10 फ़रवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
आज के लेख में परमपूज्य गुरुदेव बता रहे हैं कि चारों और भयावह स्थिति है, मनुष्य को मरघट का प्रेत-पिशाच कहना गलत न होगा। ऐसी स्थिति में देवमानव कहाँ से आएंगें ? धरती पर स्वर्ग का अवतरण कैसे हो पायेगा? ज्ञानप्रसाद लेखों में समाहित ज्ञान कैसे अनाचारिओं को उल्टा करके सीधा कर पायेगा?
गुरुदेव बता रहे हैं कि 1990 के वसंत में एक “नया पौधा” लगाया है, कोई यह न समझे कि दीप बुझ गया और प्रगति का क्रम रुक गया। स्थूल शरीर रूपी गोबर की मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिये नियुक्त किया गया पहरेदार ( हमारे गुरुदेव) अगली शताब्दी तक पूरी जागरूकता के साथ अपनी ज़िम्मेदारी निभाता रहेगा।
अखंड ज्योति के अप्रैल 1990 वाले अंक में 19 लेखों की विशेष लेखमाला पर आधारित आज का ज्ञानप्रसाद लेख ज्ञानरथ परिवार के लिए ऐसे सन्देश लेकर आया है जिन्हें हम लगातार रिपीट करते आ रहे हैं।
सभी पाठकों से करबद्ध निवेदन है कि ध्यानपूर्वक लेख का अमृतपान करें ताकि हमारे गुरु निराश न हों।
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माचिस की एक तीली, आग की एक छोटी सी चिंगारी ध्वंस करने में एक सेकंड भी नहीं लगाती,देखते ही देखते अपनी आँखों के समक्ष हमारा आशियाना राख बन कर स्वाहा हो जाता है। इसके उल्ट, एक छोटे से झोंपड़े के निर्माण के लिए भी ढेरों साधन,भांति-भांति की सामग्री,कुशल श्रमशीलों की ज़रुरत पड़ती है। यही तथ्य हूबहू पारिवारिक संबंधों के लिए भी अप्लाई किया जा सकता है। हमारे भारत के सोशल सिस्टम की विश्व भर में सराहना की जाती है। संबंध बनाने, बरकरार रखने बहुत ही कठिन होते हैं, वर्षों प्रयास करना पड़ता है लेकिन तोड़ने में एक पल भी नहीं लगता।
संबंधों के सन्दर्भ में परमपूज्य गुरुदेव कह रहे हैं कि मनुष्य इतना खोखला, उन्मादी और ऐसे स्तर तक अनाचारी हो गया है कि उसे नरपशु कहने से उचित है कि मरघट में प्रेत-पिशाच कोलाहल करने वाला कहना बेहतर लगता है। मनुष्य का प्रधान कार्य डरना और डराना ही हो चुका है। आज ऐसे ही लोग बड़ी संख्या में दिख रहे हैं। Might is right का सिद्धांत परिवारों से लेकर देशों तक व्याप्त हो चुका है, सभी देख रहे हैं, इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के कारण किसी से कुछ भी छिपा नहीं है, एकदम जंगल की आग की तरह सूचना वायरल हो रही है।
इस स्थिति का मुख्य कारण “भ्रष्ट चिन्तन” ही है जो दुष्ट आचरणों से पैदा होता है। ऐसे चिंतन से विनिर्मित वातावरण ही ऐसी विभीषिकाओं, विपत्तियों, कठिनाइयों और अभावों अवरोधों को जन्म देता है।
इस कठिनाई को “साधनों के सहारे दूर नहीं किया जा सकता।” अनुदानों से अभाव दूर नहीं हो सकता। पश्चिमी देशों में इक्कठे किए साधनों से भला कौन परिचित नहीं है लेकिन उनकी मनःस्थिति कैसी है सब देखते हैं, जानते हैं
मात्र प्रवचनों से नासमझों को उलटी चाल अपनाने से कहाँ तक प्रेरित किया जा सकता हैं।
तो फिर क्या किया जाए? हाथ पर हाथ धर कर, बैठकर नवयुग के अवतरण की प्रतीक्षा की जाए ?क्या बिना किसी योगदान के स्वर्ग का अवतरण अपनेआप हो जाएगा? कभी नहीं, कदापि नहीं !!!!
