वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 का 14वां  लेख-वर्तमान की भयावह परिस्थितिओं का क्या समाधान है?

19 लेखों की विशेष लेखमाला लिए, अखंड ज्योति का अप्रैल 1990 वाला अंक अपनेआप में एक ऐसा अंक है जिसमें परमपूज्य गुरुदेव उस पिता की तरह हमें उपदेश दे रहे हैं जैसे एक पिता जब इस संसार से विदा ले रहा होता है तो संतान के सदस्यों को बुलाकर अपनी वसीयत और विरासत (Will and inheritance) बताता है। उसकी अंतिम इच्छा रहती है कि अपने सभी बच्चों को बुलाकर अपनी वसीयत तो पढ़ा ही दे कि किस-किस को सम्पत्ति का कितना-कितना भाग मिला है, साथ में पीढ़ियों से अर्जित की गयी विरासत की भी जानकारी बता दे, बता दे कि धन तो एक चीज़ है लेकिन  सबसे बड़ी सम्पत्ति तो श्रद्धा,आत्मज्ञान,आत्मबल,अनुशासन,नैतिकता, शिष्टाचार आदि ही मानवता के मापदंड हैं जिनका पालन करना संतान का परम कर्तव्य है। 2 जून 1990 गायत्री जयंती को गुरुदेव ने स्वेच्छा से अपने स्थूल शरीर का त्याग कर दिया था, इसीलिए यह लेख इतना महत्व लिए हुए हैं। 

आज का लेख उस स्थिति की ओर केंद्रित है जहाँ वर्तमान दिशाहीन मानव अँधेरे में तीर मारने के सिवाय और कुछ नहीं कर पा रहा, छटपटा रहा है। क्या आज का लेख उसे कोई दिशा प्रदान कर पायेगा? कब तक वह यूँही भटकता रहेगा? ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का सटीक सन्देश है, “अभी नहीं तो कभी नहीं, उठो जागो और चल पड़ो गुरुवर के बताए मार्ग पर !!! 

विश्वशांति की कामना के साथ, अर्थ सहित शांतिपाठ करते हुए आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ होता है : 

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में, सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए     

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साधना शक्ति अर्जित करने के लिए जाती हैं। जिस-जिस रूप में वह शक्ति प्राप्त होती है उनमें सुख-समृद्धि, सम्पत्ति, सिद्धि, सफलता आदि देखे जा सकते हैं। किसने किस स्तर की साधना की, इसका पता उसकी पर्सनालिटी,व्यक्तित्व, चाल-चलन आदि को देखकर ही जाना समझा जाता है।

पहलवान की साधना उसके शरीरबल से, उसकी बलिष्ठता, सुन्दरता आदि विभूतियों से प्रतक्ष्य दिखती  है। धनी मनुष्य अपने धन के बलबूते बाज़ार में उपलब्ध अनेकों पदार्थ न केवल खरीद सकता है, बल्कि संचय करके प्रदर्शन भी करता है। उसके आगे पीछे चाटुकारों का समर्थन धनबल के सहारे ही होता है। बुद्धिबल के धनी ही उच्च पदाधिकारी बनते हैं। वकील, डॉक्टर इंजीनियर,संचालन कर सकने का गौरव बुद्धि ही कर सकती हैं। फिलॉस्फर, वैज्ञानिक, निर्णायक होने के लिए अभीष्ट मात्रा में बुद्धिबल का संचय आवश्यक है। कलाकारिता की साधना करने वाले ही साहित्यकार,कवि, संगीतकार,चित्रकार, मूर्तिकार,अभिनेता आदि बनते हैं। 

तरह तरह की  “शक्तियों” के अपने-अपने चमत्कार हैं। शक्तियों के आभाव में, शक्तिहीनों  को अभाव तिरस्कार,दुर्बलता,पराजय आदि का ही सामना करना पड़ता है। ऐसे लोग दूसरों  पर आश्रित रहते हैं। गुरुदेव बता रहे हैं कि प्रत्येक मनुष्य को इन बहुमुखी शक्तियों में से किसी न किसी की साधना के लिए प्रयत्नशील होना ही चाहिए। जो लोग शक्ति की निंदा करते हैं उन्हें आलसी-प्रमादी,गया-गुजरा कहा गया है। 

