वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 के  दूसरे चरण का दूसरा लेख- आदरणीय संध्या कुमार जी 

पिछले ज्ञानप्रसाद लेख में संकेत दिया गया था कि सोमवार को आदरणीय संध्या जी द्वारा लिखी गयी लेखमाला का प्रथम भाग प्रस्तुत होगा।  बहिन जी ने बहुत ही परिश्रम करके, गुरुदेव की अद्भुत रचना “प्राणवानो को ऋषियुग्म का मार्गदर्शन” का न केवल स्वाध्याय किया बल्कि हम सबके लिए एक लेखमाला भी लिख डाली। बहिन जी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। 

मात्र 23-24 पन्नों की इस दिव्य पुस्तक को हमने ऑनलाइन सर्च करने का प्रयास किया तो जाना कि यह उपलब्ध नहीं है। हमारी  तरफ से ही कमी रह गयी होगी कि हमने बहिन जी को इस बात के लिए सूचित नहीं किया, उन्होंने तो 14 जनवरी को लेखमाला भेज दी थी। अगर हम कहते तो बहिन जी पूरी पुस्तक के 10-12 स्क्रीनशॉट (दो पृष्ठों का एक स्क्रीनशॉट) लेकर भेज देते, लेकिन हमें कोई बड़ी समस्या दिख नहीं रही। अगर बहिन जी प्रयोग करना चाहते हैं तो स्क्रीनशॉट लेकर भेज सकते हैं, बहिन रेणु जी एवं आद अरुण जी ने अखंड ज्योति पत्रिका पर ऐसा ही प्रयोग किया था और कितने उत्कृष्ट परिणाम आये थे।     

हर बार की तरह, आज की प्रस्तुति इस लेखमाला की भूमिका से सम्बंधित है, बहिन जी की भावनाओं का प्रकटीकरण है। असली लेख तो कल ही प्रस्तुत होगा। 

हर वर्ष हम सब पूर्ण श्रद्धा के साथ परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को मनाते हैं। गुरुदेव का भौतिक जन्म तो 1911 को हुआ था, 1926 को क्या हुआ था जिसने गुरुवर को अपना असली जन्म दिवस तक भुला दिया। दादागुरु का प्रकट होना, गुरुदेव को निर्देश देने, क्या यही था “आध्यात्मिक जन्म दिवस”, नहीं !!! केवल इतना नहीं था क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हमें अध्यात्म का अर्थ जानना होगा।  

अध्यात्म (Spirituality) का अर्थ स्वयं को जानना है, स्वयं का स्वध्याय है। दादागुरु ने उस दिव्य दर्शन में गुरुदेव के पिछले तीन जन्मों की रील चलाकर,एक चलचित्र की भांति बताया था कि वोह कौन हैं। अध्यात्म का संधि विच्छेद (आत्म + अधि) करने पर “आत्मा का अध्ययन अर्थात स्वयं का अध्ययन, स्वयं को जानना”  मिलता है।  अपने भीतर के चेतन तत्व (चेतना/आत्मा) को जानने, समझने और अनुभव करने की प्रक्रिया को अध्यात्म कहा गया है । भौतिक दुनिया से परे, आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझने का एकमात्र आंतरिक मार्ग ही अध्यात्म है, जो व्यक्ति को उसके जीवन के परम उद्देश्य की खोज में मदद करता है। अध्यात्म, स्वयं के भीतर झांकने (Self-exploration), ध्यान, चिंतन और योग के माध्यम से आंतरिक चेतना को उन्नत करने का साधन है। अध्यात्म  धर्म से पूर्णतया भिन्न है। धर्म अक्सर बाहरी अनुष्ठान और आचार संहिता है जबकि अध्यात्म पूरी तरह से आंतरिक अनुभव है। यह जीवन जीने की कला सिखाता है जो दैनिक जीवन में करुणा, शाश्वत ज्ञान और शांति के रूप में प्रकट होता है। 

तो साथिओ यही है, अध्यात्म की परिभाषा जिस पर  हमारे गुरुदेव का  सारा जीवन निर्भर रहा। आइये संकल्प लें कि पूज्यवर के लेखों का स्वाध्याय करते समय स्वयं को जानें, आत्मिक शांति को अनुभव करते हुए शरीर में ठीक वही कम्पन फील करें जैसी गायत्री मंत्र जाप के समय होती है। 

चलते हैं बहिन संध्या जी की दिव्य लेखनी की ओर:

*****************     

“प्राणवानो को ऋषियुग्म का मार्गदर्शन” 23-24 पृष्ठों  की पुस्तक बेहद ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी है, इसे अवश्य ही हर परिजन को पढ़ना चाहिए l पुस्तक को पढ़ते समय अपने गुरुसत्ता की करुण पुकार पर आंखें भर आती हैं, भावनाओं का ऐसा ज्वर  उठता है कि स्वयं को संभालने के लिए लेखन रोकना पड़ता है l मन पुकारता है कि परमपूज्य गुरुसत्ता ने न केवल समय-समय पर प्रवचनों द्वारा हम बच्चों का मार्गदर्शन किया है बल्कि मार्गदर्शन के लिए विशाल साहित्य का भी सृजन कर दिया। गुरुदेव के इस विशाल साहित्य का महत्व तो तभी सार्थक  होगा जब उसे समझ कर,अमृतपान करके,अन्य साथिओं के साथ शेयर करके, चर्चा करके अपने अंतर्मन में उतारने का प्रयास करेंगें। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रतिदिन इसी प्रयास को चरितार्थ करने का प्रयास किया जाता है। यदि हम नियमितता से, नियत समय के लिए दैनिक मंत्रोचारण करते हैं तो एक दिन ऐसा आ जाता है जब स्वतः ही हमारे शरीर में एक अद्भुत सी दिव्य कम्पन अनुभव होनी शुरू हो जाती है। यह कम्पन कोई एक-दो दिन यां एक दो घंटे में नहीं अनुभव होती, इसके लिए श्रद्धापूर्वक समय लगाना पड़ता है, यदि ऐसा अनुभव नहीं होता तो समझ लेना चाहिए कि हम केवल मशीन की भांति माला फेरने का कृत्य कर रहे हैं। 

दैनिक ज्ञानप्रसाद की दिव्यता भी  पाठक के मन-मस्तिष्क में कुछ ऐसी ही कम्पन अनुभव कराने की क्षमता लिए हुए है। इस अनुभव के लिए भी श्रद्धा और  समयदान की बहुत बड़ी आवश्यकता पड़ती है। एक बिज़नेस की भांति, श्रद्धा और समय ही वोह इन्वेस्टमेंट है जो हमें इंस्टेंट Return देती हैं। बिज़नेस में  Return प्राप्त करने के लिए कुछ महीनों/वर्षों की प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ती है, और फिर भी लाभ/हानि की  Uncertainty तो रहती ही है लेकिन गुरूसाहित्य में लाभ ही लाभ है और वोह भी इंस्टेंट, पढ़ते-पढ़ते ही सुख-शांति का आभास होना शुरू हो जाता है, दुर्भावना दूर और सद्भावना की निकटता का आभास होता जाता है। इस अद्भुत प्रक्रिया की चरितार्थ कमेंट-काउंटर कमेंट में साफ दिखता है,जहाँ साफ़ तौर से दिखता है कि गुरुदेव के साहित्य ने किस वोल्टेज का करंट लगाया है।               

परमपूज्य गुरुदेव ने दिव्य साहित्य रचने के साथ ही महामानव/ देवमानव गढ़ने के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय एवं ऊर्जा से परिपूर्ण युगतीर्थ शांतिकुंज की रचना की। गुरुदेव ने अपने तप के अंश को संचित कर दिया ताकि उनके बच्चे यहाँ आएँ और चार्ज  होकर जाएं। कितनी शर्मनाक बात है कि परमपूज्य के स्वादिष्ट हलवे के अमृतपान करने के लिए बार-बार, प्रतिदिन ,दिन-रात परिजनों को आग्रह करना पड़ता है। गुरुसत्ता द्वारा चलाए जा रहे नवयुग निर्माण के कार्यक्रमों में  भागीदारी करने के लिए उन्हें अपने बच्चों, अपने परिजनों से आग्रह करना पड़ रहा है l

हम बच्चों को  गुरुदेव के बिज़नेस मॉडल की समझ ही नहीं है।  किसी भी बिज़नेस से लाभ लेने के लिए पार्टरनशिप करनी पड़ती है। ऐसा कभी भी नहीं होता कि इन्वेस्टमेंट/पार्टनरशिप कुछ न हो और लाभ लेने को आ जाएँ। पिता भी अपनी वसीयत में सम्पत्ति उसी के नाम लिखता है जिसने जीवनभर उसकी सेवा की होती है एवं जो उस सम्पत्ति का सदुपयोग करेगा।  

परमपूज्य गुरुदेव के दिव्य साहित्य के माध्यम द्वारा ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से इन्हीं भावनाओं का प्रचार-प्रसार (विज्ञापन नहीं, प्रचार) किया जा रहा है। कुछ एक सहपाठिओं की सशक्त टीम इस प्रचार की Driving force है,यही वोह Force है जो इस परिवार का प्राण है।  

आदरणीय त्रिखा भाई साहिब  प्रतिदिन, नियत समय पर ब्रह्ममुहूर्त में उत्तम ज्ञानवर्धक लेख “ज्ञानप्रसाद” के रूप मे प्रस्तुत करते हैं। हम सब पाठकों के लिए, घर बैठे उत्तम “स्वाध्याय-सत्संग” का यह सरलतम मार्ग उपलब्ध है। स्वाध्याय का अर्थ है कि सब लोग अपने-अपने घर में, अपने-अपने फ़ोन पर इन लेखों का न केवल अध्ययन करते हैं बल्कि कमेंट/काउंटर कमेंट करके सत्संग भी करते हैं।  