ऐसी स्थिति से निपटने के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं से क्या आशा की जा सकती है ?
इस कार्य के लिए ऐसे प्रतिभावान व्यक्तित्व चाहिए जिन्होंने स्वयं को ऊँचा उठा लिया हो और दूसरों को पतन पराभव से उबारने लायक बल कौशल उपलब्ध कर लिया हो। ऐसे ही लोग “महामानव, देवमानव” कहलाते है और उनके कार्यक्षेत्र में उतरने पर वे “साधन” विनिर्मित होते चले जाते हैं, जिन्हें प्रगति,खुशहाली के नाम से जाना जा सकता है ।
वर्तमान में हर कोई यही कहता सुना जा रहा है कि परिस्थिति बहुत ही भयावह है, कुछ नहीं हो सकता। ऐसे भी मानव मिल जायेंगें जो कहते फिरते हैं कि मानवी गरिमा को सुरक्षित रख सकने वाले देवमानवों का सर्वथा अभाव हो गया है।
लेकिन गुरुदेव बता रहे हैं कि महामानव थे/ हैं और सदैव रहेंगे। अगर ऐसा न होता तो धरती माँ कब की रसातल को चली गयी होती।
गुरुदेव ने जिस भावी नवसृजन का स्वप्न देखा है उसके लिए उत्कृष्टता के पक्षधर,आदर्शवादियों की आवश्यकता है। उन्हीं के प्रयत्न एवं पुरुषार्थ से, उन्हीं के पुण्य परमार्थ से वर्तमान समय की दिशा को बदला जा सकेगा। इस समय का सबसे बड़ा कार्य ऐसे देवमानवों की खोज करना, उन्हें संगठित करना,सुगठित एवं सुशिक्षित करना है।
कहाँ से आएंगें ऐसे देवमानव ?
गुरुदेव ने तो इस दिशा में अपने ही ढंग का कीर्तिमान स्थापित किया है। गायत्री परिवार द्वारा प्रकाशित दिव्य साहित्य ने युगशिल्पियों का एक बड़ा समुदाय तैयार करके, इसमें शामिल पाठकों को इस स्तर का विनिर्मित किया है जो स्वयं उठ सकने की सफलता प्राप्त करने के उपरान्त दूसरों को सहारा देने, उभारने में, समर्थ हो सकें। जिनके लिए सोये हुओं को जगाना, जगे हुओं को उठाकर बिठाना,बैठे हुओं को दौड़ाना एक स्वाभाविक विषय बन गया है।
ऐसे ही साथिओं को “नवयुग के अग्रदूत, नवसृजन के कर्णधार” भी कहा जाता रहा है।
पाँच लाख को पच्चीस लाख बनाने, इसी गुणन प्रक्रिया को निरन्तर जारी रखने और कार्तिक अमावस्या की रात्रि को घोर अन्धकार से उबारकर जगमगाती दीपावली बनाने की प्लानिंग हर समय होती रहती है।
यही वोह लोग हैं जिन्हें गुरुदेव ने नवसृजन के आधार, उपकरण औजार या साधन कहा है। युगतीर्थ शांतिकुंज के महागरुड़ ने इन महामानवों को अण्डों की तरह अपने डैनों के नीचे छिपा रखा है। इसी प्रोसेस के अंतर्गत महामानवों को समर्थ एवं परिपुष्ट बनाने के प्रक्रिया चल रही है। परमपूज्य गुरुदेव अपने जीवन के अस्सी पुष्प एक सुनियोजित