12 फ़रवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद लेख
कल वाले लेख की समापन पंक्तियों में आशा की गयी थी कि आज के लेख में प्रेत-पिशाच प्रवृति के मनुष्य को उलट कर सीधा करने की प्रक्रिया जैसा कुछ देखने को मिलेगा। बिलकुल सत्य है, साथिओं ने कल वाले इतने बड़े लेख को ध्यानपूर्वक पढ़ा तो आज जो समाधान सामने आया है उसे आज और कल दो दिन के लिए समझना पड़ेगा। समाधान सभी के पास है, समस्या तो उसे समझकर अंतःकरण में फील करने की ज़रूरत है। ध्यान साधना में बैठकर यदि आपको और आपके शरीर को कुछ फील नहीं हो रहा है तो समझ लेना चाहिए की कुछ गलत हो रहा है। ज्ञानप्रसाद लेखों के माध्यम से यदि आपके पेट में, ह्रदय में, मस्तिष्क में गुड़-गुड़, हलचल नहीं हो रही है तो कमी आप में है न कि गुरु के साहित्य की शक्ति में।
अप्रैल 1990 की अखंड ज्योति में 19 लेखों की विशेष लेखमाला पर आधारित लेखों का अमृतपान जिस गति से आगे बढ़ रहा है, उसी गति से हमारा कायाकल्प होना, Rebirth होना भी सुनिश्चित है, शर्त केवल और केवल एक ही है: दूसरों से आशा लगाने को छोड़कर, बकरी की भांति मैं-मैं करने को छोड़ कर,पूरी तरह समर्पित होकर,शुद्ध मन से अपना सुधार करने में लग जाने से उत्तम कोई बात नहीं है।
चलते हैं आज के लेख की ओर :
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यह सुनिश्चित तथ्य है कि मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। मान्यताएँ और भावनाएँ ही व्यक्तित्व का गठन करती हैं और मनुष्य को उसी तरह का बना देती हैं।
विचारों का बीजारोपण मन के अन्तःस्थल में ही तो होता है, यहीं से सुविचार और दुर्विचार का पौधा उगता है, देखते-देखते वही पौधा एक विशाल वृक्ष बन जाता है। जिस प्रकार एक विशाल वृक्ष को Modify करना असम्भव सा होता है ठीक उसी प्रकार वरिष्ठ एवं अधेड़ आयु के मानवों में कोई भी परिवर्तन करना अस्मभव सा दिखता है। हमारा सौभाग्य है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की बागडोर ऐसे साथिओं के हाथों में संभली पड़ी है जिन्हें “बूढ़े वृक्ष” कहना कोई गलत न होगा, यही वरिष्ठ एवं बूढ़े परिजन कांपते हाथों से ज्ञानरथ को धक्का लगाकर चलाए जा रहे हैं।
यह बूढ़े वृक्ष, कोलकता के आचार्य जगदीश चंद्र बोस गार्डन में 250 वर्षीय बरगद के वृक्ष की भांति हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही इस वृक्ष के बारे में आद अरुण वर्मा जी से बात हो रही थी। लगभग 5 एकड़ में फैला, जंगलनुमा यह वृक्ष Guinness book of records में सम्मानित है। परिवार के बुज़ुर्गों को ऐसे वृक्षों के साथ जोड़ने का एकमात्र अभिप्राय यही है कि उनकी शीतल छाया में बैठने से, उनके साथ संपर्क बनाने में,आत्मा ऐसे ही तृप्त होती है जैसे ग्रीष्म ऋतू की तपती धूप में बरगद का वृक्ष सहायक होता है। जो वरिष्ठ साथी ज्ञानप्रसाद परिवार में सक्रियता से योगदान दे रहे हैं, उनकी मनःस्थिति में पुण्य कर्मो का बीजारोपण उनके माता पिता,दादा दादी, नाना नानी आदि के पुरषार्थ से ही हुआ होगा। यही कारण है कि पुंसवन संस्कार, गर्भ संस्कार, विद्यारम्भ संस्कार, बाल संस्कार शालाओं का इतना महत्व समझा गया है। जिस प्रकार एक नन्हें से बीज से इतना विशाल वृक्ष