वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 का दसवां  लेख- गुरुदेव ने अविश्वसनीय,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य कार्यों को कैसे अंजाम दिया? 

मेरे प्यारे साथिओ , हमें डर है कि आज का ज्ञानप्रसाद लेख कहीं “अपनों से अपनी बात” जैसा एकदम इंटरैक्टिव लेख न बन जाये। 

कल वाले लेख पर पोस्ट  हुए अधिकतर कमैंट्स यह जानने की  जिज्ञासा के  समाधान की ओर  केंद्रित थे कि एक साधारण से, साधनरहित व्यक्ति  ने इतने बड़े-बड़े कार्य कैसे सम्पन्न कर लिए? शंका करने वाले तो यही कहेंगें न “कुछ तो लोचा है !!” 

तो साथिओ आज का ज्ञानप्रसाद लेख पात्रता, समर्पण, खरा-खोटा सोना, कठपुतली का नृत्य, आदि के उदाहरणों से  बता रहा है कि  कैसे 15 वर्षीय बालक  को दादागुरु ने अपनी सारी शक्तियां ट्रांसफर करके उनसे ऐसे-ऐसे कार्य करवा डाले कि सब दांतों तले ऊँगली दबाते रह गए। यदि कोई शंकाग्रस्त रह गया हो तो यह उसकी प्रॉब्लम है, ऐसे लोग तब भी थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगें। 

ऐसे कार्य केवल समर्पण से ही संभव हो पाते हैं, ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथिओं के समर्पण का प्राकट्य उनके कमैंट्स से ही दिख रहा है। आद वंदना बहिन जी ने लेख को लाजवाब (जिसका कोई जवाब नहीं) कहकर लेख का सम्मान बढ़ाया तो आद  अरुण जी ने लेख को किसी भी रोग को  ठीक करने वाली गोली कहा। कोई न कोई बीमारी तो सबको  घेरे बैठी है, तो फिर ज्ञानप्रसाद नामी गोली को क्यों नहीं लेते? आज पहली बार कमेंट कर रहे आद रजत पाटीदार जी ने भी इसी तरह का जिज्ञासाभरा प्रश्न किया। आशा करते हैं कि आज के लेख को लिखने में जो भी प्रयास किया गया है, हमारे साथिओं के लिए लाभ तो क्या, एक टॉनिक की भांति कार्य करेगा। जब तक ऐसा नहीं होगा, हमारी आत्मा तृप्त नहीं होगी। 

तो मेरे प्यारे साथिओ,  यह तो हुई आप सब की बातें।  कल वाला लेख लिखते समय हमें जो अनुभव  हुआ था, काश  टेक्नोलॉजी इतनी विकसित होती, आप देख सकते  कि लिखते समय लैपटॉप पर मात्र हमारी उँगलियाँ ही नहीं चल रही थीं बल्कि रंगमच पर गुरुदेव और हमारे बीच एक दिव्य संवाद चल रहा था। 

एक नन्हें शिशु की भांति, हम ज़िद लगाए बैठे थे कि 25 जनवरी 2023 के लेख “जिज्ञासुओं ने सब कुछ ही उगलवा लिया” शीर्षक से यह कंटेंट प्रकाशित हो चुका  है। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हम शांतिकुंज के लोपा मुद्रा भवन के  रूम नंबर 16 में (जहाँ हम 2019 में निवासित थे) हैं, बार-बार यहाँ आते हैं, कुछ पेपर प्रिंट करते हैं और परमपूज्य को अखंड दीप के बगल वाले कमरे में यह पेपर दिखाते हैं। कल लेख लिखते समय, हमारा शरीर इधर कनाडा में था  लेकिन आत्मा गुरुचरणों में समर्पित होती हुई रंगमंचीय अंदाज़ में अनुभव होती रही। हर लेख को लिखते समय कुछ ऐसी ही अनुभूति होती रहती है। 

ऐसा है मेरा/हमारा/आपका  सबका गुरु

चलते हैं विश्वशांति की कामना के साथ आज के ज्ञानप्रसाद लेख की ओर  : 

