29 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
आज के लेख का उपदेश: होंठों से जय गुरुदेव कहना और सही मायनों में गुरुदेव के होकर जीने में बहुत बड़ा अंतर् है।
परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर हर बार एक अलग तरीके से मनाने का प्रयास किया जाता है।
2026 का वर्ष अपनेआप में जिस महत्व को लेकर आया है, हर गायत्री परिजन को इसकी पूरी जानकारी है। इस वर्ष, इस मंच से, अखंड ज्योति में वसंत पर्व पर प्रकाशित कुछ चुनिंदा अंकों का स्वाध्याय करके, समझकर,सरलीकरण करके, लेखक की भावनाओं को जोड़कर, साथिओं के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। कमैंट्स बता रहे हैं कि साथिओं को इस नवीन प्रयास से लाभ मिल रहा है जिससे हमें आत्मशांति का अनुभव हो रहा है। यह सभी अंक परमपूज्य गुरुदेव ने ही हमारे हाथ में थमाए हैं, सभी एक से बढ़कर एक हैं।
आज के लेख में एक शिष्य के समर्पण का विवरण है, निस्वार्थ भाव से देने का संकल्प है, भौतिकता को छोड़,अलौकिकता की ओर जाने के कदम हैं।
हमारा विश्वास है कि शिष्यत्व का इससे सरल कोई और विवरण हो ही नहीं सकता।
हर बार की भांति आज भी करबद्ध निवेदन करेंगे कि गुरुवाणी को ध्यान से पढ़ें, अपने अंतर्मन में उतारें और फिर देखें कैसे-कैसे अलौकिक चमत्कार होते हैं।
आइए विश्वशांति की कामना करते हुए, फरवरी 2005 की अखंड ज्योति में “समर्पण की सरगम छेड़ता आया वसंत पर्व” शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुए लेख का अमृतपान करें:
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
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अपनी अंजुरी (हथेली) में सरसों के फूल उनकी महक लिए हुए वसंत ने फिर से हमारे दिलों को छुआ है। वसंती पवन ने फिर हमारी संवेदनाओं को समर्पण के स्वर दिए हैं। ऋतुराज वसंत ने भक्ति की सरगम पुनः छेड़ी है । विभोर करने वाली यादें, पुलकित करने वाली बातें, तरंगित करने वाले तराने अंतस् में पुनः उमड़े हैं। गुरु और शिष्य के बीच बहने वाली भक्तिगंगा में फिर से उफान आया है। वासंती हवाओं ने भावों में समर्पण की सिहरन पैदा करने वाले कई इतिहास रचे हैं । इन हवाओं के झोंकों के बीच अनेक गीत गुनगुनाए गए हैं। अनगिनत शब्द छंदों में पिरोए गए हैं। भावों के घटों से अनगिनत भावनाएँ छलकी और उमड़ी हैं।
लेकिन इनकी जो मधुमय मिठास शिष्य के अंतस् ने अनुभव की है, वह शायद ही कहीं अन्यत्र की गई हो। प्रेम के ढाई अक्षर बहुतों की जबान पर चढ़ते और चर्चा का विषय बनते रहे हैं लेकिन सर्वथा मौन रहकर निरंतर स्वयं को गुरु के चरणों में अर्पित करते रहने की कला केवल शिष्य को ही आती है। प्रेम के ढाई अक्षरों को समस्त शास्त्रों का निचोड़ बताने वाले कबीर भी यह कह गए हैं:
अधजल गगरी छलकत जाय, भरी गगरिया चुपके जाय।
यह अनुभव का सच है कि आधी,अधूरी भावनाओं की गागर जितना खालीपन लिए होती है, उतना ही ज़्यादा शोर मचाती है। उतने ही ज़्यादा संवाद और विवाद होते हैं। उतने ही गहरे प्रश्न खड़े होते हैं। अंतस् में शंकाओं की घनी काली बदरिया छाई होती है जो जब-तब बरस कर नयन भिगोने को मजबूर करती है।
भावना होती ही ऐसी है, और भावनाशील का तो कहना ही क्या!!!