का जन्म हुआ, युगनिर्माण का कार्य भी इसी स्तर का, सभी का सहयोग माँग रहा है। कल भी लिखा था आज फिर से रिपीट कर रहे हैं, युगनिर्माण केवल नारे लगाने से, पीले कपड़े पहन लेने से, शक्तिपीठों की ओर ताकने से, शांति कुंज के ऊपर सारी जिम्मेदारी सौंपने से, के ज्ञानप्रसाद लेखों के केवल पढ़ने से नहीं होगा। जब तक हम सभी गुरुदेव के उपदेशों को अपने अंतःकरण में नहीं उतारते,उनका अमृतपान करके, एक एनर्जी ड्रिंक की भांति नहीं पीते, तब तक अमृतपान केवल एक शब्द ही बना रहेगा, सब व्यर्थ ही जाता रहेगा। दूसरों के आगे रोते रहने से, निंदा करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला, बजाए “बकरी की भांति, मैं-मैं करने के” स्वयं से प्रश्न करने की आवश्यकता है कि हम क्या कर रहे हैं। विश्वास कीजिए आप बहुत ही शक्तिशाली हैं क्योंकि आप के पास सब शक्तियों से सर्वोपरि शक्ति “आत्मशक्ति का भंडार” है। विश्वास कीजिये यह भण्डारण आपसे कुछ भी कराने की खोज में है, हमारा गुरु ऐसे ही शक्तिशाली, आत्मविश्वासिओं की खोज में है ,कोई पता नहीं किस दिन वोह हमारी पूजास्थली-कोठरी में प्रकट हो उठे।
हमारे गुरु को सब मालुम है, वोह तो युगदृष्टा हैं। वोह जानते हैं कि किसी व्यक्ति का नीतिवान, समाजनिष्ठ, कर्तव्यपरायण, धर्मात्मा एवं परमार्थी बन सकना तभी संभव है, जब उसके अन्तःकरण में उत्कृष्ट आदर्शवादिता ने गहरी जड़े जमा ली हों अर्थात वर्षों पहले ही इन विशेषताओं का बीजारोपण हो गया हो। हम सब जानते हैं कि भ्रष्ट चिन्तन (सोच, विचार), दुष्ट आचरणों को ही जन्म देते हैं और इन विचारों के विष की वृद्धि होने से ही परिस्थितियाँ अनर्थकारी स्तर की बनती रहेंगीं। ऐसा नहीं है कि आज ही का समय बहुत बुरा है, परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं। परिस्थितियां कभी भी अनुकूल नहीं थीं लेकिन “आत्मबल के नायक, दृढ संकल्पशक्ति के हीरो” बड़ी से बड़ी परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने की क्षमता रखते हैं। जिन्होंने कुछ नहीं करना, ऐश मौज मस्ती करनी है, उनके लिए सौ बहाने तैयार बैठे हैं।
हम से कोई भी इस बात से इंकार नहीं करेगा कि विज्ञान और बुद्धिवाद की अभिवृद्धि ने सुविधा-साधनों के वोह अम्बार खड़े कर दिये हैं जिनकी कल्पना मात्र से हंसी सी आने लगती है। हमारे पूर्वजों की तुलना में आज हम सभी भौतिक दृष्टि से कितने अधिक सुविधा सम्पन्न हैं, सब जानते हैं। साधनों और सम्पदाओं की उपलब्धि को यदि प्रगति का नाम दिया जाय, तो मानना पड़ेगा कि हमारे पूर्वजों की तुलना में हम बहुत ही आगे हैं लेकिन वस्तुतः ऐसा है नहीं। अगर ऐसा होता तो फिर दौड़ किस बात की लगी हुई है? सब कुछ होते हुए भी और अधिक पाने की मृगतृष्णा में जो Rat race लगी हुई है उसका Stop sign क्यों नहीं दिख रहा? Stop sign का पालन किये बिना, बिना रुके मनुष्य आगे ही आगे कहाँ जा रहा है? वह कहाँ पँहुचना चाहता है ? उसे खुद भी नहीं मालूम!!!! उसे पूछो तो एक ही उत्तर मिलेगा: I Don’t know, सच में उसे कुछ नहीं मालूम, यदि पता होता तो फिर स्वयं को सुधार न लेता। तीन लाख डॉलर प्रतिवर्ष की सैलरी वाला मनुष्य भी यदि कहता है कि गुज़ारा नहीं होता तो Something is wrong somewhere.
