वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 का पाँचवाँ लेख-गुरुदेव के सात संकल्प 

वर्ष 1990 की वसंत पंचमी को  शांतिकुंज से मात्र 8 पन्नों का, 10 पैसे मूल्य का एक पैम्फलेट प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक “वसंत पर्व पर महाकाल का सन्देश” था। इस पैम्फलेट का प्रथम भाग कल वाले लेख में प्रकाशित किया गया था,आज दूसरा भाग प्रस्तुत है जिसमें परमपूज्य गुरुदेव “सात संकल्पों” की बात कर रहे हैं। इन सकल्पों का अमृतपान करने  पर दिखता है कि शायद ही कोई गायत्री परिजन ऐसा होगा जो इन सात संकल्पों में से कोई न कोई संकल्प अवश्य ही लिए बैठा हो। बहुत सारे परिजन तो ऐसे भी हैं जो सातों संकल्पों को धारण किये हुए हैं। 

ऐसा होने के बावजूद हमारा कर्तव्य है कि इन संकल्पों के व्यापक प्रचार प्रसार के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर शेयर किया जाए क्योंकि हर समय नए साथी (अदृश्य ही सही,सुप्त ही सही) जुड़ते जा रहे हैं। नए साथिओं को एवं असक्रिय साथिओं को उठाकर दौड़ाने का हमारा ही कार्य है।   

कल वाले लेख में गुरुदेव ने समष्टिगत (Collective) साधना में भागीदारी करने की बात करते हुए कहा था कि जो कोई भी इन संकल्पों की पूर्ति कर सकेगा, वह सहज ही “युग अवतरण का श्रेय” भी प्राप्त करेगा तथा बड़भागी कहलायेगा ।

आज के लेख में साक्षात् परमपूज्य गुरुदेव एक वीडियो के माध्यम से “करिष्ये वचनं तव” अर्थात “करने” को न केवल कह रहे हैं बल्कि प्रार्थना कर रहे हैं, कितनी शर्म वाली बात है कि हमारा गुरु हमसे हमारी ही भलाई के लिए प्रार्थना कर रहा है। अगर प्रार्थना के बावजूद भी उनकी बात न सुनी जाये तो फिर क्या ही किया जाये। आज के लेख के साथ अटैच की गयी वीडियो एवं सात संकल्पों की सूची बहुचर्चित तो है लेकिन एक बार फिर से दोहरा लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 

तो आइये अर्थ सहित  शांतिपाठ करें और आज के लेख का शुभारम्भ करें : 

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए  

******************    

ये संकल्प इस प्रकार हैं:-

[1] गुरुदेव-माता जी को अपने घर अवश्य बुलायें:

माह में एक बार गुरुदेव-माता जी को अपने घर अवश्य बुलायें । यह कार्य अखण्ड ज्योति / युगशक्ति गायत्री आदि में से किसी पत्रिका की एक प्रति अपने यहाँ मँगाने से पूरा हो सकता है। गुरुसत्ता की प्राणचेतना से घनिष्ठता स्थापित करने के लिए यह श्रेष्ठतम माध्यम है । बन पड़े तो पांच अनुपाठक और तैयार करें तथा प्रत्येक से पाँच-पाँच साथी और बढ़ाने को कहें । युग ऋषि की लेखनी इक्कीसवीं सदी में भी सूक्ष्म व कारण शरीर के माध्यम से यथावत् चलती रहेगी। 

अखण्ड ज्योति को मात्र पत्रिका नहीं, उनकी प्रखर चिन्तन-चेतना का जीता-जागता स्वरूप मानें, जो सतयुग की आधारशिला रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रही है । पत्रिकाओं का पठन-पाठन ही परोक्ष रूप से उनके द्वारा दी गयी “ज्ञान दीक्षा” है ।

[2] युग साहित्य का विस्तार:

जन मानस के परिष्कार के लिए “युग साहित्य का विस्तार” अपने परिकर में झोला पुस्तकालय अथवा ज्ञानरथ [चल- देवालय ] द्वारा करें। लोगों की दुर्बुद्धि को ठीक करने का यही सबसे सशक्त माध्यम है । विचार क्रांति इसी से होगी । इक्कीसवीं सदी संबन्धी नूतन साहित्य जो इन्हीं दिनों लिखा गया है, स्वयं भी पढ़ें, न्यूनतम अपने मण्डल के पच्चीस साथियों को भी पढ़ायें । 

