February 25,2026
आज का ज्ञानप्रसाद लेख मात्र 32 पृष्ठों की पुस्तिका “प्राणवानों को ऋषियुग्म का मार्गदर्शन” के दूसरे चैप्टर “एक माँ की करुण पुकार” पर आधारित है। आदरणीय संध्या बहिन जी द्वारा इस लेखमाला का माता जी के जन्म शताब्दी वर्ष 2026 में लिखा जाना कोई संयोग नहीं बल्कि परम सौभाग्य है। यह सौभाग्य केवल बहिन जी का न होकर,हम सभी परिवारजनों का है जिसके लिए बहिन जी का धन्यवाद् करना हमारा परम कर्तव्य है।
हमारे साथिओं को स्मरण होगा कि इस मंच से संकल्प लिया गया है कि वर्ष 2026 के समस्त कृत्य तीन-शताब्दी के महत्व को ही समर्पित रहेंगें।
बहिन जी द्वारा आरम्भ की गयी लेख श्रृंखला का कल समापन हो जायेगा और सोमवार से आदरणीय सरविन्द जी के योगदान का शुभारम्भ होने के सम्भावना है।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में वंदनीय माता जी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिल रहा है, निवेदन करते हैं कि लेख का एक-एक शब्द पढ़कर अंतर्मन में उतारने का प्रयास करें।
चलते हैं लेख की तरफ
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वंदनीय माता जी त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति हैं,उन्होंने अपना पूरा जीवन परमपूज्य गुरुदेव के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लोक कल्याण के लिए अर्पित कर दिया । गुरुवर ने माता जी को जो भी जिम्मेदारी सौंपी, उसका निर्वहन उन्होंने पूरी श्रद्धा से किया। माता जी ने गायत्री परिवार के हर सदस्य को अपने बच्चे जैसा स्नेह-प्यार दिया। हम सब जानते हैं कि गायत्री-परिवार में गुरुवर किसी को भी कोई जिम्मेदारी सौंपने से पहले उसकी कड़ाई से जांच-परख करते थे। कितने ही कार्यकर्ता भाइयों से सुना है कि गुरुवर की कड़ाई के कारण अनेकों जीवनदानी रोज़ ही शांतिकुंज छोडकर भाग जाने की इच्छा में रहते थे। किन्तु जन्म देने वाली माँ से भी बढ़कर स्नेह-प्यार लुटाने वाली वंदनीय माता जी के कारण कोई भी भागा नहीं। वोह सब आज उच्चकार्य कर जीवन का परिष्कार कर रहे हैं l
वंदनीय माता जी कहती हैं कि जिस प्रकार दूध और पानी घुल मिलकर एक हो जाते हैं, ऐसे ही हम दोनों की जीवन यात्रा रही है । इस यात्रा में गुरुदेव और मैं एक-दूसरे के पूरक बनकर अपने बच्चों के लिए जो कुछ बन पाया हमने किया, बदले में असीम स्नेह, प्यार भरी संवेदना तथा अकथनीय सम्मान पाया l माता जी बताती हैं कि जो कुछ परमपूज्य गुरुदेव ने मुझे दिया उसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। असीम स्नेह- संरक्षण तो दिया ही करोड़ों पुत्रों की माता बना कर उच्च शिखर पर विराजित कर दिया l
परमपूज्य गुरुदेव के अनमोल सानिध्य का वर्णन करते हुए वंदनीय माता जी कहती हैं कि समष्टि की पीड़ा एवं उसके निवारण हेतु साधनात्मक पुरुषार्थ में जीवन की हर साँस लग जाये यही शिक्षा उनके साथ जुड़ने के बाद पहले दिन से ही मिली। मैंने यथासम्भव कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने का प्रयास किया। माता जी और अधिक स्पष्ट करते हुए बता रही हैं कि यही क्रम पिछले कई जन्मों से अनवरत चला आ रहा था। अतः कुछ भी अटपटापन महसूस नहीं हुआ। रोते हुओं के आँसू पोछने, उनकी पीड़ा बाँटने तथा उनके प्रारब्ध को हल्का करने में असीम शांति का आभास हुआ। माता जी गुरुवर के बारे में बताते हुए कह रही हैं कि उनका ह्रदय करुणा से लबालब भरा हुआ था, देते ही गए,देते ही गए। इतना देने के बावजूद भी गुरुदेव के करुणा भरे बैंक बैलेंस में कोई भी कमी न आयी। ऐसा इसलिए हुआ कि गुरुदेव के बैंक में आर्थिक डिपॉजिट के स्थान पर भावनात्मक इनवेस्टमेंट होती रहती थी। यह एक ऐसी इन्वेस्टमेंट होती है जिसे जितना बांटो, कई गुना बढ़कर वापिस मिलती ही मिलती है।