प्यार के लिए भटक रहा शिष्य का हृदय जानता है कि यदि प्यार गहरा है, प्रीति पक्की है, भक्ति सच्ची है तो फिर किसी भी प्रश्न के उठने का कोई सवाल ही नहीं। प्रश्नों के कांटें उसे ही चुभते हैं, जिसकी भावनाएँ अधूरी और अपरिपक्व हैं। समर्पण करने वाले तो अपना सर्वस्व लुट जाने पर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। उनकी अपने आराध्य से एक ही पुकार होती है:
“प्रभु मुझे देना कुछ नहीं लेकिन मेरा सब कुछ ले लेना। देकर भी कहता मन दे दूँ कुछ और अभी।”
यह मन:स्थिति शिष्य की होती है। भक्त की भावनाएँ इसी धुरी पर भ्रमण करती हैं। वसंत का सच भी यही है। सद्गुरु-समर्पण का मर्म भी यही है और सबसे बढ़कर परमपूज्य गुरुदेव के साधना जीवन का सार यही है।
18 जनवरी 1926 की वसंत पंचमी की ब्रह्मवेला को गायत्री परिवार का कोई सदस्य कैसे भूल सकता है। यही वह दिन था जब परमपूज्य गुरुदेव की अपनी मार्गदर्शक-सत्ता से पहली मुलाकात हुई थी।
बस उसी क्षण उनके जीवन में गुरुभक्ति का महापर्व बन गया। उसके बाद से तो बस इस भक्तिकाव्य में प्रत्येक वसंत नए समर्पण का नया सर्ग लिखता चला गया।
परमपूज्य गुरुदेव की जीवन-गाथा अनेकों पाठकों ने अनेकों तरह से पढ़ी होगी। इस जीवन-गाथा के विभिन्न पहलुओं ने पाठकों के मनों को छुआ होगा। कई स्थलों पर उनका हृदय संवेदित हुआ होगा। गुरुदेव के जीवन के अनेक प्रसंगों ने पढ़ने वालों के मनों में हलचल भरी होगी, लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसा भी है, जिसने स्वयं गुरुदेव के मन को संवेदित व पुलकित किया है और वह प्रसंग है, उनके जीवन में अंकुरित हुई गुरुभक्ति । बाकी सारे प्रसंग तो इसी भक्ति-सूत्र में गुँथे हुए हैं और इसी से ओत-प्रोत हैं।
इस प्रसंग की चर्चा में गुरुदेव के जीवन के सारे वसंत पिरोए हुए हैं। परमपूज्य गुरुदेव अपने मार्गदर्शक को अनेक विधियों से स्मरण करते थे। कभी कहते थे मेरे मास्टर, कभी कहते मेरे मार्गदर्शक, कभी उन्हें अपना भगवान, तो कभी अपने साथ सदा चलने वाला,अपनी रक्षा करने वाला बॉडीगार्ड बताते। लेकिन इन सारे संबंधों में, सारे विशेषणों में उनके समर्पण का स्वर ही गूँजता था।
“गुरुदेव का समूचा जीवन एक ऐसा भक्तिगीत था, जिसे वह निरंतर अपने प्रभु, अपने आराध्य की याद में विभोर हो गाते रहे।” जब वे अपने बारे में बताते तो यही कहते:
“मेरा अस्तित्व ही क्या है ? मैं तो बस अपने गुरु के ओंठों पर लगी हुई पोली बाँसुरी हूँ। इससे तो बस गुरु महिमा की धुन ही बजती है।”
जो गुरुदेव के स्पर्श से संवेदित हुए हैं, वे ही उनके जीवन का यह “वासंती सच” जानते हैं । समर्पण की मस्ती क्या होती है, इसे तो कोई गुरुदेव से ही जाने और सीखे। ओंठों से गुरुदेव कहना और जीवन से गुरुदेव का होकर जीना, इसमें भारी बहुत भारी अंतर् है।
“हताश निराश, शिकायतों से भरा मन भला शिष्यत्व को क्या जाने ?”
