वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

28 फ़रवरी 2026, फ़रवरी माह के अंतिम शनिवार पर हमारी विशेष प्रस्तुति- अखंड ज्योति पत्रिका के पीडीऍफ़ एपिसोड   

हमारी व्यक्तिगत एवं ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की सामूहिक आदरणीय बहिन सुमनलता जी ने हमें सम्मान देते हुए एक सुझाव दिया कि सप्ताह के अंतिम शनिवार को हम अपने बारे में कुछ बताया करें, यह दिन हमारे लिए पूर्णतया रिज़र्व कर दिया और सभी साथिओं ने एकमत से न केवल इस स्पेशल विशेषांक का समर्थन किया बल्कि ऐसे-ऐसे विस्तृत कमेंट लिख कर अपनी स्वीकृति रजिस्टर कराई कि हमारी आँखों से अश्रुधारा प्रवाहित हो उठी। इनमें से अनेकों कमेंट, अमूल्य संपत्ति  की भांति  हम अपनी लाइब्रेरी में संजोये रखे हैं, समय-समय पर पढ़ते भी रहते हैं,पढ़ते समय लिखने वाले की छवि सामने आना स्वाभाविक है लेकिन यहाँ एक बात वर्णन करने योग्य है कि 

बहिनों को तो ईश्वर ने भावनाशील,संवेदनशील बनाया ही है लेकिन आदरणीय डॉ चंद्रेश बहादुर जी तो पुरुष हैं, लगभग हर बार ही कमेंट करके इस स्पेशल विशेषांक का न केवल स्मरण ही कराते हैं बल्कि इस सेगमेंट की प्रतीक्षा भी करते हैं। इस बार भी उन्होंने लगभग 20 घंटे वाला कमेंट किया था,इसी प्रकार आदरणीय बहिन सुमनलता जी को भी प्रतीक्षा थी। 

आज के  विशेष-विशेषांक की सारी  चर्चा “अखंड ज्योति पत्रिका के पीडीऍफ़” एपिसोड पर ही आधारित है। 

हमारे मस्तिष्क में इतना साधारण सा विषय इतना महत्वपूर्ण क्यों बन गया, गुरुशक्ति की महत्ता को वर्णन करता,साथिओं के सहयोग को वर्णन करता आज का यह विशेषांक अवश्य ही एक स्पेशल स्थान बनाएगा, ऐसा हमारा अटल विश्वास है। 

क्षमाप्रार्थी हैं कि शब्द संख्या अधिक होने के कारण,इसे गूगल ड्राइव लिंक में शेयर किया गया है, सोमवार के ज्ञानप्रसाद लेख तक यह लिंक उपलब्ध रहेगा। 

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7 फ़रवरी 2026  वाले स्पेशल सेगमेंट में अखंड ज्योति की Digital copies के बारे में निवेदन किया गया। सभी साथिओं ने बढ़ चढ़ कर सहयोग दिया। कइयों के प्रयास सफल रहे तो कइयों के असफल। 

सबसे प्रथम प्रयास तो हमारी आदरणीय छोटी बहिन जैसी भाभी राधारानी ने किया। अक्सर हम उन्हें रात को फ़ोन करते हैं ,उस दिन भी शायद रात के 11 बजे थे। कहने लगी कि  मैं सुबह ही यहाँ के शक्ति पीठ से पूछूँगी। वहां पूछने पर  तो न हो गयी। उसके बाद नोएडा दिल्ली में उनके बेटे आलोक  ने शक्तिपीठ में पता किया, कोई सफलता नहीं मिली। हमने भी वहां पर धर्मेंद्र जी से बात की, कोई सफलता नहीं मिली। 

आदरणीय चंद्रेश जी ने सबसे पहले अपनी बेटी को कहकर एक अंक की पीडीएफ भेज दी लेकिन उसमें कुछ समस्या होने के कारण, बड़ी ही झिझक के साथ, फिर से फोटोकॉपी कराने का निवेदन किया। आशीष हेड़ा जी ने तो न जाने कितने ही डिजिटल अंक भेज दिए, उन्हें बीच में रोकना पढ़ा क्योंकि इनमें से अधिकतर हमारी वेबसाइट पर  पहले से ही अपलोड हुए थे। अरुण वर्मा जी ने भी सहयोग दिया। संध्या जी, सुमनलता जी, रेणु श्रीवास्तव जी सभी ने बहुत ही जोश दिखाया  लेकिन गुरुदेव ने  रेणु  जी से  बाज़ी मरवा  ली, उन्होंने  सारा काम अपने ज़िम्मे ले लिया। 

