हर बार की भांति,आज के इस विशेष सेगमेंट का शुभारम्भ करने से पहले साथिओं से कहना चाहते हैं कि यह एक Open format सेगमेंट है, जैसे-जैसे जो-जो विचार हमारे अंतर्मन में उठते गए , बिना किसी रोकटोक के, बिना किसी Syntax की पालना करते, लिखते ही गए क्योंकि भावनाओं को दबाना उन पर प्रहार करने से कम नहीं है, आप सब अपने ही तो हैं ,फिर भी क्षमाप्रार्थी हैं।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से 26 अप्रैल 2024 को एक विशेष सेगमेंट आरम्भ किया गया था जिसमें हमारे साथिओं ने हमारे साथ शब्दों के माध्यम से अदृश्य मीटिंग करने का सुझाव दिया था।
हम इसे मीटिंग ही कहेंगें क्योंकि जब हमारी अंतरात्मा से निकला एक-एक शब्द पाठकों के ह्रदय को छूता है, वह कमेंट करके अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं तो यह One-way ट्रैफिक न होकर एक मीटिंग जैसी बन जाती है। केवल देखने की ही कमी रह जाती है, शब्द सब कुछ कह ही देते हैं। हमारी अंतर्-दृष्टि तो लिखते समय सब कुछ देख ही रही होती है। फोटोज और वीडियो में ही देखे गए साथी ऐसे प्रतीत होते जाते हैं जैसे सामने ही बैठे हों।
इस सेगमेंट का सुझाव हमारी वरिष्ठ बहिन आदरणीय सुमनलता जी की तरफ से आया था और सभी ने इस का समर्थन किया था। हर माह के अंतिम शनिवार को प्रकाशित होने वाला यह सेगमेंट इतना लोकप्रिय होता गया कि आदरणीय चंद्रेश जी जैसे साथी तो इस सेगमेंट की सोमवार से ही प्रतीक्षा करना शुरू कर देते हैं, साथिओं ने उनके यूट्यूब कमेंट में पढ़ा ही होगा।
धन्यवाद है उस गुरु का जिसने हमें क्या से क्या बना दिया !!!
लोकप्रियता के लालच में हमारे लिए लिखना कहाँ आसान रहता है ? वाहवाही की तो कभी भी लालसा नहीं रही, यदि कोई करता भी है तो उसे रोकते आ रहे हैं। लेकिन फिर भी गुरुकार्य को प्रसिद्ध करने का स्वार्थ तो रहता ही है, मेरे फकीर गुरु को प्रसिद्धि मिले, उसका नाम रोशन हो तो स्वतः ही एक अद्भुत सी प्रसन्नता प्राप्त होती है। उसी Indirect way से मिलने वाली प्रसन्नता को प्राप्त करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं। जैसे मेरे गुरु का सूत्र है कि कुछ भी प्राप्त करने के लिए स्वयं को गलाना पड़ता है, इस प्रसन्नता का स्रोत हमारे साथी ही हैं। जब वोह एक-एक शब्द इतने ध्यान से पढ़ते हैं, उन शब्दों पर अमल भी करते हैं, गुरु के सन्देश को धारण भी करते हैं, गुरुकार्य को आगे बढ़ाने में यथासंभव प्रयास भी करते हैं,सफल होने पर प्रसन्न होते हैं, उस प्रसन्नता को परिवार में शेयर करते हैं, असफलता से दुःखी भी होते हैं, उस दुःख को भी शेयर करते हैं।
सभी जानते हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में “परिवार” शब्द कोई ऐसा वैसा शब्द नहीं है, यह अपनत्व,श्रद्धा और समर्पण को दर्शाता, चरितार्थ करता बहुत ही शक्तिशाली शब्द है, इतना शक्तिशाली कि जब साथी इसकी व्याख्या करना आरम्भ करते हैं तो कइयों की आँखों में Emotions के वशीभूत अश्रुधारा बहने लगती है। हम तो कहेंगें कि यह अश्रुधारा कोई साधारण सी अश्रुधारा नहीं होती, यह हमें अपने गुरु से जोड़ती है। भावना से ओतप्रोत यह अश्रुधारा साक्षात् प्रमाणित करती है कि हम सही मायनों में उसी गुरु की संतान हैं जिसका ह्रदय एक अबोध शिशु की भांति है। हमारे अनेकों साथिओं ने परमपूज्य गुरुदेव की रुआँसी सी वाणी में, रुंधे हुए गले से निकल रहे शब्दों वाली वीडियो अवश्य देखी होगी। ऐसा है हमारा गुरु !!!! आज तो भांति-भांति के गुरु, भांति-भांति के हथकंडे अपनाकर लोकप्रियता अर्जित कर रहे हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं, जो श्रद्धालुओं को मिलने से पहले, ,साधकों को sanitize भी करते हैं। खैर उनके बारे में बात करना कोई समझदारी नहीं है, हमें तो अपने फकीर गुरु का ही पता है, उससे अधिक प्रेम करने वाला तो कोई मिला ही नहीं। आज परमपूज्य गुरुदेव स्थूल रूप में न होते हुए भी सूक्ष्म एवं कारण शरीर से हमारी रक्षा कर रहे हैं। उनका साहित्य ही उनका स्वरूप है। यह सिर्फ कहने की बात नहीं है, हमारे समेत अनेकों साथिओं ने इस तथ्य को टेस्ट किया है,परखा है और शत प्रतिशत सत्य पाया है।
