21 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
आज का ज्ञानप्रसाद आरम्भ करने से पहले ही अपने साथिओं से आने वाले दिनों की रूपरेखा एवं परिवर्तन की बात करना आवश्यक समझ रहे हैं।
स्वामीजी पर आधारित लेख श्रृंखला का समापन होने के बाद भी मंदिर पर लेख देख कर प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं, तो हमारे प्रिय साथी निम्नलिखित पंक्तियाँ देख लें,खुद बखुद ही उत्तर मिल जायेगा;
कल वाले लेख में, समय एवं शब्द सीमा की बेड़ियों ने स्वामी विवेकानंद मंदिर के बारे में कुछ भी लिखने की आज्ञा नहीं दी। बेलुड़ मठ की वेबसाइट पर इस मंदिर के पोस्ट हुए HD चित्र किसी का भी मन तो मोह ही सकते हैं लेकिन मंदिर के निर्माण में सिस्टर निवेदिता, सिस्टर मैक्लेऑड,सिस्टर लेगेट के योगदान का गुणगान करना हमारा सौभाग्य है। इस सौभाग्य को साथिओं के समक्ष प्रस्तुत न करके,अकेले में लाभ प्राप्त करना,हमारे स्वार्थ को दर्शाता हो सकता था; इसलिए आज इस लेख का जन्म हुआ है।
कल गुरुवार को, एक और लेख का जन्म हो सकता है जिसे आज आउट करना अनुचित होगा। शनिवार वाला साथिओं के पुष्पों से संजो रहा गुलदस्ता इस बार शनिवार को न होकर,शुक्रवार को प्रकाशित हो रहा है क्योंकि 24 जनवरी को पूज्यवर का आध्यात्मिक जन्म दिवस है। हर वर्ष की भांति इस बार भी इस पावन अवसर को अपने सामर्थ्य के अनुसार अधिक से अधिक मनाकर,गुरुवर का आशीर्वाद प्राप्त करने की योजना है।
परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन ही है कि 1940 के प्रथम अंक से लेकर 2026 जनवरी तक की अधिकतर अखंड ज्योति पत्रिकाएं हमने अपनी वेबसाइट पर अपलोड की हुई हैं। अपने ही फ़ोन से हार्ड कॉपी का एक-एक पृष्ठ रिकॉर्ड करके,उसकी पीडीऍफ़ कॉपी बनाकर अपनी वेबसाइट पर अपलोड की हुई हैं, कार्य बहुत ही जटिल,एवं Time consuming तो है ही लेकिन गुरुकार्य तो गुरुकार्य ही है,उसके लिए कैसी कोताही ?
हमारे साथी जानते ही होंगें कि अखंड ज्योति में हर वर्ष की वसंत को समर्पित एक लेख प्रकाशित होता आ रहा है,हमने ऐसे अधिकतर लेख पढ़े हैं,सेव करके रखे हुए हैं,सभी लेख इतने दिव्य हैं कि सराहना करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। गुरुदेव के 2026 के आध्यात्मिक जन्म दिवस पर्व का शुभारम्भ (शनिवार से ) एक ऐसे ही लेख से हो रहा है।
तो साथिओ यही है आज के लेख की भूमिका और यहीं से विश्वशांति की कामना के साथ हम चलते हैं कोलकाता स्थित बेलुड़ मठ के स्वामी विवेकानंद मंदिर की दिव्य यात्रा पर :
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
****************
स्वामी विवेकानंद का निधन 4 जुलाई 1902 को कोलकाता स्थित बेलुड़ मठ में हुआ। आज उसी जगह पर उनके सम्मान में स्वामी विवेकानंद मंदिर स्थित है। इस दो मंज़िले मंदिर की ऊपरी मंज़िल में एक मंदिर है जिस में संगमरमर के ॐ को स्थापित किया गया है। ग्राउंड फ़्लोर में स्वामीजी का मंदिर है जिस पर स्वामीजी की संगमरमर की प्रतिमा है। मंदिर का फ़्लोर ज़मीन से नीचे है क्योंकि मंदिर बनने के समय ज़मीन का वह हिस्सा बहुत नीचा था।
यह मंदिर ठीक उसी स्थान पर स्थित है जहाँ स्वामीजी के पार्थिव शरीर को अग्नि को समर्पित किया गया था। यह जगह स्वामीजी ने स्वयं चुनी थी। उनकी बायोग्राफी में लिखा है:
शरीर त्याग करने से तीन दिन पहले, जब स्वामीजी, दोपहर में स्वामी प्रेमानंद के साथ मठ के बड़े लॉन में घूम रहे थे, तो उन्होंने गंगा के किनारे एक खास जगह की ओर इशारा कियाऔर अपने भाई-भिक्षु से गंभीरता से कहा:
“जब मैं शरीर छोड़ूँ, तो इसे वहीं जला देना!”