इसी पढ़ाने को, ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से लगातार प्रार्थना की जाती रहती है।  

स्मरण रखें कि विद्या विस्तार ही युग की सबसे बड़ी सेवा है । मनःस्थिति बदलने, लोगों की संकीर्ण स्वार्थपरता दूर करने के लिए “युग साहित्य” से श्रेष्ठ कोई माध्यम नहीं । अभी तक जितनी भी विश्वव्यापी क्रान्तियाँ हुई हैं, वे साहित्य के माध्यम से ही सम्पन्न हुई हैं। सद्विचारों का बीजारोपण किया जा सके, तो नवयुग के लिए महामानव तैयार किये जा सकेंगें ।

[3] समय का एक अंश नियमित रूप से निकालें: 

अपने समय एवं कमाई  का एक अंश नियमित रूप से निकालें एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन हेतु उनका नियोजन करें। प्रतिदिन 2  घण्टे या प्रति सप्ताह एक नियत समय युग चेतना के विस्तार हेतु तथा 20  पैसा प्रतिदिन या माह में एक दिन की आजीविका नवसृजन के कार्यक्रमों के निमित्त निकालें । 

यदि इतना बन सके, तो यह कहा जा सकेगा कि परिजनों में संवेदना-भावना जाग्रत है-जीवन्त है । निकाले गये समय का उपयोग जन-जन में “21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य” के प्रति आस्था जगाने में किया जाय। इसके लिए युग साहित्य, गोष्ठी, व्याख्यान, युग संगीत, दीपयज्ञ, जन्मदिन, तीर्थयात्राएं आदि किन्हीं भी विधाओं का उपयोग अपनी रुचि और सामर्थ्य के अनुसार किया जा सकता है । अंशदान द्वारा इनके लिए साधन जुटाये जाते रह सकते हैं । इस न्यूनतम सेवा साधना में निष्ठापूर्वक लगे रहने वाले, कम से कम एक लाख लोकसेवी तैयार करने का संकल्प है ।

[4] नवयुग को लाने की शपथ:

नवयुग को लाने की शपथ अगले दिनों दीपयज्ञ मालिका (Deep Yagya chain)  द्वारा की जानी है। इसके लिए इसी वर्ष एक लाख यज्ञों, देव- संगठनों के लिए एक करोड़ याजक तैयार किये जाने हैं। प्रथम महापूर्णाहुति तक तो यह संख्या करोड़ों-अरबों तक जा पहुँचेगी। इन याजकों को साथियों समेत तीन या पांच की मण्डली बनाकर इसी वर्ष शांतिकुंज  आने को कहा गया है, जहां उन्हें संक्षिप्त भावपूर्ण समारोह में “प्रतिनिधि दीक्षा” दी जायेगी, यज्ञ विधि, विस्तार से समझायी जायेगी तथा वंदनीया माता जी के हाथों प्रत्येक को अपने पाँच सहयोगियों के लिए कलावा, रोली, अक्षत, पुष्प प्रदान किये जायेंगे । इस प्रकार पाँच से पच्चीस तक बढ़ते-बढ़ते दीपयज्ञ आयोजनकर्त्ता अपने साथी सहयोगियों को भी इस पुण्य कार्य में सहभागी बना सकेंगे। सभी से कहा गया है कि याजक बनने के लिए  एक बार अपनी मण्डली लेकर शांतिकुंज  हो आयें तथा अपना पुरुषार्थ संजोकर अधिक से अधिक साथी, युग शक्ति के साझीदार तैयार कर लें ।

[5] साप्ताहिक सत्संग का आयोजन:

साप्ताहिक सत्संग का आयोजन नियत स्थान एवं नियत समय  पर करें।  यदि और कुछ न बन पाए, तो टेप के माध्यम से वंदनीया माता जी के साथ, सहगान-कीर्तन, परम पूज्य गुरुदेव के साथ चौबीस गायत्री मंत्र उच्चारित कर ऋषि चेतना से स्वयं  को जोड़ें। 

