March 5,2026
एक बार फिर से संयोग है कि अगले प्रयास का शुभारम्भ सप्ताह के प्रथम दिन सोमवार से हो रहा है।
परिवार की समर्पित एवं प्रिय बेटी संजना के इस अद्भुत योगदान से इस दिव्य श्रृंखला का समापन हो रहा है। बेटी के विचार किसी को भी ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं। एडिटिंग करते समय, हमारे सामने वही हाई स्कूल की छात्रा घूम रही थी जिसने टंगस्टन जैसी आग उगलती कविता इस परिवार में शेयर की थी। विश्वास नहीं होता की आज वही बच्ची मास्टर्स कर रही है। उस कविता में भी बेटी अनेकों को मार्गदर्शन दे गयी थी और आज के इस कंटेंट में भी बहुत कुछ कह रही है।
पाठक तो ध्यानपूर्वक अमृतपान करके अपने विचार लिखेंगें ही लेकिन आदरणीय महेंद्र शर्मा जी के साथ की गयी वार्ता, पूछे गए तीन प्रश्न एवं प्राप्त हुए उत्तर न जाने कितनों को राह दिखा दें, ऐसा हमारा व्यक्तिगत विचार है।
हो सकता है अगली बार जब आद अरुण जी, सुजाता बहिन जी आदि शांतिकुंज जाएँ तो इसी प्रकार इन दिव्य आत्माओं के सानिध्य में बैठकर अविस्मरणीय,आश्चर्जनक,अविश्वसनीय किन्तु सत्य संस्मरण रिकॉर्ड करके ले आएं, परिवार में शेयर करवा सकें। ऐसा प्रयास एकदम यूनिक होता है।
कंटेंट के साथ बेटी द्वारा अटैच किये गए सभी इमोजी यथावत रखे गए हैं, साक्षात् उसकी भावना व्यक्त कर रहे हैं।
तो चलो आओ करें बेटी संजना के साथ One to one बात:
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आदरणीय डॉ सर जी को हमारा भाव भरा सादर प्रणाम ❤ 🙏🏻 🫂 🧿एवं हृदय से बारंबार धन्यवाद। विचार क्रांति अभियान के एक सच्चे एंबेसडर के रूप में हम सभी के ह्रदय को अनवरत एक सही/ सुदृढ़ दिशा देने के साथ-साथ, प्यार सहकार और वात्सल्य को भी हम पर लूटाने के लिए 🙏❤🫂🧿।
दो सप्ताह पूर्व Sunday outing में शांतिकुंज गए थे, उस दिन☀ की 🔥कुछ अनुभूतियों को अपने परिवार👨👦👧👩👴👵 के🙇♀️🙏 साथ साझा करना चाहते हैं🙏🙇♀️।
रविवार को मैं सुबह उठी, उसी दिन हमारी यूनिवर्सिटी में सामूहिक श्रमदान था, तो उसमें प्रतिभागी किया। तत्पश्चात जीजी से मिलने जाना था क्योंकि हमारे पापा जी ने हमें एक जिम्मेदारी सौंपी थी। परिव्राजक के रूप में शांतिकुंज सत्र के दौरान,समय-समय पर पापा जी को अपने कार्यक्रम की गतिविधियों की प्रगति रिपोर्ट (Progress report) जीजी को सौंपने का निर्देश मिला था। हमारी ज़िम्मेदारी इस रिपोर्ट को जीजी तक पंहुचाना था।
यूनिवर्सिटी में श्रमदान करते-करते हम थोड़ा लेट हो गए, भाग-भाग कर यूनिवर्सिटी से शांतिकुंज जा रही थी क्योंकि आउटिंग का समय हमें सुबह 6:30 से दोपहर 12:00 तक का ही मिलता है,7:00 तो यूनिवर्सिटी में ही बज गये थे। भागमभाग में मेरा दुपट्टा रास्ते में गिर गया क्योंकि मुझे डर था कि मैं लेट हो गयी तो कहीं जीजी से मिलने का समय ही खत्म न हो जाए। इसलिए मैं दौड़ दौड़ कर जा रही थी।
शांतिकुंज पंहुच कर मैं सीधे अखंड दीप के पास पहुंची। हांफते-हँसते मैं वहां के बाबूजी या जो भैया खड़े थे उनसे पूछा कि मैं जीजी से मिल सकती हूं क्या? तो भैया भी मेरी नकल करते हुए, हाँफते-हंसते बोले हां आप मिल सकती हो। मिलने वालों की लाइन खत्म ही होने वाली थी और मैं उस लाइन में अंतिम ही थी। पापा जी की प्रगति रिपोर्ट लेकर खड़ी हो गई, जीजी से मिली, पापा जी की रिपोर्ट दी। आशीर्वाद माँगा कि मम्मी पापा दोनों अच्छे से गुरुजी का काम करते रहें। जीजी ने आशीर्वाद दिया और मेरी पढ़ाई के बारे में पूछा।
