March 8,2026
(अंतराष्ट्रीय महिला दिवस को समर्पित वीडियो)
सप्ताह का प्रथम दिन सोमवार,एक दिन के अवकाश के बाद अद्भुत ऊर्जा से ओतप्रोत दिन,उससे भी बढ़कर अंतराष्ट्रीय महिला दिवस, माँ जगजननी, बहिन, बेटी,बहु, पत्नी एवं संसार की प्रत्येक नारी को समर्पित दिन अत्यधिक शक्ति से भरपूर दिन पर ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सभी साथिओं का ह्रदय से अभिवादन, स्वागत है।
आज का ज्ञानप्रसाद लेख अलग-अलग भागों में प्रस्तुत किया गया है। सबसे पहले तो प्रथा अनुसार,समापन हुई लेख शृंखला का Wrap-up करना होगा, उसके बाद आने वाले दिनों की रणनीति का वर्णन होगा और अंत में वंदनीय माता जी के जीवन पर आधरित दिव्य रचना महाशक्ति की लोकयात्रा का संक्षिप्त सा वर्णन देना उचित रहेगा।
1.परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस पर आरम्भ हुई लेख श्रृंखला के अंतर्गत 31 लेख परिवार के समक्ष प्रस्तुत किये हए। पहले चरण में अलग-अलग वर्षों में, अखंड ज्योति में वसंत पर्व पर प्रकाशित हुए 20 लेखों का प्रकाशन हुआ। दुसरे चरण में परिवार के समर्पित साथिओं: आदरणीय संध्या जी,आदरणीय सरविन्द जी परिवार एवं सबकी प्रिय बेटी, DSVV में Masters की विद्यार्थी के योगदानों ने इस परिवार की शोभा बढ़ाई।
आदरणीय चंद्रेश के अनुसार परिवारजनों का इतना कम योगदान चिंतन का विषय तो अवश्य है लेकिन You can take the horse to water but you cannot make him to drink, घोड़े को जल के पास घसीटा तो जा सकता है लेकिन उसे अमृतपान के लिए कहाँ विवश किया जा सकता है,जीवनदायनी संजीवनी बूटी कहाँ सुँघाई जा सकती है !!!!
इस बार के साप्ताहिक विशेषांक पर इस विषय पर बहुत विस्तार से बात हुई है, इसे और आगे बढ़ाना अनुचित ही होगा। सबसे उत्तम विचार “जिसने ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करना है उसे कहने की ज़रुरत ही नहीं है और जिसने नहीं करना है उसके लिए सौ बहाने हैं ,कहने का कोई असर नहीं है।” सभी साथिओं विशेषकर आद नीरा जी (जो इस विषय पर हमारी हर समय चिंता करती रहती हैं) के आभारी हैं जिन्होंने Brain storming डिस्कशन में कमैंट्स के माध्यम से पार्टिसिपेट किया।
2.साथिओं के साथ वर्ष 2026 का महत्व बार-बार शेयर कर चुके हैं, संलग्न स्लाइड भी शेयर कर चुके हैं, फिर से रिपीट कर रहे हैं कि वर्ष 2026 के सभी दिन,परम वंदनीय माता जी के अवतरण, परम पूज्य गुरुदेव की साधना को एवं अखंड दीप के प्राकट्य को समर्पित करने की योजना है। हमें पूर्ण विश्वास है कि गुरुसत्ता हमारी उँगलियाँ पकड़कर हमसे यह सारे संकल्प पूरी करवा लेगी क्योंकि हम तो मात्र रगमंच की पुतली हैं, हमारे नाच की डोर तो उनके हाथों में है।
3.अक्सर हम कहते आये हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की प्रत्येक गतिविधि एवं कार्यकलाप के पीछे गुरुदेव की अदृश्य शक्ति कार्य कर रही है तो यह भी कहते है कि हमारा मार्गदर्शन भी गुरुदेव ही कर रहे हैं। इसका प्रतक्ष्य प्रमाण एक बार फिर से तब देखने को मिला जब हम आज से परम वंदनीय माता जी के जीवन पर आधारित लेख श्रृंखला का शुभारम्भ कर रहे हैं। न जाने कितने ही दिन पूर्व न केवल परम पूज्य गुरुदेव ने वंदनीय माता जी के अवतरण सम्बन्धी लेख श्रृंखला के संकेत दे दिए थे बल्कि हमारे हाथों में एक दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” भी थमा दी थी ।
अब इसे कोई संयोग कहें यां संकेत,अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के समय ऐसा संकेत/निर्देश मिलना अवश्य ही हमारे जैसे निम्नस्तर के पुरषार्थी के अंतर्मन में गुरुसत्ता के समक्ष शीश नवाने जैसा पुनीत अवसर है। इस पुनीत अवसर के भागीदार बन रहे, हमारे साथ सभी साथी अपनेआप को सौभाग्यशाली मान रहे हैं।
