March 9,2026
कल प्रकाशित हुए ज्ञानप्रसाद लेख से जानकारी प्राप्त हुई कि न केवल कुछ एक परिवारजनों के पास “महाशक्ति की लोकयात्रा” की हार्ड कॉपी उपलब्ध है बल्कि उन्होंने इस पुस्तक का स्वाध्याय भी किया हुआ है, ऐसे साथिओं को बधाई।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में उस तत्व (मातृतत्व) की, उस केमिकल की जानकारी देने का प्रयास किया गया है जो माँ को माँ बनाता है। यही वोह केमिकल है जिसके कारण माँ करुणामई, संवेदनशील, भावनाशील, ममतामई, त्यागमई, सेवामई और सबको जोड़नेवाली बनाता है। लेकिन एक प्रश्न उठता है कि क्या विश्वभर की लगभग 4 बिलियन सभी माताओं में यह गुण देखे जाते हैं ? अध्यात्म ने इस मातृतत्व को कैसे Explain किया है, ऐसे ही जटिल प्रश्नों के उत्तर ढूढ़ने की दिशा में आज के ज्ञानप्रसाद लेख की रचना की गयी है। लेख का शुभारम्भ “माँ की व्याख्या” से किया गया है जो इस दिव्य पुस्तक का प्रथम चैप्टर है।
आइए आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ विश्वशांति से करें।
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
माँ के स्नेहिल स्मरण से हम सबके मन-प्राण अनोखी पुलक से भर जाते हैं। अनेकों अहसास, अगणित अनुभूतियां और असंख्य भावनाएं अंतःकरण के आंगन में बरबस बरस पड़ती हैं। यादों के घने बदल बार-बार अंतर्गगन में उमड़ते हैं और माँ के प्यार का जीवन-जल मुरझाए प्यासे प्राणों पर उड़ेल देते हैं। ऐसा लगता है कि अपनी माँ दूर किसी लोक में नहीं बल्कि अपने पास है, एकदम पास है। उसके आंचल का सुखद किनारा हमें छू रहा है, स्नेहभरा हाथ हमारे सिर पर फिर रहा है, माँ की आशीषों की छांव में हमारा जीवन सुरक्षित है।
माँ ! तुम्हारे सिवा हम बच्चों का और है भी कौन! चाहे जैसा भी समय हो हम सब केवल माँ को ही पुकारते हैं। जीवन की हर चोट, हर दुःख दर्द में “हे माँ, ओह माँ” जैसे शब्द ही निकलते हैं। हमें केवल तुम्हारी याद आती है। आंसू भरी आंखों और पीड़ा से विकल हमारे जीवन के लिए तुम्हारी याद ही एकमात्र औषधि है। हमें अच्छी तरह से मालूम है कि हमारी कमियों-कमजोरियों, बेवकूफियों, नादानियों को एक तुम्हीं अनदेखा करके हमको अपना सकती हो।
माँ ! तुम्हारी क्षमा अपार है। इसकी न तो कोई सीमा है और न ही शर्तबंदी। क्षमा ही तुम्हारा स्वभाव है। फूल से गन्ध और दीए के प्रकाश की भांति तुम क्षमा बरसाती हो। जिस प्रकार पहाड़ों से जल झरता है, मेघों से वर्षा होती है, हे क्षमास्वरूपिणी माँ ! सृष्टि के हर स्थूल-सूक्ष्म विधान में प्रत्येक छोटी-बड़ी गलती या अपराध के लिए कोई-न-कोई सजा निश्चित है, सृजेता के कठोर कर्मफल विधान से हम सभी बंधे हैं। यहां तक कि स्वयं सृजेता भी कर्मफल की हस्तरेखाओं को स्वीकार करता है, परंतु हे क्षमामयी माँ तुम्हारी क्षमाशक्ति से जीवन के महापातक भी पल में विनष्ट होते हैं। यह क्षमाशक्ति सृष्टि के समस्त विधानों से भी अनंत गुना समर्थ है।
मात्र एक का अक्षर महामंत्र “माँ” ही हमारा प्राण है। “माँ,माँ” जपते हुए हमारे ऊपर तुम्हारी कृपा-किरणों की वृष्टि हुई है। जीवन में अलौकिक अनुभूतियों के अनेकों सुअवसर आए हैं।
जगत जननी माँ “वंदनीय माताजी के इस धरती पर अवतरण के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के बच्चों और बच्चियों द्वारा वर्ष 2026 में आपकी महिमा के गुणगान में समर्पित होना भी एक अद्भुत सुअवसर है। माँ वरदान दो, देश-विदेश में फैली इस संतान के सिर पर अपनी कृपा का हाथ रखो ताकि हम न केवल आपकी लीलाकथा का पुण्य स्मरण करें बल्कि आपकी प्रेरणा, आपकी शिक्षा को अपने अंतर्मन में उतारने का प्रयास करें। माँ ! अब ऐसी कृपा करो कि “महाशक्ति की लोकयात्रा” पुस्तक में वर्णित “पुण्य कथा” तुम्हारे ही अमित प्रभाव से हम सब बच्चों को तुम्हारी अविरल भक्ति का वरदान देते हुए मातृतत्त्व (मातृतत्त्व न कि मातृत्व)का बोध करा सके।
