वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 का 18वां लेख- वर्तमान समय All-round credit लेने का सुअवसर है। 

परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस पर चल रही वर्तमान लेख श्रृंखला के 18वें लेख का अमृतपान करने से पहले बताना उचित हो जाता है कि इस दिव्य श्रृंखला का शुभारम्भ 23 जनवरी 2026 को हुआ था। यह प्रथम लेख, अखंड ज्योति के  फ़रवरी 2002 अंक में प्रकाशित लेख पर आधारित था। उसके बाद 2014, 1990, 1991, 1997 के अंकों में प्रकाशित लेखों को आधार बनाकर ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किये गए थे। यही वोह समय था जब गुरुदेव ने हमारे हाथ में अप्रैल 1990 की  वोह अखंड ज्योति पत्रिका थमाई जिसमें 19 लेखों की एक अद्भुत लेखमाला प्रकाशित हुई थी। इस लेखमाला का एक-एक लेख दिव्यता,निर्देश, उपदेश, मार्गदर्शन लिए हुए था। इस लेखमाला पर आधारित, अब तक 10 लेख प्रकाशित हो चुके हैं और अखंड ज्योति के उपरोक्त सभी अंकों पर आधारित, आज के लेख के समेत 18 लेखों का दिव्य प्रकाशन हुआ है। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में लेखमाला  के दो लेखों का ज्ञान समाहित  करने का, club करने का प्रयास किया गया है, यदि संभव हुआ तो आने वाले लेखों में इस प्रयोग का प्रयास किया जायेगा। 

आज के लेख का निचोड़ समयदान, संकल्प,दिव्य शक्तियां, श्रद्धा, समर्पण आदि का एक ऐसा समन्वय है जिसे समझकर,अंतर्मन में उतारने पर आत्मिक शांति मिलना लगभग निश्चित है। ऐसा इसलिए  कहा जा रहा है कि 1958 के सहस्र कुंडीय यज्ञ में जिस दैवीय शक्ति का आभास हुआ था,उसी का हवाला देकर परमपूज्य गुरुदेव हम सबको बता रहे हैं कि इतना विशाल कार्य कैसे होगा। 

आइये आज के दिव्य लेख का शुभारम्भ करें : 

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए  

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वर्तमान  समय “सर्वतोमुखी श्रेय” साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है। सर्वतोमुखी श्रेय का अर्थ होता है All-round क्रेडिट। गुरुदेव अपने बच्चों से अपने अंतिम क्षणों में कह रहे हैं : 

“बच्चों यह आल राउंड क्रेडिट लेने का समय है, बहती गंगा में हाथ धोने का समय है, श्रेय लेने का समय है, ग्वाल-बाल बनने का, रीछ-वानर बनने का, गिलहरी की भूमिका निभाने का सर्वश्रेष्ठ समय है, कल वाले लेख में भी “समय  और समयदान” की बात की गयी थी। ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी “समय सम्पदा” का दुरूपयोग एक डकैती है। 

अप्रैल 1990 की अखंड ज्योति में प्रकाशित लेख के माध्यम से गुरुदेव इस लेख  में गुरुदेव हमें लगभग डाँट ही रहे थे कि “गया समय वापिस नहीं आता, अभी नहीं तो कभी नहीं” आदि आदि। अरे भैया गुरुदेव की बात नहीं माननी है तो आपकी मर्ज़ी, आप तो मैकॉले शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत अंग्रेजी स्कूलों की शिक्षा लिए हुए हैं, वहां भी तो यही पढ़ाया गया था, “Time and tide wait for nobody, Fortune knocks only once at your door” किसी की ही बात मान लो लेकिन समय का शक्ति को पहचानो और आज से ही, बल्कि अभी से ही समय का सदुपयोग करके गुरुकार्य में सहयोग देकर विचारक्रांति में अपना योगदान देना शुरू कर दो।       

गुरुदेव कह रहे हैं कि इस दुर्लभ आमंत्रण को चूका नहीं जाना चाहिए। जो सुअवसर के अनुदानों से चूक जाते हैं, मुँह मोड़ते और पीठ दिखाते हैं, वे परीक्षा भवन में गायब हो जाने वालों की तरह सर्वदा पछताते ही रहते हैं। 

