16 फ़रवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
वर्ष 1990 का वसंत परमपूज्य गुरुदेव के जीवन का अंतिम वसंत था लेकिन एक कर्तव्यनिष्ठ पिता की भांति उन्होंने अंतिम पल में भी हम सबके लिए वोह धरोहर प्रदान की जिसका पालन करना हमारा परम कर्तव्य है।
अप्रैल 1990 के अखंड ज्योति अंक में प्रकाशित 19 पुष्पों की लेखमाला इसी धरोहर को चरितार्थ कर रही है। इसी लेखमाला पर आधारित आज का ज्ञानप्रसाद लेख महाक्रांति के लिए समयदान का आग्रह कर रहा है। इतना ही नहीं, गुरुदेव कह रहे हैं कि ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी समय-सम्पदा की बर्बादी खुली डकैती है।
तो आइए इस लेख का अमृतपान करके स्वयं को डकैती के अभियोग से मुक्त करें।
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लेने और देने का, Give and take का सिद्धांत इतना महत्वपूर्ण है कि सारा संसार ही “लेन-देन” की बात करता दिखता है। गुरुदेव का बोओ और काटो का सिद्धांत भी तो पहले देने को कहता है और फिर लेने की( फसल काटने की बात) करता है। यह Give and take है, न कि Take and give ,बोओ और काटो है, न कि काटो और बोओ।
देते समय, दान करते समय, प्रसन्नता/गर्व/गौरव की अनुभूति होती है। दान करने वाला कृतज्ञ/सहयोगी/प्रशंसक बनाने की आशा करता है। देखने-सुनने वाले उदार/दानी व्यक्ति की प्रशंसा में न जाने क्या कुछ कह जाते हैं। ऐसी भी धारणा बनी हुई है कि दान करने वाला अपने पापों से छुटकारा, पुण्यों की अभिवृद्धि के लिए देवताओं की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए, अपनी समर्था अनुसार खर्च करके, खर्च की तुलना में कहीं अधिक लाभ मिलने की आशा करता है। इन पंक्तियों को पढ़ रहे पाठकों को “तुम एक पैसा दोगे, वह दस लाख देगा” कहाँ भूला होगा। एक पैसा दान किया और आशा 10 लाख की, Such a big multiplication, Ha-Ha-Ha
दान करने के लिए, फूँक-फूँककर कदम उठाने की आवश्यकता समझी जाती हैं। संकटग्रस्तों, अभावग्रस्तों की सहायता करने में “धन का सदुपयोग” ही समझा गया है। क्या धर्मशालाएँ बनवाना, मुफ्त औषधि वितरण करना, फ्री Eye camp आयोजित करने, लंगर लगवाने आदि पर होने वाले खर्च सच में लोगों के लिए हितकारी सिद्ध हो रहे हैं, इसके लिए उपयोग की प्रक्रिया पर भी ध्यान देना बहुत ही ज़रूरी है। गुरुदेव अपने बच्चों से पूछ रहे हैं:
क्या दान देकर, लाखों-करोड़ों की संख्या में भिखारियों की संख्या बढ़ाकर, अच्छे-भले/हट्टे-कट्टे मनुष्यों से स्वावलम्बन और आत्मगौरव नहीं छीना है? क्या दान देकर आपने एक ऐसा कुप्रचलन नहीं बढ़ाया है, जिसने आदर्शनिष्ठा को, मानवी गरिमा को गिराने में ही सहायता की है?”