उसे कहाँ ज्ञान है कि शिष्य होने में कितनी तृप्ति है, कितना आनंद है, कितना उत्साह है और कितना आश्चर्य है ? जो देना जानते हैं, वही पाते हैं। जो देते हैं, वही तृप्त होते हैं। जिन्होंने केवल देना सीखा है, वही प्रेम का, भक्ति का, अनुराग का रहस्य जानते हैं।
“देने के लिए स्वार्थ और अहं से मुक्त और रिक्त मन चाहिए।”
सूफी संतों ने कहा है:
“इश्क मिजाजी,इश्क हकीकी”, अर्थात सांसारिक प्रेम और आध्यात्मिक प्रेम का अंतर् कोई-कोई ही समझ सकता है। सांसारिक प्रेम तो वास्तविक प्रेम होता ही नहीं है। इसमें तो हमेशा स्वार्थ और अहंकार के गणितीय समीकरण (Mathematical equations) लगाए जाते हैं। कब, किससे, कितना स्वार्थ पूरा हुआ/हो सकता है,कितना बड़ा/मूल्यवान गिफ्ट दिया,उससे उतना ही प्यार मिलने की संभावना है। एक अन्य पहलू अहंकार का है। जो मेरी शर्तों के अनुसार बिना मुँह खोले चलेगा,वही श्रेष्ठ है। जो बिना कोई आनाकानी किये, जितना अधिक मेरी शर्तों को माने,वह उतना ही ज्यादा अपना है ऐसी सोच वाले व्यक्ति जीवन में कभी तृप्त नहीं होते, उन्हें कभी भी संतुष्टि नहीं मिलती है। उनके अंतस् में कभी उल्लास, प्रसन्नता, उत्साह आदि पैदा नहीं होता क्योंकि वह तो एक Chained pet की भांति,बिना कोई आनाकानी किये सब कुछ माने जा रहे हैं,उन्हें ठीक और गलत सोचने की सुध ही कहाँ रहती है। ऐसे लोग विवेक की देवी माँ सरस्वती की कृपा से कोसों दूर रहते हैं, हंसवृत्ति को भला वोह क्या जानें।
भक्ति भगवान के प्रति, सद्गुरु के प्रति स्वयं को निरंतर (जी हाँ निरंतर) उँड़ेलते रहने का नाम है। यह नहीं कि जब कुछ नहीं करने को है तो गुरु का द्वार खटखटा लिया और उलाहनों और शिकायतों का पुलिंदा खोल डाला।
“प्रेम स्वयं को सौंपने की कला है। जो सब कुछ देकर बदले में और कुछ नहीं चाहता, वही शिष्य है । उसी का जीवन भक्तिगीत बनता है । पाने की इच्छा करने वाले तो बस बहकते-भटकते ही रहते हैं। उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता। यहाँ तक कि उल्लासभरा वसंत भी उन्हें मुस्कान नहीं दे पाता।
साथिओ, ज़रा सोच कर देखें तो सही, शंकाओं व शिकायतों से बोझिल मन वाला व्यक्ति क्या कभी समर्पित शिष्य हो सकता है ? जवाब एक ही है: कभी नहीं,निश्चित ही कभी नहीं। शिष्य बनने का एक ही सूत्र है:
“पहले गुरु के हाथों मिट जाना और फिर गुरुभक्त के रूप में गढ़े जाना। यही साधना-जीवन का सच है, सार है।”
परमपूज्य गुरुदेव के साधना-जीवन में आने वाले हर वसन्त ने यही बात कही है, यही गीत गाया है। वे कहते थे:
बेटा ! लोग मेरे जीवन के “चमत्कारी सामर्थ्य” की चर्चा करते हैं लेकिन उस चमत्कार के कारण को भूल जाते हैं, जिसकी वजह से यह सब संभव हुआ है। मैंने अपने जीवन को गुरुभक्ति के पवित्र जल से सींचा है; यहाँ तक कि स्वयं को, अपने जीवन को जल बनाकर अपने मार्गदर्शक के चरणों में अर्घ्य की भांति चढ़ाया है। आज जो कुछ है, सब उसी का परिणाम है, प्रतिफल है। जो भी यह करेगा, उसी का जीवन ऐसा हो जाएगा।
अब बारी हम गुरुभक्तों की है। वसंत की महक, वसंत की मस्ती, वसंत का उल्लास, उछाह गुरुभक्ति की डगर पर ही चलकर मिल सकेगा। यदि गुरुभक्ति हमारे दिलों की धड़कन बन सकी तो समझो, अपने जीवन को भी यह वसंत महकाए बिना न रहेगा। वसंतोत्सव हमें गुरुभक्ति का गीत सिखाने आया है। हमारे जीवन में समर्पण की सरगम छेड़ने आया है। इस समर्पण में ही सरसों के फूलों की छटा और आम्रमंजरी की महक समायी है।
धन्यवाद् जय गुरुदेव