फ़रवरी 2014 की अखंड ज्योति में “दिव्य कक्षा से प्रकाश के अवतरण का वसंत” शीर्षक से प्रकाशित हुए लेख पर आधारित ज्ञानप्रसाद लेख का शेष भाग आज प्रस्तुत है। पाठकों को शीर्षक देख कर अवश्य ही जिज्ञासा हुई होगी कि गुरुदेव किस “दिव्य कक्षा” एवं उसके “प्रकाश” की बात कर रहे हैं। आज के लेख में इस दिव्य कक्षा में निवास कर रहे, गुरुदेव जैसे आध्यात्मिक गुरु, साधनायुक्त परिष्कृत महामानव,देवमानव एवं गिलहरी जैसे अनगनित शिष्यों के योगदान की चर्चा है जिनके सामूहिक प्रयास से युगनिर्माण होना सुनिश्चित है। गुरुदेव के अनुसार अब “करिष्ये वचनं तव” और श्रेय लेने का समय है। हर किसी का अपना-अपना देखने का दृष्टिकोण है,अपनी-अपनी दृष्टि है लेकिन युग परिवर्तन होता स्पष्ट दिख रहा है। पुराने खंडहर टूट रहे हैं,ध्वंस हो रहे हैं, नए भवन बन रहे हैं। जब गुरुदेव कह रहे हैं कि 2026 की वसंत पंचमी तक इसे बड़ा साफ-साफ अपनी खुली आँखों से देखा जा सकेगा, तो इसे देखने के लिए भी तो दृष्टि चाहिए।
ऐसे समय में हम जैसे शिष्यों के लिए गुरुदेव का एक ही निर्देश है:
अपने समय का एक भाग,अपने श्रम का एक भाग, अपने धन का एक भाग,अपनी बुद्धि का एक भाग हमारे युगनिर्माण कार्य के लिए दीजिये। कार्य तो सारा हमने कर ही लेना है,आपको केवल श्रेय ही लेना है।
इस स्वर्ण समय जो सोया रहेगा वोह उस सौभाग्य का भागीदार नहीं बन पाएगा जिसके लिए गुरुदेव आग्रह कर रहे हैं। हम भी अपनी समर्था के अनुसार सभी को गुरुकार्य में योगदान के लिए कहते रहते हैं।
आज के लेख का शुभारंभ वहीं से हो रहा है जहाँ हमने कल छोड़ा था।
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गुरुदेव ने जब कहा कि एक पतली सी डोर से चेतना को शरीर से जोड़कर रखूँगा । उसे भी किसी दिन तोड़ दूँगा तो शिष्य ने पूछा “तब फिर साधना कैसी ?”
उन्होंने कहा:
“इस बार की संपूर्ण साधना स्थूल शरीर से नहीं, सूक्ष्म शरीर से होगी। इसकी कक्षा भी धरती से ऊपर होगी। इसका आरंभ इसी 1990 के वसंत से हो जाएगा। कुछ समय तक पृष्ठभूमि का निर्माण व तैयारी, बाद में पूर्णतया सूक्ष्मशरीर से विशिष्ट साधना आरंभ होगी।”
पूछने पर गुरुदेव ने कहा,
” यह अवधि भी 24 वर्ष की होगी। इन चौबीस वर्षों में पुराने खंडहर टूटेंगे व नवसृजन की तैयारी आरंभ हो सकेगी।”
पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म साधना के 24 वर्ष:
1990 से 2014 तक 24 वर्ष ही पूर्ण हुए हैं ।उन्होंने कहा था:
“इन चौबीस वर्षों में चौबीस पुरश्चरण तो नहीं किए जाने, फिर भी बहुत कुछ विशेष किया जाना बाकी है। इन चौबीस वर्षों के बाद एक नए क्रम का आरंभ होगा।”
इस लेख का अमृतपान कर रहे पाठकों में से शायद ही किसी को स्मरण रहा होगा कि इन 24 वर्षों कैसे-कैसे परिवर्तन हुए लेकिन युगपरिवर्तन की भूमिका तो बनना आरम्भ हो गयी थी।