सभी गायत्री परिजन इस बात के साक्षी हैं कि वंदनीय माता जी ने गुरुवर के निर्देशों का अक्षरशः पालन किया।
जब गुरुवर अपनी मार्गदर्शक सत्ता के आदेश पर कठोर तपश्चर्या के लिए हिमालय जाने लगे तब उन्होंने “अखंड ज्योति पत्रिका” के संपादन का कार्यभार माता जी को सौंपा था। इसी प्रकार 1958 के ऐतिहासिक 1008 कुंडी यज्ञ की ऊर्जा से विनिर्मित गायत्री परिवार की देख रेख का दायित्व भी गुरुवर ने माता जी के कंधों पर डाल दिया था। गुरुदेव ने ऐसा इसीलिए किया था कि गुरुवर की अनुपस्थिति में परिजन अकेले न महसूस करें। माता जी ने सौंपी गयी जिम्मेदारियों को सहर्ष शिरोधार्य किया क्योंकि वह स्वयं को अपने इष्ट, अपने गुरु की कठपुतली मात्र मानती थीं। वह कहती थीं कि गुरुवर द्वारा दिए गए निर्देशों का निर्वहन ही उनके जीवन का लक्ष्य रहा है।
दूरदर्शी गुरुवर विश्व की आने वाली कठिन परिस्थितियों को समझ रहे थे। इन विषमताओं के समाधान के लिए गुरुदेव कठोर तपश्चर्या करते रहते थे। इसी साधना में गुरुदेव ने “महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया” का बीजारोपण किया जिसके अंतर्गत जन-जन की सहभागिता बहुत आवश्यक थी। महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया को समझने के लिए हमें महाकाल को एक कालखंड (कलयुग आदि) को समझना होगा। इस प्रक्रिया में काल अर्थात समय की दिव्य शक्ति द्वारा मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का प्रयास किया जाता है। हम सब इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं कि समय बड़ा बलवान है, तो उसकी शक्ति का भी आभास तो होना ही चाहिए।
यह प्रक्रिया कोई अचानक चमत्कार नहीं, बल्कि Step by step विचारों में परिवर्तन,व्यक्तित्व का परिष्कार,समाज का पुनर्निर्माण और आध्यात्मिक जागरण
की प्रक्रिया है।
विचारों के परिवर्तन के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में इसी Step by step प्रक्रिया का प्रयास किया जा रहा है। जितना प्रयास किया जा रहा है उतने Result तो नहीं मिल रहे लेकिन गुरु की शक्ति अवश्य ही कार्यरत है, अगर ऐसा न होता तो यह परिवार कब का बिखर गया होता। “तू एक कदम बड़ा तो सही – – -” वाला स्लोगन साक्षात् दिख रहा है। इसका एक प्रशंसनीय, उत्साहवर्धक उदाहरण देते हुए हृदय प्रसन्नता से भर उठता है।
16 फरवरी 2026 के ज्ञानप्रसाद को अब तक 20000 पाठक देख चुके हैं एवं 28 जनवरी की शॉर्ट वीडियो को 53000 दर्शक देख चुके हैं । यह नंबर केवल एक ही प्लेटफॉर्म, फेसबुक से सम्बंधित हैं, अन्य अनेकों सोशल मीडिया साइट्स पर भी गुरुदेव का सन्देश भेजा जाता है। इन सभी Results का सारा श्रेय हमारे सहकारियों को ही जाता है।
1971 में गुरुदेव अपनी कर्मभूमि मथुरा को स्थायी रूप से छोडकर, सप्तसरोवर शांतिकुंज साधना स्थली हरिद्वार का सारा निर्धारण माता जी को सौंप कर स्वयं कठोर तपश्चर्या के लिए हिमालय रवाना हो गए l गुरुवर के जाने के बाद माता जी एकदम नए एवं अकेले वातावरण में कुछ तपस्विनी कुंवारी कन्याओं तथा मात्र तीन सहयोगियों के साथ शांतिकुंज में रहीं। इस कठिन समय में माता जी ने चौबीस करोड़ गायत्री जप का अनवरत क्रम आरम्भ किया। एक वर्ष बाद गुरुवर हिमालय से लौटे। उनका लौट आना माता जी के लिए समर्थ सहारा ही नहीं बल्कि जीवन संजीवनी था l गुरुवर ने लौटकर प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों,जीवन साधना सत्रों तथा ऋषि परम्परा के बीजारोपण एवं क्रियान्वयन की घोषणा की। समस्त गायत्री परिजनों ने देखा कि अब गुरुवर गायत्री परिवार के लालन-पालन हेतु कार्यों के लिए माता जी को आगे रख स्वयं बैकग्राउंड में रहते हैं l कभी-कभी माता जी ने गुरुवर से कहा भी कि यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का काम