February 24,2026
कल वाले लेख की Tagline थी, भगवान् क्यों आते हैं? भगवान् क्या देते हैं? और भगवान् क्या माँगते हैं?
इसी Tagline पर आज का लेख आधारित है। आज का लेख हमें बहुत ही साफ और सरल शब्दों में बता रहा है कि भगवान् के रूप में अवतरित हुए हमारे गुरुदेव हमसे प्रार्थना कर रहे हैं, निवेदन कर रहे हैं,हमसे मांग रहे हैं, जी हाँ सच में मांग रहे हैं कि हमारी सहायता कीजिये, हमारे सहचर बन जाइए,हमारा सहयोग कीजिए। गुरुदेव यह सहयोग फ्री में नहीं माँग रहे हैं, उसके बदले में जो अनुदान प्रदान करने की गारंटी दे रहे हैं उसे हमारे अनेकों साथी स्वयं देख चुके हैं, देख रहे हैं। गुरुदेव किसी जादू की छड़ी की बात नहीं कर रहे हैं, स्पष्ट कह रहे हैं कि गुरु-गुरु जपने से कुछ नहीं होने वाला, गुरुदेव सब कुछ कर देंगें- ऐसा कुछ नहीं होने वाला। गलत राह पर आप जाओ और ठीक करने की आशा गुरुदेव से रखें, कदापि नहीं। ऐसा हरगिज़ नहीं होगा। इन्हीं विचारों से गुरुदेव का “उलटे हुओं को उल्ट कर सीधा करने” का सिद्धांत उत्पन हुआ है। अगर आप गलत राह पर भटक गए हैं तो भी एक सहृदय पिता की भांति, गुरुदेव साथ देने का आश्वासन दे रहे हैं। गुरुदेव ने दादागुरु के सभी कठिन निर्देशों का पालन किया,ऐसे निर्देशों का पालन करना तो हम सोच भी नहीं सकते लेकिन 2026 के आध्यात्मिक जन्म दिवस पर इतना तो दे ही दें जो गुरुदेव हमसे मांग रहे हैं। ऐसा न करने पर हम Year after year यूं ही लिखते रहेंगें, कागज़ काले करते रहेंगें, प्राप्त कुछ भी नहीं होगा।
आइए गुरुवर के निवेदन को मानने का संकल्प लें और आज का लेख शुरू करें।
*****************
परमपूज्य कहते हैं कि हम लोग भगवान से कुछ न कुछ मांगते ही रहते हैं। बड़ी नौकरी, बड़ा मकान, अच्छा विवाह,अच्छे बच्चे, यहाँ तक कि तुच्छ जैसा लाटरी का इनाम आदि। ऐसे लोगों ने भगवान् को अपना नौकर ही समझ लिया है। न दिन देखते हैं,न रात, न कभी भगवान् के विश्राम आदि का ख्याल करते हैं लेकिन भगवान् को तो सभी का ख्याल रखना पड़ता है, यहां तक कि उनका भी जो कभी कुछ नहीं माँगते और निस्वार्थ भाव से भगवान् के सहचर बन कर, उनकी संतान बन कर, उनके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य करते रहते हैं। मनुष्य की मूर्खता तो देखो,उसे अपने पर इतना अविश्वास है कि सब कुछ होते हुए भी, ईश्वर का राजकुमार होने के बावजूद,अनेकों प्रतिभाओं से सम्पन्न होने के बावजूद, उसे भगवान् से दिन रात भिक्षा माँगनी पड़ती है। उसी के सामने वोह गिलहरी है जो चुपचाप, निष्ठापूर्वक, कुछ भी न होने के बावजूद, भगवान का सहयोग कर रही है। उसे अपना पेट पालने की कोई चिंता नहीं है, वोह निश्चिन्त भाव से भगवान् के कार्य में पूर्ण श्रद्धा से समर्पित है, वोह तो केवल एक ही गीत गाए जा रही है: अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में।
भगवान् से उसकी कोई भी डिमांड नहीं है, यदि है तो केवल उनके चरणों में स्थान पाने की ही इच्छा है।
धिक्कार है ऐसे मानव पर, जो चाँद तक छलांग लगाने की ढींग तो मार रहा है, मंगल पर अपना आधिपत्य जमाने में दूसरों को नीचे तो गिरा रहा है,लूनर एम्बेसी, लूना सोसाइटी इंटरनेशनल जैसी कंपनियां चाँद पर प्लाट बेचने का भी दावा तो कर रही हैं लेकिन स्वयं को पहचानने में, भगवान् द्वारा सौंपें कार्य/दाइत्व को निभाने में लापरवाही क्यों बरत रहा है। चाँद पर प्लॉट खरीदना एक प्रीतात्मक बात है,इसका कोई कानूनी आधार नहीं है।
उपरोक्त पंक्तियाँ उस तथ्य पर मोहर लगाने के लिए लिखी गयी हैं कि कभी-कभी भगवान् भी अपने भक्तों से मांगते हैं।
“क्या कहा भगवान् भी माँगते हैं ? उनके पास तो सब कुछ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, वोह तो सभी को देने वाले हैं, मनुष्य भला उन्हें क्या दे पायेगा?”