जब भगवान ने सुदामा से उसकी तंदुल की पोटली माँग कर बदले में टूटे छप्पर वाली सुदामापुरी को सर्वसम्पन्न सृजित द्वारिकापुरी के रूप में बदल दिया तो हम सबको किस बात की चिंता है। सुदामा-भगवान् के सुप्रसिद्ध प्रसंग में अटूट प्रेम और समर्पण की भावना तो है ही,गुरुदेव के बोओ और काटो का सिद्धांत भी साक्षात् दिख रहा है। भगवान् ने विश्वकर्मा भगवान् से द्वारिकापुरी की रचना से पहले सुदामा की चावलों की पोटली में से एक मुट्ठी चावल सेवन किये थे। एक मुट्ठी चावलों के बदले में पूरी सर्वसम्पन्न द्वारकापुरी ? ऐसे ही हैं भगवान के अनुदान!!!  

गुरुदेव ने ऐसे ही अनुदानों का आमंत्रण हमें भेजा है,उस स्वर्ण सौभाग्य को स्वीकार करने में किसी को भी आनाकानी नहीं करनी चाहिए। पेट और प्रजनन की छोटी-सी परिधि में तो कीड़े-मकोड़े भी अपना समय गुज़ार लेते हैं लेकिन जब कल्पवृक्ष के नीचे बिछा-बिछाया विश्राम मंच मिल रहा है और आपको केवल बैठने भर के लिए कहा जा रहा है तो आनाकानी क्यों करनी चाहिए? 

अपना ढिंढोरा पिटवाने के लिए धन-दान करने वाले अनेकों लोग मिल जायेंगें लेकिन समयदान करने को कितने सामने आयेंगें, यह समय ही बता पाता है। फरवरी 2026 में आयोजित शताब्दी समारोह में, वैरागी द्वीप में, समयदान करने आए समर्पित साथिओं को नमन किये बिना रहना संभव नहीं है।  

गुरुदेव बता रहे हैं कि उच्चस्तरीय लक्ष्य पर चल सकना तभी बन पड़ता है जब श्रद्धा, सद्भावना और उत्कृष्टता का समुचित समावेश बन पड़े। परीक्षा की इस घड़ी में यहाँ जाँच खोज हो रही है कि यदि कहीं भी महानता जीवित होगी तो वह इस “नवनिर्माण के पुण्य पर्व, युगनिर्माण” पर अपनी जागरूकता और सक्रियता का परिचय दिये बिना न रहेगी। नवयुग का अभिनन्दन करने में निशाचर ही मुँह छिपाते देखे गये हैं। हमारे बच्चों की गणना उन भगोड़ों में नहीं होनी चाहिए जो मोर्चे पर पराक्रम का परिचय देने में अपने को असमर्थ पाते हैं और कायरों की तरह सभी धिक्कार सहते हुए पीछे भाग खड़े होते हैं और उलटे-सीधे बहाने खोजते हैं। गाँधी और बुद्ध के आह्वान पर असंख्यों ने अपने तथाकथित आवश्यक काम छोड़ कर भी उन दिनों के महान अभियान में अपनी कारगर भूमिका निबाही थी और पीढ़ियों तक के लिए यशगाथा सुरक्षित छोड़ गये थे। इसी मंच पर,अभी कुछ दिन पूर्व ही स्वामी विवेकानंद पर आधारित लेख श्रृंखला का समापन हुआ,हम सबने देखा कि सारे विश्व से कैसे श्रद्धालु उनके व्यक्तित्व से जुड़ते गए। भोग विलासता, मृगतृष्णा अहम् आदि के नशे  पर यदि थोड़ा सा कण्ट्रोल  लगा लिया जाये तो हर किसी के पास इतना समय, श्रम और साधन सहज ही बच जाता है जिसके बलबूते सराहनीय स्तर पर युगधर्म निबाहते बन सकता है। जिन लोगों का समय कटता नहीं है, वोह भी समयाभाव का रोना रटते हैं, है न कैसी हास्यास्पद बात? ऐसे लोग केवल अपने को ही मूर्ख  बना रहे होते हैं। 

जो सादा, साधारण  जीवन जी सकेगा वही उच्च विचारों की अवधारणा  में समर्थ हो सकेगा। मनुष्य का लाइफ स्टाइल उसके विचारों से साफ़-साफ रिफ्लेक्ट होता है। 

