फ़रवरी 2014 की अखंड ज्योति में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक “दिव्य कक्षा से प्रकाश के अवतरण का वसंत” था। गुरुदेव की अद्भुत साधना से 2014 से लेकर 2026 के 12 वर्षों में, न केवल पुराने खंडहर टूटे हैं, बल्कि अनेक जीवात्माओं ने अपने दाग भी धोए हैं। गुरुदेव ने लिखा है कि 2026 की वसंत से लहलहाती फसल दिखने लगेगी।
दो भागों में प्रकाशित होने वाले आज के पहले भाग में आध्यात्मिक विश्लेषण (Spiritual analysis) की बात की गयी है लेकिन ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ वसंत पंचमी,माँ सरस्वती एवं पीले रंग के बेसिक प्रश्न से किया गया है। समझने का प्रयास किया गया है इनके पीछे विज्ञान का क्या तर्क है।
शुरू करते हैं आज का ज्ञानप्रसाद:
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वसंत पंचमी का पावन पर्व हर वर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी वाले दिन मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन माँ सरस्वती का जन्म हुआ था।
पतझड़ ऋतु के बाद वसंत ऋतु का आगमन होता है। वसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा है कि ऋतुओं में मैं वसंत हूँ।
मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने मनुष्य की रचना की लेकिन अपनी इस सृजना से वे संतुष्ट नहीं हुए । उन्हें लगा कि कुछ कमी रह गई है क्योंकि चारों ओर मौन और नीरसता का वातावरण था ।
विष्णु जी से सलाह लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से पृथ्वी पर जल छिड़का। जैसे ही पृथ्वी पर जल के कण बिखरे, पृथ्वी में कंपन होने लगा और एक अद्भुत चतुर्भुजी सुंदर स्त्री के रूप में शक्ति का प्राकट्य हुआ। इस सुन्दर स्त्री के एक हाथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला थी। चौथा खाली हाथ वर की मुद्रा में था
ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा बजाना शुरू किया, समस्त संसार में एक मधुर ध्वनि फैल गई। उस वीणा की मधुर ध्वनि से संसार के जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। तब ब्रह्मा जी ने उस देवी को वाणी की देवी “सरस्वती” कहा। माँ सरस्वती को विद्या और बुद्धि की देवी कहा जाता है। माँ सरस्वती की उत्पत्ति वसंत पंचमी के दिन हुई थी, इसीलिए वसंत पंचमी के दिन माँ का जन्मदिन भी मनाया जाता है और विद्या, विवेक और बुद्धि का वरदान मांगा जाता है।
वीणा वादिनी माँ सरस्वती का वाहन “श्वेत हँस” विवेक का प्रतीक है। हँसवृत्ति,हँस जैसा विवेक जिसमें जल और दूध (क्षीर और नीर) को अलग करने की क्षमता है, माँ सरस्वती से जोड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि माँ सरस्वती की आराधना से मनुष्य विवेकशील बनता है, उसमें गलत और ठीक में चयन करने की क्षमता उजागर होती है।
वसंत के साथ पीला रंग जुड़ा हुआ है।
आइये देखें पीले रंग का वसंत के साथ क्या महत्व है।
अक्सर कहा गया है “आया वसंत पाला उडंत”, शरदऋतु के कठिन वातावरण के बाद जब मौसम हल्का-हल्का गर्म होने लगता है, वातावरण में यौवन आता है, पेड़ पौधे,पक्षी आदि सभी एक नवीन ऊर्जा को ग्रहण करते हैं तो पीला रंग शरीर और मन दोनों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
