13 फ़रवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
कल और आज वाले दोनों ज्ञानप्रसाद लेखों में प्रयास किया गया है कि अध्यात्म का विषय एक ऐसा विज्ञान है जिसे समझकर,ज्ञानपूर्वक प्रयोग न करने पर उसी तरह का नुक्सान हो सकता है जैसे परमाणु बम को न जाने बिना हो सकता है। हम में से हर कोई, बड़े ही चाव से समझकर आनंदपूर्वक चीनी का प्रयोग करता है लेकिन बिना ज्ञान के यही चीनी डायबिटीज की शक्ल में घातक सिद्ध हो सकती है।
आज के लेख में परमपूज्य गुरुदेव अपनी वसीयत में हम सबको अध्यात्म के ऐसे सटीक ज्ञान के बारे में बता रहे हैं जिसका उन्होंने स्वयं प्रयोग किया, टैस्ट किया और दिव्य परिणाम मिले। साधना और पूजा-पत्री के समन्वय से ही अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। उपासना,साधना आराधना की त्रिविध प्रणाली से ही पात्रता का विकास हो सकता है। इन सभी क्रियाओं को एक साथ अपनाने से ही अविश्वास को विश्वास में बदला जा सकता है।
हमारे साथिओं के विश्वास का मूल्यांकन तो रोज़ाना ही उनके कमैंट्स से हो जाता है, स्पष्ट दिखता है कि गुरु के दिव्य साहित्य को समझने और समझाने की ज्वाला किसके अन्तःकरण में भड़क रही है।
आइये आज के दिव्य लेख का शुभारम्भ करें :
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
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अध्यात्म के बारे में कहा जाता रहा है कि यदि अध्यात्म के द्वारा सतयुग की वापसी जैसा सुखद वातावरण विनिर्मित करना हो तो मनुष्य को समझना और समझाना पड़ेगा कि जिस प्रकार शरीरबल, धनबल, बुद्धिबल, कौशलबल आदि के लिए प्रयत्न किया जा रहा है, उससे कहीं बढ़ कर आत्मबल का उपार्जन होना चाहिए। उज्ज्वल भविष्य की संरचना अध्यात्म और आत्मबल के आधार पर हो सकेगी।
आजकल हम 21वीं सदी के 26वें वर्ष की यात्रा कर रहे हैं, कौन जानता है कि आने वाले 75 वर्षों का भविष्य होगा लेकिन इतना तय है कि जिस सुखद भविष्य की आशा की जा रही है, उसके लिए “दैवी शक्ति” के रूप में अध्यात्म का आलराउंड विकास होना चाहिए। लेकिन इतने महत्वपूर्ण सब्जेक्ट को अज्ञानता के कारण अध्यात्म की प्रामाणिकता शंकित हो चली है। भौतिक विज्ञान और ओछे अध्यात्म ने मिलजुल कर ऐसा वातावरण बनाया है जिससे श्रद्धा का डगमगाना स्वाभाविक है। वास्तविकता और अवास्तविकता के बीच बने Gap को उद्घाटित करने के लिए परोक्ष दैवी-नियोजन ने हम सबके समक्ष एक सुयोग उपाय प्रस्तुत किया है।
आगे वाली पंक्तियों में इसी उपाय का वर्णन है जिसे परमपूज्य गुरुदेव ने अपने स्वयं के शरीर की लेबोरेटरी में टेस्ट किया और हमें बताया।
गुरुदेव द्वारा संचालित शान्तिकुंज की भूतकालीन गतिविधियों में यदि कुछ आनन्ददायक और उत्साहवर्धक है, तो उसका श्रेय “आत्मशक्ति” को ही जाता है। प्रस्तुतकर्ता कोई भी हो, सभी का उद्देश्य एक ही दिशा में केंद्रित है कि कोई Almighty planning होने जा रही है। आने वाले दिनों में जो कुछ भी होने जा रहा है, उसे सरल भाषा में कहा जा सकता है कि कोई “अदृश्य दैवी सत्ता असंभव को संभव करने जा रही है ।”
युगपरिवर्तन की दिशा में किये गए भूतकालीन,वर्तमान एवं भावी प्रयत्नों को जोड़कर देखा जाय तो इसे “आत्मशक्ति से समाज संरचना” के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
इतना कुछ करने के बावजूद शंका तो वहीं की वहीं खड़ी है कि गायत्री परिवार के इतने बड़े समुदाय द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रिया किसी महत्वपूर्ण Structure का परिचय क्यों नहीं दे रही हैं?
