9 फ़रवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं ने अखंड ज्योति पत्रिका की Digitization में जो अद्भुत सहायता प्रदान की है उसका विस्तृत विवरण तो आने वाले किसी वीकेंड सेगमेंट में ही देना उचित होगा लेकिन आज केवल “बड़े वाला आभार” व्यक्त करके ही लेख की ओर बढ़ते हैं।
गुरुदेव के 1990 वाले अंतिम वसंत में शांतिकुंज में भारी संख्या में आगन्तुक आए, गुरुदेव ने संबोधन करके सभी का मार्गदर्शन किया लेकिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न आगन्तुकों के हृदयों में ठाठें मार रहा था:
“जीवन के अंतिम श्वास में भी इतना तपने और तपाने की क्या आवश्यकता है ?” ऐसा करने से परिजनों को जनसंपर्क,मार्गदर्शन के आभाव के साथ-साथ एकांतवास की कष्टसाध्य जीवनचर्या बितानी पड़ेगी।
अखंड ज्योति के अप्रैल 1990 में प्रकाशित लेख के अनुसार गुरुदेव बताते हैं कि आने वाले वर्ष अनेकों प्रकार की समस्याएं लेकर आ रहे हैं उनका समाधान अन्य प्रयासों के साथ-साथ उच्चस्तरीय साधना से ही संभव है। साथिओं के लिए यह समझना बहुत ही ज़रूरी है कि गुरुदेव यह बातें आज (2026) से 3-4 दशक पूर्व कह रहे हैं, तभी तो उन्हें युगदृष्टा कहा जाता है।
ज्ञानप्रसाद लेखों का अमृतपान एक अलग प्रकार की साधना है और आद अरुण वर्मा जी का गली-गली, गाँव-गाँव जाकर,चिल्ला-चिल्ला कर सोए हुओं को जगाना, एक दूसरी प्रकार की साधना है। हर बात के लिए सरकार की ओर देखना कोई समझदारी नहीं है, मनुष्य को अपना कर्तव्य भी समझना होगा।
आज का ज्ञानप्रसाद लेख,ऐसे ही विचारों से सोए हुओं को जगाने का प्रयास कर रहा है।
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1990 का वसंत परमपूज्य गुरुदेव का अंतिम वसंत था। इस वसंत के समय शांतिकुंज में आगन्तुकों की संख्या इतनी अधिक थी कि स्थापना के वर्षों से लेकर अब तक के नंबर मिलाकर भी कम ही बैठते थे। अनेकानेक आगन्तुकों ने अपनी जानकारी के आधार पर परमपूज्य गुरुदेव से कई बातें पूछीं,अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया लेकिन एक निम्नलिखित प्रश्न था :
“अगले दिनों आप एकान्त वास की साधना करेंगे और कठोर तपश्चर्या में रित् रहने का संकल्प साधेंगे। ऐसा क्यों? जब धर्म धारण और सेवा-साधना से ही बहुत अंशों में ईश्वर भक्ति का प्रयोजन पूरा हो जाता है तो एकान्त तपश्चर्या का क्या उद्देश्य है ? ऐसा करने से जनसंपर्क, कार्यक्रमों का नियोजन, मार्गदर्शन एवं सेवा-सहयोग की अन्यान्य क्रिया-प्रक्रियाएँ जो इन दिनों चल रही हैं, वे तो न बन पड़ेंगी, साथ ही आपको एकांतवास का कष्टसाध्य उपक्रम अपनाकर अनेक असुविधाओं से भरी जीवनचर्या बितानी पड़ेगी। आपके संपर्क में आने वाले परिजन जो निरन्तर लाभ उठाते रहते हैं, उन्हें आपके संपर्क से वंचित भी रहना पड़ेगा?”