इसी सन्दर्भ में गुरुदेव ने शांतिकुंज में जीवनदान की आशा रखने वालों से कहा था कि हम यहाँ वृद्ध आश्रम, मुफ्तखोरों का आश्रम नहीं बनाना चाहते।
हम सब जानते हैं कि जबसे भिक्षा को एक व्यवसाय गिना जाने लगा है, तब से देश का गौरव बढ़ा नहीं बल्कि गिरा ही है।
आज के समय में दान लेने की प्रवृति इतनी कम होती दिख रही है कि नवरात्रि में कन्या पूजन के लिए माता पिता अपनी बेटियों को पड़ोस के घर में भेजने में कतराने लगे हैं। आपत्तिग्रस्त दुर्घटना में फँसे हुए लोगों के अतिरिक्त अन्य लोग भिक्षास्तर के अनुदानों को अस्वीकार करते दिख रहे हैं। समाज में जाग्रति तो अवश्य ही आई है लेकिन चोरों के लिए सब उचित ही है। इनकम टैक्स की चोरी के लिए तरह-तरह के हथकंडे कहाँ रुके हैं। इनकम टैक्स छूट लेने के लिए अनेकों चतुर लोग साझीदार बनकर दानी का मुखौटा पहने फिरते हैं लेकिन सही मायनों में वोह आर्थिक लाभ ही उठा रहे होते हैं।
ऐसी दशा में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि धन का दान करके, किस हद तक पुण्य कमाया या पाप घटाया जा सकता है। दहेज प्रथा का समर्थन न करते हुए,देखा जाए तो दहेज का लेन-देन भी तो दान ही है। अभी शनिवार के ही विशेष सेगमेंट में हमारी आदरणीय उमा साहू बहिन जी ने सामूहिक विवाह की जानकारी देने के साथ ही आर्थिक सहायता की भी बात की थी लेकिन इस सहायता का मुख्य एलिमेंट “अभावग्रस्त” था। जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति विवाह के बोझ को सहन करने में असमर्थ थी, निस्वार्थ भाव से दान देकर उनकी सहायता करना कहीं भी अनुचित नहीं है। समयानुसार आदरणीय अरुण जी की आर्थिक सहायता करके, उन्हें अपाहिज बनाना कतई नहीं था।
गुरुदेव बता रहे हैं कि देवालय और तीर्थ कभी “लोकशिक्षण” की अति महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति करते रहे होंगे, कभी धर्म प्रचार केन्द्र थे रहे होंगें लेकिन आजकल तो उनमें मात्र मनोकामना पूरी कराने के लिए,दान देकर, बदले में अनेक गुना लाभ देने के लिए मनाया जा रहा है। गुरुदेव हमें मात्र इतना ही समझा रहे हैं कि यदि धन का दान करना हो तो मुट्ठी खोलने से पहले हजार बार यह भी विचार कर लेना चाहिए, कि इसकी परिणति क्या हो सकती है? गिरों को उठाने और उठों को उछालने जैसी सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में सहायक होने वाले दान सदा से सराहनीय एवं श्रेयस्कर रहे हैं। उस पुनीत परम्परा को तो अभी भी और भविष्य में भी जीवन्त बनाये रखे जाने की आवश्यकता हैं।
गुरुदेव द्वारा प्रस्तुत की गयी एक नई सोच :
एक नई सोच के अनुसार मानवता को लगे घावों को भरने के लिए जिस दान-पुण्य की परमार्थिक आवश्यकता हैं, उसके लिए उपयुक्त माध्यम जनमानस का परिष्कार होना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि मनुष्य के मानस क्षेत्र की उपजाऊ भूमि में बोया गया प्रत्येक बीज ऐसे प्रतिफलों से लदा रहेगा जिसमें प्रस्तुत संकटों को टालने से लेकर भविष्य में हर क्षेत्र को समृद्धिमय बनाने की क्षमता होगी। “विचार परिमार्जन से लेकर सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन तक” की परिधि में आने वाले पुनीत कार्य ही ऐसी महत्वपूर्ण सीढ़ियां जिनके लिए स्वयं आधे पेट रह कर भी भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करने की उदारता दिखाई जानी चाहिए। व्यक्ति और समाज का सर्वतोमुखी कल्याण उन्हीं भाव-संवेदनाओं के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के प्रत्येक प्रयास का मूल मंत्र ही उपरोक्त पंक्तियों में समाहित है।