विज्ञान के अनुसार पीले रंग की तरंगें मानसिक शांति और शरीर की सक्रियता बनाए रखने में मदद करती हैं। पीला रंग ध्यान, अध्ययन और एकाग्रता के लिए लाभकारी माना जाता है।
हमारे परिवार, गायत्री परिवार के “ड्रेस कोड” का रंग भी पीला ही है। वैरागी द्वीप के आध्यात्मिक वातावरण में पीत वस्त्र से सुसज्जित नर-नारी जैसी छटा बिखेर रहे थे उसका वर्णन शब्दों में करना लगभग असंभव ही है।
तो साथिओ यह रहा वसंत से सम्बंधित जिज्ञासाओं का समाधान।
इस टॉपिक को यहीं पर छोड़ते हुए अखंड ज्योति 2014 के लेख की ओर बढ़ते हैं :
2014 फ़रवरी की अखंड ज्योति में “दिव्य कक्षा से प्रकाश के अवतरण का वसंत” शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ।
इस लेख का स्वाध्याय करके,एवं यथासम्भव एडिटिंग करते हुए, उसे पूरी तरह Self-explanatory बनाते हुए दो भाग में प्रकाशित होने वाले लेख का प्रथम भाग आज प्रस्तुत है।
हम सब जानते हैं कि समय-समय पर तरह-तरह के विश्लेषण किये जाते हैं, उन्हें सार्वजानिक किया जाता है,लोगों से राय मांगी जाती है, उनके क्रियान्वन के लिए Policies बनाई जाती हैं और सुनिश्चित किया जाता है कि बनाई गयी Policies ठीक तरीके से Apply हों,उनका सभी को लाभ मिले आदि आदि।
ज्योतिषीय विश्लेषण,राजनीतिक विश्लेषण, चुनावी विश्लेषण,आर्थिक विश्लेषण, मौसम विश्लेषण आदि कुछ एक विश्लेषण के उदाहरण हैं। प्रत्येक विश्लेषण का अपना बौद्धिक आधार है। इन पर तर्क किए जाते हैं, बहस साझा की जाती है। जब ज्योतिषीय विश्लेषण किया जाता है तो गणना का आधार ग्रहों की स्थिति,चाल आदि होती है। इस क्रम में नक्षत्रों की स्थिति व प्रभाव का भी विश्लेषण किया जाता है।
राजनीति व चुनावी विश्लेषण के लिए पार्टियों व उनके उम्मीदवारों का जनाधार, स्थानीय, प्रांतीय व राष्ट्रीय समीकरण आदि आधार बनते हैं। शेयर मार्केट, बाजारों की स्थिति, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्थिति की आवक-जावक आर्थिक विश्लेषण के कई यूनिट्स हैं। मौसम का विश्लेषण प्रकृति के पंचतत्त्वों व पर्यावरण को आधार बनाकर होता है। सभी प्रकार के विश्लेषण के अपने तर्क हैं, अपने बौद्धिक आधार हैं।
ऐसे में एक बड़ा ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि आध्यात्मिक विश्लेषण का आधार क्या है ?
तो उत्तर में यही कहा जा सकता है कि आध्यात्मिक विश्लेषण का आधार है : आध्यात्मिक दृष्टि, एक ऐसी दृष्टि जो केवल परमपूज्य गुरुदेव जैसे आध्यात्मिक महानुभावों,उच्चस्तरीय साधकों के पास ही होती है।
महान संत कबीर ने कहा है :
तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी । मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे ॥
अर्थात तुम कागज़ पर लिखी बात को सत्य कहते हो, तुम्हारे लिए वह सत्य है जो कागज़ पर लिखा है लेकिन मैं आंखों देखे को ही सच मानता हूँ और लिखता हूँ। कबीर पढे-लिखे तो नहीं थे लेकिन उनकी बातों में समाहित सच्चाई को आज तक सारा विश्व मान रहा है। वह कहते हैं: मैं सरलता से हर बात को सुलझाना चाहता हूँ लेकिन तुम उसे पुस्तकों और ग्रंथों में उलझा कर क्यों रख देते हो? जितने सरल बनोगे,उतना ही उलझन से दूर हो पाओगे !!!