प्रश्न बहुत ही समझदारी का,गंभीर और उलझन भरा था। गुरुदेव के वियोग से उठी व्यथा भी अनेकों को कष्ट दे रही थी।
सो उपस्थितजनों में से प्रत्येक व्यक्ति एकान्तवास का कारण और समाधान जानने के लिए उत्सुक था।
प्रश्न की जटिलता को समझ पाने के लिए गुरुदेव ने कुछ चुने हुए आगन्तुकों को ही चर्चा का अवसर दिया। इस चर्चा में केवल ऐसे परिजनों को ही बुलाया गया जिन्हें अध्यात्म जैसे काम्प्लेक्स विषय की बैकग्राउंड का ज्ञान एवं अनुभव था। यह ऐसे लोग थे जिन्हें अध्यात्म को गहराई स्तर तक समझने का अवसर मिलता रहा था। परमपूज्य गुरुदेव ने बताया कि अब तक जो सेवा और साधना चल रही थी उसका प्रभाव केवल स्थूल जगत तक,पदार्थ जगत तक मार्गदर्शन करने में ही सक्ष्म था। दायरा सीमित होने के कारण,अनुदान भी सीमित थे लेकिन आने वाला समय असाधारण रूप से विकट है। ऐसे समय के लिए इतनी सीमित क्षमता पर्याप्त न होगी। विशिष्ट स्तर की प्रचंडता उत्पन्न करने के लिए “उच्चस्तरीय तपश्चर्या” से कम में काम नहीं चलेगा। ऐसे कार्यों के लिए भगीरथ, दधीचि, ध्रुव, सप्तऋषि स्तर की उच्च तपश्चर्या की आवश्यकता पड़ती है, एक ऐसी तपश्चर्या जो प्रत्यक्ष शरीर तक ही सीमित न रहे बल्कि सूक्ष्म-कारण शरीर की गहराई में प्रवेश करके उच्चस्तरीय प्राणचेतना का भंडार संचय कर सके। उच्चस्तरीय प्राणचेतना का यह भंडार ( Reservoir of high-level vital consciousness) विषम परिस्थितियों से लोहा लेने में सक्ष्म हो और असाधारण दिव्य उत्पादन (Divine production) में अपने सामर्थ्य का परिचय दे सके। उत्पादन की यह फैक्ट्री,सूक्ष्म जगत में फैली हुई समस्याओं को जड़ से ख़त्म करने में समर्थ होगी, it will eliminate the problems prevalent in the subtle world.
इस समय सारा वातावरण प्रदूषण से भरा पड़ा है। साँस लेने के लिए हवा में विषाक्तता की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि प्रकृति ने विद्रोह खड़ा कर दिया है। विविध प्रकार के प्रदूषण अपने-अपने क्षेत्र में ऐसे संकट खड़े कर रहे हैं जो विदित व्यावहारिक उपचारों से नियंत्रण में नहीं आ रहे हैं।
इसी सन्दर्भ में आदरणीय चिन्मय जी का वैरागी द्वीप में कुछ दिन पूर्व दिया गया उद्बोधन बताता है कि दिल्ली में रहने वाले एक 8 वर्षीय बच्चे के फेफड़ों की स्थिति 20 वर्षों से धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के समान पाई गई है।
अकाल, युद्ध के बादल,राजनीतिक विद्रोह,अपराधों की बाढ़, विद्रोही विचारों का तूफानी प्रवाह मिलजुल कर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रहे हैं, जिससे धरती पर जीवधारियों का निर्वाह कठिन हो रहा है, शारीरिक/मानसिक रोगों की बढ़ोतरी नियन्त्रण से बाहर हो रही है, शालीनता का व्यवहार और प्रचलन ढूँढ़ पाना दुर्लभ हो गया है ।