गुरुदेव ने समयदान और ज्ञानदान को सर्वोच्च स्तर का ब्रह्मदान बताया है। अनेकों यानिओं की यात्रा के बाद, भगवान ने हमें न केवल मनुष्य जन्म देकर कृतार्थ किया है बल्कि शारीरिक, मानसिक क्षमताओं के अजस्र भण्डार से लैस करके सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी भी बनाया है। इसे अन्य प्राणियों के साथ किया गया अन्याय या मनुष्य के साथ बरता गया भाई-भतीजावाद स्तर का पक्षपात नहीं समझा जाना चाहिए। यह जन्म और विभूतियाँ, ईश्वर से अपनी संतान को उत्तराधिकार में मिलने वाला मुफ्त का कोष या भण्डार नहीं है जिसे कुकर्मों और दुर्व्यसनों में भी मनमाने ढंग से खर्च कर डालने की छूट मिली हो। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को, जो कुछ भी अतिरिक्त रूप से मिला है वह “एक विशुद्ध धरोहर (A pure heritage)” है। इस धरोहर को एक ऐसी अमानत समझा जाना चाहिए जिसे मात्र विश्व वाटिका को अधिक सुरम्य और अधिक सुसंस्कृत बनाने के लिए ही खर्च किया जा सकता है। सरकारी खजाने में तो लाखों-करोड़ों की धनराशि जमा रहती है लेकिन उसमें से खजांची किसे कितना दे, यह शासकीय निर्धारणों पर ही निर्भर है,चाबी-कुँजी खजांची ही संभालता है लेकिन अपने निजी प्रयोजन के लिए वह एक पाई भी खर्च नहीं कर सकता। यदि खजांची उस धन को ले भागे या मनमाना खर्च करने में उड़ा दे तो इसे अनाधिकारपूर्व चेष्टा माना जायगा। अमानत में खयानत करने का मुकदमा चलेगा और जेल की हवा खानी पड़ेगी।
इस तथ्य को भुला देने वाले मनुष्य ही ईश्वर प्रदत्त बहुमूल्य सम्पदा का, दुर्लभ जीवनकाल का मनमाने ढंग से दुरुपयोग करते हैं और बदले में लोक और परलोक दोनों को ही बिगाड़ते हैं।
धन तो मनुष्य का अपना कमाया हुआ है, उसमें की जाने वाली धाँधली को तो जैसा-तैसा किया भी जा सकता है लेकिन “समय सम्पदा की बरबादी तो खुली डकैती के बराबर है।” इसे असाधारण स्तर का अनाचार कहा जा सकता हैं। इसे ईश्वर के प्रति विद्रोह और जीवन के साथ खिलवाड़ न कहें तो और क्या कहा जाए।
मनुष्य की आवश्यकताएँ तो अत्यन्त लिमिटेड हैं लेकिन उसकी उपार्जन क्षमता इतनी अधिक है कि कुछ ही घण्टे श्रम साधना से निर्वाह की उचित आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं। 7 घण्टे सोने में, 8 घण्टे कमाने में, 5 घण्टे इधर-उधर के कामों में खर्च कर लेने पर भी 20 घण्टे से अधिक रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने वाले को भी खर्च नहीं करने चाहिए। 24 घण्टे समय में से 4 घण्टे हर किसी के पास इसलिए बच जाते हैं कि उन्हें ईश्वर द्वारा निर्धारित प्रयोजनों के लिए लोकमंगल के लिए, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिए लगाया जा सके। लेकिन जो लोग इस अनुशासन को पूरी तरह भूल जाते हैं, सारा समय विलास, मनोरंजन एवं Unwanted प्रयोजनों के लिए खर्च करते हैं तो अवश्य ही वोह अपनी आत्मा और परमात्मा के साथ विश्वासघात कर रहे हैं, ईश्वर द्वारा सौंपे कर्तव्य की अवहेलना कर रहे हैं। क्या भगवान इस अवहेलना के लिए उन्हें बक्श देंगें ? कदापि नहीं।
यह आपत्तिकाल जैसा समय है। अग्निकाण्ड, तूफान, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी, बाढ़, दुर्घटना जैसे समय में तो हर भावनाशील को अपने निजी आवश्यक कामों को छोड़ कर उस विपत्ति में सहायता करने के लिए दौड़ना पड़ता है। उस समय निष्ठुरता धारण करके यदि कोई मूकदर्शक बना रहे और गुलछर्रे उड़ाने में निरत रहे तो वह सर्वत्र धिक्कारा जाएगा।
