22 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
जब से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का जन्म हुआ है,एक ही उद्देश्य को लेकर अनवरत चलते जा रहे हैं, अंतिम श्वास तक गुरु के इसी आदेश का पालन करते जायेंगें।
वह उद्देश्य है परम पूज्य गुरुदेव को जानना,उनकी शक्ति को पहचानना,अपने अंदर आत्मसात करना एवं उस शक्ति का अनुभव करना। अपनी अल्प योग्यता, अल्प शक्ति,अल्प सामर्थ्य एवं अल्प विवेक का यथासंभव प्रयोग करके,भांति-भांति के प्रयास करके साथिओं को उस उद्देश्य को ओर प्रेरित और प्रोत्साहित करते रहना ही हमारा परम उद्देश्य रहेगा।
आज किया गया प्रयास ऐसे स्तर का था कि न तो साहस बटोर पा रहे थे और न ही कोई मार्गदर्शन सूझ रहा था। केवल एक ही शक्ति कह रही थी “उठो,जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।
इसी शक्ति ने हमसे वोह करवा दिया जिसका हमें स्वयं ही विश्वास नहीं हो रहा।
तीन पुस्तकें,अनेकों वीडियोस,ऑनलाइन उपलब्ध डाटा, अपने साथिओं के कमैंट्स, 2 घंटे की मूवी,और न जाने क्या-क्या कुछ स्टडी करके, 25 (प्लस 2 पूर्वप्रकाशित) लेखों के विशाल कंटेंट का सारांश एक ही लेख में प्रस्तुत करना कोई सरल कार्य नहीं था। कठिन अवश्य था लेकिन असंभव नहीं, क्योंकि असंभव को संभव ही तो कराता है मेरा गुरु !!!! ऐसे गुरु को ह्रदय से साक्षात् नमन है, माँ सरस्वती से सदैव यही निवेदन करते हैं
“चलती रहे बस मेरी लेखनी,इतना योग्य बना देना”
हाँ तो साथिओ आज की इन पंक्तियों का उद्देश्य है कि स्वामी विवेकानंद जी पर आधारित लेख श्रृंखला के Main points एक Cheat sheet की भांति प्रस्तुत किये जाएँ ताकि सिस्टर निवेदिता,सिस्टर क्रिस्टीन,जमशेद जी टाटा, निकोला टेस्ला जैसे नाम हम सबकी Finger tips पर ठीक उसी तरह हों जैसे प्राइमरी कक्षा के बच्चे के लिए 18 और 18 के गुणनफल होते हैं।
सभी 27 लेखों को सरसरी निगाह से पढ़कर देखना,उनमें से उपदेशक एवं प्रेरणादायक कंटेंट को छांटकर साथिओं के समक्ष एक रोचक,सुंदर और चुंबकीय रूप में प्रस्तुत कर पाना स्वामीजी के प्रति एवं परम पूज्य गुरुदेव की सच्ची सेवा होगी। गुरुदेव ने 3000 से ऊपर पुस्तकों का विशाल साहित्य हमारे लिए रच कर रख दिया, हम कितनी पढ़ पाए, समझ पाए,स्मरण रख पाए,यह तो कहना कठिन होगा लेकिन उनके आध्यात्मिक जन्म दिवस (जिसके लिए हमारा प्रयास कल से शुरू हो रहा है) पर उन्हें “जानने” का प्रयास ही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी
तो साथिओ आइए देखें कि हम स्वामीजी का कितना कंटेंट स्मरण रख पाएं हैं। जो लोग लेख श्रृंखला के लेख मिस कर गए,जिन्हें कमैंट्स पढ़ने के लिए भी समय नहीं था,कम से कम इस प्रयास का ही सम्मान कर लें, जीवन में बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार एकमात्र ऐसा मंच है जहाँ हर कोई स्वेछा से “देने की प्रवृति” लेकर आता है न कि भिखारी बन कर मांगने की, यही इस परिवार की विशेषता है।
आइए अर्थ सहित शांतिपाठ करते हुए विश्वशांति की कामना करें :
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
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स्वामीजी का एकमात्र प्रश्न,”आपने भगवान् को देखा है?”,उन्हें जगह-जगह भटका रहा था, आखिरकार उन्हें इसका उत्तर राम कृष्ण परमहंस से ही मिला था।
परमहंस देव के समझाने पर जब युवा नरेन्द्र मंदिर के भीतर पहुँचे, उन्होंने देखा कि वास्तव में वहाँ अनंत प्रेम की वर्षा करती हुई माँ का चिन्मय स्वरूप उपस्थित है। भक्ति और प्रेम से उनका हृदय भर गया और बार-बार प्रणाम करके कहने लगे:
“माँ, विवेक दो, वैराग्य दो, भक्ति दो, और ऐसा करो जिससे नित्य तुम्हारा दर्शन होता रहे।”
उन्हें अपना सबकुछ भूल ही गया।