अरुण जी ने फरवरी 2025 का अंक भेज दिया। जोश तो सभी में था लेकिन गुरुदेव किससे यह कार्य करवाना चाहते थे,यह महत्वपूर्ण था। सबसे आश्चर्यजनक बात जो सामने आयी वोह यह थी कि फ़ोन के साथ सबसे अधिक चिपके रहने वाले, तथाकथित Trained पीढ़ी,युवा साथियों में से किसी ने भी इस कार्य में कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। यह प्रतक्ष्य प्रमाण है कि  युवा पीढ़ी गुरुकार्य में कितनी सीरियस है। 

हम सभी वरिष्ठजन आज की मॉडर्न टेक्नोलोजी से इतने अधिक घबराते हैं कि क्या कहा जाए !!! आज भी Top comments और Newest first की समस्या बन ही जाती है। ऐसे साथियों का इस प्रक्रिया में योगदान करना अति सराहनीय है। 

हमें स्मरण होता है कि आज से कुछ वर्ष पूर्व हमारे साथ/ आद नीरा जी के साथ जब भी फोन से कोई समस्या आती थी तो हमारे बेटे सहायता करते थे। लेकिन उनकी व्यस्तता के कारण कई-कई दिन हमें प्रतीक्षा करनी पड़ती थी जिससे हमारे जैसे प्राणी की स्थिति बहुत ही दयनीय हो जाती थी। साथियों के साथ शायद शेयर कर चुके हैं, नियमितता का पालन करना हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। इसी कमज़ोरी के कारण हम आज तक इतना कष्ट उठा रहे हैं, अपनेआप को इतना कष्ट दे रहे हैं कि  क्या कहा जाए। सौभाग्य है कि आद नीरा जी जैसी पत्नी और आशीष-पारुल जैसे बच्चे हमारे साथ है जो हमारी इस बुरी आदत का न केवल सम्मान करते हैं बल्कि उसी में रंग गए हैं। हमारे लिए 10 बजकर 2 मिनट का अर्थ 2 मिनट ही है, 3 मिनट  होने का अर्थ है हमारे लिए  बेचैनी। मस्तिष्क में कुछ ऐसे केमिकल Secrete होने शुरू हो जाते हैं जो हमें अपसेट करने में सहायक होते हैं। क्या करें, दादाजी और पिताजी से विरासत में यही तो मिला है। दादाजी अंग्रेजों के जमाने के जेलर और पिताजी 1940 के युग के हेडमास्टर, दोनों ही मानवीय मूल्यों  के साक्षात प्रतीक। परिवार में, घर में पुलिस स्टेशन जैसा वातावरण ही बना रहता था। टेक्नोलॉजी आदि के बारे में अब तो स्थिति यह है कि हम दोनों ने एक दूसरे से पूछ कर जितना चाहिए, सीख ही लिया है। इतने ऑनलाइन विकल्प उपलब्ध हैं कि  कुछ न कुछ समाधान हो ही जाता है। हमें तो याद भी नहीं आता कि बच्चों से अब कभी भी कुछ पूछा  होगा।   

चलिए पीडीएफ विषय की ओर ध्यान देते हैं, कहीं भावना में बह कर असल मुद्दे से भटक ही न जाएं, यह भी हमारी एक और कमजोरी है, दिमाग में विचारों का प्रवाह इतना तीव्र होता है कि उन्हीं में Competition चल पड़ता है।

आदरणीय अरुण जी ने अपनी कंपनी में किसी की सहायता से कुछ सैंपल पृष्ठ स्कैन करके भेजे और कहा कि अगर ठीक हों तो आगे बढ़ें। लेकिन उनमें कुछ समस्या थी, हमने संशोधन करके वापिस भेजा लेकिन विश्वास नहीं था कि यह संशोधन हो पाएंगे क्योंकि यह आमने सामने बैठकर चर्चा करने वाले संशोधन थे। 

साथियों को बताना अति आवश्यक समझते हैं कि जब  अरुण जी ने पीडीएफ बनाकर भेजा तो उस दिन रविवार था। हमने स्वयं से पूछा कि आज रविवार के दिन अरूण जी का ऑफिस तो बंद होता है, तो फिर यह इतना सुंदर, बिल्कुल ठीक कार्य कैसे सम्पन्न हो गया। हमसे रहा न गया, हमने एकदम अरुण जो को फोन लगाया और पहला प्रश्न यही किया कि रविवार के दिन आपने यह कैसे किया। तो अरुण जी कहने लगे कि भैया जी यह हमने  ही, खुद  से किया हूँ। हमने कहा नहीं, आप झूठ बोले रहे हैं, हमें विश्वास नहीं हो रहा, आपने अपनी बेटी की सहायता ली होगी, अरुण जी कहने लगे, भैया जी हम झूठ काय को  बोलेंगे, बेटी तो इधर है भी नहीं। 

