23 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद-
आज 23 जनवरी 2026 शुक्रवार का दिन है, वसंत पंचमी का यह पावन दिन हर वर्ष हम सबके लिए एक अद्भुत दिव्य सन्देश लेकर आता है। इस वर्ष तो यह दिन और भी अधिक महत्व एवं दिव्यता लेकर आया है। एक साथ तीन महान शताब्दिओं का अवतरण होना अपनेआप में ही परम सौभाग्य का क्षण है। परमपूज्य गुरुदेव की साधना की शताब्दी, परम वंदनीय माता जी के अवतरण की शताब्दी एवं अखंड दीप के प्रकाट्य की शताब्दी, हम सभी के अंदर जिस ऊर्जा और उल्लास का अनुभव करा रही हैं उसका साक्षात् रूप शताब्दी नगर,वैरागी द्वीप कनखल में देखने को मिल रहा है। इस दिव्य नगरी में उमड़े जन सैलाब को देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सारा भारत क्या,विदेश ही इस पावन धरती पर उतर आया है। वैरागी द्वीप की दिव्यता हमारी शार्ट वीडियो में अभी कल ही प्रकाशित हुई थी।
हमारा ज्ञानरथ परिवार भी अनेकों समर्पित साथिओं द्वारा Represent हो रहा है, सभी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित आज का ज्ञानप्रसाद लेख, फ़रवरी 2002 की अखंड ज्योति में प्रकाशित लेख पर आधारित है।
हमारे साथी इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं कि अखंड ज्योति के हर वर्ष के जनवरी-फ़रवरी अंक में पूज्यवर के आध्यात्मिक जन्म दिवस (वसंत पंचमी) को समर्पित एक दिव्य लेख प्रकाशित होता है। हम यह इतना विश्वास से इसलिए कह रहे हैं कि अखंड ज्योति के 1940 के प्रथम अंक से लेकर लेटेस्ट, जनवरी 2026 के उपलब्ध एक-एक अंक के इन महीनों की हमने रिसर्च की है। हमारी इतनी अभिलाषा है कि इन 86 वर्षों के प्रत्येक अंक से 86 के 86 लेख ही गुरुचरणों में समर्पित कर दें लेकिन हमारी कहाँ चलती है, हमारी गाड़ी तो गुरुदेव ही चला रहे हैं,जैसा निर्देश मिलता है उसी के अनुसार आपके समक्ष उपस्थित हो जाते हैं। गुरुदेव ने कुछ एक अंकों का इस बार भी निर्देश दिया है।
यहाँ यह बताना भी अनुचित नहीं है कि रिसर्च का सहारा लेकर,साथिओं के सहयोग से, स्वयं के प्रयास से हमने 1940 से 2026 तक के,अखंड ज्योति के अधिकतर अंक अपनी वेबसाइट पर अपलोड किये हैं। Missing अंकों को अपलोड करने का प्रयास अनवरत जारी है,आशा है साथिओं के सहयोग से, गुरुवर की शक्ति से यह भी सम्भव हो जायेगा।
आज का ज्ञानप्रसाद लेख एक ऐसा लेख है जिससे हमें अपने गुरु के सही रूप को जानने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। गुरुदेव के विशाल साहित्य के माध्यम से हमें उनके बारे में कुछ-कुछ जानकारी तो अवश्य है लेकिन क्या गुरुदेव के बारे में उतना ही जानना पर्याप्त है ? बिल्कुल नहीं।
आज के लेख में 1986 की वसंत पंचमी के दिव्य मिलन का आँखों देखा हाल, एक चलचित्र की भांति वर्णित किया गया है। यह वोह दिव्य दिन था जिस दिन गुरुदेव ने कठिन सूक्ष्मीकरण साधना से बाहिर आकर परिजनों को दर्शन दिए थे और गायत्री परिवार द्वारा हर वर्ष मनाए जाने वाला वसंत पर्व केवल एक साधारण पर्व न रहकर “एक आध्यात्मिक पर्व” से परिभाषित हुआ। हम सब जानते हैं कि परम पूज्य गुरुदेव 1984 की रामनवमी से 1986 की वसंत पंचमी तक सूक्ष्मीकरण साधना में रहे थे।