यह अवधि तोड़-फोड़ की थी। प्रत्यक्ष और परोक्ष जगत, दोनों में ही परिवर्तन देखे गए। प्रकृति और जनता, इन परिवर्तनों की प्रतक्ष्य माध्यम बनी, साक्षात् देखा गया कि जनता ने कैसे पर्यावरण का नाश किया,प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया,जहाँ पर कभी देव-शक्तियाँ वास करती थीं उनके निवासों पर मानव ने जा कब्ज़ा जमा लिया लेकिन प्रकृति कभी किसी को क्षमा नहीं करती, जल्द ही उसके रौद्ररूप दिखने लगे।
परोक्ष जगत की अदृश्य शक्तियों ने नकारात्मकता में कोई कसर नहीं छोड़ी, ऐसा तो होना ही था। अगर मनुष्य ही स्वयं को ईश्वर मानना शुरू कर दे तो परिणाम तो ऐसे ही होंगें जिन्हें आज का मानव देख रहा है। इन चौबीस वर्षों में प्रकृति किस कदर कहर ढाती रही है,मानव ने संपूर्ण विश्व में कैसे-कैसे उलट-फेर किए हैं, ये हम सबने देखा है। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा की गयी जिस साधना की चर्चा इन वाक्यों में की जा रही है उसका उद्देश्य अनियंत्रितता को कण्ट्रोल करना एवं सकारात्मकता बनाये रखना था।
पाठकों को बार-बार स्मरण करा रहे हैं कि वर्ष 1990 की वसंत से गुरुदेव ने एकांतवास ले लिया था और तभी से स्थिति में परिवर्तन आने वाले थे।
एकांतवास लेने के साथ ही गुरुदेव ने “वसंत पर्व पर महाकाल का संदेश” शीर्षक से एक पत्रक (Leaflet,pamphlet) भी लिखा था। मात्र आठ पन्नों के एवं 10 पैसे मूल्य के इस पत्रक को कल वाले लेख में जानने का प्रयास करेंगें
इसी वर्ष की गायत्री जयंती वाले दिन 2 जून 1990 को गुरुदेव ने अपने स्थूल शरीर का परित्याग किया था। 2014 की गायत्री जयंती को इसके भी चौबीस वर्ष पूरे हो गए थे।
गुरुदेव ने वर्ष 2014 के नए आरंभ के बारे में कहा था कि दिव्य कक्षा पर छाया अँधेरा हटेगा, साथ ही अँधेरे की गतिविधियाँ,उनकी क्रियाशीलता भी घटेगी। अँधेरे के हटने के प्रभाव से अपशक्तियाँ या नकारात्मक शक्तियाँ न केवल नियंत्रित होंगी, बल्कि उनकी विदाई का प्रारंभ भी होगा। यह प्रक्रिया भारतभूमि को केंद्र बनाकर विश्वव्यापी रूप ले लेगी। जैसे-जैसे यह प्रक्रिया पूरी होती जाएगी, वैसे-वैसे धरती पर नकारात्मक घटनाक्रम कम होते जाएँगे। प्रक्रिया पूर्ण होने पर दिव्य कक्षा से धरती पर प्रकाश के अवतरण का कार्य शुरू हो जाएगा ।
ध्वंस का समय समाप्त,सृजन का समय आरंभ :
इस सत्य को परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी अतिसरल भाषा में समझाते हुए कहा था कि जब कोई नया भवन बनाना होता है तो सबसे पहले वहाँ पर बने पुराने भवन को तोड़ने के लिए मज़दूर बुलाए जाते हैं। ये मज़दूर अपने स्वभाव व प्रकृति से अनगढ़ होते हैं। ये तो मात्र तोड़ने वाला हथौड़ा चलाना जानते हैं। इनकी तोड़-फोड़ जब पूरी हो जाती है तो फिर कुशल, Trained कारीगरों की बारी आती है जिनकी अपनी टीम होती है, जो बड़ी कुशलता से नए और भव्य भवन का निर्माण करती है।
गुरुदेव ने कहा था कि 2014 के वसंत पर्व से इन तोड़-फोड़ करने वाले अनगढ़ मजदूरों की विदाई होने वाली है क्योंकि इनका काम पूरा हो रहा है। अब जो कार्य होने वाला है, उसे प्रकाश की दिव्य कक्षा में रहने वाले लोग पूरा करेंगे।
कौन हैं प्रकाश की दिव्य कक्षा में रहने वाले लोग?
