वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 का 11वां  लेख- इस बार का वसंत पर्व एक प्रकार का ब्रह्मयज्ञ रहा। 

हमारे साथी इस बात से परिचित हैं कि वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार अप्रैल 1990 की अखंड ज्योति पत्रिका है जिसमें 19 लेखों की  एक दिव्य लेखमाला प्रकाशित हुई थी। साथी इस बात से भी परिचित हैं कि वर्ष 1990 का वसंत, स्थूल रूप में परमपूज्य गुरुदेव का अंतिम वसंत था, इसी वर्ष 2 जून को गायत्री जयंती वाले पावन दिन, पूज्यवर ने स्वेच्छा से स्थूल शरीर का त्याग कर दिया था। 

इन परिस्थितिओं में शांतिकुंज में भारी  भीड़ का एकत्रित होना स्वाभाविक था। परमपूज्य ने आगुन्तुकों को, अपने बच्चों को मिलने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई, अनेकों को सम्बोधन किया, साक्षात् मिलन  भी हुए और पत्रिका के इसी अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ, “माथापच्ची निरर्थक नहीं गयी” लेख का शीर्षक स्वयं ही बता रहा है कि जब कोई पिता अपने अंतिम क्षणों में  बच्चों को आने वाले भविष्य के लिए अनुभव बता रहा होता है तो वह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी बात  ध्यानपूर्वक सुनी जा रही है यां नहीं। गुरुदेव ने अपने बच्चों द्वारा गंभीरता से सुने जाने के कारण ही तसल्ली दर्शाई थी और कहा था कि जो हम माथापच्ची कर रहे थे वोह निरर्थक नहीं गयी। 

हर लेख की भांति, आज के लेख में भी वोह ज्ञान समाहित है,यदि उसे अंतर्मन में उतार लिया तो कोई बात नहीं कि अमृतपान कर रहे साथिओं को आत्मिक तृप्ति न हो। इस छोटे से समर्पित परिवार के एक-एक सदस्य का एकमात्र उद्देश्य “मनुष्य में देवत्व” जगाने का संकल्प है और यह “ज्ञान” को समझ पाने से ही संभव है। 

आइये स्वयं ज्ञान को समझें और ज्ञानदान (कमैंट्स-काउंटर कमैंट्स से) से औरों को समझाएं।            

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गुरुदेव कह रहे हैं : 

इस बार का वसंत पर्व एक प्रकार का ब्रह्मयज्ञ रहा। ब्रह्मयज्ञ का तात्पर्य स्वाध्याय से है,अर्थात् स्वाध्याय को ब्रह्मयज्ञ भी कहा जाता है। ऐसा बताया गया है कि गृहस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन एकान्त में बैठकर धर्मग्रन्थों का पाठ करना चाहिए।  स्वाध्याय से व्यक्ति अपने धर्म से स्वयं तो परिचित होता ही है,अर्जित ज्ञान से जब अपने आसपास के लोगों को, परिवारजनों को अध्यापन कराता है तो उसे अनेकों गुना लाभ प्राप्त होता है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार इस यज्ञ से सन्तुष्ट होकर देवता मनुष्य को आयु, वीर्य, सुरक्षा, समृद्धि, प्रतिभा, कान्ति तथा अभ्युन्नति प्रदान करते हैं ।

हमारे ग्रंथों में  यह भी कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन स्वाध्याय करता है,औरों को कराता है, उसे “भौतिक दान” से तीन गुना फल मिलता है। यही कारण है कि “ज्ञानदान” का इतना गुणगान किया जाता है। इंडियन फिलॉसोफी में स्वाध्याय (ब्रह्मयज्ञ)  को मोक्ष प्राप्ति का आवश्यक साधन स्वीकार किया है।

आइए चर्चा करें की ज्ञानदान सबसे बड़ा दान क्यों माना गया है?”
यह बात भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में केवल भावुक कथन नहीं, बल्कि गहन अनुभव-सिद्ध सत्य है। 

सबसे पहले प्रश्न उठता है कि दान का उद्देश्य क्या है? दान का मूल उद्देश्य है,किसी की असहायता को दूर करना। उदाहरण के लिए जब हम धन का दान करते हैं तो दान प्राप्त करने वाले की भूख,गरीबी आदि में टेम्पररी  सहायता होती है। जब हम वस्त्रदान करते हैं तो प्राप्त करने वाले की कुछ समय के लिए  ठंड दूर होती है। जब हम किसी को औषधि दान करते हैं तो सीमित काल के लिए रोग निवारण होता है।
लेकिन जब ज्ञानदान होता है तो असहायता के मूल कारण पर डायरेक्ट प्रहार करता है। दान लेने वाला सोचने पर विवश हो जाता है कि मैं यह सहायता क्यों ले  रहा हूँ, मुझ में  क्या कमी है। 