ऐसी स्थिति का प्रतक्ष्य परिणाम हम सब देख रहे हैं:
जनसाधारण का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह गड़बड़ाया हुआ है। दुर्बलता और रुग्णता दिन-दिन तूफानी गति से बढ़ती जा रही है। असंयम दिनचर्या ने स्वस्थ जीवन के मूलभूत आधार को ही नष्ट कर दिया है। पैसा बढ़ा है, साधनों का भंडार संचय अवश्य हुआ है लेकिन उसके दुर्व्यसनों और प्रदर्शनों के निमित्त होने वाली फिजूलखर्ची की वृद्धि ऐसे स्तर की हुई है कि हर कोई अपनेआप को अभावग्रस्त अनुभव करता है। कामचोरी, हरामखोरी, Easy money मिलते रहने पर किसी भी क्षेत्र में वास्तविक एवं अभीष्ट प्रगति हो नहीं सकती। गुण, कर्म, स्वभाव में घुसे हुए दुर्गुण आये दिन ऐसे संकट खड़े करते रहेंगे, जिसका समाधान करने में भौतिक उपचार एवं अनुदान कुछ काम न आ सकेंगें।
साधन तो अपार हैं लेकिन साधना के क्षेत्र में सब कंगाल हैं।
साधना का अर्थ ही स्वयं को तपा कर सीधा करना होता है। लोहे को लाल गर्म करके, पिघलाने के बाद ही कोई शेप दी जा सकती है। साधना तो बहुत ही उच्चकोटि का शब्द है, दूर की बात है, दो सदस्यों के परिवार में, घर में तीन समय का खाना बनाना ही कठिन हो रहा है,क्योंकि बाहिर खाने से अमीरी का प्राकट्य होता है, दोनों के कामकाजी होने बहाना( yes बहाना) होता है, जीभ का चटोरापन होता है। हमारे बुज़ुर्गों की भांति, आज की पीढ़ी में किसके पास इतना समय है कि दोनों नौकरी करके भी घर का काम करें। लेकिन ऐसी स्थिति में अनेकों ऐसे भी मिल जायेंगें जो सब कुछ स्वयं ही करते हैं। लेकिन जैसे कहा जाता है न कि Everything comes for a price, ऐसे परिवारों को गरीब कह कर ताने भी सुनने पड़ते हैं,
यही है साधना, शब्दों का साधना, तानों की साधना।
आजकल की ऐसी दिनचर्या ने, परिवारों में अविश्वास, असहयोग अनाचार को जन्म दिया है और चरित्रभ्रष्टता का यही मूल कारण है। मानवीय मूल्यों की यह दरिद्रता आज संसार के समूचे जलाशय पर काई की तरह छायी दिखती है और जलाशय से मिलने वाले लाभों का अन्त हो रहा हैं। हम सब देख रहे हैं कि पथभृष्ट मनुष्य किस ओर जा रहा है।
प्रदूषण, विकिरण, पर्यावरण, अपराध, छल आदि के जो संकट व्यापक रूप से गहरा रहे हैं, उनकी कल्पना करना ही चिन्ताजनक है। बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आवश्यक साधन जुटा सकना कठिन प्रतीत होता है।
अवांछनीयता और वातावरण में संव्याप्त दरिद्रता कहाँ से आयी ? मनुष्य इतना नीचे गिर कैसे गया ?
