वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 का 19वां लेख- यह बहती गंगा में हाथ धोने का स्वर्ण अवसर है 

हम तो धन्य हो गए परमपूज्य गुरुदेव के चरणों में शीश नवा कर, गुरुकार्य में योगदान देकर जो आत्मिक शांति मिलती है उसे शब्दों में वर्णित करना लगभग असम्भव ही है। 

हम उस गुरु  की महिमा गा रहे हैं जिन्हें अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी अपनी संतान के भविष्य की ही चिंता है। वैसे तो संतान के उज्जवल भविष्य के लिए उन्होंने हिमालय जैसा विशाल साहित्य तो लिखा ही है लेकिन वर्तमान लेख श्रृंखला में उस दिव्य लेखमाला की बात हो रही है जिसमें 19 लेख शामिल हैं। इस लेखमाला को आधार बनाकर इस मंच से अधिकतर लेख प्रस्तुत हो ही गए हैं, अब मात्र कुछ एक ही बचे हैं। हम कह सकते हैं कि अप्रैल 1990 के अखंड ज्योति अंक पर आधारित  लेख श्रृंखला अब यात्रा के अंतिम क़दमों की ओर अग्रसर है। इसके बाद परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस के अवसर पर हमारे समर्पित साथिओं द्वारा पुष्प अर्पित किये जायेंगें। 

आज के लेख में गुरुदेव अपनी विरासत में हम सबको उस दुर्लभ अवसर की बात बता रहे हैं जिसे खोना एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य होगा। ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते, इनमें योगदान देना बहती गंगा में हाथ धोने जैसा तो है ही, एक Blank cheque की भांति भी है, जो  चाहो रकम भर लो। इतना ही नहीं, गुरुदेव ने वर्तमान में चल रही योजनाओं:पर्यावरण,नारी शिक्षा, वृक्षारोपण,खर्चीली शादियां, नशामुक्ति जैसी योजनाओं के लिए भी मार्गदर्शन क्या,Guidelines ही सेट करके बता दी हैं। दीपयज्ञ जो आज इतना प्रचलन में है, आज के लेख में इसका बहुत ही उत्कृष्ट विवरण है। 

तो साथिओ आओ चलें आज की दिव्य यात्रा की ओर अर्थसहित शांतिपाठ के साथ :

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए  

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स्वाति नक्षत्र में, वर्ष में एक बार बरसने वाली, स्वाति वर्षा का लाभ जिन सीपियों को उठाना होता है, उठा ही लेती हैं। मान्यता है कि इस नक्षत्र में वर्षा की एक-एक बूँद जिस भी सीप में पड़ती है  वह मोती बन जाती है। ब्रह्मकमल वर्ष में एक बार ही फलता है। राजनीतिक चुनाव पाँच वर्ष में एक ही  बार होते हैं।

इन सभी विशेष अवसरों का रेफरन्स देने का अभिप्राय यही है कि “युग परिवर्तन” की वर्तमान वेला बार-बार नहीं आएगी। यदि यह स्वर्ण अवसर निकल गया तो उसके बाद कोई कितना भी उत्सुक क्यों न हो इस सुयोग को नहीं पा सकेगा। समय निकलने के बाद कोई बन्दर, हनुमान नहीं बन सकेगा, कोई रीछ जामवन्त,कोई गिद्ध जटायु नहीं बन पाएगा। जब महाभारत ही नहीं हो रहा तो अर्जुन,भीम कहाँ से आकर, इतिहास के पृष्ठों पर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करा पायेंगें। 

कलेक्टर की नियुक्ति शासनाध्यक्षों द्वारा होती है, यह अवसर गिने-चुनों को ही मिलता है। शासनतंत्र की तरह धर्मतंत्र में भी एक  अनोखी सुविधा है कि यदि कोई भावनाशील पुरुषार्थी,अपनी उमंग और आदर्शवादी हिम्मत से काम करे तो वह मण्डलाधीश मण्डलेश्वर, मण्डलीक, मण्डलाधिपति आदि बन सकता है और इतना समर्थ बन सकता है कि उसका शासन जन-जन के मन को प्रभावित कर सके  इसी स्तर के लोगों की इन दिनों सर्वत्र माँग है और दसों-दिशाएँ ऐसी ही प्रतिभाओं की खोज कर रही हैं । युगदेवता ने उन्हीं को पुकारा है, महाकाल उन्हीं को खोजने के लिए टकटकी लगाये, ढूँढ़-खोज में निरत हैं।

