24th February,2026
आज के लेख की भूमिका का शुभारम्भ आदरणीय संध्या बहिन जी के धन्यवाद् से हो रहा है; जिस सक्रियता और स्पीड से बहिन जी ने सारी पुस्तक के 16 स्क्रीनशॉट भेज दिए हैं, उसके लिए आभार व्यक्त करते हैं। इस मंच पर जिन 15 मानवीय मूल्यों का ढिंढोरा फेरा जाता है, बार-बार प्रचारित किया जाता है, नियमितता उनमें से एक बहुत ही महत्वपूर्ण मूल्य है। यह मूल्य Take it easy, who cares करने वाले लोगों के लिए एक सूचक हो सकता है, हमारे जीवन का तो यह महत्वपूर्ण अंग है, इसमें अपनी बढ़ाई भी करवा लें तो शायद अनुचित न हो।
पुस्तक का शीर्षक स्वयं ही बहुत कुछ कह रहा है और प्राणवानों को जगने के लिए कह रहा है, कह रहा है “जो सोवत है सो खोवत है।”
बहिन जी के स्क्रीनशॉट भेज देने से एक करेक्शन करना चाहेंगें, जिन्हें 23-24 पृष्ठ कहा जा रहा था, वोह सच में 32 पृष्ठ हैं। इन 32 पृष्ठों में पहला भाग प्रज्ञावतार युगदेवता की अपील है जिसमें 1) जीवन का सौभाग्य, 2) भगवान क्यों आते हैं ? 3) भगवान् क्या देते हैं? 4) भगवान् क्या माँगते हैं ? चैप्टर समाहित हैं। दूसरे भाग में वंदनीय माता जी द्वारा “एक माँ की करुण पुकार” चैप्टर समाहित है। अंतिम भाग “परिजनों की अंतरंग गोष्ठी में” मात्र 3 ही पृष्ठ हैं।
कल प्रकाशित हुए आदरणीय संध्या जी के पुरषार्थ से संकलित हुई लेखमाला के आरंभिक लेख को साथिओं ने बड़े ही ध्यान से पढ़ा, जिसके लिए हम सभी का धन्यवाद् करते हैं। आग्रह करते हैं कि ज्ञानप्रसाद में समाहित इलेक्ट्रिक करंट को फील करके, उसके झटकों को शब्दों में वर्णन करने का अवश्य प्रयास करें। भगवान्/गुरुदेव हमसे यही मांग रहे हैं।
जय गुरुदेव
बहिन संध्या जी की लेखनी का शुभारम्भ होता है :
“प्राणवानो को ऋषियुग्म का मार्गदर्शन” पुस्तक को पढ़कर बहुत सुकून महसूस होता है, ऐसा महसूस होता है जैसे कि परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माताजी सामने बैठकर सब बता-समझा रहे हैं,अपनत्व से सराबोर, सरलतम भाषा शैली जो आसानी से हर परिजन को मान्य है l
परमपूज्य गुरुदेव बता रहे हैं कि जीवन में अनेक प्रकार के सौभाग्य आते हैं और उन सौभाग्यों के लिए मनुष्य सदा स्वयं को सराहता रहता है किन्तु ध्यान रखना है कि ऐसे सौभाग्य कभी-कभी ही आते हैं, हमेशा नहीं आते जैसे विवाह होना, डिग्री मिलना, नौकरी मिलना या लाटरी लगना। यह सुनहरे अवसर कभी-कभी ही प्राप्त होते हैं,इसे गुरुवर और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि मनुष्य को समय को पहचानना चाहिए, गुज़रा हुआ समय कभी वापस नहीं आता है,समय को पहचानना सबसे बड़ा सौभाग्य होता है।
70 वर्ष पूर्व रिलीज़ हुई बॉलीवुड मूवी शिरीं फ़रहाद का सुपरहिट गीत “गुज़रा हुआ ज़माना, आता नहीं दोबारा” हम जैसे वरिष्ठों की तो क्या, इंडियन आइडल तक की युवा पीढ़ी की भी पसंद है, हम सबको समय की महत्ता समझाता आ रहा है।
जिस प्रकार किसान समय की महत्ता को समझते हुए बीज बो देता है और अच्छी फसल पाता है,वैसे ही जो मनुष्य समय पर नौकरी के लिए अर्जी दे देते हैं, नफे मे रहते हैं l
परमपूज्य गुरुदेव “भगवान् के सहचर” होने की व्याख्या करते हुए हनुमान जी का उदाहरण देते हैं। हनुमान जी ने अपनी शक्ति एवं समय को पहचाना। भगवान राम के सहचर बन उनका कार्य करने लगे, अपने जीवन का लक्ष्य ही “भगवान का कार्य करना” बना लिया। भगवान को समर्पित होकर उन्होंने बड़े-बड़े कार्य किए। संजीवनी बूटी लेने गए थे तो पूरा पर्वत ही उठा कर ले आए, समुद्र को पार कर जाना, सोने की लंका को ध्वस्त कर देना, रावण एवं अन्य असुरों का सामना करना, कुंभकर्ण जैसे विशालकाय राक्षस से अकेले ही लड़ जाना आदि तथ्यों से भला कौन अपरिचित है।