यह कोई ऐसी-वैसी शंका एवं असमंजस नहीं है: इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि इसके निराकरण के ऐसे समाधान-कारक प्रमाण Develop किए जाएँ जो अविश्वास को विश्वास में बदल सकें, हम जैसे पाठकों को बता सकें कि विश्वसनीय अध्यात्म का स्वरूप क्या है। जब तक अध्यात्म स्वयं अपनी प्रखरता का परिचय न दे पायेगा,तब तक सर्वसाधारण, पूजा पत्री, ज्ञानप्रसाद लेख, यज्ञ-हवन, माला फेरना मात्र रोबोट (Robot) बनकर ही प्रयोग होते रहेंगें। ऐसी स्थिति में कंफ्यूज हुए तथाकथित साधक असफल होते रहेंगें, खोखले अध्यात्म से ट्रांसफर हुई शक्ति उनको असमर्थ और उपहासास्पद बनाती रहेगी, लोक-श्रद्धा, डगमगाती रहेगी। ऐसी स्थिति में विचारशीलों का उत्साह भी डगमगाने से पीछे नहीं रहेगा।
तो फिर क्या किया जाये, कहाँ है जन्म घूंटी जिसका बार-बार रेफरन्स दिया जाता रहा है।
गुरुदेव के निर्देश अनुसार शान्तिकुंज के संचालक Role model के रूप में सामने आये हैं। वोह भूतकाल को साक्षी मानकर, जो उन्होंने प्रतक्ष्य देखा, अपने निजी जीवन में अपना कर उन तथ्यों पर प्रकाश डाल रहे हैं ताकि वर्तमान क्रिया-कलापों के औचित्य पर विश्वास करने की मनःस्थिति पैदा की जा सके। मनःस्थिति की ही तो सारी बात है, उसी उलटी हुई मनःस्थिति को उलट कर सीधा करने की ज़रुरत है। किसी भी कार्य की सफलता के लिए जनशक्ति, साधना-शक्ति, साधन-शक्ति की ज़रुरत होती है, हम सब जानते हैं कि इन पैरामीटर्स की कभी भी कमी नहीं रहेगी। वैरागी द्वीप, शताब्दी नगर में उमड़ा, जनसैलाब,निस्वार्थ श्रमदान देखकर शायद हो कोई निस्वार्थता पर शंका कर सके।
ऐसे आयोजनों से शक्ति संचय के लिए किये गये पुरुषार्थ और प्राप्त हुए दैवी अनुकम्पा के सहयोग की सम्भावना का रहस्य आसानी से समझा जा सकता हैं।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के प्रत्येक प्रयास में बढ़ चढ़ कर सहयोग दे रहे साथिओं को भी अदृश्य दैवी अनुकम्पा का अनुभव अवश्य ही होता होगा, ऐसा हम विश्वास से कह सकते हैं। यदि हमें लिखते समय अद्भुत आत्मिक शांति का आभास होता है तो पाठक कैसे गुरु-अनुकम्पा से वंचित रह सकते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव ने कभी भी पूजा अर्चना की निंदा नहीं की, एक सघन विश्वासी जितना कर सकता है,उन्होंने अपनी क्षमता से बढ़कर ही पूरा किया है। लेकिन गुरुदेव ने साधना को ऐसे तरीके से अपनाकर, स्वयं पर वोह प्रयोग किये जिन्हें “अध्यात्म के प्राण” कहा जा सकता है।
आदरणीय चिन्मय जी से न जाने कितनी बार हम सब उपदेश ले चुके हैं कि कपड़े को धोने के बाद ही उस पर रंग चढ़ता है। भट्टी में गलने के बाद ही लोहा अभीष्ट स्तर के उपकरणों में ढलने योग्य बनता है। तपने की इसी प्रक्रिया को “पात्रता” का नाम दिया गया है और इसी के अनुरूप ही दैवी अनुदान मिलते हैं। इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान कर रहे साथी भी अवश्य ही अपनी पात्रता विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
इन पक्तियों में यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि अध्यात्मवादी को निजी व्यक्तित्व के परिष्कार को प्राथमिकता देनी चाहिए।
अध्यात्मवादी की शोभा सज्जा उसका जप-तप ही है, इसी को समझ कर, स्वयं को तपाकर ही “तप” सफल हो पायेगा।
यही है गुरुदेव का अनुभव और प्रतिदान जो वह हम सबको 1990 की वसंत को अपनी वसीयत और विरासत में देना चाहते थे।
गुरुदेव ने स्वयं प्रैक्टिकल करके “अध्यात्म विज्ञान” के रहस्यों की प्रेरणा, अनुसंधान, अनुभव के आधार पर यह जाना और माना है कि त्रिवेणी संगम की भांति, आत्म विज्ञान (Self science, Science of knowing yourself) की भी तीन दिशा धाराएँ हैं: (1) उपासना (2) साधना (3) आराधना। तीनों के समन्वय से ही एक पूरी बात बनती है।