लेकिन ऐसा नहीं है, भगवान् मनुष्य की भांति लालची और स्वार्थी नहीं हैं, वोह अपने लिए कुछ नहीं माँगते। अर्जुन को प्रेरित करके, महाभारत का युद्ध कराके भगवान को क्या मिला ? मानवता के लिए धर्म-स्थापना करके,अर्जुन समेत जिस-जिस ने भगवान् के कार्य में योगदान दिया, कृतार्थ हो गया।
भगवान् अपने बच्चों से “उच्च कार्यो” की पूर्ति के लिए सहयोग की माँग करते हैं l
गुरुवर प्रज्ञा अभियान के प्रति स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि युग साहित्य पढ़ना-पढ़ाना, प्रज्ञा अभियान पढ़ाना, जन्मदिन मनाना ये तीन कार्यक्रम प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत आते हैं, अपने बच्चों से मुखातिब होकर गुरुवर कह रहे हैं कि आप सब भी प्रज्ञा पुत्रों के रूप मे हमारे साथ शामिल हो जाइए । हम आप सब को हनुमान, नल-नील,शबरी, केवट, रीछ-वानर की तरह आमंत्रित करते हैं। हमारे काम मे शामिल हो जाइए,आप हमारा काम कीजिए, हम आपकी ज़िम्मेदारी लेते हैं।
“प्रज्ञा अवतार और प्रज्ञा अभियान” को समझने के लिए गुरुदेव का विशाल साहित्य उपलब्ध है लेकिन जिन्हें संक्षेप में समझना हो उनके लिए इतना ही काफी है कि गायत्री परिवार की मान्यता के अनुसार परम पूज्य गुरुदेव का नाम ही प्रज्ञा अवतार के रूप में लिया जाता है। यहाँ पर यह क्लियर करना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि अन्य अवतारों की भांति यह शब्द कोई पौराणिक दिव्य चमत्कार नहीं, बल्कि “जागृत विवेक की शक्ति” के रूप में समझा जाता है। प्रज्ञा का अर्थ दिव्य बुद्धि, जागृत चेतना होता है। अवतार का अर्थ अवतरण (उच्च चेतना का पृथ्वी पर प्रकट होना) होता है। गायत्री परिवार की मान्यता के अनुसार परमपूज्य गुरुदेव को “प्रज्ञावतार” इसलिए कहा गया कि उन्होंने युग-परिवर्तन का विचार दिया, वेद-उपनिषद-गीता आदि का पुनर्व्याख्यान किया एवं साधना को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा।
प्रज्ञावतार (गुरुदेव) द्वारा दिया गया,प्रज्ञा अभियान एक सामाजिक-आध्यात्मिक आंदोलन है जिसका मुख्य उद्देश्य विचारक्रांति, चरित्र निर्माण,नैतिक पुनर्जागरण आदि हैं जिनसे गायत्री परिवार का बच्चा-बच्चा जानकार है।
पाठकों से आग्रह किया जा रहा है कि गुरुदेव के साहित्य से चयन करके प्रस्तुत किये गए ज्ञानप्रसाद लेखों को Lightly न लिया जाये, इन लेखों में अनेकों निर्देश हैं, सन्देश हैं, मार्गदर्शन है जो असंख्य भटके हुओं को राह दिखा चुके हैं, मंदिरों में नाक रगड़ने से, किसी मनुष्य के आगे हाथ फैलाने से, गुरुदेव ही करेंगें-करेंगें जैसे अन्धविश्वास भरे शब्द दोहराने से बेहतर है प्रज्ञा का प्रयोग करके,स्वयं को समझकर जीवन को उज्जवल बनाने का प्रयास करें।
इसी संदर्भ मे गुरुवर ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के एक-एक बच्चे से प्रार्थना( सच में प्रार्थना) कर रहे हैं कि आप केवल हमारा साहित्य घर-घर में पँहुचा दीजिए। इसके आगे का कार्य हमारा साहित्य स्वयं ही कर लेगा क्योंकि हमारी शक्तियाँ हमारे विचारों में समाहित हैं और यही है विचारक्रांति अभियान।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से नियत समय पर, पूर्ण नियमितता से गुरुवर का साहित्य विश्व के अनेकों घरों में वितरित किया जा रहा है। इसके आगे का कार्य गुरुदेव स्वयं ही कर रहे हैं।