अनजान मनुष्य  के लिए हीरे और काँच में कोई अन्तर नहीं है लेकिन यदि गुरुदेव द्वारा चयन किए गए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं के अन्तराल में दिव्य प्रकाश की एक भी किरण भी उठती हो तो उनके लिए यह दुर्लभ/स्वर्ण अवसर है। इस दुर्लभ अवसर को गँवा देने पर जन्म-जन्मान्तरों तक पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। यह एक सुनिश्चित लॉटरी खुलने जैसा, स्वयं वरण करने जैसा अवसर है।

इस अवसर में आमंत्रण है कि बुद्धिमता के दावेदार, विवेकशील मनुष्य  युग की पुकार सुनें और उस पुकार को पूरा करने में अपनी मानसिकता और साहसिकता को सिद्ध करने के लिए कसौटी पर कसे जाने के लिए प्रस्तुत करें। न्यूनतम एक वर्ष लगाने जैसे कुछ छोटे कदम उठा लेने के लिए, उत्साह को समेटने सँजोने जैसा साहस तो किसी प्रकार बटोर ही लें। जितना अधिक बन पड़े उतना ही उत्तम।

इन दिनों प्रमुखता देने योग्य कार्य, जनमानस का परिष्कार और  विचार परिशोधन हैं। मान्यताओं, भावनाओं, आकांक्षाओं आदि को फिज़ूल के  प्रयोजन में निरत रहने वालों को सहमत करा  लिया जाय कि यह समय उठने और उठाने का, जगने और जगाने का, नवसृजन के लिए कटिबद्ध होने का समय है। अपने आसपास के लोगों को इसी कार्य के लिए समय नियोजित करने के लिए प्रेरित किया जाए। 

जब उच्च व्यक्तित्व वाली आत्माओं ने अपने को बदलना आरंभ किया तो  निश्चित है कि वह समूचा वातावरण बदल जायेगा जिसमें रहते हुए हर कोई खिन्न विपन्न हो रहा है। जिस घुटन में दम निकल रहा है उसे बदलने के लिए, इन्हीं दिनों साहस  जुटाया जाना है ।

दिव्य आत्माएं सदैव इस ब्रह्माण्ड में विचरित करती रहती हैं,करती रहेंगीं लेकिन श्रेय दिलवाने  के लिए तो उन्हीं का चयन होगा जो अपनी प्रतिभा दिखाकर, पात्रता का प्रमाण देते हुए इस पुनीत कार्य के लिए आगे आयेंगें। अनेकों ऐसे भी बच जायेंगें जो कृपणता, निष्ठुरता और कायरता के कारण धिक्कार बरसते रहने की व्यथा ही सहते रह जायेंगें। दोनों विकल्प आपके पास हैं: धिक्कार यां श्रेय-Choice is yours.

गुरुदेव अंतिम क्षणों में हम बच्चों से जो करवाना चाहते हैं वह सरल है, सुखद है और हाथों-हाथ श्रेय और गौरव प्राप्त  करने वाला है। 

हर कोई मनुष्य अकेले भी कुछ न कुछ कार्य तो कर ही सकता है लेकिन यदि संगठन की क्षमता बन पड़े तो बड़े क्षेत्र को भी चुना जा सकता है। 10-20 गाँव का एक मण्डल निर्धारित करके उनमें बसने वालों के साथ सघन संपर्क जोड़ा जा सकता है। इन खेतरूपी गांवों को जोतने, बोने, पानी देने, रखवाली करने में “एक कर्मठ किसान” की भूमिका निभाई जा सकती है। मात्र इतने से पुरषार्थ और परिश्रम से हीरे मोतियों जैसी फसल से कोठे भरने की प्रतीक्षा भी की जा सकती है। 

इन पंक्तियों के पाठक समझ रहे होंगें कि यहाँ “भगवान् के खेत”  की बात हो रही है, वही भगवान का खेत जिसके लिए दादागुरु ने हमारे गुरुदेव को कहा था और बोओ और काटो के सन्देश का जन्म हुआ था। 