अन्न पानी, और हवा जीवन के आधार हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य समय के तीन काल माने जाते हैं। जीव, ईश्वर, और प्रकृति,तीनों के समन्वय से संसार चल रहा है। इसी प्रकार यह भी माना जाना चाहिए कि “आत्मशक्ति का उपार्जन”, उपासना, साधना और आराधना के समन्वय से ही संभव है। इन्हें समान रूप से अपनाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि जिन “चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियों” को प्राप्त करने के लिए अध्यात्म का प्रयोग किया जाता है, वे अक्षरशः सही सिद्ध न हों। तीनों की संक्षिप्त विवेचना यहाँ प्रस्तुत है।
(1) उपासना-निकट बैठना। ईश्वर को सर्वतोभावेन आत्मसमर्पण करना। उसके निर्देश और अनुशासन को इस सघनता के साथ अपनाना मानों आग और ईंधन, नाला और नदी एक हो गये हों। एक ने अपनी इच्छा, अस्तित्व और सत्ता समाप्त कर दी हो और दूसरे में अपने को लय करने में कोई कमी न रखी । विराट ब्रह्म, विशाल विश्व अर्थात् ईश्वर का कोई नाम रूप नहीं है । व्यापक सत्ता निराकार ही हो सकती है, फिर भी कोई उसकी इच्छित कल्पना एवं स्थापना अपने मन से कर सकता है। गुरुदेव इसके लिए, गायत्री मंत्र के शब्द और सविता उदीयमान स्वर्णिम सूर्य के रूप में अपनाते रहे। कोई भी अपनी इच्छानुसार और अन्य नाम रूपों को मान सकता है।
(2) पात्रता विकसित करने के लिए दूसरा स्टैप साधना अर्थात् सधा हुआ संयमी जीवन है। मानवी गरिमा के अनुरूप क्रियाएँ, मर्यादाओं का अवलम्बन, वर्जनाओं का निरस्तीकरण, सभ्यता एवं सुसंस्कारिता, उत्कृष्ट आदर्शवादिता एवं अनुशासन का पालन करना ही साधना है । संचित कुसंस्कारों को गुण,कर्म स्वभाव से निकलना, देवमानव स्तर के गुण, कर्म, सरकस के जानवरों जैसा आत्मशिक्षण, सुरम्य उद्यान स्तर का सुनियोजित जीवनयापन ही संस्कारों को पवित्र बनाने वाली साधना है। यही कारण है कि “तपश्चर्या” की तुलना “साधना” से की जाती है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर बार-बार रिपीट कराने का अर्थ यही रहता है कि हम इन तीन बेसिक नियमों को घोलकर पी जाएँ।
(3) आराधना का अर्थ है उदारता। साधक को देने में प्रसन्नता होनी चाहिए एवं लेने में संकोच करना चाहिए। सादा जीवन उच्च विचार, न्यूनतम में निर्वाह, बचत का नियोजन, गिरों को उठाने और उठों को उछालने में अभिरुचि आदि को ही को पुण्य-परमार्थ कहा जाता है। दान का अर्थ ही देना है।
अध्यात्म की फिलोसॉफी उपासना, साधना, आराधना के समन्वय पर आधारित है। इन तीनों को जीवनचर्या की हर क्रिया-प्रक्रिया के साथ जोड़ना पड़ता है और ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं इसके विपरीत तो कुछ नहीं हो रहा है।
आराधना का एक पक्ष है शुभ का संवर्द्धन और दूसरा है अशुभ का उन्मूलन। इन्हें सहयोग और संघर्ष के नाम से जाना जाता है।
बोने और काटने का सिद्धान्त आराधना विज्ञान के अंतर्गत ही आता है। न्यायनिष्ठा एवं औचित्य का नीर-क्षीर विवेक भी आराधना का ही एक भाग है।
पात्रता अर्जित करने के लिए उपासना, साधना और आराधना के त्रिविध (Three pronged) प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता होती है। इसी आधार पर “आत्मिक स्वस्थता” बन पड़ती है। पूजन, अर्जन, उपहार, आदि क्रिया-कृत्यों को भी आत्म-साधना का अंग माना जाता है लेकिन वह ऐसा ही है जैसा कि स्वस्थ शरीर पर धुले वस्त्र और श्रृंगार साधनों की सुसज्जा। आवश्यकता उसकी भी है लेकिन उसे महत्व इतना ही देना चाहिए जितना कि ज़रूरी है। पूजा को कलेवर और साधना को प्राण समझना कोई गलत नहीं है । दोनों के बीच अटूट रिश्ता है।
पूर्णता तक पहुँचने के लिए जीवन शोधन ही वह तत्व है जिसे शक्ति भावना की जड़ों के सहारे सींचा और आगे बढ़ाया जाता हैं।
गुरुदेव द्वारा भूतकाल में जो सफलताएँ पाई गई हैं, वर्तमान में जो योजनाएँ बनाई गई हैं और भविष्य के लिए जो तैयारियाँ की गई हैं, उनकी सफलताओं का रहस्य इस एक ही बिंदु पर केन्द्रित समझा जा सकता हैं कि उन्होंने आत्म परिष्कार के उपरोक्त तीनों आधारों को समग्र निष्ठा के साथ अपनाया है। इस संदर्भ में सफलता प्राप्ति के इच्छुकों को भी इसी समग्रता का अनुकरण करना चाहिए।
आज के लेख का यहीं समापन होता है, सोमवार को एक और लेख गुरु चरणों में समर्पित करने की योजना है।
जय गुरुदेव