ज्ञानदान ही एकमात्र दान है जो बार-बार देने से भी घटता नहीं है बल्कि बढ़ता ही जाता है ,इसीलिए कहा गया है “विद्या ददाति विनयम्…” अर्थात ज्ञान विनम्रता प्रदान करता है। यह श्लोक बताता है कि विद्या (शिक्षा) व्यक्ति को विनम्र बनाती है, और विनय से व्यक्ति को पात्रता प्राप्त होती है। पात्रता से व्यक्ति धन अर्जित करता है, और धन से धर्म का पालन करने की क्षमता मिलती है। यह श्लोक हितोपदेश में उल्लिखित है। 

जब ज्ञान दिया जाता है तो वह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति से होते हुए पूरे समाज तक फैलता है, आने वाली पीढ़ियों तक प्रभाव डालता है
ज्ञानदान “आत्मनिर्भर” बनाता है अर्थात किसी को धन देकर (भिक्षा आदि)  हम उसे आज का भोजन दे रहे होते हैं लेकिन उसे धन कमाने का साधन बताकर उसे जीवन भर का समाधान बता रहे होते हैं।  ज्ञानदान व्यक्ति को सोचने की शक्ति, सही-गलत का विवेक, निर्णय करने की क्षमता देता है। आध्यात्मिक दृष्टि से अज्ञान (अविद्या) को ही बंधन का कारण माना गया है, ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है, विद्या मुक्त करती है, चेतना का स्तर उठाती है।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि ज्ञानदान का अर्थ उपदेश थोपना नहीं
बल्कि व्यक्ति में छुपी शक्ति को जगाना है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि ज्ञानदान अस्थायी राहत नहीं, स्थायी समाधान है। यह व्यक्ति, समाज और युग को बदलने की शक्ति रखता है। 

इसी तथ्य को परमपूज्य गुरुदेव ने युग परिवर्तन योजना में संहित किया है। जब तक सही और गलत का अंतर् ही नहीं होगा तो विचार क्रांति कैसे होगी, युग परिवर्तन कैसे होगा?  

आज के डिजिटल युग में तो ज्ञानदान बहुत ही सरल प्रक्रिया है। नियमित रूप से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार से जुड़ जाइये और उपलब्ध सभी सुविधाओं का लाभ उठाते हुए अपना एवं दूसरों का कल्याण कीजिये।  

शांतिकुंज  की भूमि पर 1990 के वसंत को, ज्ञान का ही समुद्र मंथन होता रहा, अज्ञानता को दूर करने के साधन एवं आत्मनिर्भर बनने के तरीके बताये गए। तरह-तरह के प्रश्न उठाए गए एवं  जिज्ञासाओं से  यह पता चल सका कि “मनुष्य का निजी पुरुषार्थ नगण्य है।” मनुष्य जीवन भर एक ही इच्छा लेकर बैठा रहता है कि  मैं किसी तरह बड़ा बन जाऊं, जब बड़ा बन जाता है तो और बड़ा बनने की इच्छा,इसी बड़ा बनने की इच्छा में जीवन का अंत आ जाता है। मनुष्य वासना, तृष्णा और ईगो  से आगे बढ़ ही नहीं पाता, सारे का सारा बहुमूल्य  जीवन एक छोटे से  दायरे में कुएं के मेंढक की तरह, ईश्वर से प्राप्त हुई सम्पदा को विसर्जित करने में खर्च कर देता है। पूजा-पत्री, छिटपुट पूजा-पाठ तक, तनिक से उपहार मनुहार तक सीमित रहकर वह स्वयं संतुष्ट रहता, स्वयं ही फूलता रहता है, इसी को ईश्वर उपासना मानकर मन बहलाता रहता है, पास पड़ोस वालों को बहकाता रहता हैं। 

उसे ईश्वर द्वारा प्रदान किये गए सामर्थ्य का ज्ञान ही नहीं होता। वह जानता ही नहीं कि शक्ति के स्रोत ईश्वर के साथ जुड़कर, वोह  भी हिमालय से निकली, कलकल बहने वाली गंगा की तरह अपना  और संसार का भला करने का सामर्थ्य प्राप्त किये हुए है। 

साथिओ, हम बात कर रहे हैं 1990 के वसंत के दिनों में आये परिजनों और गुरुदेव के बीच हुई वार्ता एवं उनकी जिज्ञासाओं के समाधान की,  गुरुदेव बता रहे हैं : 

माथापच्ची व्यर्थ नहीं गयी, बच्चे कुछ न कुछ ज्ञानप्रसाद तो लेकर ही गए हैं। जिन सफलताओं के संबंध में चर्चा होती रहीं,उन्हें हर कोई जानता है, हर कोई परिचित है एवं अधिकतर दृश्यमान हैं। लेकिन अभी और बहुत कुछ जानने योग्य बाकि रह जाता है जिसे न तो आँखों से देखा जा सकता था  और न ही कानों से सुना जा सकता था। उचित समय आने पर, जब कोई पूछेगा तो उसको बताने तक के लिए समय और समाधान रिज़र्व रख लिया है 

गुरुदेव ने “साधना से सिद्धि का रहस्य और मार्ग” बताते हुए कहा कि समर्पण ही एकमात्र मार्ग है एवं सदा से यही मार्ग समझा-समझाया जाता रहा है।