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए  

******************         

1990 के वसंत वाले दिन शांतिकुंज में इतने परिजन इक्क्ठे हो गए जितने कभी पहले नहीं हुए थे। अधिकतर लोगों के दिल में प्रश्न था कि  युगचेतना उभारने वाला इतना साहित्य कैसे सृजा गया? उसका अनेक भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन प्रसार कैसे सम्पन्न हुआ? इतना बड़ा परिवार कैसे संगठित हो गया, जिसमें पाँच लाख पंजीकृत और इससे पाँच गुना अधिक सामयिक स्तर पर सम्मिलित उच्चस्तरीय व्यक्तियों का समुदाय किस प्रकार जुड़ता चला गया और साथ चलता रहा? एक व्यक्ति के तत्त्वावधान में 2400  आश्रम-देवालय कैसे बन सके? शांतिकुंज,ब्रह्मवर्चस्,तपोभूमि मथुरा  जैसे बहुमुखी सेवाकार्य में संलग्न संरचनाओं की इतनी सुव्यवस्था कैसे बन सकी? सुधारात्मक और सृजनात्मक आन्दोलन की देशव्यापी विश्व-व्यापी व्यवस्था कैसे बन गई? “रोता आये हँसता जाये” वाला उपक्रम अनवरत रूप से कैसे चलता रहा? आदि-आदि ऐसे विदित अगणित क्रिया-कलाप इन 80  वर्षों में घटित हुए हैं जिनकी इतने सुचारु रूप से चलने की सूत्र संचालक जैसे एक नगण्य एवं साधारण से व्यक्तित्व

से आशा की नहीं जा सकती, फिर  भी वे कैसे सम्पन्न होते चले गए? जड़ी बूटी चिकित्सा पर आधारित आयुर्वेद की नयी सिरे से शोध कैसे बन पड़ी व मनोरोगों के निवारण और मनोबल के संवर्द्धन की ब्रह्मवर्चस प्रक्रिया कैसे चलती रही? सात पत्रिकाओं का सम्पादन अकेले  प्रयास से कैसे चल पड़ा? लाखों शिक्षार्थी हर वर्ष प्रशिक्षण पाने से किस प्रकार लाभान्वित होते रहे? सृजनात्मक आन्दोलनों को इतनी गति कैसे मिल सकी जितनी कि अनेकानेक संगठन और समुदाय भी नहीं उपलब्ध कर पाते हैं ?

इन सभी प्रश्नों का समाधान एक ही उत्तर से निम्नलिखित शब्दों में हो गया : 

एक छोटी सी चिंगारी जब ईंधन के अम्बार से मिल जाती है तो  प्रचण्ड अग्निकाण्ड बन जाता है। पारस को छूकर लोहे को  सोना बनाने वाली उक्ति कितनी प्रसिद्ध है, सब भलीभांति जानते हैं।  

फिर भगवान के साथ रहने, सर्वशक्तिमान से जुड़ने वालों की स्थिति वैसी क्यों नहीं हो सकती ? बिजली के विशाल उत्पादन केन्द्र के साथ जुड़ जाने पर घर के सभी छोटे-मोटे यंत्र-उपकरण सहज ही चलते रहते हैं। गुरुदेव ने अनेकों लेखों और वीडियोस में  हम सबको बार-बार, ज़ोर  देकर कि  

कुछ का समाधान तो हो गया लेकिन हजारों जिज्ञासु सन्देह ही प्रकट करते रहे और पूछते रहे कि जब लाखों की संख्याओं में गिने जाने वाले ईश्वर भक्त, गई गुजरी एवं  उपहासास्पद जीवन व्यतीत करते देखे जा रहे  हैं तो गुरुदेव जैसे साधारण, फकीर दिखने वाले, दरवेश गुरु के पास इतनी समर्था कैसे आ गई ? कैसे हो जाता है कि  भगवान के अनुदान केवल कुछ एक (नरसी मेहता,हनुमान,अर्जुन, गिलहरी, रीछ-वानर, सुदामा,ग्वाल-बाल आदि  जैसे) विरलों को ही मिल पाता है  

पात्रता के अनुरूप किसी भी गुरु की उपलब्धियों का शिष्य में ट्रांसफर  होना एक ऐसी वास्तविकता है जिसे हर कहीं चरितार्थ होते देखा जा सकता हैं। दादागुरु ने अपनी समस्त शक्तियां गुरुदेव को ट्रांसफर करके अविश्वसनीय कार्य करवा लिए।   

खोटे सिक्के हर जगह ही ठुकराये जाते हैं। 24 कैरट का सोना तो कहीं भी बेच कर सही मूल्य प्राप्त किया जा सकता है। आजकल तो आर्टिफीसियल ज्वेलरी का प्रचलन है, क्या उसे बेच कर असली सोने जैसा मूल्य मिल सकता है ? कदापि नहीं क्योंकिं आर्टिफीसियल तो आर्टिफीसियल ही है, खोटा ही है; कृत्रिम ही है, आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI-कृत्रिम बुद्धिमत्ता)  की तरह।    