शक्तियों में सबसे ऊपर  “आत्मिक शक्ति” को ही माना गया है। इसी मंच पर आत्मिक शक्ति को एटॉमिक शक्ति से भी ऊपर मानते हुए एक उत्कृष्ट लेख लिखा जा चुका है, इस लिंक के क्लिक करके उस  लेख का अमृतपान किया जा सकता है 

आत्मिक शक्ति अर्थात आत्मबल को अलौकिक(Divine),असाधारण माना गया  है। आत्मबल प्राप्त करने का मूल्य “तपश्चर्या” के रूप में चुकाना पड़ता है। किसी भी उपार्जन के लिए पूँजी तो जुटानी ही पड़ती है। प्रत्येक  शक्तिवान को घोर परिश्रम  करना पड़ता है नहीं तो  शेखचिल्ली जैसे  बेसिर-पैर के हवाई किले बनाते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। बिना परिश्रम के तो निवाला भी मुँह तक   नहीं पँहुचता । 

ऋषियों को आत्मबल के उत्पादन के लिए अभीष्ट तपश्चर्या के लिए साहस जुटाते रहना पड़ता है। योगी-तपस्वी अपने कार्यक्रम इसी बल के आधार पर विनिर्मित करते हैं। इसी  तपश्चर्या और बल के आधार पर ऋषि मुनि ऐसे-ऐसे असाधारण अद्भुत, अलौकिक कार्य कर पाते हैं जिन्हें देखकर दांतो तले ऊँगली दबाते लोग देखे गए हैं । 

घोर तपश्चर्या की संपत्ति होने के कारण  परिस्थितिओं के प्रवाह को बदल देने की क्षमता ऐसे ही देवमानवों के पास होती है। यही लोग विपुल मात्रा में अपनी शक्ति को ट्रांसफर करने में सक्ष्म होते हैं एवं उनके पास  दूसरों को प्रभावित करने वाली, शाप/वरदान देने की क्षमता होती हैं। 

स्वर्गप्राप्ति  के नाम से दिव्य आनन्दों की जो चर्चा होती रहती हैं उन्हें उपलब्ध कर सकना इन्हीं “आत्मबल के अधिष्ठाताओं” से ही बन पड़ता है। ऐसी  सनातन मान्यताओं को कोई भी,कभी भी यथार्थता की कड़ी कसौटी पर चैक  कर सकता है। आग जैसी तपश्चर्या पर तपने के बाद ही साधारण दिखने वाला मनुष्य कुंदन बन जाता है। कौन देख पाया कि साधारण से, हम जैसे दिखने वाले परमपूज्य किन-किन विभूतियों को संजोए हुए हैं। 

क्षमता का आभाव ही शंका का मुख्य कारण है।  

आत्मसाधना द्वारा आत्मबल प्राप्त कराने का दावा तो असंख्य लोग करते दिखते हैं लेकिन उनमें वे विभूतियाँ नहीं देखी जातीं जो इस दिशा में सफल पुरुषार्थियों में देखी जानी चाहिए। सफलता के लक्षण न दिखने पर झूठ और लूट का आरोप तो लगेगा ही,जूते भी पड़ेंगें। वह धनाध्यक्ष कैसा जो रोटी कपड़े जैसी साधारण सी आवश्यकता न जुटा सके। वह पहलवान कैसा जो मात्र 100 कदम भी न चल सके। वह विद्वान कैसा जो चिट्ठी पत्री तक पढ़ने लिखने में असमर्थता प्रकट करे। वह कलाकार कैसा जो एकाग्र रहने तक की भी क्षमता प्रदर्शित न कर सके। 

झूठी आत्मसाधना के ढिंढोरेबाज़ों के पास दूसरों को प्रभावित करने, सफलता प्राप्त करा  सकने की कोई क्षमता नहीं होती। ऐसी स्थिति में संदेह होना स्वाभाविक है कि या तो आत्मबल की जो महत्ता बताई है, महिमा गाई जाती रही है, वह झूठी है यां  आत्मसाधना के दावेदार स्वयं ही  भ्रमग्रस्त हैं, छल-प्रपंच का आश्रय लेते हैं। 