उपरोक्त पंक्तिओं में स्वयं को गलाने की बात की गयी थी, बीज गलने के बाद ही पौधा और वृक्ष बनता है, इस समय इन पंक्तियों के लिखते हुए हमारा स्वास्थ्य “गलने” जैसी स्थिति में ही है। पिछले 10 दिनों से दांत की दर्द इतनी Severe हो रही है कि यह दर्द आँखों और सिर तक पंहुच जाती है। दो दिन पूर्व Dentist को दिखाया था,ट्रीटमेंट चल रहा है लेकिन सुधार कम ही दिख रहा है। गुरुकार्य का लालच,मानवीय मूल्यों की पालना जैसे पैरामीटर्स हमें गुरु से दूर कहाँ रहने देते हैं। कुछ थोड़ा आराम करने का प्रयास भी किया था, आँखें बंद करके लेटने का प्रयास किया था, उस स्थिति में कहाँ आराम है। हमारे साथी (विशेषकर अरुण जी ) हर कमेंट में हमारे अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं तो उनकी प्रार्थना तो गुरुदेव सुन ही लेंगें, गुरुदेव के प्रिय पुत्र जो ठहरे। जब लेख में सात संकल्पों की बात हो रही थी तो वोह गुरुदेव माता जी को हर महीने घर बुला रहे हैं, प्रज्ञा अभियान मंगा रहे हैं,महिला मंडल भी चला रहे हैं, प्रभातफेरी का काम भी कर रहे हैं, साप्ताहिक यज्ञ से जन जागरण कर रहे हैं, नशा मुक्ति आंदोलन में भी सक्रीय है, और सबसे बड़ी बात है कि फुल टाइम जॉब करके, परिवार को भी सँभालते हुए यह सब कुछ कर रहे हैं। तो हुए न गुरु के प्रिय पुत्र ? क्योंकि गुरु को वही बच्चा प्रिय है जो उनका कार्य करता है। जय गुरुदेव, जय गुरुदेव रटने वाले बहुत हैं, गुरुदेव से भीख मांगने वाले बहुत हैं लेकिन सही अर्थों में, अंतर्मन से, श्रद्धापूर्वक,निस्वार्थ कार्य करने वाले, गुरु को देने वाले बहुत ही कम हैं। इसी कमेंट में अरुण जी ने ज्ञानप्रसाद लेखों का अंतर्मन की आँखों से अमृतपान करने का बात की थी। हम उनसे पूर्णतया सहमत हैं क्योंकि इस प्रकार अमृतपान करने से उच्चकोटि के विचार उठना स्वाभाविक है, यह विचार ही हैं जो शब्दों में परिवर्तित हो जाते हैं, यह शब्द ही हैं जो पढ़ने वाले के ह्रदय में सीधे उतर जाते हैं, यही शब्द कई बार इतने शक्तिशाली होते हैं कि भावनाशील पाठक की आँखों से आँसू निकाल कर उसे जिस शांति का अनुभव कराते हैं, उसे शब्दों में बयान करना लगभग असंभव होता है।
“यह है शब्दों की शक्ति, किसी ने ऐसे ही नहीं कह दिया: Pen is mightier than sword”
हम अक्सर ही देखे जा रहे हैं कि दैनिक ज्ञानप्रसाद लेखों पर पोस्ट किये जाने वाले कुछ कमेंट इतने उच्चकोटि के होते हैं कि हम उन्हें अमूल्य रत्नों की भांति अपने ह्रदय में संजोये हुए हैं, सेव किये हुए हैं।
हमारी आदरणीय बहिनें -संध्या जी, सुमनलता जी,सुजाता जी, वंदना जी आदि ने अपने -अपने प्रयास कमैंट्स के माध्यम से शेयर किये, इस सम्बन्ध में यही कहना उचित रहेगा कि गुरुकार्य के लिए किसी को भी बाधित नहीं किया जा सकता। आज जितने भी सक्रीय साथी इस परिवार में अपना योगदान दे रहे हैं उन्हें किसी ने भी, कभी एक बार भी नहीं कहा कि आओ गुरु का कार्य करो। उनका सौभाग्य, उनके पूर्वजन्मों के पुण्य कर्म, यां आज कल के सत्यकर्म देखकर ही गुरु ने अपनी ओर न केवल खींचा, बल्कि अपने साथ ऐसा जोड़ा कि छुड़ाने पर भी छूट नहीं पाते। आदरणीय अरुण जी जो कार्य कर रहे हैं, क्या वोह खुद कर रहे हैं ?