परमपूज्य गुरुदेव यह गुरुवाणी 1990 की वसंत में कही गयी थी, युगसंधि वर्षों में कही गयी थी। गुरुदेव चाहते हैं कि वासना, विलासिता की जंजीरों को कम से कम इस अवधिकाल में ही थोड़ा ढीला कर ही लिया जाय, भौतिक महत्त्वाकाँक्षा के लिए आतुर होने पर कण्ट्रोल  लगाया जाय तो बहुत कुछ हो सकता है।  कुबेर सा सम्पन्न और इन्द्र सा वैभववान् बनने की लालसा तो हर कोई कर रहा है लेकिन फ्री में किसी को कुछ नहीं मिलता। परिवार से अनावश्यक मोह बढ़ाते चलने की मूर्खता से समय रहते जो सजग एवं सतर्क हो जाते हैं, ऐसे लोगों के द्वार पर याचनारत आए भगवान् को  दुत्कार नहीं सहन करनी पड़ती।  

जो लोग तृष्णाओं को मर्यादित कर सकें, जिनकी परमार्थ भावना गहरी खुमारी से उबर सके, उनमें से किसी के लिए भी इन दिनों की अनिवार्य “समयदान योजना” को उदारतापूर्वक पूरी करने से वंचित न रहना पड़ेगा। व्यस्तता और अभावग्रस्तता तो मात्र बहाने हैं। जिस कार्य में मनुष्य की रूचि होती है,उनके लिए सारा समय और मनोयोग खपाया जा सकता है  तो कोई कारण नहीं कि भावनाशीलों के लिये युगचिन्तन के अनुकूल बनने में कोई ऐसी समस्या सामने आये जिसे हटा सकना बन ही न पड़े। ऐसा कहना इसलिए विश्वसनीय हो जाता  है कि हमारे ज्ञानरथ के सारथी की शक्ति असीमित है, आप एक बार हाँ कीजिये, फिर देखिये कैसे कायाकल्प होता है। 

युगनिर्माण योजना के अंतर्गत, परमपूज्य गुरुदेव ने केवल भारत का, हरिद्वार का, गायत्री परिवार का ही नहीं सोचा है, उनकी युगनिर्माण योजना में सारा विश्व समाहित है। व्यापक लोक-मानस का परिष्कार यद्यपि बहुत बड़ा कार्य तो है ही लेकिन उसे सम्पन्न किये बिना और कोई विकल्प भी तो नहीं है।

“पाठक सोच रहे होंगें कि इतना बड़ा कार्य कैसे होगा, बिल्ली के गले में घंटी बाँधने जैसा असम्भव सा कार्य कौन करेगा, तो साथिओ उत्तर है हम करेंगें, हम करेंगें।  केवल नारे लगाकर नहीं,पूरी समर्था और मन से करेंगें।  

गुरुदेव ने इस दिशा में एक बहुत ही सुन्दर उदाहरण देकर हम अबोध बच्चों को समझाया है : 

एक छोटी सी नर्सरी में लगाये हुए पौधे स्थान-स्थान पर ट्रांसप्लांट किये जाते हैं तो वृक्षों से सजा एक विशालकाय उद्यान, सघन वन विनिर्मित होता है। 

इस जीवंत-जाग्रत उदाहरण से  अवश्य ही साहस उभरता है, विश्वास होता कि युगनिर्माण का कार्य असंभव  न रह कर संभव होगा। गायत्री तपोभूमि मथुरा में 1958 में सम्पन्न हुए एक हजार कुंड (पूरी गणना 1008) वाले यज्ञ का जिन्हें स्मरण है, वोह जानते हैं  कि उसमें 4 लाख याजक और 10  लाख दर्शक उपस्थित हुए थे। उनके ठहरने आदि की व्यवस्था 10 मील के दायरे की भूमि घेरने पर सम्पन्न हुई थी। सभी को आश्चर्य होता होगा कि इतने बड़े समारोह के लिए जटिल व्यवस्थाएँ किस प्रकार जुटायी जा सकी होंगी, किस प्रकार इतने साधन एकत्रित हो सके होंगे लेकिन  इन आश्चर्यचकित लोगों में से प्रत्येक को एक तथ्य स्वीकार करना पड़ा था कि 

यहीं पर आज के लेख का समापन होता है, गुरुदेव द्वारा लिखित एक और पत्र कल आपके इनबॉक्स में पोस्ट होगा।  

जय गुरुदेव 


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