वर्ष 1986 में, 60 वर्ष बाद परमपूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज परिसर में एकत्रित हुए अनेकों साधकों को उसी प्रकार अपनी शक्ति का आभास कराया जैसे उनके हिमालय से आये गुरु (दादागुरु) ने 1926 में आंवलखेड़ा की कोठरी में कराया था। अवश्य ही वहाँ बैठे हज़ारों शिष्यों में से, उन दिव्य दर्शनों की अनुभूति केवल उन्हीं को हुई होगी जिनकी पात्रता विकसित हो चुकी थी। पात्रता एवं श्रद्धा के बिना तो दुर्योधन ने भी भगवान को ग्वाला कह कर पुकारा था।
दिव्य दर्शनों के लिए दिव्य दृष्टि होना बहुत ही ज़रूरी है
साथिओं से करबद्ध निवेदन है कि जिस प्रकार हम एक-एक शब्द का चयन करके इस लेख को चलचित्र बनाने का प्रयास कर रहे हैं,उसी भावना एवं पात्रता से इस लेख में डूब जाने का प्रयास करें, फिर देखें,अनुभव करें कि हमारे गुरु की क्या शक्ति है, इस तरह से डूब जाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प है ही नहीं।
आइये हमारे साथ बैठ जाइए उस नाव में जो महासागर की गहराई में से अमूल्य रत्न खोज पाने की और अग्रसर है।
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वर्ष 1926 के पुण्य पर्व वसंत पंचमी के दिन हिमालयवासी सद्गुरु (दादागुरु) ने एक 15 वर्षीय किशोर को अपनी पहचान कराई। उन पुण्य क्षणों में गुरुता प्रकट हुई और शिष्यत्व सार्थक हुआ।
हालाँकि वसंत पर्व का महत्त्व बताने वाली अनेकों अन्य कथाएँ, अनेकों माध्यमों पर उपलब्ध, हैं, जिनमें से कुछ पुराणों में हैं, तो कुछ संस्कृत कवियों के कोश में। कई कथाएँ कही-सुनी बातों के रूप में भी प्रचलित हैं। सभी रचनाएँ अपनेआप ने उत्कृष्ट हैं, सभी में “आध्यात्मिक भाव” झरते हैं, सभी में आध्यात्मिक सरिता की वेगवती धारा उफनती है लेकिन वर्ष 1926 की वसंत पंचमी के ब्रह्ममुहूर्त को जो इतिहास कथा लिखी गई उसने आध्यात्मिक भावों का सैलाब ही ला दिया।
इस ऐतिहासिक कथा में सद्गुरु (दादागुरु) का प्रेम प्रकट होता है और शिष्य का अपने गुरु के लिए साक्षात् समर्पण दिखता है
साथ ही वसंत पंचमी के महत्त्व को दर्शाने वाली एक बहुत ही प्यारी और मीठी कथा इस महापर्व से जुड़ गई।
उस दिन से लेकर हर वर्ष प्रत्येक वसंत पंचमी को इस महान पर्व में नए से नए आयाम जुड़ते गए। एक-एक करके 60 वर्ष बीत गए और वर्ष 1986 की वसंत पंचमी का आगमन हुआ।
इस आगमन वेला की प्रतीक्षा असंख्य हृदयों को थी। सभी आशा और उल्लास के हिंडोले में डोल रहे थे। सभी को गुरुदेव के दर्शनों की आशा थी, अपने गुरुदेव के अमृत वचनों को सुनने का उल्लास था। लगभग दो वर्षों की प्यासी आँखें आज तृप्त होना चाहती थीं, यह बहुत ही विरल क्षण थे। दो वर्षों की सूक्ष्मीकरण साधना के बाद परम पूज्य गुरुदेव आज दर्शन देने वाले थे। 1986 का वर्ष शांतिकुंज के कण-कण में अनूठा उल्लास लिए था,उस में एक अनूठी उमंग थी। इस दिन जिन्होंने भी गुरुदेव को देखा है, वे जानते हैं और जिन्होंने सुना है, वे मात्र अनुमान लगा सकते हैं। जो इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं, वे उस घटना को अपनी मन की आँखों से निहार सकते हैं ।