गुरुदेव अपनी वसीयत में हम बच्चों के लिए लिख रहे हैं कि इस योजना का शुभारंभ “अपनी स्वयं की प्रतिभा निखारने से होना चाहिए।”

अक्सर देखा गया है कि “योग्य” मनुष्य की बात मानने में ज़्यादा आनाकानी नहीं की जाती। विश्वास दिलाने के लिए विश्वसनीय योग्यता का होना बहुत ही ज़रूरी है। इधर-उधर की हांकने वाले, गप्पों से इन्फ्लुएंस करने वालों की सेना तो सोशल मीडिया साइट्स पर बाढ़ लगाए बैठी ही है। आम जनता की अपेक्षा हम अधिक वरिष्ठ और अति विशिष्ट लोगों की ही बात सुनते हैं, उन्हें ही सम्मान भी देते हैं। आत्म परिष्कार की कसौटी पर स्वयं को तपाकर इतना खरा तो बना ही  लेना चाहिए कि कम से कम किसी को उँगली उठाने का अवसर न मिले। वाणी की मधुरता, व्यवहार में सभ्यजनों जैसी शिष्टता, वस्त्र-उपकरणों से लेकर साज-सज्जा तक में समुचित स्वच्छता रह सके, ऐसा अभ्यास करना चाहिए। समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के चार प्रमुख धर्माचरणों से अपने व्यक्तित्व को सँजोया जा सके तो समझना चाहिए कि विशिष्टता और वरिष्ठता से स्वयं को सम्पन्न बना लिया गया है। ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली गई जिससे सर्वत्र प्रामाणिकता और प्रतिभा का परिचय मिलेगा और अपनी विश्वसनीयता बढ़ेगी। क्रियाकलाप में वाणी की मधुरता, शरीर की सक्रियता होने के लक्षण प्रकट होना सक्रियता का मापदंड है। स्वाध्याय एवं सत्संग प्राप्त करते रहने का अवसर अधिकाधिक लोगों को मिलता रह सके ऐसे छोटे बड़े कार्यों में निरत रहने के लिए परिस्थितियों के अनुरूप प्रयत्न करते ही रहना चाहिए।

उत्साह उभारने, और लोकचेतना जगाने की एक नितान्त सरल और अत्यधिक प्रभावशाली प्रक्रिया दीपयज्ञ योजना है। यदि चुनाव में खड़े होने वाल कैंडिडेट  की तरह दौड़-धूप की जा सके तो यह आयोजन हर कहीं सरलता और सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सकते हैं। वैज्ञानिक तथ्य है कि एक बार का उबाल, साल छः महीने तो अपनी गर्मी बनाये ही रखता है। इसलिए जिलाधीशों के बराबर  धर्मतंत्र की जिम्मेदारी उठाने वालों को अपनी सुविधानुसार निकटवर्ती मंडल निर्धारित करना चाहिए और एक वाहन की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे दौड़ धूप का अधिक कार्य सम्पन्न हो सके। सघन जनसंपर्क सध सके और जनजागरण के, नवसृजन के अनेकानेक काम अपने ढर्रे पर लुढ़कते रहने वाली गति पकड़ सकें।

हर वर्ष अपने मंडल के हर गाँव में “एक बड़ा दीपयज्ञ आयोजन” होना ही चाहिए ताकि उसके द्वारा उभरे हुए उत्साह से सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के कितने ही छोटे बड़े काम उपस्थितजनों को प्रभावित करके उनके द्वारा संकल्पपूर्वक किये जाने की प्रक्रिया चल पड़े।