ऐसी बात इतनी दृढ़ता से कहना इसलिए प्रासंगिक हो जाता है कि जिस श्रद्धा से यह अद्भुत पुस्तक लिखी गयी है, जिस श्रद्धा से आने वाले लेख लिखे जायेंगें, यदि उसी श्रद्धा एवं भक्ति से आने वाले लेखों का अमृतपान किया जायेगा तो अवश्य ही पाठकों की मानसिक चेतना परामानसिक अनुभूतियों (Paranormal experiences) के क्षीर सागर में तैरने लगेगी। साधना पथ के जिज्ञासुओं के लिए यह लेख शृंखला एक मार्गदर्शिका साबित होगी, ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात गाँठ बाँध लेने जैसी है कि कभी-कभार दर्शन देने वाले साथिओं को यह लेख श्रृंखला शायद ही कोई लाभ प्रदान कर सके। इसलिए यदि माँ के आँचल में ममत्व की अनुभूति करनी है तो बिना अवकाश लिए, संकल्पित होकर एक-एक शब्द ग्रहण करना उचित होगा।
हमें स्मरण आता है कि 1980s में युगतीर्थ शांतिकुंज आने वाले प्रत्येक परिजन को युगतीर्थ की मर्यादा का पालन करना पड़ता था,नियमित समय पर गेट से बाहिर जाना,भोजन में नमक/मिर्च आदि का संयम बरतना आदि शामिल थे क्योंकि इसे पिकनिक न समझकर तीर्थसेवन का लाभ उठाने का एक मार्ग समझा जाता था। ज्ञानप्रसाद लेखों का लाभ उठाने के लिए भी इसी तरह का अनुशासन आवश्यक है और जो साथी इस अनुशासन का पालन कर रहे हैं, उन्हें जो लाभ हो रहा है, वोह स्वयं ही इसके साक्षी हैं।
युग निर्माण योजना द्वारा प्रकाशित, ब्रह्मवर्चस द्वारा सम्पादित “महाशक्ति की लोकयात्रा” में आदरणीय डॉ प्रणव पंड्या जी द्वारा लिखी भूमिका बहुत ही प्रेरणादायक एवं दिल को छू लेने वाली है।
यदि इस लेख श्रृंखला का शुभारम्भ श्रद्धेय जी की भूमिका के साथ किया जाए तो उससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा।
तो आइए उनकी दिव्य लेखनी का अमृतपान करें :
“महाशक्ति की लोक यात्रा” परम वंदनीय माता जी के दिव्य जीवन की अमृत कथा।
सुप्रीम प्रभु जब “संभवामि युगे-युगे” के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए मानव कल्याण हेतु धराधाम में अवतरित होते हैं, तब उनके साथ उनकी लीला शक्ति का भी नारी रूप में प्रायः इस लोक में अवतरण होता है। इतिहास-पुराण के अनेकों पृष्ठ भगवत्कथा के ऐसे दिव्य प्रसंगों से भरे पड़े हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के साथ माता सीता आईं। लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के साथ माता रुक्मिणी का आगमन हुआ भगवान बुद्ध के साथ यशोधरा का, चैतन्य महाप्रभु के साथ देवी विष्णुप्रिया का इस लोक में आविर्भाव हुआ। भगवान् श्रीरामकृष्ण देव के साथ माँ शारदा ने अवतार लेकर उनके ईश्वरीय कार्य में सहायता की। ये सभी महान नारियां एक ही महाशक्ति की विभिन्न कलाओं के रूप में अवतरित हुईं और भगवान् की अवतार लीला में उनकी सहायक बनीं।
वर्तमान युग में उसी महाशक्ति ने माता भगवती के रूप में अपनी समस्त कलाओं के साथ, संपूर्ण रूप में इस धरालोक पर अवतार लिया। अपनी इस लोकयात्रा में महाशक्ति ने अपने आराध्य वेदमूर्ति तपोनिष्ठ युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव के ईश्वरीय कार्य में सहायता करने के साथ हम सबके सामने अनेकों जीवनदर्शन प्रस्तुत किए। आदर्श गृहिणी,आदर्श माता, आदर्श तपस्विनी, आदर्श गुरु का स्वरूप हम सबके समक्ष प्रकट किया। यही नहीं उन्होंने अपने पवित्र और साधना संपन्न जीवन के द्वारा भारतीय नारी की गरिमा को भव्य अभिव्यक्ति दी। उन्होंने इस श्रुति वाक्य को अपनी जीवन साधना से सत्य सिद्ध किया कि “नारी अबला नहीं शक्तिस्वरूपा है, वह आश्रित नहीं आश्रयदाता है।”