हनुमान जी को यह शक्ति भगवान राम के प्रति समर्पित होने से, उनके सहचर बन जाने से एवं अध्यात्म की सही पहचान के कारण ही आई थी। पाठकों को स्मरण होगा कि कल प्रकाशित हुए लेख में अध्यात्म को समझने का प्रयास किया गया था। इसे पुनः प्रकाशित करना तो उचित न होगा, पाठक कल वाले लेख की सहायता लेने में स्वतंत्र हैं। अध्यात्म की उसी परिभाषा के सन्दर्भ मैं हमारे गुरुदेव बताते हैं कि
“अध्यात्म पूजा की चौकी तक या जीभ की नोक तक सीमित नहीं होता है बल्कि “ऊँचे सिद्धांतों को अपने जीवन मे धारण करने की हिम्मत ही सही अर्थों में है।”
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से जिन 15 मानवीय मूल्यों को समय-समय पर शेयर किया जाता रहा है,यदि हम एक बार ध्यान से समझ लें,उन पर अमल करते हुए अपने जीवन में उतार लें, विश्वास रखिये सभी आपके क़दमों में गिर जायेंगें, आपका गुणगान करेंगें, इन पुरातन मानवीय मूल्यों में अपार शक्ति समाहित है। लेकिन समस्या तो यही है कि हम गुरु साहित्य को, ज्ञानप्रसाद लेखों को केवल औपचारिकता के लिए ही पढ़ते हैं, हमें तो अध्यात्म का इलेक्ट्रिक करंट लगता ही नहीं है।
यहाँ पर एक बहुचर्चित प्रज्ञागीत मस्तिष्क में ठाठें मार रहा है, साथिओं के साथ शेयर करना ज़रा भी अनुचित न होगा
भजन की,अध्यात्म की,ईश्वर भक्ति की यही सबसे बड़ी परिभाषा है लेकिन मनुष्य को तो मंदिर में घंटी बजाने में, लोगों को बताकर बढ़ाई लूटने में ही सबसे बड़ा और शक्तिशाली अध्यात्म दिखता है।
अध्यात्म की परिभाषा को समझने, अंतःकरण में उतारने पर गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित इस लेखमाला का महत्व और अधिक हो जाता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से अध्यात्म के विषय पर अनेकों लेख प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन वर्तमान लेख के संदर्भ में एक बार फिर से दोहराना ज़रा भी अनुचित नहीं है।
गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी द्वारा रचित जिस पुस्तक पर यह लेखमाला आधारित है,उसका तो शीर्षक स्वयं ही बता रहा है कि लेखमाला का एक-एक शब्द प्राणवानों के लिए सन्देश है, मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है।
गुरुदेव/ वंदनीय माता जी हमसे पूछ रहे हैं : हनुमान जी ने अध्यात्म के नाम पर कौनसा अनुष्ठान या जप-तप किया था? वह केवल ऊँचे उद्देश्यों के लिए भगवान के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चल पड़े थे , उनके सहचर बन गए थे। नल-नील ने भी अध्यात्म और समर्पण के बल पर ही पत्थरों का पुल बना दिया था। नल और नील के बारे में यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है। नल विश्वकर्मा के पुत्र थे और नील अग्नि के पुत्र थे, दोनों वानर थे। देवताओं के तंग करने के लिए उनके हाथ में जो कुछ भी आता था पानी में फेंक देते थे। इस कारण देवताओं ने उन्हें शाप दिया था कि यह दोनों जब भी कोई वस्तु पानी में फैंकेंगें तो वोह डूबेगी नहीं। यहाँ भगवान् की महिमा देखकर मन गदगद हो जाता है कि भगवान् के सहचर बनने पर शाप भी वरदान में बदल जाता है। सभी को भलीभांति मालूम है कि समुद्र पर बने सेतु में न तो कोई पिल्लर थे, न कोई हैंगर्स थे और न ही कोई गार्डर फंसे थे। यहाँ तक कि सीमेंट की भी ज़रूरत नहीं हुई थी। वानर सेना ऐसे ही बस पत्थर फेंकती