आदरणीय त्रिपाठी जी ने सुझाव दिया कि स्वामीजी की तीन अल्मोड़ा यात्राएं बहुत हो रोचक हैं उन पर लेख लिखा जाये। रिसर्च करने पर पता चला की स्वामीजी तीन नहीं पांच बार हिमालय गए थे। पहली यात्रा 1888 में एवं अंतिम यात्रा 1901 में कैप्टेन सेविएर के निधन पर सम्पन्न थी। साथिओं को हाथरस के स्टेशन मास्टर सदानंद के साथ की गयी प्रथम यात्रा का स्मरण अवश्य हो जाना चाहिए
श्रीरामकृष्ण के महाप्रयाण के बाद नरेन्द्रनाथ आदि युवाभक्त काशीपुर में एकत्र हुए थे जिन्हें श्रीरामकृष्ण ने त्यागमन्त्र में दीक्षित किया था। श्रीरामकृष्ण के जिन शिष्यों ने आगे चलकर संन्यास ग्रहण किया वे संख्या में “सोलह” थे।
“विवेकानन्द ने कहा था दरिद्र नारायणों के माध्यम से परमात्मा हमारी सेवा ग्रहण करना चाहते हैं। इसे कहते हैं सन्देश ! इस सन्देश ने स्वार्थबोध से परे मनुष्य के आत्मबोध को असीम मुक्ति का मार्ग दिखाया। यह किसी आचार-विशेष का उपदेश नहीं है। यह कोई व्यवहारोपयोगी संकीर्ण अनुशासन नहीं है। छुआछूत को रोक पाना इसमें अपनेआप ही आ जाता है इसलिए नहीं कि उसके द्वारा राष्ट्र के स्वतन्त्र होने का सुयोग है, बल्कि इसलिए कि उसके द्वारा मनुष्य का अपमान दूर होगा। वह अपमान हममें से प्रत्येक पर लांछन है।
“विवेकानन्द का यह सन्देश सम्पूर्ण मानवजाति के लिए मार्गदर्शक है और इसलिए वह हमारे युवकों को कर्म के माध्यम से मुक्ति के विभिन्न मार्गों की ओर प्रवृत्त कर रहा है।”
भारत की आम जनता की दुर्गति देखकर स्वामीजी का हृदय अत्यन्त दुःखित हो गया था। केवल भारत ही नहीं, सभी देशों की सभी जातियों के लिए उनके प्राण रोया करते थे। उनके विशाल हृदय में किसी प्रकार की भौगोलिक सीमा नहीं थी। उन्होंने कहा था:
“भगवान् को किधर ढूँढ़ते फिर रहे हो? क्या दीन,घृणित,अछूत तुम्हारे देवता नहीं हैं? पहले इन्हीं की पूजा क्यों नहीं करते? … वेदान्त की जन्मभूमि भारतवर्ष में साधारण जनता का युग-युग से अपमान होता आया है।अस्पर्शों का स्पर्श धर्म के विरुद्ध है, उनका संग अपवित्र है। निराशा के अन्धकार में उनका जन्म होता है, उसी में उनकी निरन्तर स्थिति है। याद रखो, निर्धन की कुटिया में ही भारतीय राष्ट्र बसता है। किन्तु हाय! उनके लिए अब तक किसी ने कुछ नहीं किया। अनादर सहते, भारत के उपेक्षित किसान, जुलाहे, चमार, झाडूदार आदि निम्न श्रेणी के लोग, उच्च श्रेणी द्वारा उत्पीड़ित हुए जा रहे हैं। तथा स्वदेश-वासियों की अवज्ञा के बावजूद वर्षों से चुपचाप रहकर अपना काम करते आ रहे हैं; इसके लिए उन्होंने कभी उपयुक्त वेतन तक नहीं पाया ।”
संतोष रजक जी की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार स्वामीजी के निम्नलिखित वाक्य सभी को याद रखने चाहियें:
“घर लौट आऊँ, कहाँ है घर ? मैं मुक्ति-मुक्ति की परवाह नहीं करता, बल्कि झरने की तरह दूसरों के सुख के लिये लाखों बार नरक जाने को भी तैयार हूँ। यही मेरा धर्म है, सत्य ही मेरा ईश्वर है, सारा ब्रह्माण्ड ही मेरा देश है। मेरे पास शिक्षा हेतु यही सत्य है कि मैं ईश्वर की सन्तान हूँ। मैं अपने जीवन का उद्देश्य जानता हूँ। मैं भारत का जितना हूँ, उतना ही विश्व का भी हूँ, इसमें पाखण्ड कुछ भी नहीं है। मेरा कार्य अन्तर्राष्ट्रीय है, केवल भारतीय नहीं ।”
खंडवा में स्वामीजी को विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण पत्र मिला था। जिस घर में स्वामीजी दो दिन के लिए रहे, जिस पलंग और सोये, जिस अलमारी का प्रयोग किया वहां के मेयर ने आज भी संजोकर रखे हैं और उसकी पूजा की जाती है।
