वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 का चौथा लेख-“इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य” का उद्घोष

कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख में जिस Pamphlet का रेफरन्स दिया गया था, उसी आठ पन्नों पर आज और कल के दो लेख आधारित हैं। आज का  लेख उस जानकारी की और केंद्रित है जिससे प्रेरित होकर ही कल वाले लेख के सात संकल्पों को क्रियान्वत किया जा सकना सम्भव होगा। कल प्रकाशित होने वाले जिन सात संकल्पों की बात की जा रही है उनसे लगभग सभी साथी भलीभांति परिचित हैं, आवश्यकता है उन साथिओं को  प्रेरित एवं प्रोत्साहित करने की, जो आज/कल-आज/कल  करते हुए बहती गंगा में हाथ धोने से वंचित रह रहे हैं। पूज्य गुरुदेव की समष्टिगत (Collective) साधना में भागीदारी करने एवं उनके द्वारा बताये गए संकल्पों की पूर्ति करने वाला सहज ही “युग अवतरण का श्रेय” भी प्राप्त करेगा तथा बड़भागी भी कहलायेगा । 

आज के लेख में परमपूज्य गुरुदेव वर्ष 1990 को युगसंधि के बीजारोपण का वर्ष बता रहे हैं, लहलहाती फसल के लिए कौन से बीज बोने हैं, कौन सी खाद डालनी है,कैसा और  कितना पानी डालना है,इस  लेख में ऐसे सभी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर हैं। 

इंटरनेट पर युगसंधि सर्च करने पर परमपूज्य गुरुदेव की ही एंट्री सबसे पहले आती है। युगसंधि अर्थात दो युगों की संधि का अर्थ है बीसवीं (1900-1999) और इक्क्सवीं सदी (2000-2099) के मिलन के वर्ष। लेख के सन्दर्भ में गुरुदेव 1990 से 2010 के वर्षों की बात कर रहे हैं लेकिन उन्होंने 1970 से 2030 के वर्षों को भी युगसंधि कहा है। 

खैर आइये विश्वशांति की कामना करें और आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करें : 

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए          

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वसंत पर्व पर महाकाल का सन्देश 

1990 का वर्ष  युग संधि के बीजारोपण का वर्ष है। शिलान्यास हमेशा छोटे रूप में होता है लेकिन समय के साथ ही  देखते-देखते एक विशाल भवन बनकर खड़ा हो जाता है। इन दिनों युग संधि का जो स्वरूप छोटा दिखाई दे रहा है, वह अगले दिनों विशालकाय बोधिवृक्ष (एक ऐसा विशाल वृक्ष जो ज्ञान का बोध कराएगा) का रूप ले लेगा, इसमें किसी को कोई सन्देह नहीं होना चाहिए।

वर्ष 1990   का वसंत पर्व एक विशिष्ट पर्व है। अब से लेकर 2000  तक के दस वर्ष जोतने, बोने, उगाने, खाद-पानी डालने और रखवाली करने के हैं । जब भी अंतरिक्ष यान छोड़ा जाता है, उलटी गिनती चालू हो जाती है एवं 5,4,3,2,1,0  होते ही यान को छोड़े जाने का संकेत दे दिया जाता है। 

शांतिकुंज से, इस वसंत पर्व से “इक्कीसवीं सदी के आगमन” की उलटी गिनती अर्थात  “काउण्ट डाऊन ” प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है “इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य” का उद्घोष करने वाली सूत्र संचालक सत्ता ने, इसी वसंत से, संभावित उथल-पुथल से निपटने की तैयारी हेतु अपना प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का क्रम अब बन्द कर दिया है। ऋषिकल्प पूज्य गुरुदेव के जीवन रूपी दुर्लभ ब्रह्मकमल के 80 फूल पूरी तरह खिल चुके। संजीवनी बूटी के एक से एक शोभायमान पुष्पों के खिलते रहने का एक महत्वपूर्ण अध्याय पूरा हो चला। जो काम परोक्ष सत्ता द्वारा सौंपा गया था, जिस प्रयोजन के लिए भेजा गया था, वह उनके द्वारा क्रमबद्ध रूप से चलता रहा और दुलार बरसने वाले स्तर के साथ काम पूरा होता रहा। युग परिवर्तन का बीजारोपण कर दिया गया एवं खाद-पानी देने, संभाल आदि करने के लिए  समर्थ सहायकों का तंत्र भी जुटता चला गया, इसे ईश्वर की महती अनुकम्पा कहना चाहिए ।