जो कोई भी मनुष्य भगवान से अपने काम निकलवाने के लिए जुड़ता है, मंदिरों के चक्र लगता है, सुबह शाम  गायत्री मन्त्र की गिन-गिन कर मालाएं जपता है, उसे स्वार्थी/ प्रपंची/ पाखण्डी न कहें तो और क्या कहा जाये ? ऐसे स्वार्थी भगवान् के मंदिर में अपनी शर्तों और डिमांड्स की लम्बी सूची लेकर जाते हैं। ऐसे पाखंडिओं की जब कोई भी डिमांड पूरी नहीं होती तो भगवान् की निंदा, शिकायत,बदनामी करना शुरू हो जाते हैं, भोले-भाले भगवान् को  तानशाह कहने से भी गुरेज़ नहीं करते। ऐसे मूर्खों को इतना तक तो  पता नहीं कि भगवान्  तो उनके ह्रदय में,अंतःकरण के सिंघासन पर विराजमान हैं।  

गुरुदेव पात्रता के लिए एक और उदाहरण उस पत्नी का देते हैं जो तन,मन,धन से, विवाह के पहले ही दिन से अपने पति  को समर्पित हो जाती है और पति उस पर,बिना कोई प्रश्न किये अपनी सम्पूर्ण सम्पदाओं को न्योछवर कर देता है। भक्त और भगवान का ऐसा विवाह होता है।   

इस सृष्टि के रचियता (ईश्वर) की एक ही आशा  है कि अनेकों योनियों का चक्र काटकर, सुरदुर्लभ मानव तन तथा जीवन पाने वाला “प्राणी” उपलब्ध विभूतियों के सहारे स्रष्टा के “विश्वरुपी उद्यान” को हरा भरा रखने के लिए एक  समर्पित माली की भूमिका निभाए। यदि वोह ऐसा करता है तो कोई कारण नहीं कि उसे आत्म-संतोष, सभी का सम्मान, श्रेय,यश तथा उसके स्वामी एवं सखा (ईश्वर)  का समुचित अनुग्रह/ अनुदान प्राप्त न हो। 

गुरुदेव ने बस इतना ही किया, पूर्ण समर्पण और वोह भी ऐसा कि अपने हिमालयी गुरु को छोटे से गांव,आंवलखेड़ा की कोठरी में आने पर विवश कर दिया। 15 वर्ष के बालक का यह निस्वार्थ समर्पण एवं पात्रता ही थी जिसने इतना विशाल कार्य कर डाला 

चलो गुरुदेव की बात यहीं छोड़ देते हैं, आगे चलते हैं !!!

पात्रता और समर्पण वाले तथ्य की परीक्षा करनी हो तो संसार में जन्में अब तक के महामानवों की जीवनचर्या को प्रूफ देने के लिए देखा/समझा जा सकता है। पुण्य और परमार्थ को उस बीज की भांति समझा जा सकता है जो बीजने के समय तो राई के समान छोटा सा, नन्हाँ सा   होता है लेकिन देखते ही देखते वह एक  विशालकाय बरगद के वृक्ष की तरह उत्कर्ष के उच्च शिखर तक जा पहुँचता है। 

ईश्वर के अजस्र अनुदान प्राप्त करने का एकमात्र तरीका निम्नलिखित ही  है और यही रहेगा:

गुरुदेव साधना के अर्थ को समझाने के लिए कहते हैं यह स्वयं को संयमी और सुसंस्कृत बनाने के लिए  की जाती हैं। इसके लिए ईश्वर  की एकमात्र इच्छा को पूरा करना पड़ता हैं कि संयमशील एवं उदारचेता स्तर का परमार्थ परायण जीवन जिया जाय। सच्चे साधु,  ब्राह्मण, सन्त, सुधारक और शहीद इसी स्तर के होते रहे हैं। उनकी साधारण सी पूजा उपासना भी राई से पर्वत बनाते  देखी जा सकती है।  

अंत में इतना ही कहना चाहेंगें कि शांतिकुंज आये अनेकों शंकाग्रस्त परिजनों को निम्नलिखित Concluding remarks अवश्य पढ़ने चाहिए:

परमपूज्य गुरुदेव जैसे ईश्वर समर्पित मनुष्य ही देवमानव कहलाते हैं और उन्हीं में वे सिद्धियाँ/ विभूतियाँ प्रकट होती हैं जो एक साधनहीन व्यक्ति में इतनी समर्था भर देते हैं जिनके माध्यम से अनेकानेक महान कार्यों की पूर्ति हो जाती है, इसमें ज़रा भी शंका नहीं है। 

जय गुरुदेव, धन्यवाद् 

वसंत पर्व को समर्पित कल और लेख 


Leave a comment