इन माध्यमों से युग ऋषि के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का पुण्य कमायें । आज के युग की यह महत्वपूर्ण सेवा है । यदि सप्ताह में एक बार भी मण्डल के सभी सदस्य बैठकर नूतन विचारों को सुनने, सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्यक्रम बनाने, नये परिजनों को साथ जोड़ने तथा परिवार के प्रमुखों के जन्म दिवस मनाने का उपक्रम चलाने लगें, तो साप्ताहिक सत्संग के बड़े प्रयोजन पूरे  कर सकते हैं, जो एक जागृत प्रज्ञा संस्थान कर सकता है ।

[6] आज के युग की तीर्थ यात्रा:

अपने मोहल्ले, समीपवर्ती स्थानों, अथवा कस्बों की प्रभातफेरी साइकिल यात्रा के माध्यम से सम्पन्न करें। यही इस युग की तीर्थ यात्रा है। घर-घर अलख जगाने हेतु संगीत प्रचार उपकरणों से सज्जित साइकिलों द्वारा सप्ताह में एक बार समूह सहित निकल सकें, तो नवयुग के आगमन का उद्घोष जन-जन तक पहुँच सकेगा । ” नया संसार बसाने नया इंसान बनाने” के लिए, अगले दिनों सारे भारत में एक लाख साइकिलों की तीर्थयात्रा सतत चलाते रहने का युग ऋषि का मन है । उन्हें आशा है उनका यह संकल्प अवश्य पूरा होगा । यदि भारत माता की आत्मा को जगाना है, तो गाँव-गाँव, घर-घर तक पहुँचने के लिए साइकिल यात्राओं की इस प्रक्रिया का ही प्रयोग करना होगा ।

[7] शांतिकुंज में बैटरी चार्ज:

महापूर्णाहुति तक एक या दो वर्ष में एक बार सिद्धपीठ शांतिकुंज  की तीर्थ चेतना से अनुप्राणित हो, शक्ति संचय, ‘बैटरी चार्ज’ कराने के लिए किसी एक सत्र में सम्मिलित होने का संकल्प लें । संभव हो तो अपना जन्मदिवस यहीं मनायें । 

स्मरण रखें गुरुदेव-माताजी की प्राण ऊर्जा इस तीर्थ परिकर में विशेषरूप से आगामी दस वर्ष तक और तदुपरांत एक शताब्दी तक घनीभूत रूप में विद्यमान रहेगी। वर्ष में एक बार आने से वह लाभ मिलता रहेगा, जो उनकी साधना में भागीदारी से किसी को मिल सकता है । पाँच दिवसीय सत्रों में परिजनों द्वारा उठाये जा रहे उत्तरदायित्वों के अनुरूप प्राण-अनुदान देकर, उन्हें समर्थ अग्रदूत के रूप में विकसित करने का सशक्त प्रयास किया जा रहा है। नैष्ठिक प्रतिभावानों को इस लाभ से वंचित नहीं रहना चाहिए ।

उपरोक्त सातों सूत्रों को वसंत पर्व  पर पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्मदिवस पर दिया गया विशेष उद्बोधन मानें तथा उनके दर्शन प्रत्यक्ष न हो पाने की स्थिति में भी, उनके सूक्ष्म शरीर तथा कारण शरीर की दिव्य चेतन ऊर्जा से सम्पर्क जोडने का प्रमुख माध्यम मानें। ध्यान रखें कि अभी तक महाकाल की शक्ति से किये गये सभी संकल्प पूर्ण होकर रहे हैं । अतः अपने को अर्जुन, हनुमान, शबरी, केवट की श्रेणी में रखते हुए, गिलहरी, रीछ वानर आदि निमित्त मात्र मानकर श्रेय अर्जित करने का यह सौभाग्य हाथ से न जाने दें ।

आज के ज्ञानप्रसाद लेख का यहीं पर समापन होता है, वसंत पंचमी और गुरुदेव से जुड़ा हुआ एक और लेख कल प्रस्तुत किया जायेगा। 

शतब्दी वर्ष में यदि पूज्य गुरुदेव,वंदनीय माता जी एवं अखंड दीप से सम्बंधित ज्ञान का अमृतपान होता रहे तो इससे बढ़कर सौभाग्य क्या हो सकता है। 

जय गुरुदेव, धन्यवाद् 


Leave a comment