प्रस्तुत अवांछनीयता को हटाने एवं घटाने के लिए असाधारण प्रवाह विनिर्मित करना आवश्यक होगा। देवत्व को पराजित होने से बचाने के लिए उसी दिव्यशक्ति का अवतरण होना चाहिए, जो महाकाली की तरह दैत्यसत्ता से लोहा ले सके, उसे परास्त कर सके। मनुष्य को ऐसा-वरदान मिले, इसके लिए प्रचण्ड तप के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। तप शक्ति से ही देवसत्ता का अवतरण संभव होता रह सकता हैं। ऋषि तपस्वियों द्वारा अनेक बार का परिचित उपचार इन दिनों भी अपनाये जाने की आवश्यकता पड़ गई है।
सो उसे पूरा करने के लिए ऐसे दुस्साहसपूर्ण कदम उठाये जा रहे हैं।
नवयुग का अवतरण अपने समय की “सतयुग की वापसी” है। इसलिए जितना “मानवी पुरुषार्थ” आवश्यक है उससे अधिक “दैवी सहयोग” चाहिए।
सत्प्रयोजनों में आसुरी शक्तियाँ सदा आक्रमण करती और विघ्न उपस्थित करती रही हैं। विश्वामित्र के यज्ञ को असफल करने में निरत सुबाहु, मारीच, ताड़का आदि के उपद्रवों का सामना करने के लिये भगवान् राम एवं लक्ष्मण की सहायता आमंत्रित की गयी थी। कालनेमि,अहिरावण, और सुरसा हनुमान को असफल करने जा रहे थे।
इन सबका सामना दिव्यशक्ति के माध्यम से ही संभव हो सकेगा।
आने वाले समय के लिए भी ऐसी ही प्रचण्ड सामर्थ्य उपार्जित की जानी है।
यह सर्वविदित है कि भस्मासुर, वृत्तासुर, महिषासुर, अघासुर आदि असुरों ने दैवी प्रयोजनों में कितने ही विघ्न उत्पन्न किये थे। इस बार सतयुग की वापसी वाली दैवी योजना पर भी ऐसे ही आसुरी संकट आते और अपनी भरपूर सामर्थ्य लगाते रहेंगे। उनका सामना भी दैवी शक्ति से ही किया जा सकता है।
परिजनों में से अनेकों अवगत हैं कि “शांतिकुंज की युग निर्माण योजना” को कितनी ही दुरात्माओं ने समय-समय पर अपनी छोटी सामर्थ्य के अनुरूप चिकोटी काटने और डंक मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे लोकल आक्रमण तो आसानी से रद्द और निरस्त कर दिये गये लेकिन भारत के भीतर, पड़ोस में तथा विश्व के हर कोने में जो आतंकवादी-आक्रामकता छाई हुई है वह न जाने कब, क्या अड़ंगा खड़ा कर दें, इसे कोई नहीं जानता। ऐसी दशा में विश्वशान्ति की सुरक्षा करने के लिए ऐसी सतर्कता और शक्ति चाहिए जैसी कि वन्य पशुओं की भरमार वाले एक छोटे से खेल की सुरक्षा के लिए, सिक्योरिटी गार्ड के सारे परिवार को जुटानी पड़ती है ।
भले ही गायत्री परिवार के परिजन आक्रमणकारी न हों लेकिन आक्रान्ताओं से आत्मरक्षा करने के लिए कुछ तो करना ही होगा। यह एक बड़ी व्यापक और भयंकर समस्या हैं जिससे निपटने के लिए उस स्तर की तैयारी हर हालत में अपेक्षित है। परमपूज्य गुरुदेव इसी स्तर की एकांतिक प्रचण्ड तपश्चर्या द्वारा समर्थ आत्मशक्ति का संग्रह कर रहे हैं।
संकटों की कोई कमी नहीं एवं उनसे कोई क्षेत्र बचा नहीं है। तोप बन्दूक, परमाणु हथियारों के धमाके हुए बिना भी ऐसी परिस्थिति बनी रह सकती है जो आतंक, आशंका, विपत्ति और अराजकता जैसी अवांछनीयता बनाये रखे । युद्ध हमेशा आग्नेय ही नहीं होते। शीत युद्धों की अनेकों किस्में भी ऐसी हैं जो असाधारण परिस्थितियाँ बनाये रख सकती हैं और अपनी परिधि में उन्मादी अशान्ति खड़ी किये रह सकती हैं। हर समस्या को पुलिस, शासन, कचहरी और जेल जैसे माध्यमों से ही काबू