गुरुदेव से चमत्कारों के बारे में पूछने पर इतना ही बताया जाना उचित समझा गया कि यदि शक्ति स्रोत से जुड़ने के लिये, अपनी अल्पता एवं अज्ञानता  को महापुरुष के चरणों पर समर्पित करने और उनकी महानता को मान्यताओं भावनाओं, संवेदनाओं आकांक्षाओं एवं क्रियाकलापों में कस लेने के बाद, सच्चे अर्थों में किये गए प्रयास से ही स्वयं  को ईश्वर के हाथों सौंपा जा सकता है। ऐसा स्टैप लेने के बाद ही ईश्वर के अनुदान और सिद्धि सम्पदा को सहज खरीद पाना संभव है। 

मात्र पूजा-पाठ की राई-रत्ती, चिन्ह पूजा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति नहीं कर सकती। यही समझा-समझाया जा सकता है। 

वसन्त पर्व के महासत्संग ने अनजाने में “भक्ति के साथ शक्ति” के जुड़े होने का रहस्य समझाया जिसकी शाब्दिक जानकारी तो थी लेकिन  न तो कभी श्रद्धा जगती थी और न ही विश्वास परिपक्व होता था। अधिकतर लोग मात्र “जानकारी” को ही पर्याप्त समझते थे, क्रिया रूप में, परमार्थ जैसा कुछ करने के लिये कुछ भी साहस जुटा पाने में असमर्थ थे। ऐसे लोगों ने इस बार के वसंत में, इस तथ्य को गंभीरतापूर्वक समझा। साथ ही यह भी अनुभव किया कि शरीरबल, बुद्धिबल, मनोबल, धनबल आदि क्षमताओं और सामर्थ्यों का कितना ही बाहुल्य क्यों न हो, “आत्मबल” की तुलना में उन सब की सम्मिलित क्षमता भी नगण्य हैं।  

हमारा विश्वास है कि इस विषय से सम्बंधित मार्च 2025 के पूर्वप्रकाशित लेख पाठकों को अवश्य ही स्मरण हो आये होंगें  शांतिकुंज परिकर द्वारा अब तक जो घटित हुआ है, उसके मूल में तप ही एकमात्र वास्तविकता है और यदि कोई ऐसा ही ओजस्वी तेजस्वी, वर्चस्वी, तपस्वी बनना चाहता है तो ऋद्धियों/सिद्धियों को प्राप्त करने के लिये कस्तूरी के मृग की तरह भटकने की क्या आवश्यकता है? मात्र पूजा के सहारे दैवी अनुकम्पा के रूप में मिलने वाले अनुदानों की जो अपेक्षा करते हैं, उन्हें मृगतृष्णा में भटकने पर खीज़, थकान और निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

शांतिकुंज में एकत्रित हुए अधिकतर परिजनों को इस तथ्य का ज्ञान हो गया कि बीज अपने बलबूते वृक्ष नहीं बन जाता। उसे खाद-पानी आदि  भी चाहिए। व्यक्तित्व की प्रामाणिकता और व्यवहार में उच्चस्तरीय उदारता का  समावेश ही वह आधार है जिसके बलबूते किसी को भी साधारण परिस्थितियों में रहते हुए भी असाधारण स्तर का देवमानव बनने का अवसर मिल सकता है। 

यहाँ देखने और अनुभव करने  वाली बात है कि परमपूज्य गुरुदेव को मालूम था कि कुछ ही दिनों में इस स्थूल शरीर के त्याग का समय आने वाला है लेकिन अंतिम श्वास तक अपने परिवार के लिए, अपने बच्चों के लिए कार्य करते रहे। इसके उल्ट रियल लाइफ में अक्सर देखा गया है कि रिटायरमेंट के कुछ वर्ष पूर्व ही लोग कहना शुरू कर देते हैं, “हम तो रिटायर हो गए हैं, हमें कोई भी ज़िम्मेदारी न दी जाये।” ऐसे लोगों को To die in harness, अर्थात अंतिम श्वास तक एक्टिव रहना, कार्य करते रहने का अर्थ ही मालूम नहीं होता। 

वसन्त पर्व के दिन इस संदर्भ में चलता रहा शंका समाधान निरर्थक नहीं गया। रहस्योद्घाटन की जानकारी प्राप्त करके जिज्ञासा की तुष्टि भर नहीं हुई बल्कि  सहस्रों ने निश्चयपूर्वक संकल्प लिया कि वे अगले दिनों इसी राजमार्ग पर चलेंगे। शेष जीवन को सच्चे अर्थों में सार्थक बनायेंगे। ईश्वर की आशा अपेक्षा पूरी करेंगे और बदले में उसे सच्चे साथी सहचर की भूमिका निबाहते हुए निहाल कर देने के लिये बाधित करेंगे।

तो साथिओ आशा करते हैं कि जिस प्रकार अनेकों परिजनों के प्रश्नों का समाधान हो गया, आपके मन में भी समर्पण के प्रति कोई शंका नहीं रह गयी होगी। 

जय गुरुदेव, सोमवार तक मध्यांतर 


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