उसके बाद मैं गुरु जी के साधना कक्ष के दर्शन करने गई और अखंड दीप का दर्शन किया। नीचे उतर कर जा रही थी तभी पास में ही आदरणीय महेंद्र शर्मा बाबूजी के ऑफिस की ओर खिंची चली गई, पता नहीं क्या हुआ !!!! मैं उनके पास जाकर खड़ी हो गई। हमेशा उनके ऑफिस के सामने से गुजरती थी लेकिन उनके पास बहुत से लोग होते थे तो नहीं जाती थी लेकिन इस बार ऐसा अनुभव हुआ कि मुझे कोई खींचकर ले गया। मैं उनके पास जाकर खड़ी हो गयी, मेरी अश्रुधारा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। उन्होंने पूछा कुछ बोलना है? मेरे मुख से कोई भी शब्द ही नहीं निकल रहे थे। उन्होंने बोला लिखकर बताओगी, मैं फिर भी कुछ बोल ही नहीं पा रही थी,बड़ी ही मुश्किल से स्वयं को संभालने की कोशिश कर रही थी। अंत में मैं फूट-फूट कर रोने लगी। थोड़ी देर बाद शांत हुई तो मैंने आदरणीय डॉक्टर सर का परिचय दिया। मैंने कहा कि मुझे आपके बारे में आदरणीय डॉक्टर त्रिखा सर जी के यूट्यूब चैनल द्वारा प्रसारित ज्ञानप्रसाद के अमृतपान से पहली बार पता चला था। वहीँ से पता चला कि कैसे आपके दोस्त ने पहली बार आपके लिए धोती खरीद कर दी थी, कैसे आप हिमालय के गुरु जी से ही दीक्षा लेना चाहते थे क्योंकि हमारे गुरु जी देखने में बिल्कुल भी कोई महान पहुंचे हुए संत नहीं लगते थे। एक बार बाबूजी जिज्ञासावश परम पूज्य गुरुदेव के कक्ष में जाकर देखे थे तो उन्हें बाघ की सवारी करते हुए गुरुजी माता जी की झलक प्राप्त हुई थी। मैं यह सारी बातें बोली जा रही थी और बाबूजी मेरी हां में हां मिला रहे थे, अपनी कुछ अनुभूतियां भी साझा करते जा रहे थे।
फिर मैंने बताया बाबूजी आपसे जब मैं एडमिशन के टाइम मिली थी तो आपने पूछा था कि मनोविज्ञान में पढ़ रही हो तो मैंने बोला आपको कैसे पता चला क्योंकि मैंने तो बताया ही नहीं था। उन्होंने हंस दिया था और बोला था ठीक है मास्टर्स भी कर लेना,उस समय मेरा मास्टर्स का कोई प्लान नहीं था। उसके बाद उन्होंने पूछा पढ़ाई अच्छे से चल रही है न ? घर में सब कैसे हैं?
अंत में मैंने उनसे तीन प्रश्न पूछे:
पहला प्रश्न यह था कि गुरु जी सतयुग की वापसी का सपना देख रहे हैं वैसा हमें कुछ भी रियलिटी में दिख नहीं रहा। उन्होंने बोला कि हां बेटी सही कह रही हो, मुझे भी यहां रहते इतने वर्ष हो गए हैं परंतु मुझे आजतक एक भी वैसा इंसान नहीं मिला जो बोल्डली यह कहे कि हां मैं गुरु जी के लिए लोभ मोह छोड़ने को तैयार हूँ। हर कोई गुरुजी से हमेशा मांगता ही रहा कि बच्चा दे दो, नौकरी दे दो। जब उनका परिवार सेट हो गया तो वह गुरु जी को छोड़कर जाने लगे क्योंकि अब गुरु जी की क्या जरूरत? अब तो बच्चे विदेश में सेट हो गए अब उनका काम तो निकल गया।
लेकिन फिर भी जैसे माँ अपने बच्चों को पकड़ कर तब तक नहलाती है जब तक बच्चे की गंदगी साफ नहीं हो जाती, तब तक माँ छोडती नहीं। ठीक उसी तरह भले ही परिजन लाख गलती कर रहे हैं परंतु वो छोड़कर नहीं जा रहे, इस तरह उनके चित्त की गंदगी धुल रही है । बाबूजी आगे बोले मैं इस बात के पक्ष में हूँ कि जब परिजन नये-नये आते हैं और उनसे कोई गलती हो जाए तो उन्हें बाहर नहीं निकालना चाहिए बल्कि उन्हें परिवार की तरह प्यार से समझना चाहिए। मैं भी कभी नया था, मैं भी इस समय से गुज़रा हूँ ।उन्होंने आगे बोला कि परम पूज्य गुरुदेव अकेले सूक्ष्म रूप से सारा काम कर रहे हैं, उन्हें ऐसे लोगों की जरूरत है जो उनके काम में सहयोग कर सकें। अगर थोड़े से भी ऐसे व्यक्ति मिल जाएँ तो अपना काम बन जाए।
