19 फ़रवरी 2026
परमपूज्य गुरुदेव के चरणों में अर्पित किया गया आज का पुष्प उस लेख श्रृंखला के “पहले चरण” का समापन लेख है जिसे हर वर्ष की भांति 2026 में पूज्यवर के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित किया जा रहा है। कल से इस समर्पण प्रक्रिया का दूसरा चरण “अपने साथिओं के योगदान” से आरम्भ हो रहा है।
आज का लेख, अखंड ज्योति के अप्रैल 1990 में प्रकाशित उसी 19 लेखों का लेखमाला में से चुना गया है जिसका हम बार-बार रेफरन्स देते आ रहे हैं । लिखने से पहले जितनी बार भी प्रस्तुत लेख को पढ़ा, मोटर साइकिल पर बैठे आदरणीय अरुण जी , उद्घोष लगाते नन्हें-मुन्हें -प्यारे-प्यारे बच्चे, बैनर हाथ में लिए बच्चे, आँखों के आगे घूम गए। ऐसा इसलिए हुआ कि आज के लेख में कुछ इसी तरह का ज्ञान है, ज्ञानप्रसार का इतना सरल माध्यम जिसे कोई भी कर सकता है।
लेख का समापन पिछली बार की ही तरह एक चीट शीट से हो रहा है जिससे कम्पलीट लेख तो नहीं, उनके शीर्षक देखे जा सकते हैं। पूरे लेख हमारी वेबसाइट पर किसी भी समय पढ़े जा सकते हैं।
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विश्व की लगभग सभी साँस्कृतिक मान्यताओं में तीर्थयात्रा का बहुत बड़ा महत्व है। यरुशलम मक्का, बोधगया,सारनाथ आदि तीर्थों के अनुयायी उन केन्द्रों में पहुँचते और अपनी श्रद्धा की सघनता का परिचय देते हैं। भारतीय धर्म में भी तीर्थों की महिमा और गरिमा का असाधारण प्रतिपादन हुआ है, इसलिए असंख्य तीर्थयात्री इस प्रयोजन के लिए असाधारण मात्रा में समय, श्रम और धन का नियोजन करते हैं।
तीर्थयात्रा को अनेक सत्परिणाम उत्पन्न करने वाले धर्मानुष्ठानों में गिना जाता है। लेकिन समय के साथ तीर्थस्थान एवं तीर्थ यात्राएं भी समाज में पनप रही विकृतियों से अछूते नहीं रहे हैं
परमपूज्य गुरुदेव तीर्थयात्रा के महत्व एवं पुण्यफल के बारे में साफ़-साफ़ कह रहे हैं कि
-क्या “धर्मप्रचार की पदयात्रा” अपनाई गयी ?
-जन-जन के साथ संपर्क साधा गया?
-क्या समाज का नेतृत्व करने वाले विचारशील महामानवों के साथ संपर्क स्थापित किया गया ?
-यदि उनके सानिध्य में बैठे तो क्या उनसे प्राप्त हुए ज्ञान को अंतर्मन में उतारने का संकल्प लिया गया ?
गुरुदेव ने यह प्रश्न आज से 36 वर्ष पूर्व अप्रैल 1990 की अखंड ज्योति में पूछे थे,अगली पंक्तियों में जिस स्थिति की वर्णन किया गया है,आज 2026 में जब यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, यातायात आदि सुविधाजनक तो अवश्य ही हुआ है लेकिन तीर्थ यात्राओं का उद्देश्य कितना पूर्ण हो पाया है, यह सबकी अपनी-अपनी राय है।
आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो भेड़चाल में देवालयों के दर्शन, जलाशयों में डुबकी लगाने, पूजापत्री जैसी लकीर पीटने को ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। शायद उन्हें धक्का-मुक्की, फैली हुई गंदगी, अव्यवस्था से कोई सरोकार नहीं है। उनसे अगर पूछा जाए कि तीर्थयात्रा से आपको क्या पुण्यफल प्राप्त हुए, आपने समाज को क्या दिया तो शायद ही कोई उत्तर मिले।
गुरुदेव हमसे पूछ रहे हैं कि क्या हरकी पौड़ी पर हर-हर गंगे की डुबकी लगाने से आकाश से पुण्यफल बरसना शुरू हो जायेगा,नोटों की बारिश हो जाएगी,वर्षों के संचित कुकर्मों का नाश हो जायेगा?