तो साथियों क्या कहें, प्रेम की भावना के वशीभूत हमारे आंखों से आंसू रुक ही नहीं  रहे थे। 

गुरुदेव ने अरुण जी से वोह कार्य करवा लिया जिसकी हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते। गुरु की शक्ति पर अंधविश्वास करना तो साक्षात अज्ञानता है लेकिन जब कोई कार्य बनना होता है तो संयोग स्वतः ही बन जाते है। मनुष्य स्वयं से पूछता है, सच में यह मैने किया है? शायद इसी को Introspection, आत्म-निरीक्षण कहते होंगे, अपनी आत्मा से बात करना, Talking  to yourself.

इसी तरह की बात हमारी आदरणीय बड़ी बहिन रेणु श्रीवास्तव जी के सम्बन्ध में लिखना चाहेंगें। जब पीडीऍफ़ आदि की चर्चा चल रही थी तो बहिन जी का मैदान में कूद पड़ना हमारे लिए एक आश्चर्यजनक बात थी। दोनों वरिष्ठ, उम्र के इस पड़ाव में अकेले और ऊपर से स्वास्थ्य सम्बन्धी कभी कोई समस्या, कभी कुछ। अपनेआप को इस कार्य के लिए  प्रस्तुत करना हमारे लिए जहाँ सम्मानजनक था वहीँ झिझक भी थी कि  बहिन जी/ भाई साहिब कहाँ फ़ोटोस्टेट दुकान  पर जाते रहेंगें, फ़ोन पर  बार-बार कहा कि बहिन जी अपनी सेहत की Cost पर कुछ नहीं करना है, जब सर्दी थोड़ी कम हो जाती है तब कर लेंगें, हमें तसल्ली हो गयी है कि  आपके पास सब Copies सुरक्षित, अब कभी भी हो जाएँ को चिंता नहीं है। बहिन जी ने बताया कि मैंने कुछ नहीं करना है, कुछ युवक हमारे  घर में किरायदार हैं, उन्हीं  को बता देंगें, वोह करा लायेंगें। अभी यह बात हो ही रही थी कि अगले दिन उन्होंने कुछ एक सैंपल पृष्ठ भेज भी दिए। जब हमने कहा कि  सब ठीक है तो उन्होंने एक-एक करके पीडीऍफ़ भेजने शुरू कर दिए, इतने परफेक्ट कि  शांतिकुंज भी पीछे रह जाये। 

यहाँ एक बात वर्णन करने योग्य है कि शुरू करने से पहले बहिन जी ने पूछा था कि  पीडीऍफ़ कैसे बनती है ,मैंने तो कभी बनाई नहीं है  और जब धन्यवाद् करने की बात आई तो कहने लगीं कि धन्यवाद् तो हमारे पतिदेव का करना चाहिए, उन्होंने ही घर पर अपने फ़ोन के कैमरे से किया है। जब हमने यह बात सुनी तो एकदम आदरणीय ईश्वर शरण पांडे जी की छवि सामने आ गयी।  सात साल पहले जब हमने उन्हें देखा, तो चकित हो गए थे इस आयु में भी फ़ोन, ईमेल, फेसबुक आदि पर युवाओं से अधिक सक्रीय हैं। आज शायद  उनकी आयु 92-93 वर्ष के लगभग होगी। वंदना जी (उनकी बेटी, राकेश जी की पत्नी) उनसे अभी कुछ दिन पहले ही मिल कर आयी हैं, बता रही थीं कि  हमें याद कर रहे थे। पांडे जी, बड़ी बहिन रेणुजी, उनके पतिदेव आदि वरिष्ठों को देखकर गुरुदेव का “युवा कौन है” वाला उद्बोधन स्मरण आ रहा है। शायद यही कारण है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के वरिष्ठों (हमारे समेत) को खीज आती है कि युवा पीढ़ी के पास समय  क्यों नहीं है, श्रम की भावना क्यों नहीं है। 

आइये इसी सम्बन्ध में युवाओं की प्रतिभा का एक उदाहरण दें लें, पीडीऍफ़ एपिसोड की ओर  फिर वापिस आएंगें। 

