February 26,2026
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सभी साथी बड़े भाग्यशाली हैं जिन्हें 2026 के विशेष वसंत पर आदरणीय संध्या बहिन जी के पुरषार्थ से पांच लेखों की दिव्य लेखमाला के अमृतपान का अवसर प्राप्त हुआ।
“प्राणवानों को ऋषियुग्म का मार्गदर्शन” शीर्षक से प्रकाशित इस दिव्य रचना का स्वाध्याय करना,उसे अंतर्मन में उतारना और परिवार के समक्ष प्रस्तुत करना कोई साधारण कार्य नहीं है। जिस साहस,निष्ठा और श्रद्धा के साथ बहिन जी ने इस कार्य को सम्पन्न किया, साथिओं ने पूर्ण रूप से इन्वॉल्व होकर,एक One-on-one discussion बनाकर रोचक बनाया,उसके लिए कृपया हमारा हार्दिक आभार स्वीकार करें।
गायत्री परिवार के लिए वर्ष 2026 की महत्ता से सभी भलीभांति परिचित हैं,ऐसे समय किया गया कोई भी प्रयास अनेकों गुना आत्मिक शांति लेकर आया है, ऐसा हमारा अटल विश्वास है। इस पावन अवसर पर बहिन जी के विचार हमें प्रेरित किये बिना नहीं रह सकते:
“ऋषियुग्म के श्री चरणों में अपनी लेखनी से कुछ लिखकर अर्पित करने का प्रयास की हूँ, आशा करती हूँ सभी परिजनों का स्नेहपूर्ण सहयोग मिलेगा l”
आज का लेख “एक माँ की करुण पुकार” का समापन भाग है। लेख के साथ संलग्न लगभग सवा घण्टे की वीडियो के कुछ भाग आज के लेख में व्यक्त किये हुए हैं। यह वीडियो शांतिकुंज वीडियो गायत्री परिवार यूट्यूब चैनल पर 2020 में प्रकाशित हुई। अपनी रिसर्च के दौरान जब हमने यह वीडियो देखी तो स्वयं से प्रश्न किया था कि क्या कारण था कि इतनी महत्वपूर्ण वीडियो को अपलोड करने में 30 वर्ष का समय लग गया ? हमारे द्वारा स्मारिका प्रकाशित करने का यही कारण था,लाखों में नहीं तो 50000 लोग तो इसे देख ही चुके हैं।
खैर जो भी हो, आइए माँ की बात को मानें,संकल्प लें कि किसी के कहे बिना ही,आज्ञाकारी बच्चे की भांति, नियमितता से गुरुकार्य में सहयोग देंगें। गुरूसाहित्य की प्राणशक्ति कोई कभी-कभार अर्जित करने जैसी चीज़ नहीं है, यदि ऐसा होता तो हम साँस भी कभी-कभार लेकर शरीर का पालन कर लेते। क्या ऐसा सम्भव है ? बिलकुल नहीं !!!!
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एक माँ की करुण पुकार- समापन भाग:
वंदनीय माता जी को संपूर्ण मानवजाति की चिंता है। गिरते हुए मानवीय मूल्य, व्यक्ति की व्यक्ति से कलह, राष्ट्रों की परस्पर कड़वाहट, अनेक राष्ट्रों के पास अनेकानेक भयानक शस्त्र-बल का होना तथा परस्पर लड़ने की भावना रखना इन सब विषम परिस्थितियों से माता जी आहत हैं। उनके अनुसार ऐसी विषम परिस्थितियों के लिए “सूक्ष्म स्तर पर एक बड़ी व्यापक तैयारी” होनी चाहिए ताकि नवसृजन के लिए संकल्पित आत्मबल-सम्पन्न देवमानवों की उत्पत्ति सम्भव हो सके एवं विनाश को टाला जा सके।
ऐसी विपरीत स्थिति में माता जी हम सबका साहस बांधते हुए कह रही हैं कि हमें मनोबल नहीं खोना है तथा अनीति से मोर्चा लेने वाली ताक़तों को एकजुट करना है l परिजन मात्र इतना ही करें कि अपने साधनात्मक पुरूषार्थ में वृद्धि कर दें तथा समष्टि में सम्व्याप्त “महाकाल की सत्ता” में एकात्मता स्थापित करने का प्रयास करें ताकि श्रेष्ठ वातावरण बनने में मदद मिले l
माता जी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहती हैं कि अश्वमेधिक पुरुषार्थ ने मेरी उम्मीदें और भी बढ़ा दी हैं। मेरी स्थिति गुरूजी की सूक्ष्म व कारण सत्ता के साथ पल-पल स्पन्दन लेती हुई सी है l