गुलदस्ते के रूप में समर्पित किए हैं और देव मानवों की एक ऐसी समर्थ मण्डली विनिर्मित की है जो नवयुग के अवतरण में ब्रह्ममुहूर्त की तरह अपना परिचय दे सकें, भोर का उद्घोष करने वाले,बांग देने वाले मुर्गों की भूमिका निभा सकें। युगतीर्थ शान्तिकुंज में, जिसे गुरुदेव ने व्यक्तित्व गढ़ने की फैक्ट्री कहा है, यही सृजन कार्य हो रहा है। नवसृजन के लिए ऐसी अनेकों बहुमुखी गतिविधियों का सूत्र संचालन हो रहा है। प्रत्येक वसन्त पर्व इन्हीं भूमिकाओं की स्मृति ताज़ा कराता है।
1990 के वसंत के बारे में गुरुदेव कह रहे हैं कि इस बार एक नया स्वरूप निखरा है जिसे “नया पौधा” कहा जा सकता है। इस वसंत पर्व पर अब तक के प्रयासों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण निश्चय निर्धारण होने जा रहे हैं।
पिछले वसंत पर्व पर ऐसे ही परिजनों को सूक्ष्म संकेतों से आमंत्रित किया गया था, वे अपनी निजी उमंगों से विवश होकर उस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए चल पड़े, इसी का संक्षिप्त विवरण इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया जा रहा है। जो नहीं आ सके उनका आवश्यक निजी परिश्रम एवं स्तर जानने के लिये एक पत्र भेजा गया है ताकि अखंड ज्योति में प्रकाशित जानकारी के आधार पर यदि घनिष्ठता में कोई कमी रह गई हो तो पूरी हो सके। आदान-प्रदान का सिलसिला इस रूप में चल सके, जिसमें सबके लिए एक प्रकार से “श्रेय साधना” ही सन्निहित है।
प्रत्यक्ष पधारने या अपने व्यक्तित्व के स्तर को लिपिबद्ध व्यवस्थित भेजने वाले दोनों ही वर्गों की संख्या में वर्तमान उत्कृष्टता सम्पन्न लोगों की सज्जनता है जिस पर गर्व भी किया जाता है और नवसृजन के उज्ज्वल भविष्य का आधार स्तम्भ भी माना जा सकता हैं।
इन दोनों ही वर्गों (प्रतक्ष्य आने वाले और लेखनी से जुड़ने वाले) के साथ हमारे परोक्ष सम्बन्ध बने रहे हैं और उस आधार पर युगचेतना का प्रकाश अधिकाधिक विशिष्ट विस्तृत, सार्थक एवं सफल होता जा रहा है।
विगत वसन्त से कुलपिता के एकान्त साधना में चले जाने पर एक असमंजस यह खड़ा होता है कि इतने बड़े और इतने समर्थ समुदाय के साथ जो घनिष्ठता पनपती और प्रगति की प्रक्रिया चलती रही है उसमें विक्षेप, गतिरोध लगेगा, व्यवधान पड़ेगा। पारस्परिक जोड़ने वाला स्नेह, बन्धन टूट जाने पर वह उपक्रम कैसे बनेगा, जिससे पतंगे की तरह उज्ज्वल भविष्य के आकाश पर छाया और अपनी सक्रियता का परिचय देते रहा जा सके?