नीरा जी के भाई साहिब का बेटा, इधर लैंड करने के बाद कुछ समय के लिए हमारे पास रहा। वोह और उसकी पत्नी दोनों ही इंडिया में बैंगलोर में किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे। दोनों ही कंप्यूटर से रिलेटेड इंजीनियर थे। मैंने बेटे  से पूछा कि  मुझे लैपटॉप में कुछ सहायता चाहिए। बेटा नीचे, मेरे स्टडी रूम में आया, दो घंटे मेरा काम रोककर माथापच्ची करता रहा, कुछ भी नहीं बन पाया। मेरे  समय का एक-एक सेकंड इतना मूल्यवान है कि चाय आदि पीते भी फ़ोन/लैपटॉप पर कार्य करना आदत सी बन गयी है। अंत में कुछ भी समाधान न मिलने के कारण मुझे उसे बाय-बाय कहना पड़ा। आज की युवा पीढ़ी के ज्ञान पर कोई प्रतिक्रिया करना  तो उचित नहीं होगा लेकिन इतना ज़रूर कह सकते हैं कि बेसिक ज्ञान, Fundamentals की इतनी कमी है कि हर चीज़ के लिए गूगल, chatgpt, AI आदि ने जकड़ कर रखा हुआ है। अगर उसने पढ़कर ही करना है तो मैं खुद ही पढ़ लूँ। हाँ हम वरिष्ठ लोग उनसे Slow ज़रूर हैं लेकिन शायद ज्ञानार्जन की स्पीड उनसे अधिक ही हो। खैर यह दो पीडियों के बीच  की खाई है, जो शायद ही कभी भरी जा सके। लेकिन दोनों पीढ़ीओं में परस्पर सम्मान होना बहुत ही आवश्यक है।    

आइए एक बार फिर से पीडीऍफ़ की ओर  चलें 

जितने भी साथिओं ने बढ़ चढ़ कर, पूर्ण समर्पण के साथ,निस्वार्थ भाव से गुरुकार्य में गिलहरी जैसा योगदान दिया है, उनका धन्यवाद् तो करते ही हैं लेकिन गुरुदेव के उपदेश “यह घाटे का सौदा नहीं है,हमसे आपको लाभ ही लाभ मिलेगा” पर मोहर न लगाएं तो हमारे साथ अन्याय होगा। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है जिस कार्य के लिए हम दो वर्ष से, न जाने कौन से द्वार पर भीख माँग  चुके थे, यहाँ तक कि  शांतिकुंज/मथुरा से भी निराशा  ही प्राप्त हुई थी उसे गुरुदेव ने कैसे करा दिया। उस दिन रुद्राभिषेक समारोह में उत्पल भाई साहिब पुरानी अखंड ज्योति पत्रिकाओं  का पूरा बंडल लेकर आये थे, हमें कहने लगे, देख लेना, जो चाहिए निकाल लेना। हमने कहा हमारे सारे Gap पूरे हो गए हैं। इतना ही नहीं, शांतिकुंज से, पुष्पा जी, सुजाता जी एवं अन्य  अनेकों ने फ़रवरी माह की पीडीऍफ़ भेज दी, यह सब तब हुआ जब  अरुण जी और रेणु बहिन जी यह कार्य कर चुकी थीं। 

रुद्राभिषेक वाले दिन जब हमने नीरा जी के साथ उत्पल जी वाली बात शेयर की तो कहने लगी यह है गुरु की माया, गुरुकृपा। गुरुदेव के बारे में चमत्कारों का समर्थन न हमने किया और न ही गुरुदेव ने किया लेकिन  जब इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं तो गुरु की शक्ति का आभास अवश्य होता है, गुरु के सुरक्षा चक्र को अवश्य नमन करते हैं, हम तो ठहरे विज्ञान के विद्यार्थी, मृत शरीर को जब तक छू कर न देख लें,कहाँ मानने वाले हैं, ईश्वरीय सत्ता में विश्वास प्राप्त करने के लिए, सारी रात  शमशान में मृत शरीर का अंत होते हुए देखने वाले हैं। 

आज के इस विशष-विशेषांक का समापन करने का समय आ गया है लेकिन जब तक अखंड ज्योति से सम्बंधित इस कठिन लेकिन सफल प्रयास के  उद्देश्य की चर्चा न की जाये तो यह योगदान कम्पलीट नहीं समझा जायेगा। 