“प्रकाश की दिव्य कक्षा” (Divine class of light) में रहने वाले लोग वे आध्यात्मिक साधक, गुरु और उच्च चेतना वाले व्यक्ति होते हैं, जो भौतिक शरीर से ऊपर उठकर, चेतना को शरीर से मुक्त कर, दिव्य ज्ञान और शांति का अनुभव करते हैं, और जिन्हें अक्सर ‘परम सत्ता’ या ‘गुरुदेव’ के रूप में वर्णित किया जाता है, जो इस मार्ग पर चलने के लिए दूसरों का मार्गदर्शन करते हैं। भौतिकता से परे, चेतना के उच्च स्तर पर बैठे यह लोग, आध्यात्मिक यात्रा मेंअमरता के सागर में गोता लगाते हैं, ज्ञान का रस पीते हैं और संघर्षपूर्ण दुनिया में सुकून पाते हैं। गुरु और शिक्षक इसी केटेगरी में आते हैं जो अपने शिष्यों को दिव्य मार्ग पर चलने और जीवन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। आध्यात्मिकता से ओतप्रोत यह साधक (हमारे गुरुदेव) विशिष्ट साधनाएँ करते हैं, उन्हें ऐसे-ऐसे दिव्य अनुभव होते हैं, जो दूसरों को विस्मयकारी लगते हैं।
संक्षेप में कहा जा सकता है की आध्यात्मिक रूप से विकसित, गुरुदेव जैसे साधक, प्रकाश और ज्ञान के क्षेत्र में निवास करते हैं, और दूसरों को भी वहां तक पहुंचने में सहायता करते हैं।
इस विवरण को पढ़ रहे पाठक स्वयं अपना मूल्यांकन कर सकते हैं कि “विशेष दिव्य कक्षा” में हमारा स्थान कहाँ है।
गुरुदेव बता रहे हैं कि यह दिव्य कार्य, ऋषिमंडल व देवमंडल के द्वारा किया जाएगा। इसके सूत्र-संचालक स्वयं महेश्वर महाकाल होंगे। इन प्रकाशलोक की दिव्य आत्माओं के कार्य का माध्यम, शुभ,पवित्र एवं परिष्कृत आत्माएँ बनेगीं।
पुण्यकर्म करने वाले लोग ही धरती पर सृजनकार्य का श्रेय पाएँगे।
इस प्रसंग में पूज्य गुरुदेव ने एक बात यह भी कही थी कि प्रायः लोगों को यह शिकायत रहती है कि हमेशा अच्छे लोग ही कष्ट क्यों पाते हैं ? इसके उत्तर में गुरुदेव ने बताया कि अच्छे लोगों में हमेशा ही परिष्कार (Refinement) की चाहत रहती है, उनके लिए उत्कृष्टता की कसौटी “Sky is the limit” ही होती है। ऐसे लोगों में पवित्रता की चाहत बड़ी तीव्र होती है। ऐसी जीवात्माएँ अपने को महाकष्ट में डालकर भी अपने सभी दाग धो देना चाहती हैं, जनसामान्य के आगे Role model बनने को उत्सुक रहती हैं। जब इनके दाग धुल जाते हैं तो ये आत्माएं परिष्कृत हो जाती हैं।
ऐसी परिष्कृत दिव्य आत्माएँ ही बाद में महाकाल की महायोजना में भागीदार बनती हैं।