सूत्र संचालक सत्ता के इस जीवन का प्रथम अध्याय पूरा हुआ। यह दृश्यमान स्वरूप था, जिसमें “जो बोया-सो काटा” की नीति अपनायी गयी। प्रत्यक्ष काया द्वारा, परोक्ष सत्ता के मार्गदर्शन में जो कुछ भी कर्तव्य बन पड़ा, वह सभी के सामने है। जो जानकारी परिजनों को विदित नहीं थी, उसे जान-बूझकर उजागर नहीं होने दिया गया; शालीनता की मर्यादा भी यही रही है। 

अब जीवन का दूसरा अध्याय आरंभ होता है। इसमें जो भी कुछ होना है, वह और भी अधिक महत्वपूर्ण मूल्यवान है। अध्यात्म विज्ञानी (Spiritual scientists) स्थूल के अतिरिक्त सूक्ष्म (Subtle) व कारण (Causal) शरीर की सत्ताओं का अस्तित्व बताते रहे हैं। अब इन्हीं दो शरीरों (सूक्ष्म और कारण)  का प्रयोग एक शताब्दी तक किया जाना है। यह कार्य 1990 के वसंत पर्व से आरंभ किया जा रहा है। यहाँ से लेकर वर्ष 2000 के वसंत पर्व तक की अवधि में पिछले  दो हजार वर्षों से जमी हुई गन्दगी बुहार कर साफ कर दी जायेगी एवं उज्ज्वल भविष्य की, नवयुग की आधारशिला रखी जायेगी। युगतीर्थ शांतिकुंज में यह आधारशिला निकट भविष्य में ही क्रियान्वित होती दिखेगी ।

पूज्य गुरुदेव का सूक्ष्म शरीर, भारत वर्ष के कोने-कोने और विदेशों में बसे भारतीय मूल के विशिष्टजनों के माध्यम से युग-संधि के स्वरूप को व्यापक बनाने में नियोजित होगा। युग चेतना के विस्तार की यह प्रक्रिया अगले दिनों “नवयुग के मत्स्यावतार” का रूप ले लेगी । इस प्रयोजन के निमित्त जिस उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधना की, रचनात्मक क्रिया-कलापों की आवश्यकता पड़ेगी, उनको समाज में, जन-जन में, कण-कण में, रोम-रोम में समायी सूक्ष्म सत्ता द्वारा, सूक्ष्म शरीर के माध्यम से ही सम्पन्न किया जायेगा। क्योंकि स्थूल शरीर इस प्रक्रिया में कोई साथ नहीं दे सकता, इसलिए उसका पहले ही त्याग हो चुका होगा। 

स्थूल शरीर के त्याग का  एक स्पष्ट कारण यह है कि स्थूल शरीर की विधि-व्यवस्था बनाने, परिजनों का इसके प्रति मोह होने से, दर्शन करने से, चमत्कार आदि  बने रहने से, जो ढेरों समय नष्ट हो जाता है, उसे बचाया जाना है। सूक्ष्म शरीर बिना किसी अड़चन के एक व्यापक क्षेत्र में दुर्तगति  से सक्रिय होता रह सकता है। इसी कारण प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का क्रम क्रमशः कम करते-करते, अब बन्द करने की स्थिति में लाने का निश्चय करना पड़ा । 