गुरुदेव उत्तर में समझा रहे हैं कि भटक जाने पर राह बदलनी पड़ती है, भूल सुधारनी पड़ती है।
अच्छा हो तीर्थयात्रा संबंधी प्रचलन में हम नये सिरे से विचार और परिवर्तन करें और देखें कि हमारी तीर्थयात्रा के साथ कहीं लोकमंगल जुड़ा है यां केवल सैर-सपाटा ही है।
पुराने समय में “धर्मप्रचार की पद यात्रा” में संपर्क के साधन ढूंढे जाते थे। आज पद यात्रा की बात करना कुछ अटपटा सा लगता है, तीर्थयात्री तो तीर्थ के गेट तक गाड़ी ले जाना बेहतर समझते हैं। गुरुदेव आज के समय के लिए विनोबा जी की पद यात्रा जैसा विकल्प बताते हुए कहते हैं कि अपनी कार्यपद्धति के प्रति निष्ठा जमाने के लिए सुनियोजित क्रिया प्रक्रिया निर्धारित करें।
आज की स्थिति में यह उपयुक्त लगता है कि जन जागरण की साइकिल यात्राओं पर टोली बना कर निकलें। साइकिल यात्राओं की टोली एक प्रवाहक्रम बना कर जन-जागरण के लिए निकलें और जिधर से गुजरें, उधर ही युग-चेतना का प्रकाश वितरण करें। दीवारों पर आदर्श वाक्य-लेखन, सहगान कीर्तन और युगधर्म संबंधित स्थानीय आधारों का स्वरूप और समाधान प्रस्तुत करें।
योजना इस प्रकार बने कि साइकिल टोली प्रचारक अपने गाँव/नगर से शान्तिकुंज को विश्व तीर्थ मान कर उसके लिए यात्रा आरम्भ करें। जहाँ भी उपयुक्त लगे, विराम करें और अपने ढंग से प्रचार-प्रक्रिया क्रियान्वित करें। शान्तिकुंज पहुँच कर दो-चार दिन विश्राम करें, साधना करें एवं प्रेरणा ग्रहण करें। पैदल-यात्रा में अधिक जनसंपर्क होने, खर्च कम पड़ने, जहाँ चाहे सुस्ताने आदि की अधिक सुविधाएँ तो हैं लेकिन समय अधिक लगने तथा श्रम को सहन करने की सुविधा भी तो चाहिए। जिन्हें साइकिल चलाना नहीं आता, ऐसे लोग, विशेषतया महिलाएँ साइकिल की अपेक्षा पैदल चलने अथवा वाहनों का उपयोग करने के लिए विवश होती हैं लेकिन जिन्हें चलाना आता हो, उन्हें साइकिलों की टोली बना कर निकलना ही सुविधाजनक होता है। साइकिलों की तीन-चार की टोली ही पर्याप्त है। इनमें से एक भारवाहक रिक्शा भी होना चाहिए, जिसमें बिस्तर-कपड़े, भोजन बनाने के साधन, वाद्ययंत्र आदि को सुविधापूर्वक ले जाया जा सके। साइकिलों में लोग कैरियर पर बहुत सीमित सामना ही लाद सकते हैं। छोटा या बड़ा लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर हर हालत में साथ रहना चाहिए। स्लाइड प्रोजेक्टर भी ऐसा ही, सस्ता साधन है जो कहीं भी स्क्रीन लगाकर फिल्में दिखा कर, किसी गली मुहल्ले की भीड़ इकट्ठी कर सकता है और प्रवास के साथ धर्मप्रचार का दोहरा उद्देश्य एक साथ पूरा कर सकता है। साइकिल यात्रा के साथ, झोला पुस्तकालय चलाना, ज्ञानरथ धकेलना, घरों में स्लाइड प्रोजेक्टर दिखाना, आदर्शवाक्य लिखना, स्टीकर्स लगाना, छोटी-छोटी गोष्ठियाँ नियोजित करना, प्रभात फेरी स्तर का अलख जगाना, साप्ताहिक सत्संग के लिए दौड़-धूप करना यह सब तीर्थयात्रा की ही आवश्यकता पूरी करते हैं लेकिन साइकिल टोलीयात्रा का जो प्रभाव-परिणाम देखने को मिलता है, उसकी बात ही कुछ और है।