इस सम्बन्ध में सभी परिजनों को उपलब्ध माध्यमों से यह सूचित किया गया है कि
“कोई यह न समझे कि दीप बुझ गया और प्रगति का क्रम रुक गया। दृश्य शरीर रूपी गोबर की मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिये नियुक्त किया गया पहरेदार अगली शताब्दी तक पूरी जागरूकता के साथ अपनी ज़िम्मेदारी निभाता रहेगा।
पक्षी दूर अन्तरिक्ष में इतनी दूर उड़ जाते हैं कि खुली आँखों से दिख भी नहीं पड़ते फिर भी वे अपने घोंसले का, दुधमुँहे बच्चों का पूरा ध्यान रखते हैं। बच्चे भी समय पर उनके द्वारा खुराक मिलने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। गाय अपने बछड़े सहित जंगल में चरने चली जाती है, संयोगवश कभी दोनों बिछुड़ भी जाते हैं, फिर भी एक दूसरे को ढूँढ़ने और पुकारने में कमी नहीं रहने देते।
वर्तमान पत्रिका पाठकों का अपने परिवार का परिकर अगले दिनों बढ़ तो सकता है लेकिन घटेगा नहीं। मिशन की पत्रिकाओं के रूप में प्रकाश चेतना हर महीने अपने पाठक परिजनों के यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से जा पहुँचती है। हर दिन के एक लेख को एक प्रवचन समझा जाय (इन शब्दों को पढ़ते समय साथियों को कल वाला दैनिक दिव्य संदेश स्मरण हो आया होगा) तो यह मान्यता उचित है कि परिजनों और अभिभावकों के बीच दैनिक मिलन सत्संग संभव हैं। इसलिये परिजन एक महीने में ढाई रुपये का व्यक्तिगत अनुदान पत्रिका के चन्दे के रूप में प्रदान करते हैं इस प्रकार प्रत्यक्ष न सही परोक्ष मिलन एवं नियमित आदान प्रदान का क्रम चलता रहता हैं। इसी माध्यम से विचारों का ही नहीं, “प्राणचेतना का शक्ति प्रत्यावर्तन” भी बन पड़ता हैं।
अनवरत मिलन की यही प्रक्रिया आगे भी चलेगी, सभी परिजनों के परिचय, जन्मतिथि, फोटोग्राफ संग्रह कर लिये गए हैं। इस आधार पर शान्तिकुंज से जन्मदिन के अवसर पर एक प्रेरणापूर्ण सन्देश एवं अनुदान पहुँचा करेगा। मिलन की आँशिक पूर्ति इस प्रकार हो जाया करेगी। शान्तिकुंज परिवार में संचालक अपना सूक्ष्म शरीर, अदृश्य अस्तित्व बनाए रखेंगें। यहाँ आने वाले, रहने वाले अनुभव करेंगे कि उनसे अदृश्य किन्तु समर्थ प्राण प्रत्यावर्तन और मिलन आदान-प्रदान भी हो रहा है। इस प्रक्रिया का लाभ अनवरत रूप से जारी रहेगा।
युगसन्धि पुरश्चरण के अंतर्गत सभी साधकों को अपने-अपने यहाँ कुछ साधना करते रहने के लिए कहा गया है, वह तो चलेगी ही, साथ ही एक अनुबन्ध यह भी जोड़ा गया है यदि संभव हो तो वर्ष में कभी भी पाँच दिन के लिए शान्तिकुंज आकर एक सत्र सम्पन्न कर लें और लगभग वही लाभ प्राप्त कर लें तो बैटरी को बिजली के साथ जुड़कर नये सिरे से चार्ज होने एवं धीमी पड़ी शक्ति को नये सिरे से फिर अर्जित करने के रूप में मिलता हैं।
कहने, सुनने, करने, कराने की प्रक्रिया चलती रहने के सम्बन्ध में इस वसंत पर्व पर उपस्थित परिजनों के ऊपर से उतरे आदेश के अनुसार यह कहा गया था कि
“हम में से कोई किसी से अगले दिनों बिछुड़ न सके। जो आलस्य और आनकानी करेगा उसे शान्तिकुंज की संचालक शक्ति न केवल झकझोरेगी, बल्कि उसके कान भी खींचेगी। हर व्यक्ति सक्रिय होकर ही चैन से बैठ सकेगा”।
भले ही इसे सीधी भाषा में नहीं कहा गया हो लेकिन इसे एक गुरुनिर्देश मानकर चलना चाहिए, समझ लेना चाहिए कि हम सब एक सशक्त सूत्र से मजबूती के साथ परस्पर बाँधे गए हैं जो बिछुड़ने की स्थिति आने नहीं देंगे, भले ही हम लोगों में से किसी का दृश्यमान शरीर रहे या न रहे।
धन्यवाद्, जय गुरुदेव