है, मुझ से नहीं हो पाएगा। गुरुवर ने माता जी का मनोबल बढ़ाते हुए कहा कि तुम प्यार बांटती चलो, सभी को एक सूत्र में बांधती चलो। महाकाल ने ही इस मिशन को माध्यम बनाया है, हम धरती के भाग्य को बदलने का जितना भी कार्य कर सकेंगें,करेंगे। ऐसे ऋषियुग्म के स्नेह-संरक्षण का सौभाग्य पाकर हम सभी गायत्री परिजन धन्य हो गए हैं, इस सौभाग्य का पूर्ण लाभ प्राप्त करना हमारे हाथ में है। अनुदानों से झोली भरना हमारे हाथ में है। साथिओं से अनुरोध है: अपना पात्र बड़ा कीजिए (पात्रता बढ़ाइए) गुरुदेव सुपात्र ढूंढ रहे हैं।
गुरुदेव की वर्ष 1986 की सूक्ष्मीकरण साधना, वंदनीय माता जी के लिए एक और परीक्षा की घड़ी थी। उस घड़ी का स्पष्टीकरण करते हुए माता जी कहती हैं कि गुरुवर ने सूक्ष्मीकारण साधना का संकल्प ले लिया, इस साधना में वह एक-दो परिजनों एवं मेरे अलावा किसी से भी नहीं मिलते थे, नाममात्र आहार ग्रहण करते थे। ऐसे कठोर तप का संकल्प उन्होंने जगत की पीड़ा हरने के लिए ही लिया था। इस साधना में माता जी ने सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए गुरुवर को कठोर तपश्चर्या हेतु पूर्ण सहयोग दिया l
इस से आगे वाला समय माता जी के लिए और भी अधिक कठिन परीक्षा का था जब गुरुवर स्वेच्छा से अपने स्थूल शरीर का त्याग करके सूक्ष्म एवं कारण मे सम्व्याप्त हो गए। माता जी के समक्ष कठिन परीक्षा,मुँह खोले, बाँहें फैलाए खड़ी हो गयी। यकायक उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि बिना पतवार, बिना खिवैया नाव कैसे चलेगी, उनके बिना कैसे कुछ कर पाऊँगी, इतने बड़े विश्व्यापी परिवार को कैसे सँभालूंगीं, किन्तु उन्होंने खुद को सम्भाला, अपने बच्चों, अपने गायत्री परिवार एवं मिशन के लिए उस सत्य को चरितार्थ किया कि गुरुवर हिम्मत दे रहे थे। “ज्योति कभी बुझेगी नहीं” शीर्षक से लिखे गए लेख से लेकर 2 जून को दिए गए गुरुवर के अंतिम संदेश तक स्वयं की भावनाओं,सम्बल को समेटकर माता जी ने वो किया जो गुरुवर उनसे चाहते थे तथा उनकी दी हुई शक्ति के बल पर माता जी आगे ही आगे बढ़ती चली गईं।
हमारे पाठकों को स्मरण हो आया होगा कि इन टॉपिक्स पर इसी मँच से अनेकों दिव्य लेखों का प्रकाशन हो चुका है,सभी लेख हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। सर्च विंडो में Keywords डालकर यह विस्तृत लेख पढ़े जा सकते हैं।
गुरुवर की अनुपस्थिति में परिजनों का मनोबल बढ़ाने, उनकी ऊर्जा जागृत करने के लिए श्रद्धांजलि समारोह, शक्ति साधना सत्र,शपथ समारोह एवं संस्कार महोत्सवों जैसे भव्य आयोजन माता जी के शक्ति के कारण ही सम्पन्न हो पाए। देवसंस्कृति दिग्विजय के क्रम मे 18 अश्वमेध महायज्ञों द्वारा भारतवर्ष एवं अन्य कई देशों मे देवसंस्कृति की अलख जगाने के लिए चार वर्षों मे माता जी के नेतृत्व में सम्पन्न हुए l आज 2026 में, जब यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, 2024 के मुंबई अश्वमेध यज्ञ के साथ अश्वमेध यज्ञों की गणना 47 पंहुच चुकी है। माता जी द्वारा संपन्न कराए गए सभी सत्कर्मों ने करोड़ों व्यक्तियों की चेतना को तो जागृत किया ही,साथ में सतयुग साकार होने की भूमिका भी बना दी l
माता जी कहती हैं कि प्रत्येक महायज्ञ मे 25-30 लाख व्यक्तियों का जुड़ना, उनके द्वारा संस्कृति विस्तार का संकल्प लिया जाना, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन, सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्यक्रम आरम्भ होना सब गुरुवर की शक्ति का ही चमत्कार है। जो 60 वर्षों में न हो पाया, वह अब उनकी सूक्ष्म शक्ति से मात्र तीन वर्षों में हो गया। माता जी अपनेआप को मात्र गुरुवर की कठपुतली ही मानती हैं l
यहीं पर वर्तमान लेखमाला का मध्यांतर होता है।
जय गुरुदेव
संध्या कुमार