इन पंक्तियों के लेखकों को कई दशकों तक वंदनीय माताजी के निकटतम रहने का सौभाग्य मिला है। सालों-साल एक छत के नीचे उनके साथ हंसना-बोलना, खाना-पीना,उनके वात्सल्य का सतत पयपान करते हुए जीना, यहां तक कि उसके महाप्रयाण के क्षण तक उनके पास रहना, उन्हीं की कृपा से संभव हुआ है। उनके साथ गुज़रा हर पल अभी भी स्मृतियों में सुरक्षित और संरक्षित है। इस अमूल्य निधि को अब तो दिन में कई-कई बार खोलकर देखने की आदत-सी पड़ गई है। उनकी याद करने से गहन साधना से प्राप्त होने वाला आत्मबल और अजस्र शांति मिलती है। मैंने उनके जीवन को सदा से ही बहुआयामी देखा है। वह अति सरल, सहज एवं अति रहस्यपूर्ण थीं। लोक में रहते हुए भी वह पूर्णतया अलौकिक थीं। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि उनके जीवन की सम्पूर्ण व्याख्या पूर्णतया असंभव है।
ब्रह्मवर्चस द्वारा संपादित इस पुस्तक में जो कुछ लिखा गया है वह दृश्य सत्यों का भावपूर्ण संकलन है। हालांकि ये दृश्य-सत्य ऐसे झरोखों की तरह हैं जिनसे अदृश्य बरबस झांकना–झलकता और प्रकट होता है। यदि भक्तिपूर्ण रीति से, श्रद्धा भाव से इसे पढ़ा जाएगा, तो पढ़ने वाले की मानसिक चेतना परामानसिक अनुभूतियों के क्षीर सागर में तैरने लगेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। परम वंदनीय माताजी की कृपा प्राप्ति के इच्छुक जनों के लिए इस पुस्तक को पढ़ना जैसे सुवर्ण पथ पर चलना है। स्थूल देह में न रहने पर भी असंख्य जन आज भी वंदनीय माताजी की पराचेतना की अनुभूति प्राप्त करते हैं। सत्य यही है कि वे आज भी हैं, यहीं हैं, हमारे एकदम आस-पास हैं। मेरा तो यह विश्वास है कि इन क्षणों में इस पुस्तक को थामे हुए जनों के हृदयों में उठ रहे भाव स्पंदनों को वह महसूस कर रही हैं।
उन्हें पुकारने के लिए इस पुस्तक का पठन और श्रवण एक श्रेष्ठ साधना है। इसमें उनकी लोकयात्रा के अनेकों ऐसे प्रसंग है, जो उन भावमयी की भावात्मक अनुभूति देने में समर्थ हैं। योग विज्ञान के विद्यार्थी उनके इन प्रसंगों को पढ़ने व मनन करने से समझ सकेंगे कि सच्ची योग साधना क्या होती है! जो भक्त हैं, उनके लिए “महाशक्ति की लोकयात्रा” का पठन और चिन्तन जीवन-सुधा की तरह है। जिसे जितनी तरह से और जितनी बार पिया जाए, उतनी ही आत्मचेतना को नवस्फूर्ति प्राप्त होती है। वे इस लोक में हम सबके लिए ही आई थीं। हमारी अंतर्चेतना को जगाने, इसे ऊपर उठाने, हम सबके जीवन के कष्ट-कठिनाईयों से छुटकारा दिलाने के लिए वह अपनी समूची लोकयात्रा में प्रयत्नशील रहीं। आज जब वह अपने दिव्यधाम में हैं, तो भी उन्हें सदा हमारा ही ध्यान रहता है
ऐसी वात्सल्यमयी मां को भक्तिपूर्ण प्रणाम करते हुए मेरी यही प्रार्थना है-
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वर्तिहारिणि त्रैलोक्यवासिनाड्ये लोकानां वरदा भव।। -देवी सप्तशती 11/35
‘‘विश्व की पीड़ा को दूर करने वाली मां! हम तुम्हारे चरणों में पड़े हुए हैं। हम प्रसन्न होओ। त्रिलोक निवासियों की पूजनीय परमेश्वरी, सब लोगों को वरदान दो।’’
महाशक्तिमयी माताजी से इस प्रार्थना के साथ यह पावन प्रयास अब आपके हाथों में सौंपा जा रहा है। आप सभी पर उनके कल्याणमय आशीषों की सतत वर्षा होती रहे।
आशा करते हैं कि डॉ साहिब की इस प्रस्तुति से पाठकों की आत्मा अवश्य ही तृप्त हुई होगी।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन इस जानकारी से करेंगें कि इस दिव्य पुस्तक की हार्ड कॉपी,सॉफ्ट कॉपी, टेक्स्ट कॉपी, Scanned कॉपी अलग-अलग प्लैटफॉर्म्स पर उपलब्ध है। इतना ही नहीं विचारक्रांति पुस्तकालय की वेबसाइट पर इस पुस्तक की Sanskritized version भी उपलब्ध है। DSVV के वेद विभाग के पंडित यमुनादत्त शास्त्री जी ने इसका संस्कृत में अनुवाद करके मिशन की अनुपम सेवा की है।
परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के चरणों में करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि Websites आदि का पूरी तरह से सहयोग बना रहे क्योंकि इतनी जगहों पर उपलब्ध होने के बावजूद कई बार ऐसी दुविधा आन पड़ती है जो अवसाद का कारण बनती है।
धन्यवाद्, जय गुरुदेव