कोई समय था जब आत्मशक्ति से सम्पन्न अनेकों व्यक्तित्व थे जिन्होंने  अपनी अर्जित क्षमता के सहारे ऐसे कार्य कर दिखाए  जो साधारणजनों की दृष्टि में अलौकिक कहे जा सके। विश्वमित्र, अगस्त्य, परशुराम, नारद, दधीचि जैसे तपस्वियों के नाम याद आते ही वे घटनाएँ आँखों के सामने गुजरने लगती हैं जिनमें उन्होंने असाधारण पुरुषार्थ प्रकट करते हुए सिद्ध पुरुषों जैसे स्तर के प्रमाण परिचय दिये थे।

आज साधु-संतों की जनसंख्या तो लाखों/करोड़ों में  है लेकिन साधना  की कला में प्रवीण महामानवों की संख्या शायद हजारों में ही हो । हर मन्दिर के  पीछे कम से कम एक पुजारी की नियुक्ति तो आँकी ही जा सकती हैं। व्यक्तिगत पूजा-पाठ में घंटों समय लगाने वाले भक्तजनों की गिनती भी करोड़ों में ही होगी। पंडित पुरोहित अपने को देवताओं का एजेण्ट बना कर प्रचुर परिमाण में दान दक्षिणा बटोरते देखे जा रहे हैं।

प्रस्तुत तथ्यों  को नकारा भी नहीं जा सकता और विश्वास भी नहीं किया जा सकता कि उनकी क्षमता  वैसी ही है जैसी advertise की  जाती है। 

गुरुदेव कह रहे हैं कि सामयिक समस्याएँ इतनी अधिक हैं कि समर्थ अध्यात्म के सहारे उन्हें इतने सारे लोग अकेले  न सही, मिलजुल कर तो कर ही सकते हैं लेकिन देखा इसके ठीक विपरीत जा रहा है। तथाकथित अध्यात्मवादियों की संख्या बरसाती मेंढ़कों की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। हर कोई अपनेआप को सक्ष्म और महाज्ञानी साबित करने में लगा हुआ है। ऐसे अज्ञानिओं  द्वारा नियोजित कर्मकाण्ड भी अत्यन्त खर्चीले और आडंबर भरे हो रहे हैं।  

ऐसी स्थिति में ज़रूरी हो जाता है कि लाखों करोड़ों पीले वेषधारिओं  की संख्या लोकहित की दृष्टि से यदि कुछ न भी कर सके तो कम से कम स्वयं को तो “आदर्श रूप” में प्रस्तुत करें। मात्र पीले कपड़े पहनने से गायत्री परिवारजन नहीं कहे जा सकते, उनकी साधना, किये गए सत्र तभी प्रमाणित होंगें जब उनका व्यक्तित्व स्वयं बोलेगा। उनका व्यक्तित्व, चाल चलन देख कर, लोगों में पनपी अश्रद्धा को निपटा सके। इन पक्तियों को पढ़ रहे पाठकों के ह्रदय में यह प्रश्न नहीं उठ रहा कि कहीं बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई हैं। गुरु सहित्य में लिखा कुछ था और पाठकों ने कुछ और ही समझ लिया है। पाठकों ने  कलेवर को ही सब कुछ समझ लिया  है। यह आवश्यकता अनुभव ही नहीं की गई है कि उपासक को प्राणवान भी होना चाहिए। पूजा कृत्यों के साथ-साथ,आध्यात्मवादी की जीवनचर्या भी उच्चस्तरीय होनी चाहिए। उसके व्यक्तित्व में प्रामाणिकता एवं उत्कृष्टता का भी गहरा पुट होना चाहिए। बहिरंग कलेवर का गठन कर लेना पर्याप्त नहीं होता। मिट्टी के खिलौने जैसी गाय से बच्चे का मन तो बहलाया जा  सकता है लेकिन  उस खिलौने  से  दूध देने की आशा नहीं की जा सकती। खोटे सिक्के देखने में असली जैसे लगते तो हैं लेकिन  दुकानदार के हाथ तक पंहुचते ही  उपहासास्पद बनने लगते हैं। नकली तो आखिर नकली ही रहेगा। उससे केवल मन ही बहलाया जा सकता है, वह प्रयोजन पूरा नहीं कराया जा सकता जो असली के माध्यम से सम्पन्न हो सकता हैं।