यहाँ एक बात समझने वाली है, हर किसी का Difference of opinion है :
जो लोग तीर्थयात्रा के पुण्य से प्रभावित होते हैं, इस उपयोगिता को समझ नहीं पाते। उनके लिए तो नर्मदा की परिक्रमा, गोदावरी परिक्रमा, गंगा परिक्रमा, किसी तीर्थ की परिक्रमा ही सबसे बड़ा तीर्थ है। महिलाएँ घरों के भीतर तुलसी के,घर से बाहर पीपल के वृक्षों की न केवल परिक्रमा कर लेती हैं बल्कि गणना के लिए सूत का कच्चा धागा भी लपेटती जाती हैं।
ऐसे विश्वास वाले जनसाधारण को तीर्थयात्रा के उपयोग और उद्देश्य का कैसे ज्ञान होगा?
यह “चिन्ह पूजा” बताती है कि तीर्थयात्रा पाप प्रायश्चित करने का एक उपक्रम है। अब तो सिर्फ चिन्हपूजा की मनोरंजन प्रक्रिया ही सर्वत्र हावी है, परमार्थ किसी को सूझता ही नहीं। देवालयों में मनोकामना पूर्ण करने या सस्ती वाह-वाही लूटने के उद्देश्य से ही धर्म स्थानों का निर्माण होते देखा गया हैं।
प्राचीनकाल के ऋषि-मुनियों की एक प्रशिक्षण पद्धति यह भी थी कि वे अपने शिष्यों की मण्डली साथ लेकर तीर्थयात्रा पर निकलते थे और उपयुक्त स्थानों पर विराम करते हुए अध्ययन-अध्यापन का क्रम चलाते रहते थे। इससे उस ऋषि मण्डली को अनेक क्षेत्रों के साथ संपर्क साधने, अनुभव बटोरने एवं स्वास्थ्य संवर्द्धन के बहुमुखी लाभ मिलते थे। पद यात्रा स्वास्थ्य संवर्द्धन का एक अति सरल और महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। अभी भी छुट्टी के दिनों में छात्रों, किसानों एवं दूसरों लोगों को पर्यटन-परिभ्रमण के लिए विशेष सुविधा मिलती रहती है।
इक्कीसवीं सदी की युगान्तरीय चेतना का संदेश सुनाने एवं वातावरण बनाने, उत्साह उभारने के लिए उसी प्राचीन परम्परा को अब नये ढंग से नये कार्यक्रम के साथ प्रयुक्त करने की योजना बनाई गई है जिसे अपनाकर प्रचारकों और विचारकों ने यहाँ के जनसमुदाय एवं वातावरण को उच्चस्तरीय बनाने में असाधारण सफलता अर्जित की है
साइकिल टोलियों का प्रवास कार्यक्रम अपने चुने हुए क्षेत्र में किया जाय ताकि सर्वथा अजनबी क्षेत्र के साथ संपर्क साधने में, यात्रा सम्बन्धी तथा लोगों का सहयोग पाने के संदर्भ में असाधारण कठिनाई का सामना न करना पड़े।
गुरुदेव बता रहे हैं कि 2400 प्रज्ञापीठों की स्थापना के बावजूद दुर्भाग्य यही रहा कि पुरानी मान्यताओं को बदल सकने में वैसी सफलता नहीं मिली जैसी मिलनी चाहिए। कलेवर मुख्य रहा और प्राण प्रतिष्ठा के तथ्य को समझा ही नहीं गया ।
अब नये सिरे से ऐसे नए धर्म-संस्थानों को बनाने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। अगले दिनों हर गाँव-कस्बों को ऐसे ही धर्म संस्थानों की आवश्यकता बड़ी संख्या में पड़ेगी। भले ही वे आर्थिक असुविधा की स्थिति में, झोपड़ी, खपरैल, टिनशेड, चौपाल, सघन वृक्ष के उद्यान जैसे ही आच्छादनों के सहारे बना लिये जाएँ। अपने तीर्थयात्री अब यह प्रयत्न भी करेंगे कि जहाँ ठहरें, वहाँ किसी न किसी रूप में एक प्रबल प्राण वाले तीर्थ आच्छादनों की स्थापना करें। भले ही उनके कलेवर सस्ते साधनों से बने हुए ही क्यों न हों?
