वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 के  दूसरे चरण का प्रथम लेख- आदरणीय रेणु श्रीवास्तव जी

हमारी आदरणीय बड़ी बहिन रेणु श्रीवास्तव जी की पूर्वस्वीकृति लिए बिना, हमने उनके द्वारा प्रस्तुत योगदान में अपना कुछ योगदान शामिल कर दिया जिसके लिए हम करबद्ध क्षमाप्रार्थी है। हमारी धारणा है कि स्नेह और आदर से ओतप्रोत, एक छोटे भाई द्वारा इतना साहस करना कोई बड़ा Crime नहीं है    
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से पिछले कुछ वर्षों से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस (वसंत) को एक उत्सव की भांति मनाया जाता है। इस उत्सव को मनाने के लिए साथिओं को अपने योगदान भेजने के लिए निमंत्रण भेजा जाता है। हर बार इस निमंत्रण को अलग रिस्पांस मिलता है। इस बार अभी तक केवल तीन साथी (आदरणीय रेणु श्रीवास्तव जी, आदरणीय संध्या कुमार जी एवं आदरणीय सरविन्द पाल जी) ही इस दिव्य कार्य में आगे आये हैं, सभी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। 
“2026 के वसंत का महत्व अन्य वर्षों से कुछ अलग है।” 
1926 में हमारे दादागुरु सर्वेश्रानन्द जी ने परमपूज्य गुरुदेव को आंवलखेड़ा की कोठरी में दिव्य दर्शन दिए थे, उन्हीं के निर्देश से अखंड दीप की स्थापना की गयी थी, इसी वर्ष परम वंदनीय  माता जी का इस धरती पर अवतरण हुआ था।
तो वर्ष 2026 एक साथ तीन-तीन शताब्दियाँ लेकर आया है। ऐसे विशिष्ट समय में परमपूज्य गुरुदेव ने हमारे (अरुण त्रिखा) जैसे तुच्छ लेखक  के हाथ में कुछ दुर्लभ अखंड ज्योति पत्रिकाएं थमाई जिनके अध्यन से 20 लेखों की एक श्रृंखला का जन्म हुआ। गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित इस प्रथम चरण का समापन कल हुआ था। आज दूसरे चरण का प्रथम लेख प्रस्तुत किया गया है। जहाँ हम बहिन जी का धन्यवाद् करते हैं, वहीँ आशा करते हैं कि हर लेख की भांति यह प्रस्तुति भी पाठकों के ह्रदय को छू जाएगी। 
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पंडित श्रीराम शर्मा आचार्यजी एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक, गायत्री परिवार के संस्थापक थे जिन्होंने विश्व एकता का संदेश दिया।उनका जन्म उत्तर प्रदेश में आंवलखेड़ा नामक छोटे से गाँव  में हुआ। गुरुदेव ने आध्यात्मिक विकास के द्वारा समाज में क्रांति फैलाई।आज विश्व के अधिकांश देशों में गायत्री परिवार परिजन सक्रिय होकर गुरुदेव के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने सभी को आत्म परिष्कार यानि स्वयं का परिष्कार  (Self-refinement) एवं आत्म चिंतन (Self-reflection) का उपदेश दिया और यही हम सबका मूल मंत्र है। इसी मंत्र  से आज भी व्यक्ति निर्माण,परिवार निर्माण, समाज निर्माण का कार्य तीव्र गति से आगे ही आगे बढ़ता चला जा रहा है। परमपूज्य गुरुदेव ने 3200 के लगभग पुस्तकें लिखकर, विशाल साहित्य की रचना करके हम जैसों का ऐसा मार्गदर्शन किया एवं कर रहे हैं जिसके अमृतपान से न जाने कितने ही परिवारों के अंधकारमय वातावरण में प्रकाश की किरण दिखने लगी है। जब हम गुरुदेव के विशाल साहित्य की ओर दृष्टि दौड़ाते हैं तो दिखता है कि शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र होगा जिस पर गुरुवर की लेखनी न चली हो। 
परम वंदनीय माता जी की जन्म शताब्दी, परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस तथा अखंड दीप के  प्राकट्य के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अभी कुछ दिन पूर्व ही 19 जनवरी 2026 से आरम्भ होकर चार दिवसीय शताब्दी समारोह का आयोजन किया गया। इस त्रिवेणी संगम का भव्य उत्सव हरिद्वार स्थित गंगा तट पर वैरागी द्वीप में हुआ। 