कुछ वर्ष पूर्व फितूर उठा कि शांतिकुंज से अखंड ज्योति और युगनिर्माण की पीडीऍफ़ आती रहती हैं, इन्हें  एक स्थान (हमारी वेबसाइट, इंटरनेट आर्काइव आदि )पर एकत्र कर दिया जाये तो पाठकों को सुविधा रहेगी क्योंकि awgp की साइट पर 2020 के बाद कुछ भी अपलोड नहीं हुआ था और विचारक्रांति पुस्तकालय की वेबसाइट पर 2023 बाद कुछ नहीं था। गुरुदेव की बात मान कर “तू एक कदम तो बढ़ा” कदम तो बढ़ा लिया लेकिन असफलताओं ने ऐसा आ घेरा कि क्या  कहा जाए। जिस किसी से भी सहायता के लिए प्रार्थना कि असहयोग और निराशा के सिवाय कुछ न मिला,यदि कुछ मिला तो, स्ट्रेस  केवल स्ट्रेस।  अपने जीवनसाथी से यह दुःख शेयर किया तो काउंटर प्रश्न मिला, जो अखंड ज्योति उपलब्ध हैं, क्या आपने सभी पढ़  ली हैं? अपनी वेबसाइट पर यां इंटरनेट आर्काइव पर अपलोड करने से आपको क्या मिल जाना है ? स्ट्रेस को देखते हुए यहाँ तक कह दिया कि  लोगों को पढ़ा कर  आपको क्या मिल जाना है? ऐसे प्रश्न केवल हमारे स्वास्थ्य, हमारी  दशा को देख कर ही किये गए थे। हमारा रिएक्शन था: हम फिर खाक गुरु का कार्य कर रहे हैं, इतना छोटा सा कार्य नहीं हो पाता  तो हम क्या गुरु के शिष्य हैं ?  आँखों के आगे शांतिकुंज के जीवनदानिओं की छवियां घूमने लगीं। हम तो ठहरे  पूरे ज़िद्दी ( सभी जानते हैं), प्रयास जारी रहा और जो कुछ हमें प्राप्त हुआ वोह आप सबके समक्ष प्रस्तुत है, किसी  से छिपा नहीं है।

क्या प्राप्त हुआ ? कोई आर्थिक लाभ हुआ ? कोई वाहवाही मिली? वह तो वैसे ही हम जैसे तुच्छ प्राणी को मिले जा रही है। 

हमें मिली आत्मिक शांति, प्रयास में सफलता, साथिओं के सहयोग का एक अद्भुत नमूना, गुरुशक्ति का साक्षात् प्राकट्य, गुरुशक्ति में अटूट विश्वास, ऐसा अनुभव हुआ कि गुरु हमसे  कुछ और करवाना चाहते हैं, हमारी पात्रता का मूल्यांकन कर रहे हैं, और न जाने क्या कुछ। 

लेकिन जहाँ यह सब कुछ प्राप्त हुआ , एक भारी नुक्सान भी हुआ कि हमारे साथी जो हम पर इतना विश्वास करते हैं, इतना सम्मान कर रहे हैं, भांति-भांति के विशेषणों की मज़बूत कड़ियों से बांधे जा रहे हैं, हमारे कन्धों पर इतना बोझ डाले जा रहे हैं, जीवन के अंतिम पलों में इस ऋण को कैसे चुका  पायेंगें, कहीं कंधे टूट ही न जाएँ , कहीं और Surgeries न करवानी पड़  जाएँ। 

साथिओं से निवेदन है, गुरुदेव से प्रार्थना है कि हमारे लिए इतनी शक्ति की प्रार्थना करें कि इस हाड-माँस-रक्त  की पोटली की अंतिम बूँद भी गुरुचरणों में अर्पित हो। 

जय गुरुदेव, बहुत बहुत धन्यवाद् 

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आज के इस वीकेंड एपिसोड को पढ़ने के बाद अवश्य ही अनेकों साथी स्वयं ही आने वाले अंकों की पीडीऍफ़ कॉपियां बनाने में उत्सुक होंगें। अगर साथिओं का सहयोग रहा तो युगनिर्माण योजना के भी मिसिंग अंक पूरे किया जा सकते हैं। निम्नलिखित लिस्ट से युगनिर्माण योजना के मिसिंग अंकों की जानकारी मिल रही है:

जून 2025

   सितंबर 2025

   अक्टूबर 2025

    नवंबर 2025

 दिसंबर 2025

    फरवरी 2024

    मई 2024 

    जून 2024

    जुलाई 2024

    अगस्त 2024

     सितंबर 2024


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