1990 से 2014 के चौबीस वर्षों में पूज्य गुरुदेव की साधना के प्रभाव से कई कार्य संपन्न हुए थे। इस अवधि में न केवल पुराने खंडहर टूटे बल्कि अनेक जीवात्माओं ने अपने दाग भी धोए हैं। अनेकों को परिष्कृत व पवित्र होने का अवसर मिला है। यह अवधि उनके लिए एक विलक्षण तप की रही है। अब इन परिष्कृत आत्माओं के श्रेय लेने का समय है, युगनिर्माण की प्रक्रिया में भागीदार बनने की बारी है।
गुरुदेव ने इसी सत्य की चर्चा करते हुए लिखा था कि नर-कीटक, नर-पशु, नर-पिशाच से ऐसे व्यक्ति गढ़े जाएँगे, जिन्हें महामानव, देवमानव कहा जा सके। इस अवधि में जो कर्ममुक्त हुए,अब उनके कर्म करने की बारी है। संक्षेप में श्रेष्ठ कर्म, सृजन कर्म करने के प्रारंभ का समय अब आ गया हैं। गुरुदेव बताते हैं कि 2014 के वसंत से यही नया कार्य आरंभ होने जा रहा है।
2014 का वसंत बड़ा ही विलक्षण व अद्भुत है:
वर्ष 2014 का वसंत कई अर्थों में विलक्षण व अद्भुत है। इस वर्ष का महत्त्व एवं मूल्य परमपूज्य गुरुदेव के अंग-अवयवों के लिए बहुत अधिक है। यह वर्ष निश्चित रूप से उज्ज्वल भविष्य के आगमन की घोषणा का वर्ष है। आने वाले तीन वर्षों में अँधियारे की विदाई सुनिश्चित है। इसी के साथ, दिव्य कक्षा के प्रकाश का धरती पर अवतरण सुनिश्चित है। जो मानव सत्व गुण से संपन्न व शुभवृत्तियों से युक्त होंगे, वही इसका माध्यम बनेंगे। जैसे-जैसे यह प्रकाश बढ़ता जाएगा, धरती पर क्रमिक रूप से सकारात्मक घटनाक्रम भी बढ़ते जाएँगे। प्रकाश का यह वेगपूर्ण अवतरण धरती की कक्षा से तमस् को हटाएगा, मिटाएगा । प्रकृति के तीन गुणों में जहाँ अभी “तम” की प्रधानता है वहीं इसके प्रभाव से “सत्त्व” की प्रधानता बढ़ेगी।
सत्त्व की इस प्रधानता के बढ़ने से शुभ बढ़ेगा और क्रमशः वे सभी घटनाएँ घटित होंगी,जिनकी चर्चा परमपूज्य गुरुदेव ने अखंड ज्योति जनवरी 1987 के 72 पन्नों वाले “कुंडलिनी विशेषांक” में लिखी थी। यह परिवर्तन क्रमिक यानि धीरे-धीरे होगा।
युगऋषि गुरुदेव के साधना शताब्दी वर्ष अर्थात 2026 की वसंत पंचमी तक इसे बड़ा साफ-साफ अपनी खुली आँखों से देखा जा सकेगा (एक बार फिर रिपीट करते हैं, आँखें खोलिये, परिवर्तन देखिये) गुरुदेव ने जो युग परिवर्तन के बीज बोए थे, उनकी फसल लहलहाती हुई दिखने लगेगी लेकिन उन बीजों में अंकुर इसी वसंत को फूटने को है।
इन अर्थों में वर्ष 2014 में नवयुग के आगमन का स्पष्ट संदेश मुखरित है।
बस, इसकी ध्वनि को सुनने और अपने कर्त्तव्य-निर्वहन में लगने की बारी हम सबकी है।
तो साथिओ आज के ज्ञानप्रसाद लेख का यहीं पर समापन होता है, कल एक और अद्भुत, दिव्य, ज्ञान से भरपूर लेख को रचने का प्रयास होगा।
जय गुरुदेव, धन्यवाद्