हमारे साथी जानते हैं कि यह त्रय-शताब्दी समारोह केवल हरिद्वार, आंवलखेड़ा, मथुरा, भारत तक ही सीमित न रह कर, पूरे विश्व में मनाने की योजना है। इतना ही नहीं, शांतिकुंज प्रशासन से जानकारी दी गयी है कि यह उत्सव कई वर्षों तक मनाया जाना है। आदरणीय चिन्मय पंड्या जी की शार्ट वीडियो, जिसमें आने वाले वर्षों के चार चरणों की बात की गयी है, हम सबने देखी  हुई है, फिर भी दोहराने के लिए निम्नलिखित लिंक दिया जा रहा है।      
https://youtube.com/shorts/Q4tQqHlG5Wo?si=iXu_9RetKdgm3uKs
यह कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें बार-बार दोहराना ठीक रहता है, सभी तिथियां, सभी फैक्ट्स कहाँ याद रह पाते हैं। मनुष्य की तो प्रवृति ही ऐसी होती है कि उससे पूछा  जाए कि उसने कल ब्रेकफास्ट में क्या खाया था तो दो मिंट सोचना पड़ेगा। 
वैरागी द्वीप, शताब्दी नगर समारोह को सफल बनाने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति दर्ज़ हुई। इस उपस्थिति में, साधारण साधकों के इलावा अनेकों विश्विख्यात विभूतिओं ने सभी को ज्ञानदान प्रदान किया। हमारे ग्रंथों में ज्ञानदान को “सर्वोत्तम ज्ञान” की संज्ञा दी गयी है, यही वह दान है जिससे सही और गलत का, नीति और अनीति का, अंतर् समझने का ज्ञान प्राप्त होता है। इस ज्ञान के प्राप्त होते ही साधारण सा मानव, महामानव और देवमानव बनता चला जाता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से प्रतिदिन प्रसारित होने वाले ज्ञानप्रसाद का एकमात्र उद्देश्य मानव का आत्म परिष्कार ही है। 
शताब्दी समारोह में योगदान देने के लिए देश-विदेश से महीनों पहले से ही श्रमदान शुरू हो गया था। सूखी-कांटों भरी भूमि को समतल करने से लेकर भोजनालय/टॉयलेट्स आदि तक की व्यवस्था स्वयंसेवकों द्वारा की गयी थी। श्रद्धालुओं के आवास,अलग-अलग नगर आदि बसाए गए थे। इससे कई माह पूर्व देश-विदेश में  ज्योति कलश की यात्रा एवं पूजन हुए। जगह-जगह दीप यज्ञ सम्पन्न हुए। हमारा सौभाग्य है कि हमारे घर कनाडा में भी ज्योति कलश का शुभागमन हुआ, इस सौभाग्य के लिए बहिन इशानी जी एवं तेजल जी का धन्यवाद् करते हैं। आइये इस वीडियो को भी फिर से देख लें : 
https://youtu.be/EZqcwEysfyA?si=YF9xEV566BOAGjfZ
जैसा उपरोक्त पंक्तियों में वर्णन किया गया है, शताब्दी नगर में सारा कार्य स्वयंसेवकों द्वारा ही सम्पन्न किया गया था।किसी ने भी एक पैसा तक चार्ज नहीं किया था। इस विषय पर भी हमने एक 26 मिंट की वीडियो अपलोड की थी।  इस वीडियो में दर्शकों ने साथिओं के उच्च विचार अवश्य ही सुने होंगें। न्यूज़ वाला की इस रिपोर्ट में साथिओं ने देखा होगा कि रिपोर्टर स्वयंसेवकों से पूछ रही है कि फ्री में कैसे सारा कार्य हो रहा है, कुछ न कुछ स्वार्थ तो होगा ही, उस बेचारी को कहाँ मालूम कि यह परमपूज्य गुरुदेव का परिवार “गायत्री परिवार” है जिसमें लेने की बात न करके, देने की बात होती है, बोओ और काटो की बात होती है।   
https://youtu.be/-apKAV3eXuE?si=3hOV7zbatMwVYOPv
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से पिछले कई वर्षों से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित दिव्य लेखों की श्रृंखला प्रकाशित की जा रही है ,आशा है सभी परिचित होंगे।
इस वर्ष का वसंत सभी के लिए ‌दिव्य संदेश लेकर आया है जब हम सभी त्रिवेणी संगम शताब्दी समारोह कार्यक्रम मना रहे हैं। गुरुदेव ‌की तप शक्ति से पूरा गायत्री परिवार संचालित हो रहा है,आज भी गुरुदेव का सूक्ष्म शरीर शान्तिकुंज में विराजमान हैं। गायत्री तपोभूमि मथुरा से उन्होंने साधना का आरंभ किया। दादागुरु के निर्देश पर 24-24  लाख के चौबीस महापुरश्चरण  सम्पन्न किए। 1971 में गुरुदेव मथुरा से प्रस्थान करके वंदनीय माता जी के साथ शान्तिकुंज आ गए। शान्तिकुंज का स्थापना दिवस भी बसंत पंचमी ही है। शान्तिकुंज स्थापना के पीछे दिव्य चेतना के भाव को गुरुदेव के आध्यात्मिक स्वरूप को अन्तर्मन में ग्रहण करने का अवसर मिला। 