अजीब बात है कि धन की कमी के कारण स्वामीजी का मंदिर बनने में लगभग 21 वर्ष का समय लगा। धन के लिए भारत में ही नहीं, विदेशों में भी ज़ोरदार अपील की गई थी। स्वामीजी के शरीर त्यागने के लगभग पांच वर्ष बाद, निर्माणकार्य जनवरी 1907 में ही शुरू हो सका। धीमी गति से काम होने के कारण, जनवरी 1909 में, जब मंदिर का लगभग आधा निर्माण हो गया था, तब उनके जन्मदिवस पर एक बड़ी सी तस्वीर लगाई गई और उसे खूबसूरती से सजाया गया।
तीन वर्ष बाद जनवरी 1912 में, जब स्वामी ब्रह्मानंद ने देखा कि निर्माणकार्य ज़्यादा आगे नहीं बढ़ा रहा है, तो उन्होंने डांटते हुए और दर्द भरे लहजे में लिखा:
“स्वामीजी ने दस वर्ष पूर्व अपना शरीर त्याग दिया था। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि उनकी मृत्यु पूरे देश के लिए एक नुकसान है। लोगों ने इस बारे में अपना दुःख और चिंता ज़ाहिर की है। लेकिन क्या हम आज के भारत के इस देशभक्त संत के लिए अभी तक एक सही यादगार बना सकते हैं? यह शर्म की बात है और भारतीयों की बेकारी का पक्का सबूत है।”
लेकिन उनकी डांट पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
यहाँ यह बताना महत्वपूर्ण हो जाता है कि मंदिर में स्वामीजी की संगमरमर की प्रतिमा का कार्य,उनकी शिष्या सिस्टर निवेदिता के प्रयासों से ही संभव हो पाया। सिस्टर निवेदिता की सहयोगी मिसेज लेगेट की आर्थिक सहायता प्रदान की थी ।
पहले निर्णय लिया गया था कि स्वामीजी की एक छोटी प्रतिमा लगाई जाए। बढ़ते खर्चों की वजह से कोई भी बड़ी मूर्ति लगाने के बारे में सोच नहीं सकता था। लेकिन जब खुद मिसेज लेगेट ने मार्बल की एक बड़ी मूर्ति लगाने का सुझाव दिया, तो निवेदिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने लिखा कि वह साइज़ बहुत शानदार होगा! इससे विवेकानंद मंदिर और भी शानदार दिखेगा और आने वाले समय तक एक शानदार इवेंट बना रहेगा!