मेरा दूसरा प्रश्न यह था कि भगवान ने जब सृष्टि बनाई होगी तब तो सब कुछ पूरी तरह से विशुद्ध होगा, यह दुष्प्रवृतियां कहां से आई? तो उन्होंने जवाब दिया कि हां शुरू में सब कुछ सही था, बाद में मध्यकालीन युग में जब लोग अपने संस्कारों को भूल गए तो दुष्प्रवृत्तियाँ आईं। इसको उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया कि जैसे तुम्हें यहां से वहां तक जाना है और बीच में टेबल चेयर रखे हैं तो तुम उनकों रौंदते हुए तो नहीं जाओगी, तुम अपने रास्ते को ध्यान से देखते हुए जाओगी। ऐसा ही कुछ बाद में हुआ। हर कोई अपने विवेक को भूल गया और मनमानी पूर्वक जीवन जीने लगा।
मेरा तीसरा प्रश्न यह था कि एक द्वंद मुझे हमेशा परेशान करता है। मुझे पता तो है कि सबसे पहले अच्छे से पढ़ाई करनी है उसके बाद अच्छे से गुरु जी की काम करना है लेकिन जब कभी गुरु जी के विचारों के विरुद्ध गायत्री परिवार के सिस्टम में ही देखती हूं तो मुझे अंदर से बहुत गुस्सा आता है। मुझे लगता है कि मुझे कुछ करना चाहिए। यह भी लगता है कि कहीं मेरी यह इच्छा, कहीं मेरा कुछ स्वार्थ तो नहीं है। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ कि परम पूज्य गुरुदेव का यह भी कथन सुना/पढ़ा है कि अभी डिग्री पूरा करने का समय नहीं है, सब कुछ छोड़छाड़ कर अभी कुछ करने का समय है। यह बहुत ही आपातकालीन स्थिति है, इस अभियान में अभी से जुट जाना चाहिए। यह बात समझने में हमें बार-बार कंफ्यूजन होता है और लगता है कि मैं पूरा समय गुरु जी को नहीं दे पा रही। बाबूजी ने इसका जवाब भी हमें दिया कि मान लो तुम्हें एक कील ठोकने का काम दिया गया है। इस कार्य को जो व्यक्ति पढ़ा लिखा नहीं है वह करेगा तो हो सकता है वह अपने हाथों में ही मार ले। जो पढ़ा लिखा होगा वह सब कुछ कैलकुलेट करके ही राइट एंगल, ट्रायंगल पर कील को मारेगा तो काम बहुत अच्छे से हो जायेगा। दोनों के काम करने की कला में, फिनिशिंग में बहुत अंतर होता है। इसलिए तुम अपनी पढ़ाई अच्छे से पूरी करो, जरूरी थोड़ा है कि तुम मनोविज्ञान पढ़ कर, अध्यापक बन कर पढ़ाओगी ही, हो सकता है जहां तुम जाओ उस क्षेत्र में मनोविज्ञान की थ्योरी को ऐसे अप्लाई करो कि हर काम बहुत अच्छे ढंग से संपन्न हो और उसका लाभ मिले।
इस तरह बाबूजी से विस्तृत चर्चा करके अपने प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करके मुझे बहुत ही संतुष्टि मिली, मन प्रफुल्लित हुआ।
जैसे ही बाहर निकली तो मुझे आदरणीय ओमकार पाटीदार बाबूजी मिले, उन्हें प्रणाम किया। उनकी वाणी और चेहरे के तेज और ऊर्जा ⚡से जो असीम प्रेरणा मिलती है उसे शब्दों में बयां करना लगभग नामुमकीन है। मन को बहुत प्रसन्नता मिलती है।
मैंने बाबूजी को बोला कि आप तो कनाडा के आदरणीय डॉक्टर अरुण त्रिखा सर के घर से हो आए लेकिन मैं जब से उनके कांटेक्ट में आई हूं तब से वह मुझे नहीं मिले,शांतिकुंज आये ही नहीं। वह सुनकर मुस्कुरा रहे थे कि हां मैं तो उनके घर हो आया। फिर उनके साथ मैंने फोटो लिया, उन्होंने हमारा उत्साहवर्धन किया। कोई ज़्यादा बात नहीं हो पाई क्योंकि उनके कुछ जान पहचान के लोग उनसे मिलने लगे, उनको पकड़ लिया तो बाबूजी ने बोला बाद में मिलते हैं।🙏🏻
जय गुरुदेव जय महाकाल