यहाँ पर “मातृत्व और मातृतत्व का अंतर्” समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है। ऐसा लगता है कि यह दोनों शब्द आपस में ऐसे गुंथे हुए हैं की उन्हें अलग करना समझदारी नहीं होगी। इस लेख श्रृंख्ला के तुच्छ लेखक ने पठन के फ्लो में मातृत्व और मातृतत्व को एक ही समझ लिया था लेकिन ऐसा है नहीं। मातृतत्व, उस तत्व, Ingredient, उस केमिकल को कहते हैं जिसके कारण नारी में मातृत्व की विशेषताएं समाहित होती हैं। संवेदना, भावनाशीलता,करुणा आदि विशेषताएं जिनके कारण एक नारी, नारी बनती है। कुछ विशेष केमिकल्स नारी को नारी बनाते हैं जो उसे पुरुष से अलग बनाते हैं। वैज्ञानिकों ने तो यहाँ तक रिसर्च करके बता दिया है कि Oxytocin,Estrogen जैसे केमिकल महिलाओं में पैदा होने के कारण संवेदनशीलता, भावना और करुणा के लिए ज़िम्मेदार हैं। जब महिलाओं में इन केमिकल्स की प्रतिशत कम होती है तो वह Man-ish (पुरुषों जैसा) और जब पुरुषों में इन केमिकल्स की प्रतिशत अधिक हो जाती है तो वह Woman-ish (महिलाओं जैसा) बर्ताव करते हैं।
यदि हम अपने आसपास दृष्टि दौड़ाएं तो देखेंगें कि करुणा, संवेदनशीलता, भावना आदि के लिए Female का योगदान ही देखने को मिलेगा। परिवार में बेटे और बेटी,विवाह के बाद पति और पत्नी, यहाँ तक कि आद अरुण जी की बाल संस्कार शाला में भी बेटियां आठ और बेटे केवल दो ही हैं, इतना ही नहीं उद्घोष में भी बेटियों की आवाज़ और उत्साह बेटों से बढ़कर है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का भी सारा बोझा हमारी समर्पित बहिनें ही उठाए हुए हैं, करबद्ध प्रार्थना है कि हमारे भाई साथी इसे अन्यथा न लें, हम खुद भी तो पुरुष ही हैं,रोज़ाना अंतर् देखते ही हैं।
करुणा, संवेदना आदि के लिए वंदनीय माता जी का शपथ समारोह वाला उद्बोधन इस सन्दर्भ में बहुत ही सटीक है,पूज्यवर का वोह वाला उद्बोधन जिसमें कह रहे हैं “भगवान् न करें आपका एक्सीडेंट हो जाए, हम खाना खायेंगें यां आपको हस्पताल पंहुचाएंगें” संवेदना की परिकाष्ठा वर्णन कर रहा है।
तो साथिओ चर्चा का विषय मातृत्व और मातृतत्व को समझना है। इस विषय पर अथाह साहित्य उपलब्ध है, आइए पुस्तक का ही सहारा लेकर मातृत्व और मातृतत्व का अंतर समझने का प्रयास करें।
समस्त संवेदनाओं का मूल तत्व मातृतत्त्व ही है :
मातृतत्त्व जीवन और जगत् की समस्त संवेदनाओं एवं संभावनाओं का मूल (Basic ingredient) है। मनुष्य की रचना की सभी संवेदनशील विशेषताएं इसी तत्व की उर्वरता में अंकुरित होती हैं। सृष्टि की सारी संभावनाएं इसी तत्व से अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं। यही वह परम पूर्णता है, जिसके एक अंश से जगत् का विस्तार हुआ है। यह सृष्टि की कोख है,जिससे जीवन के विविध रूप जन्मे हैं। दार्शनिकों ने इसी को जीवन व जगत् के सभी अनिवार्य तत्त्वों को धारण और पोषण करने वाली “मूल प्रकृति” कहा है। यही ऋग्वेद में वर्णित आदिमाता अदिति हैं, जो स्वयं अनादि, अनंत, और अविभाज्य रहते हुए सभी लोकों को जन्म और जीवन देती है। अंत में सब इसी में विलीन हो जाते हैं। विश्व-ब्रह्माँड को संचालित करने वाली “आदिशक्ति” इसी मातृतत्त्व का ही परिचय है।