हमारे गुरुदेव बाल्यकाल से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे,उन्होंने  स्वयं के लिए कुछ भी अर्जित नहीं किया। लोक‌ कल्याण हेतु अपना सब कुछ न्यौछावर किया। अपने तप की पूंजी को भी लोककल्याण में ही ख़र्च किया। गायत्री मंत्र साधना को जन-जन के लिए सुलभ कराया। पुरातन समय में  महिलाओं को गायत्री मंत्र जप का अधिकार नहीं था। गायत्री मंत्र पर सिर्फ ‌ब्राह्मणो का अधिकार था लेकिन गुरुदेव ने नारा दिया: 
जाति-धर्म सब  एक समान,नर और नारी एक समान।
अभी कुछ दिन पूर्व, इसी मंच से स्वामी विवेकानंद जी पर लेख श्रृंखला प्रस्तुत की गयी, उस श्रृंखला के एक-एक लेख के अमृतपान से ऐसा मालूम होता है कि जिन सूत्रों को लेकर स्वामी जी लेकर चले थे, उन्हीं की पूर्ति हेतु पूज्य गुरुदेव का इस धरा पर अवतरण हुआ। 
गुरुदेव का सत्संकल्प:
हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा,आत्म निर्माण,समाज निर्माण,लोकसेवा,इसी उद्देश्य को कार्यान्वित करने हेतु देवमानव गढ़ने के लिए सत्र आरंभ किया गया।
वंदनीय माता जी, जगत जननी,सभी गायत्री परिवार को अपने आंचल में समेटे हुए जैसा ममत्व और प्यार उड़ेलती हैं जिसका वर्णन शब्दों में करना असम्भव है। उन्होंने ने ही नारी जागरण अभियान का शुभारंभ किया।
मनुष्य के जीवन में कुछ घड़ियां ऐसी होती हैं जब सौभाग्य की वर्षा होती है, एक ऐसी वर्षा जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन होता है। गुरुदेव के सम्पर्क में जो भी आया पत्थर से पारस बनता चला गया। गुरुदेव सदैव यही कहते हैं:
हमारा वर्तमान ही प्रधान है। वर्तमान में अच्छे कर्म करने पर पूर्व जन्मों के बुरे कर्मों का प्रभाव कम होता है और श्रेष्ठ भविष्य में परिवर्तित हो सकता है। अपने सद्विचारों के साथ सत्कर्मों को आश्रय‌ दें। बोओ और काटो अर्थात जैसा कर्म करेंगे वैसा ही परिणाम मिलेगा। गुरुदेव ने मानव मात्र को एक समान कहा जिसका अर्थ है किसी के लिए भी जाति आदि का कोई बन्धन नहीं है। सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं। जाति से कोई ब्राह्मण नहीं होता बल्कि सत्कर्मों से मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। गुरुदेव ने नवसृजन के लिए समर्पित शिष्यों का आह्वान किया। ब्रह्मबीजों का ब्रह्मतेज सारे विश्व में फैल चुका है। देश-विदेश में सैकड़ों शक्तिपीठों  की स्थापना हो चुकी है। आज करोड़ों समर्पित, निष्ठावान गायत्री साधक गुरुदेव के सपनों को साकार कर रहे हैं। 
ऐसे ही करोड़ों साधकों में एक छोटा सा, मात्र कुछ एक साथिओं का हमारा परिवार भी है जिसका नाम ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार है। इस परिवार के कुछ एक अति समर्पित साथी रीछ, वानर, गिलहरी की भूमिका निभाते हुए रामसेतु जैसा कार्य करने में प्रयासरत हैं।
शीर्षक में ऑनलाइन होने के बावजूद, इस परिवार के सदस्यों की ऑफलाइन उपस्थिति भी अति सराहनीय है। इस सक्रियता की  एक झलक प्रत्येक शनिवार के स्पेशल सेगमेंट में देखने को मिलती है। 
समापन 


आशा करते हैं हमारी आदरणीय बहिन सुमनलता जी ने कल शनिवार वाले फ्री फिल्म शो के लिए अपनी प्रज्ञा मण्डली इक्क्ठी कर ली होगी। सोमवार को आदरणीय संध्या जी की प्रस्तुति का प्रथम भाग आने वाला  है।  


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