स्वामीजी की प्रतिमा जयपुर में बनाई गई थी। सिस्टर निवेदिता लिखती हैं:
“मूर्तिकार ने मार्बल के पत्थर के सामने एक छोटी सी पूजा की और चढ़ावे के साथ काम शुरू किया था। फिर उसने पत्थर में छिपे स्वामीजी से प्रार्थना की: स्वामीजी! कृपया मेरे हाथों में प्रकट हो जाइए! वह सुबह 8.00 बजे से शाम 7.30 बजे तक काम करते थे और केवल लंच के लिए ही ब्रेक लेते हैं । उन्होंने मुझे खबर भेजी कि अगर काम हमारी संतुष्टि के अनुसार पूरा नहीं हुआ, तो वे काम के लिए एक भी पैसा नहीं लेंगे।”
1913 में स्वामीजी की प्रतिमा का अनावरण हुआ और स्वामीजी की पूजा होने लगी। निर्माणकार्य फिर भी चलता रहा और 1923 के अंत तक ही पूरा हो सका।
शंकरीप्रसाद बसु लिखते हैं:
“इन 16 लंबे वर्षों में देश के अलग-अलग भागों में स्वामी विवेकानंद के सम्मान में कई मीटिंग हुईं और हज़ारों लोगों ने उनके नाम पर ‘जय-ध्वनि’ की। हज़ारों लोग बेलूर मठ गए और अधूरे मंदिर में उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया। हम इन लोगों की भक्ति पर शंका तो नहीं कर सकते लेकिन इतना ध्यान तो अवश्य ही रखना होगा कि हमारी भक्ति आलस्य से जुड़ी हुई है,जिसके कारण कुछ भी प्राप्त करने में बाधा पड़ती है।”
स्वामी विज्ञानानंद निर्माणकार्य देखते थे। काम शुरू होने से पहले, वे स्वामीजी के ख्यालों में डूबे रहते थे। वे लगातार स्वामीजी के बारे में बात करते थे और उनका ध्यान करते थे। उस समय वे इलाहाबाद में रामकृष्ण मठ में रहते थे। वे अक्सर पास के भारद्वाज आश्रम जाते थे और सप्तर्षियों (सात ऋषियों) की तस्वीरें देखते थे और उन्हें ध्यान से देखते रहते थे, क्योंकि श्री रामकृष्ण ने स्वामीजी को सप्तर्षिमंडल (सात ऋषियों का समूह) के सात ऋषियों में से एक के रूप में देखा था। उन्होंने अपने कमरे में सप्तर्षि-मंडल की एक ऑयल पेंटिंग भी रखी हुई थी। वे बार-बार कहते थे,
“स्वामीजी ब्रह्मांड में हर जगह मौजूद हैं लेकिन उनका निवास सप्तर्षि-मंडल ही है।”
जनवरी 1924 में स्वामीजी का मंदिर और ऊपर वाला ॐ मंदिर दोनों खोल दिए गए।
ॐ मंदिर तक जाने वाली सीढ़ियों से कई लोग इम्प्रेस नहीं हुए। अपने बेहतरीन टेस्ट के लिए जानी जाने वाली मिस मैकलियोड ने लिखा कि सीढ़ियाँ खड़ी, ऊँची और तंग थीं, स्वामीजी और मेरी सोच से बिल्कुल मेल नहीं खाती। वह सीढ़ीओं के बारे में इतना ही कह कर नहीं रुकीं, बल्कि उन्होंने सीढ़ियों को बेहतर बनाने का प्रयास भी किया। उन्होंने इटली के Villa d’ Este से, जो अपनी घुमावदार और सीढ़ियों के लिए प्रसिद्ध था,डिज़ाइन लिया,और सीढ़ियों में बदलाव किया।
श्री रामकृष्ण ने एक बार स्वामीजी को शिव और खुद को उनकी शक्ति कहा था। ऐसे उदाहरण हैं कि उनके कुछ भाई शिष्यों को स्वामीजी के भगवान शिव के रूप में दर्शन हुए थे। स्वामीजी के कमरे में जो अंडाकार क्रिस्टल दिखाया गया है, स्वामीजी को भगवान शिव के साथ सम्बंधित है। इस शिवलिंग को सिस्टर मैकलियोड का बनवाया था । स्वामीजी के मंदिर के शिखर पर नौ फुट का त्रिशूल है, जो भगवान शिव का प्रतीक है।1939 में मिस मैकलियोड ने त्रिशूल को सोने से मढ़वाया था।
विल्व वृक्ष:
ॐ मंदिर की ओर जाने वाली दाईं ओर की सीढ़ियों के पास एक विल्व वृक्ष है। उसी जगह पर असली विल्व वृक्ष था जिसके नीचे स्वामीजी बैठा करते थे। भगवान शिव को अर्पित किये जाने वाले विल्व और पत्ते इस वृक्ष के प्रोडक्ट हैं।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन
जय गुरुदेव