माता जी मिशन के उज्जवल भविष्य के लिए पूर्णतः आशावान हैं लेकिन सतर्क करते हुए कह रही हैं कि काम अधिक है, मानवीय संख्या कम होने के कारण 100 गुना अधिक मानवी स्तर पर काम करना होगा। हम बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए कहती हैं कि हमें पूरी आशा है कि मजबूत कँधों वाले मेरे बच्चे मेरे दायित्वों को जरूर निभायेंगे। इसके साथ ही आशातीत लक्ष्य की ओर इंगित कर रही हैं कि जो इस समय इस प्रवाह से जुड़ा रहेगा वह आगामी 10-12 वर्षों मे श्रेय और सम्मान का अधिकारी होता जाएगा l देव संस्कृति दिग्विजय का यह उपक्रम पिछले दिनों चला है। सत्प्रयोजनों के लिए यदि कुछ ही सज्जन मानव श्रद्धा भाव से जुड़ जाएं तो परिवर्तन होना निश्चित होता है। वंदनीय माता जी अपने बच्चों को जागृत करते हुए कह रही हैं कि यह संधिकाल की बेला है,यह समय कुछ भी कर गुजरने के लिए है। ऐसा समय जब संसार के भाग्य को नये सिरे से लिखा जा रहा हो, बार-बार नहीं आने वाला। ऐसे दुर्लभ समय में तमाशा देखने वाले, हाथ पर हाथ रखकर बैठने वाले, समय के अभाव का रोना रोते रहने वाले, बहानेबाज़ी करने वाले अभागे नहीं तो और क्या ही कहलाएंगे l जब समय विशिष्ट होता है तब जिम्मेदारियां भी विशिष्ट ही होती हैं। ऐसे समय में दृढ़ संकल्पित होकर, खुद को शक्ति की प्रक्रिया में जोड़कर अर्जुन, हनुमान, सुग्रीव की श्रेणी मे खड़े हो जाने का सौभाग्य विरलों को ही मिलता है।
इन पंक्तियों को पढ़ रहे सौभाग्यशाली मानव ही वोह विरले परिवारजन हैं जिन्हें गुरुवर ने ढूंढ कर युगनिर्माण के कार्य के लिए चुना है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रत्येक साथी अद्भुत विशेषता लिए हुए है, उसका छोटे से छोटा प्रयास बहुत बढ़ा परिणाम लाने में समर्थ है।
अपने बच्चों को झकझोरते हुए माता जी कह रही हैं कि यह समय व्यर्थ गंवाने का नहीं है। माता जी हम सबको पुकार रही हैं, कह रही हैं:
“जागो और अपना दायित्व सम्हालो।”
अपने बच्चों पर अडिग विश्वास प्रकट करते हुए माता जी कह रही हैं कि गुरुसत्ता का आमंत्रण तीव्र अति तीव्र होता जा रहा है। हमारी परीक्षा और अधिक कड़ी होने वाली है, हर श्वास में एक ही स्वर मुखरित हो रहा है:
“युग परिवर्तन के लिए और अधिक समर्पण”
इसी समर्पण को और अधिक स्पष्ट करते हुए हमारी माँ कह रही है कि ऐसे में प्रत्यक्ष रंगमंच की भूमिका अपने वरिष्ठ बच्चों के कन्धों पर सौंपकर मुझे भी सूक्ष्म व कारण सत्ता के रूप में सक्रीय होना पड़ सकता है,किंतु यह एक शाश्वत सत्य है कि “शक्ति का प्रवाह” कभी भी रुक नहीं सकता।
यह तो बेसिक साइंस का सुप्रसिद्ध सिद्धांत है:
Energy can never be created nor destroyed. When one form of energy disappears, other appears,light energy changes to heat energy,chemical energy changes into mechanical energy and so on.
हमारा विश्वास है कि जो परिजन जागृत हैं वह किसी भी झंझट में नहीं पड़ेंगें,अपने पुरूषार्थ के साधनाक्रम में कोई भी कमी नहीं आने देंगें। हमने अपना जीवन एक समर्पित शिष्य की भाँति जिया है, अपने अराध्य की हर इच्छा को पूरा करने का श्रद्धा से प्रयास किया है l भविष्य में हम स्थूल रूप से न दिखाई दें किन्तु हमारा कृतत्व जो गुरुसत्ता की अनुकम्पा से बन पड़ा,वह तो प्रेरणा केंद्र बनेगा एवं हमारे बच्चे भी उसी तरह दायित्व निर्वहन के लिए होड़ लगाएंगे। गुरुजी और हमने शांतिकुंज में जो कार्य चलाए हैं,उन्हें आप सब निष्ठा से चलाएंगे, यह हमारा दृढ़ विश्वास है l
1 से 4 अक्टूबर 1990 की अवधि में “संकल्प श्रद्धांजलि समारोह” सम्पन्न हुआ। यह समारोह अपनेआप मे अभूतपूर्व आयोजन था,जिसमें अनेकों शिष्यों ने संकल्प लेते हुए आश्वस्त किया कि वे पूर्ण शक्ति से गुरुकार्यों को आगे बढ़ायेंगे,कभी इस राह में पीछे नहीं हटेंगें l