अपने कथन को और स्पष्ट करते हुए गुरुवर कहते हैं कि “हम दुनिया को पलट देने का जो दावा करते हैं वह अपनी तपशक्ति एवं सिद्धियों को आधार बनाकर नहीं बल्कि विचारों से करते हैं।” आप सब हमारे विचारों को फैलाने में हमारी सहायता कीजिए। यह काम बहुत बड़ा है, बड़ा होने के कारण बहुत बड़ी ऊर्जा की आवश्यकता है। इसलिए हमें अब नयी पीढ़ी चाहिए, युवा चाहिए, शक्तिशाली गर्म खून चाहिए, आप जैसे पढ़े-लिखे, विचारशील लोग चाहिए। इस संदर्भ में गुरुदेव हमें युवा की परिभाषा अनेकों बार समझा चुके हैं। इस परिभाषा के अनुसार युवा वोह नहीं है जिसकी आयु 18-20 आदि वर्ष की है लेकिन निट्ठला बैठा हुआ है। 60-70 वर्ष का वरिष्ठ,पूर्ण श्रद्धा और शक्ति से,विवेक से कार्य करने वाला, अपनी बुद्धि का प्रयोग करने वाला मनुष्य ही युवा है। गुरुदेव को ऐसे मानवों से बड़ी आशा है।
आप हमारा साहित्य पहले खुद समझिए,फिर विचारशील, शिक्षित लोगों मे जाइए, गोष्ठियां कीजिये, चर्चा कीजिये, आधुनिक युग की सुविधाओं का प्रयोग करके हमारी विचारधारा उन तक पहुंचाईये l
यहाँ एक बार स्मरण कराना बहुत महत्वपूर्ण लग रहा है कि इस छोटे से मंच पर जो भी प्रयास किया जा रहा है, गुरुदेव के विचारों का प्रचार ही है
परमपूज्य गुरुदेव हम सभी बच्चों से युगपरिवर्तन, युगनिर्माण को सफल बनाने का निवेदन (जी हाँ,निवेदन) करते हुए कहते हैं कि हम आपके सामने हाथ फैलाते हैं, हमें केवल आपकी भावना, क्षमता, समय, श्रम चाहिए और विश्वास भी दिलाते हैं कि अगर आप हमारे खेत मे बीज बोयेगे तो निश्चित रूप से लाभ में रहेंगे। विश्वास कीजिये हम आपके बोये हुए बीज का 1000 गुना फल उगाकर देंगे, आपको निहाल कर देंगे l
यह कोई कोरी/फीकी बढ़ाई और डींग नहीं है, गुरुदेव/ माता जी के अनेकों बच्चे इस वचन के साक्षात् प्रमाण हैं जिन्हें समर्पण और पात्रता देखकर गुरुदेव ने क्या से क्या बना दिया।
परमपूज्य गुरुदेव के मन मे विश्व के कल्याण के लिए अत्याधिक बैचेनी है। भगवान् राम, भगवान् कृष्ण की भांति वह अवतारी सत्ता सब कुछ अकेले ही करने मे समर्थ है लेकिन वह हमें अपने सहकारी बनाकर, हमें श्रेय देना चाहते हैं, हमारी शान बढ़ाना चाहते हैं। गुरुदेव द्वारा रचित दिव्य साहित्य, सरल होकर जब घर-घर में पंहुचता तो अधिक से अधिक लोग दिव्य क्रांतिकारी विचारों को पढ़कर जागृत होते हैं, “युगक्रांति अभियान” मे भागीदारी करने के लिए तैयार हो सकते हैं। हमारे महान गुरु ने हमसे जो दायित्व की उम्मीद लगा रखी है, उसे पूरा करने का समय आन खड़ा हुआ है l जो कोई भी इस समय की पहचान करते हुए सहयोग के लिए हाथ बढ़ाएगा, वही जय जयकार का अधिकारी बनेगा वरना पछताने के सिवा कुछ हाथ ना आएगा l ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर भी उसी की जय जयकार हो रही है जो बिना कहे ही, स्वयं ही आगे आकर गुरुकार्य में सहकारिता दिखा रहा है।
गुरुवर केवल एक कदम बढ़ाने के साहस की बात कर रहे हैं। उसके आगे की सारी जिम्मेदारी स्वयं ही लेने के लिए तैयार खड़े हैं, कहाँ मिलेगा ऐसा विश्वास दिलाने वाला गुरु?
तो फिर देर किस बात की है? सभी परिजनों को दृढ़ संकल्पित होकर, समयदान,श्रमदान,विवेकदान आदि करते हुए, अपने दायित्व निर्वहन के लिए लग जाना चाहिए l
जय गुरुदेव,
इसके आगे के लेख के लिए कल तक के लिए मध्यांतर।
संध्या कुमार