अपने समुदाय में ऐसे अनेकों कार्य करने को पड़ें हैं  जिनको गतिशील बनाने में तनिक भी विलम्ब नहीं होना चाहिए। शिक्षा संवर्द्धन इनमें से प्रमुख है। नारी शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा को सृजनशिल्पी विशेष रूप से हाथ में लें क्योंकि इसे नकारा ही जा रहा है। गरीबी दूर भगाओ की योजना “कुटीर उद्योगों” को अपनाये बिना हल नहीं हो सकती। शारीरिक समर्थता और मानसिक साहसिकता के अभिवर्धन के लिए व्यायामशालाओं के आन्दोलन को गतिशील बनाया जाना चाहिए। बाल-विवाह और बहुप्रजनन की बाढ़ को तो दृढ़तापूर्वक रोका ही जाना चाहिए। खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं।  इस तथ्य को हर किसी को हृदयंगम कराया जाना चाहिए और बिना खर्च तथा बिना धूमधाम की शादियाँ कर यह कुप्रचलन समाप्त होना ही चाहिए। नशेबाजी धीमी आत्महत्या (Slow suicide) है। यदि यह तथ्य समझा और समझाया जा  सके तो बहुमुखी बरबादी पर अवश्य ही अंकुश लग सकता है। वृक्षारोपण की प्रवृत्ति बढ़नी चाहिए। यह गतिविधि हर घर में शाकवाटिका, पुष्पवाटिका के आरोपण के रूप में तो चल ही पड़नी चाहिए। जीवन के हर क्षेत्र में प्रगतिशीलता का समावेश करने के लिए साप्ताहिक सत्संगों को योजनाबद्ध रूप से चलना चाहिए। यदि दैनिक रूप में धार्मिक, सामाजिक आयोजन नहीं चल सकते तो उन्हें कम से कम साप्ताहिक रूप में तो चलना ही चाहिए। युग अवतरण का योजना केन्द्र यदि नई इमारत के रूप में नहीं बन सकता तो कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि किसी बड़ी इमारत वाले से एक कमरा माँग लिया जाय जो संगठन कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होता रहे और शेष समय घर-मालिक उसे अपने कार्यों में प्रयुक्त करता रहे।

कुछ उपकरण इस प्रयोजन के लिए अनिवार्य हैं (1) ज्ञानरथ का चल देवालय (2 ) स्लाइड प्रोजेक्टर (3) सत्संग की प्रचार पेटी जिसमें टेप एंप्लीफायर हों। (4) गाँव-गाँव परिभ्रमण करने के लिए साइकिल टोली, (5) संगीत उपकरण (6) आयोजन के लिए फर्श और आच्छादन (7) दीपयज्ञों में काम आने वाले उपकरण। 

यह सभी साधन मिलकर 10000 रुपए के अंदर  बन सकते हैं। इतने पैसे का प्रबंध सहज ही यज्ञ के समय मिलजुल कर चन्दे के रूप में एकत्रित किया जा सकता है। जिन लोगों से  पैसा लिया है, उन्हें हिसाब समझा कर यह संतोष कराया जा सकता है कि किसी ने इन कार्यों में किसी प्रकार की हेराफेरी नहीं की है। 

वर्ष में एक बार कर्मठ व्यक्तियों को शांतिकुंज में सत्र  सम्पन्न करने के लिए भेजना चाहिए ताकि वे उपयुक्त प्रेरणा और प्राणचेतना साथ लेकर वापस लौटें। यह हर वर्ष  बैटरी चार्ज करा लेने, बंदूक या मोटर का वार्षिक लाइसेंस Renew कराने  के समान आवश्यक समझा जाना चाहिए।

मिशन के साथ किसी भी रूप में जुड़े हर व्यक्ति को नवसृजन के निमित्त, नित्य कुछ घण्टे का समयदान लगाने के लिए सहमत करना चाहिए और साथ ही कुछ पैसों का अंशदान भी निकालते रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। ताकि उस योगदान के सहारे आत्मनिर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के तीनों ही क्रियाकलापों में आवश्यक पोषण देते रहने का अवसर मिल सके।

अखण्ड-ज्योति पत्रिका अपने परिवार के हर शिक्षित सदस्य को पढ़नी चाहिए और अशिक्षित को सुनानी चाहिए। 

अखंड ज्योति का यह अनुष्ठान, महाअभियान के सूत्र संचालक,हमारे गुरुदेव को नित्य अपने घर बुलाने और उनका एकदैनिक  प्रवचन सुनने के समान सशक्त प्रेरणाप्रद है। इसके लिए जो खर्च करना पड़ता है वह इतना कम है कि माह  में एक बार हलका जलपान करा देने से अधिक नहीं बैठता।

उपरोक्त सभी काम ऐसे हैं जिन्हें अपनाने पर कोई भी व्यक्ति प्रखर प्रतिभा के रूप में उभर सकता है और स्वयं को,अपने परिवार को, अपने समाज को एवं वातावरण को हर दृष्टि से कृतकृत्य कर सकता है।

कल तक के लिए मध्यांतर

जय गुरुदेव 


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