इस समारोह के वीडियो लिंक को क्लिक करके माता जी के दर्शन किये जा सकते हैं https://youtu.be/QyvI7T9VqEk?si=tYnLnqjx_g4oIMH8
इस समारोह के तुरंत बाद माता जी ने 3 से 5 के बीच एक महत्वपूर्ण गोष्ठी ली जिसमें कहे गये शब्द, बच्चों से स्नेह-प्यार को दर्शाता रहे। माता जी ने कहा:
“मेरे प्यारे बच्चों इस समारोह की अभूतपूर्व सफ़लता के लिए मैं तुम सब की ऋणी हूँ, तुम सबने परिश्रम से सबको संगठित कर एक नमूना खड़ा किया तथा अपनी इस “माँ” को आश्वस्त किया कि गुरुजी का कार्य किसी भी स्थिति में रुकेगा नहीं l
तत्कालीन अफरा-तफरी, विकट स्थिति का जिक्र करते हुए माता जी ने कहा कि दिल्ली देखो, यहाँ तो मारकाट मची हुई है, कितनी गाड़ियां कैंसल हैं, बहुत कम ही चल रहीं हैं, फिर भी 10-11 लाख श्रद्धालु इकट्ठे हो गए, यदि परिस्थितियां सुगम-सरल,समान्य होतीं तब भीड़ को सँभालने के लिए एक हरिद्वार तो क्या कई जिले भी कम पड़ जाते। वास्तव मे यह एक महाकुंभ है जिसमें आमंत्रण हेतु कोई पोथी या पत्र नहीं लिखा गया और सब इकट्ठे हो गए, दैवीसत्ता ने ही स्पष्टत: इस असम्भव कार्य को सम्भव बनाया है l
समारोह की अभूतपूर्व सफ़लता पर चर्चा करते हुए माता जी ने कहा कि लाखों लोगों ने भोजन किया l इतने सारे भोजनालय चले,फिर भी भंडार की स्थिति जैसी की तैसी ही बनी हुई है l
आगे चलकर तुम सब इससे भी बड़े- बड़े चमत्कार देखोगे l
अपने परिजनों को प्रोत्साहित करते हुए माताजी कहती हैं कि तुम्हें आगे और भी बड़े कार्य करना है l अभी बड़ा समारोह सम्पन्न हुआ, अतः थोड़ा विश्राम उचित है लेकिन अपनी सक्रियता को कम ना होने देना, जो स्फूर्ति का ज्वर उठा है उससे आगे धुंआधार कार्यक्रम करना है,सारे राष्ट्र को हिलाकर रख देना है l
वंदनीय माताजी अपने परिजनों का मार्गदर्शन करते हुए कहती हैं कि अपने अहं को त्याग कर सबको टीम भावना से काम करना है, अपनी-अपनी कमियों को दूर करते हुए योग्यताओं का सम्वर्धन करना होगा l अपने मिशन के प्रति दायित्वों का निर्वहन पूर्ण समर्पण भाव से करोगे तो गुरूजी की आवाज तुम्हारे चोगे से निकलेगी अर्थात् गुरुजी तो साथ चलेंगे ही,मार्ग भी दिखाएंगे l
वंदनीय माता जी परिजनों को समझाते हुए कहतीं है:
“आप समर्पण कर चुके हैं अतः अब आपका शरीर और मन आपका नहीं रहा,अब वह हमारा हो गया,अपनेआप को प्रमाणिकता की कसौटी पर कसो तथा अधिक से अधिक त्याग के लिए तैयार हो जाओ l”
अपने बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते हुए माता जी कह रही हैं कि मेरा तो जाने का समय आ रहा है, पूर्णाहुति के समय से ही मेरा मन जाने का हो रहा है,मुझसे अपने आराध्य का वियोग सहा नहीं जाता है:
“मैं रहूँ न रहूँ, तुम बुजदिल मत बनना l गुरुवर के लिए माता जी कहती हैं कि वह 80 वर्ष में 800 वर्षों का काम कर गए, मुझे तुम बच्चों के देखभाल की ज़िम्मेदारी दे गए, जिससे कि तुम अकेले न महसूस करो। तुम सब देखोगे कि अब जो काम होंगे वह माता जी नहीं बेटे ही करेंगे तथा यह और भी शानदार होंगे l अब हम मिशनरी भावना की तरह फैलते ही जायेंगे, देखते देखते हम कई गुना हो जाएंगे, तुम में से ही कोइ विवेकानंद निकलेंगे, कोइ दयानन्द निकलेंगे और तुम सब देखते जाओ तुम सब से वह करवा लेंगे जो तुमने सोचा भी नहीं था l
इन्हीं दिव्य शब्दों के साथ आदरणीय संध्या बहिन जी द्वारा संकलित लेखमाला का समापन होता है, कल फरवरी माह का अंतिम शनिवार हमारे साथिओं ने सम्मानपूर्वक हमारे लिए रिज़र्व किया हुआ है,क्या लिख पायेंगें, गुरुवर ही बताएंगें।
बहुत बहुत धन्यवाद्, जय गुरुदेव