बिलकुल नहीं !!! उनका गुरु उन्हें जैसे-जैसे कह रहा है, उसे जो-जो कुछ उचित लग रहा है, उनसे कराये जा रहा है, काम गुरु कर रहा है और सराहना अरुण जी की हो रही है। ऐसा होता है गुरु-शिष्य का सम्बन्ध, ऐसा होता गुरु-पुत्र का सम्बन्ध। बहिनों के प्रयास में जितनी सफलता मिल रही है, वोह साधारण से कहीं अधिक है। आज तो कोई किसी की बात सुन के नहीं राज़ी, बहिनें सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें कोई सुन तो रहा है। यहाँ एक और बात कहना अनुचित नहीं है कि जब 100 वर्षों के बाद भी हमारा गुरु, हमारी माँ, अपने ही बच्चों से निवेदन कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, समय के एक हिस्से के लिए, धन के एक हिस्से के लिए फर्याद कर रहे हैं तो हम क्यों पीछे हटें। माता पिता के सभी बच्चे एक से तो नहीं होते, कुछ सुनते हैं, कुछ आनकानी करते हैं लेकिन माता पिता प्रयास करना छोड़ तो नहीं देते।
हम तो कहेंगें कि आज के इंटरनेट के युग में कमैंट्स सबसे बड़ा शक्तिशाली शस्त्र है, शायद ही कोई ऐसा प्राणी होगा जो कुछ न कुछ घंटे इंटरनेट पर व्यतीत न करता होगा, यही उसका सबसे बड़ा मित्र है, यही “विश्वगुरु” है, स्वामीजी तो वर्षों पुराने विश्वगुरु थे। तो साथिओ उचित रहेगा कि इस घनिष्ट मित्र की सहायता से, इस विश्वगुरु से शिक्षा प्राप्त करके, गुरुकार्य के महत्वपूर्ण प्रैक्टिकल का समाधान ढूंढने का प्रयास करें तो कोई कारण नहीं कि सफलता न मिले। 22 घंटे फेसबुक पर पोस्ट हुए कल वाले लेख को 3600 लोग देख चुके हैं।
जब आधुनिक विश्वगुरु की बात चल रही है तो बहिन सुमनलता जी गूगल ड्राइव में टाइप करने में “साहिब” की सहायता ले सकती हैं। सच मानिये बहिन जी गूगल ड्राइव में टाइप करना बहुत ही सरल और सटीक है। नीरा जी स्थूल रूप में हमारे साथ हैं, AI, Chatgpt आदि इतनी जल्दी सीख लिया कि कमैंट्स से देखा जा सकता है। आप का भी हमारे साथ फ़ोन पर बात करने में स्वागत है, गूगल ड्राइव की समस्या वीडियो कॉल से एकदम सॉल्व की जा सकती है।
पारिवार और सहयोग की भावना का एक उदाहरण आदरणीय चंद्रेश जी ने प्रस्तुत किया जब हमने उन्हें पुराने अखंड ज्योति के अंकों की पीडीऍफ़ फाइल बनाने का सुझाव प्रस्तुत किया। भाई साहिब ने एकदम एक अंक की फाइल बनाकर भेज दी जिसके लिए धन्यवाद करते हैं। जब हमने इस कार्य को सम्पन्न करने में आने वाले आर्थिक व्यय की बात की तो कहने लगे गुरुकार्य में हमारा भी कुछ सहयोग कर पाना, हमारा सौभाग्य ही है। इसी सन्दर्भ में आदरणीय बड़ी बहिन रेणु श्रीवास्तव जी से बात हुई। अपने स्वास्थ्य को एक तरफ करके उन्होंने एकदम सहयोग करना अपना सौभाग्य समझा। साथिओ अखंड ज्योति पत्रिका के मिसिंग अंकों को अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। विश्वभर में फैले गायत्री परिजनों के लिए एक बहुत बड़ी सहायता है। ऐसा अद्भुत डाटाबैंक शायद शांतिकुंज के पास भी नहीं है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हमने कुछ समय पूर्व उनसे इस सम्बन्ध में बात की तो उन्होंने हमारी वेबसाइट का ही लिंक भेज दिया। गुजरात स्थित विचारक्रांति पुस्तकालय,जो कुछ वर्षों से गुरुदेव के विशाल साहित्य को Digitize करने का अद्भुत कार्य कर रहा है, उनसे भी बात करके कोई अधिक सफलता नहीं मिल पायी थी। इसलिए हमारे परिवार का जो कोई भी साथी अखंड ज्योति को digitize करने में सहायता करेगा, सच में बहुत बड़ा योगदान होगा। आपने कुछ नहीं करना है ,केवल फोटोकॉपी वाला ही स्कैन करेगा और आप हमारे पास व्हाट्सप्प पर भेज देंगें।
शताब्दी समारोह का समापन हो गया है, अगले प्रोग्राम से पहले-पहले हम इसकी स्मारिका प्रकाशित करना चाहते हैं, कार्य बहुत ही बड़ा है लेकिन प्रयास कर रहे हैं, गुरुकृपा होगी तो यह भी अवश्य पूरा होगा, अब तक 365 पन्नें इक्क्ठे हो चुके हैं।
आइये चलते चलते हमारे घर का फ्रंट ही दिखा दें।
जय गुरुदेव