नहीं किया जा सकता। मनुष्य का समाज के प्रति बहुत बड़ा कर्तव्य है, यदि वोह ही अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक निभाना शुरू कर दे तो परमाणु शक्तियां ऐसे ही धरी की धरी रह जायेंगीं। अविश्वास के वशीभूत, परिवार के प्रत्येक सदस्य ने अपने फ़ोन पर तो पासवर्ड का चौकीदार बिठाया हुआ है तो फिर शांति की कामना कैसे की जाए। शान्ति की परिस्थितियाँ बनाये रखने के लिए भी सबसे बड़ी क्षमता मनुष्य के हाथ में रहनी चाहिए।
गुरुदेव बताते हैं कि प्रस्तुत तपश्चर्या को ऐसी ही “शक्ति साधना” समझा जा सकता है। अवांछनीयताओं, अनाचारों, आपदाओं, मूढ़ मान्यताओं, कुरीतियों, अनीतियों और विडम्बनाओं से जूझने के लिये भी कारगर हथियार चाहिए। सीधे-साधे तरीके से तो नशेबाजी, दहेज वाली, बरबादी भरी शादियों तक से छुटकारा नहीं पाया जा सका है। इनसे बड़ी और विषम समस्याएं घटाटोप की तरह समाज में गहरा रही हैं। इन सभी समस्याओं को लेख पढ़ा कर, लेक्चर देकर जैसे दुर्बल साधनों से कैसे निरस्त किया जा सकेगा?
बुद्ध और गाँधी ने मात्र उपदेश ही नहीं दिये थे, ऐसे संघर्ष भी खड़े किये थे जो “व्यापक अनाचार” को निरस्त कर सके। इन सभी महामानवों की सफलता के अन्य कारण भी जुड़ें हुए रहे होंगे लेकिन “आत्मशक्ति की बहुलता” का विद्यमान आधार भी उस संदर्भ में नकारा नहीं जा सकता।
आज की अवांछनीयताओं को भी अपने निराकरण के लिए ऐसी ही आत्मशक्ति ज़रुरत है। समुद्र सोखने वाले अगस्त्य मुनि को, और विचारतंत्र को उलटने वाले परशुराम के कुल्हाड़े कोआज भी भुलाया नहीं जा सकता। आने वाले समय में अनेक खाई खंदकों को पाटना आवश्यक होगा। साथ ही टीलों को भी झुकने के लिए विवश करना होगा, समतल भूमि तभी बन सकेगी और उसी पर कोई भव्य निर्माण संभव हो सकेगा। खेत उगाने और उद्यान लगाने के लिए भी तो समतल भूमि चाहिए। ऐसे कार्यों के लिए प्रायः बुलडोजर प्रयोग में लाने पड़ते हैं। रेगिस्तानों को हरे भरे बनाने के लिए, समतल करके नहरों के जल स्रोतों का प्रबंध करना पड़ता हैं।
ऐसी ही एक व्यवस्था “आत्मशक्ति की उपलब्धि” भी है। गंगा लाने का श्रेय भगीरथ को है और मन्दाकिनी को अवतरित करने में महातपस्विनी अनुसुइया का पुरुषार्थ काम आया था। पाताल गंगा अर्जुन के धनुषबाण से उभरी थी और उसी से भीष्म की प्यास बुझी थी। तपते सूर्य की किरणों से समुद्रों की सतह से भाप के अम्बार उठते हैं। बादलों का जन्म उसी भाप से होता हैं। वर्षा ऋतु ही हरीतिमा और खाद्य-सम्पदा का उत्पादन करती हैं। यह तप की ही गरिमा है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण हेतु प्रचुर साधन सामग्री की आवश्यकता है। ऐसे भविष्य का उत्पादन केवल यंत्र उपकरणों से ही नहीं होगा। इसके लिए ऐसी तप शक्ति ही आवश्यकता है, जो हिमालय को पिघला सके और हाहाकारी प्यास को अपने बलबूते शान्त कर सके।
कठोर अनुबंधों के साथ, 1990 के वसंत पर्व से आरंभ की गयी, गुरुदेव की “एकांतवास तपश्चर्या” के साथ ऐसे अनेकों कार्य जुड़े हुए हैं।
जय गुरुदेव, धन्यवाद्