मातृतत्त्व का बोध समस्त योग साधनाओं की चरम परिणति है। योग के विभिन्न तत्त्व व प्रकार, विधि और अनुशासन इसी परम पूर्णता को जानने व पाने के लिए हैं। चित्तवृत्ति निरोध से मातृतत्त्व की चित् शक्ति ही प्रकाशित एवं प्रकट होती है। इसी में साधक को अपने स्वरूप का बोध होने के साथ अनेकानेक यौगिक विभूतियों की प्राप्ति होती है। साधकों की साधना व सिद्धि की आधारभूमि यही है। यही योगियों की कुंडलिनी शक्ति है। जिसके जागरण मात्र से योग साधकों में महाशक्ति की अभिव्यक्ति के अनेकों स्रोत खुल जाते हैं। मातृतत्त्व की कृपा से ही योग साधक सक्षम व समर्थ बनता है। अनेकानेक सिद्धियां एवं विभूतियां उसका अनुगमन व अनुसरण करती हैं।
मातृतत्त्व का सामान्य परिचय जीव को जन्म लेते ही हो जाता है। प्रत्येक प्राणी मातृतत्त्व की सजल भावानुभूतियों में जीवन पाता है। उसकी माँ ही उसके लिए सब कुछ होती है। उसके हृदय से पहली पुकार माँ के लिए उठती है। होठों से पहला शब्द माँ निकलता है। सारे रिश्ते-नाते, सारी संबंध-संवेदनाएं मातृतत्व के इर्द-गिर्द अपना अस्तित्व बुनती हैं। सबके केंद्र में माँ ही होती है। जो माँ से घनिष्ठ होता है, उसी से घनिष्ठता की अनुभूति होती है। माता के संवेदन विस्तार में जीवन की संवेदनाएं विस्तार पाती हैं। जन्मकाल में केवल यही एक जीवन सत्य अपनी संपूर्ण तीव्रता में, समूचे अस्तित्व में स्पंदित होता है। यह समझने में किसी को तनिक-सी भी देर नहीं लगनी चाहिए कि प्रत्येक शिशु का जीवन मातृमय होता है। मातृतत्व ही उसके लिए सुख, सुरक्षा, आनंद एवं प्रेम का साधन होता है।
लेकिन भावना से ओतप्रोत यह अनुभूतियाँ स्थायी नहीं रह पातीं। जैसे-जैसे जीवन चेतना बहिर्मुखी होती है, ये भावनाएं विलीन होती जाती हैं। मनुष्य के जीवन में अहंता के पनपते ही वे वही संबंध-संवेदनाएं जो कभी माता के गर्भ में अपने जीवन को मजबूती से बांधे हुए थीं,दुर्बल होने लगती हैं। फिर एक ऐसी स्टेज भी आ जाती है जब बौद्धिकता के घमंड के वशीभूत, जीवन को जन्म देने वाली माँ को अलग और दूर होना पड़ता है।
जिस अंश से सृजन हुआ था, जिस अंश ने रचना की थी, वही अंश स्वयं को परम-पूर्ण समझने का घमंड पाल लेता है।
इसी के साथ शुरू होती है भूलने और व्यस्त रहने की नाटकबाज़ी, जिस माँ ने मनुष्य को इस संसार में लाया, उसी मनुष्य ने व्यस्तता और भुलक्क्ड़बाज़ी के बहाने से माँ को दूर कर दिया। मनुष्य को सुप्रसिद्ध तथ्य “विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियाः समस्ताः सकला जगत्सु अर्थात हे माता विश्व की सारी विद्याएं एवं जगत की सारी स्त्रियां तुम्हारा ही स्वरूप हैं” भूल ही जाता है। मातृतत्व से विलग होकर जीवन अनजान अंधेरों की भटकन में भटकने लगता है।
इस भटकन से उबरने का एक ही उपाय है:
मातृतत्व के प्रति सच्ची इच्छा,जगत् और जीवन को जन्म देने वाली माँ के प्रति अविरल अनुराग। यही उस महायोग का प्रारंभ बिंदु है, जो जीवन की अपूर्णता को परम पूर्णता की ओर ले जाता है और अपनी चरम परिणति में उसे पूर्णता का वरदान देता है।
वैदिक ऋषियों से लेकर महायोगी श्रीअरविंद ने इसी पथ का अनुसरण किया है। इस पथ पर चलकर ही वे पूर्णता के वरदान से लाभान्वित हुए। ऋग्वेद के अगणित मंत्रों के साथ श्रीअरविंद के मंत्र काव्य सावित्री की अनेकानेक पंक्तियां इस समाधि-सत्य की साक्षी हैं। महायोगी श्रीअरविंद ने मंत्र काव्य सावित्री के तीसरे पर्व को ‘भगवती श्रीमाता का पर्व’ कहा है। इसमें मातृतत्व की बड़ी ही मार्मिक एवं अनुभूतिपूर्ण व्याख्या है।
परमपूज्य गुरुदेव की अनुभूति भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने एक नहीं, अनेक स्थानों पर कहा है:
“मातृतत्त्व की साधना ही जीवन को संस्कारित एवं परिष्कृत करती है। इसी से जीवन समर्थ एवं शक्तिवान बनता है।”
कल विशाल ज्ञानसागर में डुबकी लगाकर,माँ को समझने के लिए, सागर की तह से कुछ रत्न ढूंढने का प्रयास करेंगें।