नवागंतुक का अद्भुत स्वप्न :
उस वसंत पंचमी के कुछ दिनों पूर्व से ही समूचा वातावरण एक विशेष प्रकार की चेतना के स्पंदनों से Vibrate हो रहा था। जो ग्रहणशील थे, वे इन Vibrations को ग्रहण भी कर रहे थे।
ऐसे ही एक ग्रहणशील नवागंतुक ने उन्हीं दिनों एक ऐसा स्वप्न देखा जो बड़ा ही पुलकन भरा एवं मधुर था। स्वप्न में उसने देखा कि वह गुरुदेव के ऊपर वाले कमरे में गया हुआ है, कमरे में एक सोफा है, इसके बगल में गुरुदेव का पलँग है। गुरुदेव स्वयं सोफे पर बैठे हुए हैं। उसने गुरुदेव को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया, अपने साथ लाए हुए सुर्ख गलाब के फूल अपने दोनों हाथों से गुरुवर के चरणों में चढ़ाए। गुरुदेव ने एक नज़र उठाकर उसकी ओर देखा और गंभीरतापूर्वक बोले,
“तुम आ गए बेटा, तुम्हें मैंने ही बुलाया है। ठीक से रहना, मैं हमेशा तुम्हारा ध्यान रखूँगा। अच्छा अब जाओ।”
गुरु से आज्ञा पाकर जब वह वापस चलने लगा, तो गुरुदेव ने उसे एक बार फिर टोका और कहा,
“नीचे जाकर सबको बता देना कि मैं मिलूँगा, सबसे मिलूँगा । इतना ही नहीं, मैं सबको अपनी पहचान भी कराऊँगा। सबको बताऊँगा कि मैं कौन हूँ।”
इसी के साथ स्वप्न टूट गया लेकिन चिंतन की कड़ियाँ नहीं टूटीं। हमने इस आगंतुक का नाम,पता एवं अतिरिक्त जानकारी खोजने का प्रयास किया लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा। हो सकता है AWGP के किसी प्रकाशन में इसका विवरण उपलब्ध हो।
स्वप्न देखने वाले के मन में अनेकों विचार थे जैसे कि क्या गुरुदेव सचमुच मिलेंगे और वे कौन हैं। इस नवागंतुक ने जून 1984 एवं अप्रैल 1985 की अखण्ड ज्योति पढ़ रखी थी, जिसमें गुरुदेव की जीवन-कथा- वृत्तांत प्रकाशित हुआ था और उन्होंने अपने तीन जन्मों की कथा भी लिखी थी। अपने सद्गुरु (दादागुरु) से मिलन और स्वयं की जीवन-साधना के बारे में बताया था।
“तो क्या इस सब विवरण के इलावा भी गुरुदेव की कोई पहचान है ?”
ऐसे कईं प्रश्न नवागंतुक के मन को कुरेदते रहे। उसने शांतिकुंज के एक-दो वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं से अपने इस अजीबोगरीब स्वप्न की चर्चा भी की लेकिन उन्हें यही बताया गया कि गुरुदेव अभी साधना में हैं और उनका बाहर आने का कोई कार्यक्रम नहीं है ।
गुरुदेव का सूक्ष्मीकरण से बाहिर आना एवं अपने असली स्वरूप के दर्शन कराना :
1986 की वसंत पंचमी से दो-चार दिन पूर्व हल्के स्वरों में ही सही, शांतिकुंज में बात होने लगी कि कि गुरुदेव मिलेंगे,अवश्य मिलेंगे। एक दिन पहले से ही शांतिकुंज में भीड़ उमड़ने लगी थी। पक्की जानकारी तो किसी को नहीं थी लेकिन सभी अनजाने में ही एक आशा, एक विश्वास लेकर आ रहे थे कि उनके प्रभु उनसे मिलेंगे। वसंत पंचमी के दिन से पहली वाली रात्रि में जो परिजन शांतिकुंज आए थे, जो उपस्थित थे, उनमें से अधिकतर लोग सो नहीं सके थे। सभी परिजनों के हृदयों में उमड़ती उमंगों का सैलाब निद्रा को दूर भगा रहा था।वसंत पंचमी वाले दिन सुबह का यज्ञ भी अति शीघ्र सम्पन्न हुआ और सभी प्रवचन हाल में आ बैठे। यद्यपि उस दिन भीड़ इतनी थी कि सभी को बैठने की जगह सुलभ नहीं हो सकी फिर भी सभी उपस्थित थे और सभी सुखी थे। हों भी क्यों नहीं,