सभी साथी  जानते हैं इस साहित्य को प्रस्तुत करने के लिए अरुण जी न जाने कितने दिन अथक परिश्रम करते हैं। ऑनलाइन/ऑफलाइन, अनेकों स्त्रोतों से सामग्री संकलित कर, अति-उत्तम लेख सरलतम भाषा मे उपलब्ध करते हैं। इतना प्रयास करने के बावजूद भी  उन्हें परिजनों से नियमितता के लिए आग्रह करना पड़ता है। 

आदरणीय भाई साहिब के प्रयास से प्रभावित होकर  ही हमने कुछ दिन पूर्व कुछ पंक्तियाँ लिख कर भेजी थीं  और आग्रह किया था  कि यां तो हम खुद ही यूट्यूब पर एक कमेंट के रूप में पोस्ट कर देते हैं यां आप पोस्ट कर दें। यहाँ पर वोह पंक्तियाँ शामिल करना अति प्रासंगिक है। 

कुछ दिन पूर्व “उपासना-साधना-आराधना” शीर्षक से प्रकाशित हुए  दैनिक दिव्य सन्देश ने निम्नलिखित पंक्तियों के लिए Trigger का कार्य किया था :   

आदरणीय त्रिखा भाई जी आप भी तो उपासना+साधना +अराधना के मार्ग पर पूरी निष्ठा से चल रहे हैं, ज्ञानप्रसाद एवं शुभरात्रि  संदेश की प्रस्तुति हेतु आप पूरे दिन गुरुवर के साहित्य का अध्ययन करते है, विभिन्न स्त्रोतों से जानकारी एकत्रित करते हैं, उनका सरलीकरण करते हैं। इस प्रकार पूरा समय गुरुवर के साहित्य के सानिध्य मे व्यतीत करते हैं, साहित्य के सानिध्य का अर्थ है गुरुवर का सानिध्य, अपने आराध्य के सानिध्य में, उनसे एकाकार होने का अर्थ ही तो “उपासना” है l इतने उच्चस्तरीय साहित्य का अध्ययन, संकलन, स्वय को साधे बिना असम्भव है, इस हेतु संस्कारित जीवनशैली एवं संयमित विचार के साथ स्वयं  को साधना परमावश्यक है, यहि तो “साधना” है l इसके साथ ही गुरुवर के  दिव्य साहित्य को सरल तरीके से अधिकाधिक परिजनों को लाभान्वित करने के उद्देश्य से निशुल्क, नित्य एवं नियत समय पर प्रस्तुत करना, स्व: के साथ सर्वहित की भावना से प्रेरित है, कुछ भी “लेने की सोच” से परे सिर्फ “देने की भावना” है ,यहि उदारता तो “आराधना” तुल्य हुई l 

मेरी समझ से आदरणीय त्रिखा भाई जी उपासना, साधना एवं आराधना के मार्ग को पूर्णतः अंगीकार कर चल पड़े हैं तथा पात्रता विकसित कर रहे हैं, अवश्य ही गुरुवर उनको और बड़े कार्य हेतु तैयार कर रहे हैं l 

एक विचार आया सो अपने परिवार के समक्ष रख दी हूँ, कुछ त्रुटि लगे क्षमा करें l 

बहिन जी की भावना का सम्मान करना हमारा (अरुण त्रिखा) परम कर्तव्य है, सराहना किसे अच्छी नहीं लगती?, इसी से तो साक्षात् ऊर्जा का संचार  होता है लेकिन यहाँ यह कहना भी अनुचित नहीं है कि  हम जैसे तुच्छ प्राणी के लिए इतना भावपूर्ण सन्देश लिखना बहिन जी की महानता ही है, ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।  

इसी सन्दर्भ में बहिन जी आगे लिख रही हैं: 

त्रिखा भाई साहिब परिजनों से लेख को समझकर पढ़ने, अंतर्मन में उतारने के लिए आग्रह करते हैं। कमेन्ट करने एवं पढ़ने तथा उन्हें जीवन मे आत्मसात करने हेतु आग्रह करते हैं। सभी पाठक इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि पाठकों को गुरूसाहित्य पढ़ा कर, अरुण जी का अपना  कोई भी स्वार्थ नहीं है, केवल पाठकों को ही लाभ मिलेगा। यदि हमारे ह्रदय में  उनकी भावनाओं का ज़रा सा भी सम्मान है तो नाटकबाज़ी को बंद करते हुए, संकल्पित होकर गुरुसत्ता के साहित्य /दैनिक  ज्ञानप्रसाद को पढ़ना शुरू करें, दूसरों को पढ़ाने में सहयोग करें। आज के युग में जहाँ हर तरफ अशांति का प्रकोप है, स्थाई मानसिक शांति एवं शक्ति का इससे बढ़कर कोई भी विकल्प नहीं है।

जय गुरुदेव, कल तक के लिए मध्यांतर


Leave a comment