इस दृष्टि से देखा जा सकता है, परिस्थितियों में घटित होने वाले घटनाक्रमों के कारणों को,घटनाक्रमों के पीछे सकारात्मक/नकारात्मक शक्तियों को,आध्यात्मिक दृष्टि से न केवल देखा और जाना जा सकता है, बल्कि प्रचंड आध्यात्मिक ऊर्जा से नियोजित व नियंत्रित भी किया जा सकता है।
अभी-अभी इसी मंच से समापन हुई, स्वामी विवेकानंद की 27अंकों की लेख श्रृंखला के अमृतपान से यह तथ्य तो पूर्णतया स्पष्ट दिख गया कि प्राचीन भारत के ऋषि, आचार्य, अलौकिक आध्यात्मिक सम्पदा के स्वामी थे/हैं। हमारे अपने गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का व्यक्तित्व ऐसा अलौकिक था/है जिसमें प्राचीन भारत के ऋषि, आचार्य व संतों का समावेशित स्वरूप झलकता था। समय-समय पर उन्होंने अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से जो कुछ देखा, अपनी अंतरंग वार्ताओं में कहा, वही इस आध्यात्मिक विश्लेषण (Spiritual analysis) का आधुनिक आधार हैं।
परमपूज्य गुरुदेव के साथ का वह वसंत:
आज 2026 में जब हम 12 वर्ष पुराने, 2014 वाले वसंत को देखते हैं तो पाते हैं कि वह कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण था। परिजन भूले न होंगे कि परमपूज्य गुरुदेव ने वर्ष 1990 की वसंत पंचमी को अपने गायत्री परिवार के सदस्यों से अंतिम भेंट करके एकांत ले लिया था। परमपूज्य गुरुदेव इस अंतिम वसंत की एवं उसके बाद के एकांत की चर्चा, वर्ष 1989 के सितंबर महीने से ही करने लगे थे। इस महीने व उसके बाद के महीनों में उनके शरीर में विचित्र से परिवर्तन आने लगे थे। कभी- कभी उनके शरीर की तेजस्विता अतिशय बढ़ जाती और कभी-कभी वह सामान्य सा लगने लगता। इसी क्रम में यदा-कदा उनका शरीर बहुत कड़ा हो जाता तो फिर थोड़ी देर बाद ठीक हो जाता। ऐसे और बहुत सारे परिवर्तन थे, जिनकी तार्किक व्याख्या तो संभव नहीं लेकिन देखने वालों को ये अतिविस्मयकारी अवश्य लगते थे।
एक बार जब उनसे उनके एक शिष्य ने इसके बारे में पूछा, “गुरुदेव ! आपके साथ यह सब क्या हो जाता है ?” तो उन्होंने कहा,
“बेटा! मैं एक अति विशेष साधना कर रहा हूँ।”
उनकी इस बात को सुनने वाले ने समझा कि साधना तो गुरुदेव का स्वभाव है। इस बार वे कुछ नया करने वाले होंगे, लेकिन उन्होंने स्वयं ही थोड़ी देर बाद कहा,
“मैं अपनी चेतना को धीरे-धीरे इस शरीर से मुक्त कर रहा हूँ । बस, एक पतली सी डोर से जोड़कर रखूँगा । उसे भी किसी दिन तोड़ दूँगा।”
बात ठीक-ठीक समझ में नहीं आई। समझाते हुए गुरुदेव ने कहा:
“अगर इस प्रक्रिया के बिना शरीर छोड़ना हुआ तो शरीर छोड़ने के बाद भी सप्ताहों, हो सकता है कई महीनों तक शरीर से प्रकाश निकलने का क्रम जारी रहे। महर्षि अरविंद के साथ हुआ था। उनके शरीर छोड़ने के बाद भी चार दिन तक लगातार उनका शरीर प्रकाशित रहा। ऐसी स्थिति में नाहक लोग चर्चा करेंगे, तमाशा बनेगा, इसीलिए यह प्रक्रिया पूरी की जा रही है, ताकि कोई बेवजह चर्चा या तमाशा न हो। “
महर्षि अरविन्द के 5 दिसंबर 1950 को महासमाधि लेने के बाद, उनके पार्थिव शरीर से 4 दिनों तक दिव्य अलौकिक प्रकाश निकलता रहा। शरीर में सड़न (decomposition) के कोई लक्षण नहीं थे और एक सुनहरी-लाल आभा (Golden-crimson hue) बनी रही। इस घटना के कारण, उनके शरीर को तुरंत नहीं, बल्कि 9 दिसंबर को समाधि दी गई, जो उनकी शारीरिक चेतना के अतिमानसिक (Supramental) रूपांतरण का प्रमाण मानी जाती है।
महर्षि अरविन्द की French-Indian शिष्या Mirra Alfassa जिन्हें हम सब माँ (The Mother) के नाम से जानते हैं, ने उल्लेख किया था कि अरविन्द ने अपनी संपूर्ण अतिमानसिक शक्ति शरीर छोड़ने के बाद, उनके शरीर में स्थानांतरित कर दी थी।
जब हमारे साथी महर्षि अरविन्द के बारे में यह पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं तो उन्हें हमारे मई 2021 के ज्ञानप्रसाद अवश्य स्मरण हो आये होंगें जिनमें परमपूज्य गुरुदेव की अरविन्द आश्रम पांडिचेरी की यात्रा का वर्णन था। दो भागों में प्रकाशित यह लेख अपनेआप जिस दिव्यता को प्रकट कर रहे थे उसे शब्दों में वर्णन करना लगभग असंभव है, सुनहरी मातृ मंदिर भी आँखों के आगे अवश्य ही घूम गया होगा।
उन दोनों लेखों के लिंक भी यहाँ दे रहे हैं :
कल दूसरा भाग प्रस्तुत होगा।