लूट, बलात्कार, हत्या, डकैती जैसे अपराध आँखों के सामने होते रहें लेकिन जो समर्थ होते हुए भी उन अनाचारों की रोकथाम के लिए टस से मस न हो तो उसे भी अपराधियों की श्रेणी में ही गिन लिया जाता हैं।
समय की सम्पदा को जिस भी प्रयोजन के लिए लगाया जाय, उसी तरह के फल उग कर आते हैं । लोभ, मोह और अहंकार के लिए, वासना, तृष्णा के लिए लगाया गया समय, शोक-सन्ताप कलह-पतन की ओर ही लेकर जाता है । इसी प्रचलन ने व्यक्ति और समाज को ऐसे जंजालों में फँसा दिया है जिनमें विनाश और विग्रह के अतिरिक्त और कुछ मिलता ही नहीं दिख पड़ता।
आदि से अन्त तक बदलने की प्रक्रिया को ही गुरुदेव ने विचार क्रांति और युगनिर्माण की संज्ञा दी है। देवमानवों को मात्र पुण्य और परमार्थ ही सुहाता था, अन्तराल की शक्तियों और बहिर्जगत की सम्पदाओं को सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिए लगाया जाता था। वे अपने सामर्थ्य का नियोजन अपने और परायों का कल्याण करने में ही निरत रहते थे। फलतः सर्वत्र सतयुगी वातावरण बिखरा दिखता था और दैवी अनुग्रह अमृत वर्षा की तरह बरसता था। अभ्युदय के सभी द्वार खुले रहते थे और यहाँ के वातावरण को स्वर्गोपम बनाते थे।
पिछली शताब्दी में गिरने और गिराने का मार्ग अपनाया गया, उसने नारकीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करके रख दीं । इस अनाचार से प्रकृति और परमेश्वर दोनों को ही भारी कष्ट हुआ है। गुरुदेव ने कुमार्गगामियों को कड़ी प्रताड़ना देकर सीधे रास्ते पर चलाने का निश्चय किया है। साथ ही जो विनाश हो चुका है, उसे नये सिरे से सुधारने का भी निश्चय । लंकाध्वंस और धर्म की स्थापना की त्रेता वाली दुहरी प्रक्रिया पुनः दुहराई जा रही हैं। ऐसे भाग्य में सम्मिलित होकर श्रेयाधिकारी बनने की मानसिकता वाले हनुमान, जामवन्त, नल-नील ढूँढ़े जा रहे हैं। देवताओं को मनुष्य कलेवर धारण करके इस नवसृजन के लिए परमसत्ता द्वारा आमंत्रित किया जा रहा है। जो सहमत हो रहे हैं उनसे एक ही अपेक्षा की जा रही है-महाक्रान्ति के लिए समयदान। इन दिनों यही एक कार्य है-हरिश्चन्द्र भामाशाह स्तर का उदार आचरण। इसे अपनाने वाले लगभग उतने ही बड़े श्रेय के अधिकारी बनेंगे जिसे अब तक मात्र परमेश्वर को ही दिया जाता है। राम की प्रतिष्ठा के लिए जितने देवालय बने हैं, उनसे हनुमान के मन्दिर अधिक ही हैं।
यह चिन्ता करना व्यर्थ है कि अपनी समस्त सम्पदा यदि महाकाल की पुकार सुनकर नवसृजन के लिए लगा दी गई तो हमें घाटा पड़ेगा, विश्वास कीजिए यह नफे का सौदा है। संसार भर के महामानवों का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि परमार्थी देव-पुरुषों ने जो खपाया उसकी तुलना में कहीं अधिक प्राप्त किया है। भगवान का द्वार निजी प्रयोजनों के लिए अनेकों खटखटाते पाये जाते हैं लेकिन अब की बार भगवान ने अपना प्रयोजन पूरा करने के लिए साथी-सहयोगियों का द्वार खटखटाया है। जो कोई भी इसके लिए साहस, जुटाएँगे, वे लोक और परलोक की सिद्धियों-विभूतियों से अलंकृत होकर रहेंगे। शान्तिकुंज के संचालकों ने यही सम्पन्न किया और अपने को अति सामान्य होते हुए भी अत्यन्त महान कहलाने का श्रेय पाया है। अपेक्षा जाग्रत आत्माओं से भी इन दिनों ऐसा अनुकरण करने की की जा रही हैं।
जय गुरुदेव,कल के लिए मध्यांतर