गयी और रामसेतु का निर्माण हो गया l पुरातन साहित्य में हम सबने अवश्य ही पढ़ा होगा कि वानर सेना का एक-एक सदस्य इतने से सहयोग से, भगवान के काम में जुड़ने के कारण क्या से क्या हो गया। उसी तरह नन्हीं गिलहरी, जो पानी में जाती,गीली होती,बालू में लोटती और अपने शरीर से चिपकी बालू को समुद्र में डालकर,रामसेतु निर्माण में सहयोग देती: वोह भी निहाल हो गयी, भगवान ने उसे शाबाशी दी एवं प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फिराया इससे उसकी पीठ पर धारी के निशान बन गए । आज भी गिलहरी की पीठ पर धारी के निशान दिखाई देते हैं। विज्ञान ने तो इसे भी Genetics की प्रक्रिया बता दिया है, वोह भला भगवान् की शक्ति तो कहाँ मानने वाला है क्योंकि वोह स्वयं ही तो भगवान् बना बैठा है। साथिओ, इन सभी उदाहरणों के द्वारा हम प्राणवानों का मार्गदर्शन हो रहा है।
उपरोक्त पंक्तियों से चली आ रही यह चर्चा समय-पालन का महत्व बता रही है।
समय को सम्मान करते हुए भगवान के सहचर बनने के कारण सब जय-जयकार के अधिकारी बन गए। गुरुदेव की तो शिक्षा ही भगवान् के खेत में योगदान देने को कहती है, भगवान् के विशाल उद्यान के बागवान बनने को कहती है।
गुरुवर, हम परिजनों को समय को पहचानने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, वह नवयुग निर्माण मे लग जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं l गुरुवर कह रहे हैं कि यह युगसंधि की बेला है, दृढ़ता से कार्य मे लग जाने को कह रहे हैं, कह रहे हैं कि इस सुअवसर को हाथ से मत निकलने मत दो वरना बाद मे पछतावा होगा। अभी तो आप सभी के बच्चे छोटे हैं,नासमझ हैं, कल को बड़े होने पर पछतावा करेंगे और पूछेंगें कि आपने ऐसा स्वर्णिम अवसर हाथ से क्यों निकलने दिया l
परमपूज्य गुरुदेव भगवान के अवतार लेने के संबंध मे बता रहे हैं कि धर्म की रक्षा एवं अधर्म के नाश हेतु भगवानों ने समय-समय पर अवतार लिए हैं। लेकिन भगवान के अवतार लेने के पीछे एक और महत्वपूर्ण कारण बताते हुए गुरुवर कहते हैं कि वह “सौभाग्यशालीयों का भाग्य चमकाने एवं निष्ठावानों को सिर-माथे पर रखने के लिए भी अवतार लेते हैं।” केवट, शबरी, सुग्रीव, हनुमानजी, रीछ- वानर, गिलहरी ऐसे ही उदाहरण हैं l भगवान राम सर्व शक्तिशाली थे वह बिना किसी के सहयोग के रावण से लड़ कर सीता माता को छुड़ा सकते थे लेकिन उन्हें अपने भक्तों को श्रेय देना था। यही कारण है कि भगवान् ने सबसे तरह-तरह का सहयोग लेकर उन सभी की जय जयकार करवाई। परमपूज्य गुरुदेव ने बताया कि समय-समय पर भगवान अवतार लेते हैं एवं धरती पर कष्टों का समाधान करते हैं, इसी संदर्भ मे गुरुवर कहते हैं कि चौबीसवें अवतार के रूप मे प्रज्ञावतार जन्म ले रहा है, भगवान के साथ या महापुरुषों के साथ उनके कार्यों मे सहयोग करने से मनुष्य क्या से क्या बन जाता है l हमने देखा ही है कि स्वतंत्रता संग्राम मे महापुरुषों के साथ भागीदारी करने वाले क्या से क्या बन गए, देश आज भी उनकी जय जयकार करता है ,लकड़ी और आग का उदाहरण देते हुए गुरुवर समझा रहे हैं कि जब तक लकड़ी अलग थी, तब कोइ भी उसे हाथ लगा देता था, इधर-उधर फेंक देता था किंतु जब वह स्वय को आग मे समर्पित कर देती है तब वह भी आग बन जाती है,उसकी तेजी एवं ऊर्जा बढ़ जाती है अब उसे हाथ लगाने से भय लगता है, इसी तरह यदि मनुष्य भगवान या महापुरुषों के साथ पूर्णतः समर्पित हो जाए तो उसकी ऊर्जा-शक्ति बढ़ जाती है, वह सौभाग्यशाली बन जाता हैl
सभी भाई बहिनों का धन्यवाद्, कल तक मध्यांतर
संध्या कुमार