उपरोक्त प्रश्न के अनेकों उत्तरों में एक उत्तर को मानना ही पड़ेगा कि “विचार क्षेत्र में बढ़ती हुई उद्दण्डता, आपाधापी का प्रदूषण ही उन समस्याओं के लिए उत्तरदायी है, जो अप्रसन्नता और अव्यवस्था का निमित्त कारण बनी हुई हैं।”
अपने आसपास के प्रदूषण के लिए तो N90 certified मास्क लगा लेंगें लेकिन अपने अंतःकरण के प्रदूषण के लिए, मस्तिष्क के प्रदूषण के लिए कौन सी मास्क लाएँगें, कोरोना वायरस के लिए तो कई इंजेक्शनों का आविष्कार हुआ, दिमाग के प्रदूषण से भी तो छुटकारा मिलना चाहिए !!!
आज के लेख से यही निष्कर्ष निकलता है कि नीतिनिष्ठा और समाजनिष्ठा के आदर्शों (Ideals of morality and social commitment) की अवहेलना करने से ही समूचा मनुष्य समुदाय उस विपत्ति में फँसा है, जिससे निकलना और उबरना असंभव नहीं तो कम से कम सहज तो प्रतीत नहीं होता है। यदि कहीं कोई आशा की किरण दिखती है तो वोह एक ही है:
लोकमानस का परिष्कार, आदर्शों का परिपालन, विचारों का परिशोधन, चरित्र और प्रयासों में आदर्शों का सम्पुट लगाया जाना। उसके बिना प्रस्तुत असंख्यों समस्याओं में से एक का भी सीधा समाधान मिलना संभव नहीं हैं।
हमारा कर्तव्य है कि हम सब अपनी ज़िम्मेदारी समझें, मैं-मैं की बकरी बनना छोड़कर, स्थिति की निंदा करना छोड़कर, आज ही परमपूज्य गुरुदेव के संकल्पों में भागीदारी का संकल्प लेकर उनके विश्व्यापी युगनिर्माण प्रोग्राम में योगदान दें।
इसी महान प्रयोजन की पूर्ति “अध्यात्म तत्त्वज्ञान” से होती हैं। भावनाओं और मान्यताओं का उदात्तीकरण इसी आधार पर संभव हैं। प्रस्तुत विश्व समस्याओं का निराकरण भी यही हैं। व्यक्तियों को भ्रान्तियों एवं अवांछनीयता से मुक्त करके ही उन्हें मौज से रहने, और रहने देने की स्थिति में आया जा सकता है। हँसती-हँसाती जिन्दगी मिल बाँट कर खाने की प्रवृत्ति, झपटने-हड़पने की अपेक्षा सेवा सहायता में रुचि लेने की रीति-रीति ही मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बना सकती है और उन सारी विपत्तियों से एक बारगी छुटकारा दिला सकती हैं जिनके कारण महाविनाश की आशंका पनप रही हैं।
उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रचलित भाषा में जिसे “विचार क्रान्ति” कहा जाता है और पुरातन सोच के अनुसार “जनमानस का परिष्कार” कहा जा सकता है, इस मर्यादा को अन्तःकरण ही गहराई तक पहुँचाने में मात्र अध्यात्म तत्त्वदर्शन ही समर्थ हो सकता हैं। इस प्रकार समर्थ एवं प्रखर अध्यात्म से ही यह आशा की जा सकती है कि व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत असंख्यों विपन्नताओं-विभीषिकाओं का समाधान वह कर सकेगा।
मध्यांतर