“जब मन में खुशी छलक रही हो तो तन की सुधि भला किसे रहती है।”
ठीक समय पर परमपूज्य गुरुदेव वंदनीय माताजी के साथ प्रवचन मंच पर आए। असंख्य जोड़ी आँखें दोनों पर टिक गईं। हमेशा अपनी चंचलता के लिए प्रसिद्ध मन आज अनायास ही स्थिर हो गया। यह भावदशा किसी एक की नहीं, एक साथ सभी की थी। सुदीर्घ और कठोर साधना के पश्चात् गुरुदेव पहली बार सर्वसाधारण के सामने पधारे थे। गुरुदेव के मुखमंडल से ही नहीं, बल्कि रोम-रोम से तप की ऊर्जा का प्रेरक प्रवाह बह रहा था एवं आनंददायी उपस्थिति से सभी परिजन स्वयं को धन्य और कृतकृत्य अनुभव कर रहे थे। गुरुदेव कुछ बोल रहे थे, कुछ कह रहे थे, लेकिन केवल शब्दों से नहीं बल्कि “प्राणों” से कह रहे थे।
प्राणों से कहने की बात कुछ ऊँचे स्तर के साधक ही समझ सकते हैं।
गुरुदेव जैसे महाप्राण व्यक्तित्व का तपप्राण बह रहा था और परिजनों की अनेकों मचलती हुई लघु प्राणधाराएँ उसमें विलीन हो रही थीं।
प्राण-प्रत्यावर्तन का यह संयोग बहुत ही अद्भुत और सुखद था।
गुरुदेव की वाणी में सद्गुरु का सजल वात्सल्य था लेकिन साथ ही महातपस्वी का प्रचंड प्रकाश, ओज एवं तेज़ भी था, गुरुदेव की वाणी में प्रेम के अमृत बिंदु थे, तो तप की धधकती ज्वालाएँ भी थीं। आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय किंतु सत्य तीनों एक साथ थे । एक पल गुरुदेव अपने विशाल शिष्य समुदाय को दुलारते, उन्हें अपनी सहायता का आश्वासन देते, तो दूसरे ही पल कालनेमि की कुटिल चालों पर बरस पड़ते। एक पल वह दुनिया के उज्ज्वल भविष्य की सुखद तस्वीर प्रस्तुत कर देते, तो अगले ही पल उनकी गर्जना सुनाई देती कि इन दिनों दुनिया को नष्ट कर देने के लिए जो स्टारवार की तैयारी हो रही है, मैं इस स्टारवार को पाँवों से मसलकर रख दूँगा। मैं चेलेंजर को धूल में मिला दूँगा।
“शैतान की ताकत से हज़ारों गुना बड़ी भगवान् की ताकत होती है ।”
दुरभिसंधियाँ (Wrong treaties) चलने नहीं दी जाएँगी। दुनिया को मिटाने का ख्वाब देखने वाले खुद मिटेंगे।
चैलेंजर एक बहुमुखी अमरीकी अंतरिक्ष यान था जिसका उपयोग नागरिक और सैन्य दोनों तरह के उद्देश्यों के करना था। 28 जनवरी 1986 को उड़ान भरने के मात्र 73 सेकंड के बाद ही यह नष्ट हो गया था और इसके सभी यात्री मारे गए थे। आज का लेख परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को ही समर्पित है, स्टार वॉर जैसे विषय को किसी और दिन के लिए पोस्टपोन करना उचित रहेगा।
“गुरुदेव की वाणी से दिया गया सन्देश किसी विद्वान् मनीषी के विचारों का ताना-बाना न होकर एक साधनासंपन्न ऋषि की उज्ज्वल दृष्टि थी।”