सूक्ष्म शरीर से भी बड़ी कारण शरीर की सत्ता है। उसका  कार्यक्षेत्र अति विशाल है । महाकाल की चेतना, सूक्ष्म शरीरधारी ऋषि सत्ताओं के द्वारा भूमण्डल के जिस बड़े क्षेत्र में सक्रीय हो सकती हैं, वह मात्र कारण शरीर के बलबूते ही संभव हो सकता है। अदृश्य जगत में जो अवांछनीयता घटित हो रही है एवं जिसकी प्रतिक्रिया दृश्य जगत में विभिन्न प्रकोपों-विभीषिकाओं के रूप में दृष्टिगोचर हो रही है, उसमें हस्तक्षेप करने की समर्था केवल कारण शरीर में है। 

हमारे साथिओं ने स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीर की डिटेल्ड  स्टडी की हुई है, फिर भी हम यहाँ पर हम, 20 अगस्त 2025 वाले लेख (तीन शरीर और पांच कोष) का रेफरन्स देना अनुचित नहीं समझते हैं https://aruntrikhadotorg.wordpress.com/wp-admin/post.php?post=13643&action=edit

इक्कीसवीं सदी में कई ऐसे प्रयास सम्पन्न करने पड़ेंगे, जो स्थूल एवं सूक्ष्म शरीरों को क्षमता से परे है । ब्राह्मी चेतना से जुड़ कर दिव्य कारण शरीर ही उन सब को क्रियान्वित करता है, जिन्हें प्रायः “अद्भुत एवं अलौकिक” कहा जाता है ।

इक्कीसवीं सदी (वर्ष 2000 से 2099 का समय) निश्चित ही उज्ज्वल संभावनाएं लेकर आ रही है। इस अवधि में ऐसे अद्भुत परिवर्तन होंगे,जिनका अनुमान लगा पाना बहुतों के लिए कठिन होगा। यह समझ पाना लगभग असंभव  होगा कि यह कैसे हो रहा है और इसे कौन कर रहा है। ऐसे असामान्य कार्य को करने के लिए ही सूत्र संचालक ने प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का क्रम बन्द कर, सूक्ष्म शरीर से सभी परिजनों से सम्पर्क बनाने एवं दिव्य कारण शरीर द्वारा परोक्ष स्तर पर हो रहे परिवर्तनों में भागीदारी करने का निर्णय लिया हैं। ऐसे में प्राणवान परिजनों पर विशिष्ट जिम्मेदारियाँ आती है ।

ज्ञानप्रसाद लेखों के माध्यम से ऐसे ही प्राणवान परिजनों की खोज की जा रही है, इन आत्माओं के मिलने की देरी है, एक बार मिल गयीं तो सूत्र सत्ता उनसे स्वयं ही असमान्य कार्य भी करवा ही लेंगीं, तब उनके मुख से केवल यही शब्द निकलेंगें “यह सब गुरुदेव ही करवा रहे हैं !!!”

भगवान सदैव अपना कार्य महामानवों, देवदूतों, देवमानवों से कराते रहे हैं । अगले दिनों मनुष्य शरीर में प्रतिभावान देवमानव प्रकट होने जा रहे हैं । देवमानवों की प्रकृति होती है कि वे अपने उपार्जन में से अपने लिए न्यूनतम खर्च करते हैं और शेष भाग  को परमार्थ प्रयोजनों के लिए लगा देते हैं । अपने समय की साधना, पुण्य-परमार्थ और धर्म की यही धारणा है ।

पूज्य गुरुदेव की समष्टिगत (Collective) साधना में भागीदारी करने का जिनका भी मन हो, वे न्यूनतम कार्यक्रम के रूप में इस बसंत पर्व से निम्न संकल्प तो कर ही लें। जो कोई भी इन संकल्पों की पूर्ति कर सकेगा, वह सहज ही “युग अवतरण का श्रेय” भी प्राप्त करेगा तथा बड़भागी कहलायेगा ।

इन संकल्पों को कल वाले लेख में प्रस्तुत किया जायेगा, आज यहीं पर मध्यांतर का आनंद लेते हैं। 

जय गुरुदेव, धन्यवाद्  


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