एक डेली रूटीन को निभाते हुए ज्ञानप्रसाद लेखों का अमृतपान तो हो ही सकता है लेकिन सही अर्थों में अमृत (अ-मृत) की बूँद तभी अनुभव होगी जब सोए हुए शरीर में लाइफ/ऊर्जा का संचार होगा जो पाठकों से  ऐसे-ऐसे कमेंट लिखवा लेगी कि  वोह स्वयं ही बोल उठेंगें “ क्या यह मैंने लिखा है ?”    

खोखले आध्यात्म के खिलौने से एक बड़ी भारी हानि यह हो रही  है कि अध्यात्मिकता और आस्तिकता पर से लोगों का विश्वास ही उठ रहा है। क्या होगा जब प्रत्यक्षवाद के वर्तमान युग में लोग अध्यात्म को अप्रामाणिक मानने लगें और इस प्रपंच से दूर रहने की बात सोचने लगें? 

यदि ऐसा हुआ तो अमृत वचनों को, संसार के उच्चस्तरीय प्रतिपादनों को भारी क्षति पहुँचेगी और नास्तिकता का बोलबाला होगा जिसकी आड़ में अनैतिकता, असामाजिकता, अराजकता, अवांछनीयता का नंगा नाच होगा। उत्कृष्टता आदर्शवादिता को अनावश्यक समझा जाने लगे। बिगड़ा  हाथी किसी भी दिशा में चल सकता है और कुछ भी अनर्थ कर सकता हैं। यदि आत्मिक तत्व के साथ जुड़े हुए उत्कृष्टता के, मर्यादाओं के, पुण्य-परमार्थों के विचार बाँध तोड़ कर उच्छृंखलता की दिशा में चल पड़ें तो मनुष्य-मनुष्य नहीं रह जायगा, उसे प्रेत पिशाचों जैसा देखा जायगा।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि आज भौतिक विज्ञान ही नियन्ता बन रहा है जिसके कारण विशुद्ध भौतिकवादी मान्यताओं का जन्म हुआ है । लोगों ने आत्मा/परमात्मा के सिद्धांत को अमान्य ठहराकर उस नीति की उपयोगिता से इंकार कर दिया है जो अब तक मानवी गरिमा और मर्यादा से मनुष्य को बांधे हुए थी। इन पंक्तियों के लेखक के लिए विज्ञान सदा ही सम्म्मानीय रहा है लेकिन कुछ पथ-भ्रष्ट हुए आविष्कारकों ने  ऐसी  नास्तिकता का बीज बो दिया है जो नीतिनिष्ठा को भी अमान्य ठहराता हैं। नास्तिकता के वशीभूत, भविष्य में लोग क्या रीति-नीति अपनाने लगेंगे, इस विचारणा से भयंकर भविष्य की आशंका उभरती है। जो अध्यात्म बड़े महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध कराने की  आशा दिलाता रहा है  नास्तिकता के कारण वर्तमान परिस्थितियाँ मूर्छित  जैसी बन गई हैं। मनुष्य में विकसित पशुता द्वारा पतन के गर्त में गिरने का प्रोत्साहन, विज्ञान द्वारा नास्तिकता का पोषण तथा आत्मिक क्षेत्र में बढ़ रही विडम्बनाओं की भरमार जनमानस को इतना भ्रमित कर रही है उनका प्रतिफल विनाशकारी रूप धारण करके ही सामने आ रहा है। 

ऐसी स्थिति में हम सब का क्या कर्तव्य है ? कल तक चिंतन कीजिये, शायद कल वाले लेख में समाधान मिल जाये !!!

जय गुरुदेव 


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