उनके हर शब्द में उनके महान् तप की अलौकिक प्रभा झलक रही थी।
इस वसंत पंचमी को गुरुदेव द्वारा इस तरह का अमृतकण और अग्नि स्फुल्लिंग एक साथ बरसते देख कर अनेकों साधकों को आश्चर्य तो हुआ ही होगा, अविश्वास भी हुआ होगा लेकिन था बिल्कुल शत प्रतिशत सत्य।
जिन मनिषिओं ने गुरुदेव का यह रूप देखा,उसे अखंड ज्योति के पन्नों में समाहित किया गया यह आँखों देखा हाल, चलचित्र ,सचमुच ही हम जैसे पाठकों के आभार के अधिकारी हैं। आज 2026 में 40 वर्ष बाद जिस दृश्य का आँखों देखा हाल वर्णन किया जा रहा है, उसे उस समय प्रतक्ष्य देखने वाले कितने सौभाग्यशाली होंगें।
प्रभुमूर्त गुरुदेव एक ही समय पर, एक साथ अनेकों रूप में,अनेकों को दिखाई देते रहे ,कोई पहचान न पाया कि उनके प्रभु का, उनके आराध्य का सच्चा और वास्तविक स्वरूप क्या है।
बात भी सही है, भगवत्स्वरूप की सही पहचान क्या इतनी आसान है। यह तो केवल और केवल भगवत्कृपा से ही संभव है ? तभी तो गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने रामचरितमानस में बिना किसी लाग-लपेट के कह दिया है,
“सो जानहि जेहि देहु जनाई” अर्थात् प्रभु को वही जान पाता है जिसे वोह खुद अपनी पहचान कराते हैं।
अगर हम यह कहें कि वर्ष 1986 की वसंत पंचमी, ठीक वही संयोग और वातावरण लेकर आई जो 1926 के समय आंवलखेड़ा की उस कोठरी में आया था तो शायद अतिश्योक्ति न हो। 60 वर्ष पूर्व के वही क्षण फिर से दृश्यमान हो गए। इतिहास ने गुरुकृपा की वैसी ही कथा फिर से लिख डाली। गुरुदेव ने शिष्य समुदाय के समक्ष अपनी पहचान प्रकट करते हुए कहा,
“बेटा! जिसने माताजी को देख लिया, उसने मुझे देख लिया और जिसने मुझे देख लिया, समझो उसने गायत्री माता को देख लिया।”
यह शब्द हमारे साथी अनेकों बार गुरुमुख से वीडियोस में सुन चुके हैं।
दादागुरु ने भी तो उस 15 वर्षीय बालक को कुछ इसी तरह मंत्रमुग्ध और निशब्द कर दिया था। उस बालक की ही भांति सभी साधक गुरुदेव को निहारते रहे,सुनते रहे।
बड़े ही सीधे सरल और सुस्पष्ट शब्दों में गुरुदेव ने अपने “शिष्यों को अपने स्वरूप का बोध करा दिया।” हाँ यह अलग बात है और पात्रता के स्तर पर निर्भर है कि किसे यह सत्य स्मरण रहा और किसने इस महासत्य को अपने जीवन की भूल-भुलैया में भुला दिया लेकिन साधकों का अनुभूतिपूर्ण सत्य यही है कि ईश्वरीय सत्ता ही हमारे अपने गुरुदेव के रूप में आई थी। उनकी उस अमर और अमिट वाणी के कुछ अंश तो थोड़े ही दिन पूर्व सच हो गए थे जब दुनिया भर के अखबारों ने चेलेंजर (स्पेस शटल) और स्टारवार के खत्म होने की खबर सुर्खियों में छापी थी।
गुरुदेव की वाणी शिव वाणी है। उन्होंने जो कुछ कहा, समय आने पर वह अवश्य सत्य सिद्ध हुई और होती रहेगी यदि हम इस शिव वाणी को समझ सकें, उन्होंने अपनी जो पहचान हमें बताई उस पर हम अपना ध्यान टिका सकें, तो 2026 की वसंत पंचमी हमारे लिए भी वैसी ही इतिहास-कथा लिख सकती है।
सोमवार को अखंड ज्योति से ही चुना हुआ एक ऐसा ही दिव्य लेख प्रस्तुत करने की योजना है।
जय गुरुदेव,धन्यवाद्