पूर्व योजना बनाने तथा इस संबंध में अब तक प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला है वहाँ एक सरल उपाय यह है अपने यहाँ से हरिद्वार चल पड़ने की योजना बनाई जाय। रास्ते में वाक्य लेखन, दीपयज्ञ, सहगान कीर्तन, प्रवचन, साहित्य विस्तार, स्टीकर लगाने आदि कार्य करते हुए शान्तिकुंज पहुँचा जाय। वहाँ दो चार दिन विश्राम एवं प्रशिक्षण का लाभ प्राप्त करते हुए दूसरे रास्ते से घर वापस लौट चला जाय ताकि जाने में अलग और लौटने में अलग गाँवों से संपर्क सधे।
इसके अतिरिक्त यह भी हो सकता है कि अपने इलाके की एक परिधि बना कर उसके हर गाँव के साथ संपर्क बनाने का काम हाथ में लिया जाय और निर्धारित परिक्रमा पूरी की जाय। इमारतों, मन्दिरों-जलाशयों तक तीर्थयात्रा को सीमित न करते हुए उस क्षेत्र को ही “एक जीवंत तीर्थ” मान लिया जाय और उसकी अभ्यर्थना नव चेतना संचार द्वारा ही की जाय।
जय गुरुदेव
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चीट शीट:
प्रथम लेख- गुरुदेव के सही रूप को जानने का दुर्लभ सौभाग्य
दूसरा लेख- 2014 की वसंत से नवयुग का शुभारम्भ हो चुका है
तीसरा लेख-ध्वंस का समय समाप्त,सृजन का समय आरंभ
चौथा लेख-“इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य” का उद्घोष
पाँचवाँ लेख-गुरुदेव के सात संकल्प
छठा लेख-शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण
सातवां लेख- 1991 का वसंत, गुरुदेव की अनुपस्थिति का पहला वसंत था।
आठवां लेख-अभी नहीं तो कभी नहीं का संकल्प
नौंवां लेख- एक साधनरहित व्यक्ति अकेले इतना बड़ा कार्य कैसे कर सकता है?
दसवां लेख- गुरुदेव ने अविश्वसनीय,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य कार्यों को कैसे अंजाम दिया?
11वां लेख- इस बार का वसंत पर्व एक प्रकार का ब्रह्मयज्ञ रहा।
12वां लेख- गुरुदेव को 1990 की “एकांतवास साधना” क्यों करनी पड़ी ?
13वां लेख-हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े हैं
14वां लेख-वर्तमान की भयावह परिस्थितिओं का क्या समाधान है?
15वां लेख-प्रेत पिशाचों को महामानव, देवमानव बनाने के लिए कौनसी जादू की छड़ी की आवश्यकता है?
16वां लेख-अध्यात्म में शंका कर रहे तथाकथित साधकों के लिए एक अद्भुत लेख
17वां लेख-समय सम्पदा की बरबादी तो खुली डकैती के बराबर है
18वां लेख- वर्तमान समय All-round credit लेने का सुअवसर है
19वां लेख- यह बहती गंगा में हाथ धोने का स्वर्ण अवसर है 20 वां लेख-क्या तीर्थ यात्राओं से सारे पाप धुल जाते हैं ?