25 अगस्त, 1893 को, बोस्टन में, विवेकानंद की पहली बार हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ग्रीक भाषा के अध्यापक Prof JH Wright से मुलाकात हुई। राइट विवेकानंद के गहन ज्ञान से हैरान थे और उन्होंने स्वामीजी को आगामी संसद में वक्ता के रूप में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। वह इतने आश्चर्यचकित थे कि उन्होंने विवेकानंद को अपने घर में अतिथि के रूप में रहने का निमंत्रण दिया। 25 से 27 अगस्त, 1893 तक, विवेकानंद राइट के घर, 8 आर्लिंगटन स्ट्रीट पर रहे। पहले ही दिन इन युवा संन्यासी के साथ चार घण्टे तक बातचीत करने के फलस्वरूप Prof Wright उनकी प्रतिभा से इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने स्वामीजी को धर्ममहासभा में प्रतिनिधि के रूप में प्रवेश दिलाने का भार अपने ऊपर ले लिया। जब विवेकानंद ने Prof Wright से कहा कि उनके पास संसद में भाग लेने के लिए कोई Letter of recommendation या प्रमाण पत्र नहीं है, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, “स्वामी, आपसे आपके प्रमाण पत्र मांगना ऐसे है जैसे सूरज से उसके चमकने के अधिकार के बारे में पूछना।” फिर राइट ने स्वयं धर्म संसद के अध्यक्ष को परिचय पत्र लिखा और उन्हें सुझाव दिया कि वे विवेकानंद को वक्ता के रूप में आमंत्रित करें और कहा कि “यहां एक व्यक्ति है जो हमारे सभी विद्वान प्रोफेसरों से कहीं अधिक ज्ञानी है।” राइट ने यह भी जाना कि विवेकानंद के पास रेलवे टिकट खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने उनके लिए भी रेलवे टिकट खरीद ली।
स्वामी जी के बारे में सिस्टर निवेदिता लिखती हैं:
“शिकागो-धर्ममहासभा में जब स्वामीजी ने अपना भाषण आरम्भ किया, तो उनका विषय था : हिन्दुओं के प्राचीन धार्मिक विचार लेकिन जब उनका भाषण समाप्त हुआ तो आधुनिक हिन्दूधर्म की सृष्टि हो चुकी थी। वहाँ उपस्थित सभी लोगों के भीतर सम्पूर्ण भारतवर्ष की भावधारा का महत्त्व आँकने की क्षमता मिली। भारत की धार्मिक चेतना ने स्वामीजी द्वारा पश्चिम में अपने आपको प्रकाशित किया।”
रोमाँ रोलाँ(Romain Rolland) ने इस जागरण की ओर इंगित करते हुए लिखा है:
“सर्वप्रथम यहीं से भारत की उन्नति शुरू हुई। उसी दिन से इस दीर्घकाय कुम्भ की नींद टूटने लगी। विवेकानन्द के निधन के तीन साल बाद नयी पीढ़ी ने जो आन्दोलन होते देखा, वह तथा वर्तमान भारत के संगठित जन-आन्दोलन विवेकानन्द के ही सशक्त आवाहन के फल हैं। स्वामी विवेकानन्द भारतीय जनजागरण के पुरोहित हैं, स्वाधीनता संग्राम के अग्रदूत हैं।”
अमेरिका के विख्यात दार्शनिक विलियम जेम्स और बाद में रूस के प्रसिद्ध मनीषी टॉल्स्टाय बड़े मुग्ध हुए थे।
लन्दन में रहते समय स्वामीजी की प्रोफेसर मैक्स मूलर से भेंट एक महत्त्वपूर्ण घटना है।
मैक्समूलर के आमन्त्रण पर स्वामीजी आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में जाकर वृद्ध प्रोफेसर से मिले। यह मिलन बड़ा ही हृदयस्पर्शी था। इस परिचय के फलस्वरूप मैक्समूलर श्रीरामकृष्ण के प्रति और भी आकृष्ट हुए और बाद में उन्होंने श्रीरामकृष्ण की जीवनी लिखी। रात में विदा लेकर स्वामीजी स्टेशन पर आये। वे ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे, उसी समय आँधी-पानी के बीच प्रोफेसर मूलर स्टेशन पर आ पहुँचे। स्वामीजी ने उन्हें देखकर संकोचपूर्वक कहा,
“ऐसे खराब मौसम में आपको इतना कष्ट उठाने की क्या जरूरत थी?” गद्गद कण्ठ से प्रोफेसर ने उत्तर दिया, “श्रीरामकृष्ण के सुयोग्य शिष्य से मिलने का सौभाग्य प्रतिदिन तो नहीं मिलता!”
स्वामीजी निरुत्तर हो गये। इन दो-चार मर्मस्पर्शी बातों ने ही स्वामीजी को अभिभूत कर दिया।
तो साथिओ ज्ञान के विश्व्यापी विशाल उपवन से चुने हुए कुछ अनमोल पुष्प,अवश्य ही इन पुष्पों की दिव्य सुगंध पाठकों के ह्रदय में सीधा उतर जाएगी,इसमें हमें रत्तीभर भी शंका नहीं है।
यूट्यूब में स्लाइड्स की अधिकतम सीमा का लाभ उठाते हुए अटैच किये गए चित्र हमें बाल्यकाल के बॉयोस्कोप का स्मरण करा सकते हैं जहाँ कभी हमने गली में साथिओं के साथ बॉलीवुड के सितारों के चित्र देखे थे।
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