20 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
नंबर 25 को “एंजेल नंबर” कहा जाता है क्योंकि यह डिजिट 2 (सामंजस्य और साझेदारी) और 5 (बदलाव और स्वतंत्रता) की ऊर्जाओं को जोड़ता है। यह नंबर अंदरूनी ज्ञान पर भरोसा करने की शिक्षा देता है। वर्तमान लेख श्रृंखला के समापन लेख का नंबर “25” होना अवश्य ही उन सभी ऊर्जाओं की ओर प्रेरित कर रहा है,जिसका यह प्रतीक है।
हिमालय से भी विशाल व्यक्तित्व,स्वामी विवेकानंद जिन्होंने केवल भारत में ही नहीं, सारे विश्व में भारतीयतता की पताका फहराई, समापन शब्द प्रयोग करना हमारा अल्पज्ञान,अयोग्यता ही हो सकती है।
ऐसी आत्माएं भौतिक शरीर त्यागने के बाद भी अपने साहित्य से मानवता का मार्गदर्शन करती रहती हैं। शत शत नमन करते हैं।
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वर्ष 1900 के 9 दिसम्बर की रात में ठीक डेढ़ वर्ष बाद, स्वामीजी जीर्ण देह और भग्न स्वास्थ्य लेकर बेलुड़ मठ में पहुँचे। 20 जून 1899 को अपनी दूसरी विदेश यात्रा के लिए रवाना हुए थे। मायावती आश्रम के संस्थापक कैप्टेन सेवियर के निधन का समाचार पाते ही श्रीमती सेवियर को इस असहनीय शोक में सान्त्वना देने हेतु वे मायावती जाने को तैयार हुए। गुरुभाई स्वामी सारदानन्द तथा शिष्य स्वामी सदानन्द को साथ लेकर भीषण ठंड,कोहरे, हिमपात के बीच 3 जनवरी को वे मायावती पहुँचे। उन्हें देखकर श्रीमती सेवियर को थोड़ा ढाढ़स बँधा। ब्रिटिश होने के बावजूद सेवियर दम्पति ने अपने हृदय का रक्त देकर भारत की सेवा की है। हिमालय के ध्यानमय वातावरण में स्वामीजी 15 दिन रहे।
बेलुड़ मठ लौटकर वे फिर अपने आदर्शों को मूर्त रूप देने में लग गये। भारत के सभी प्रान्तों से लोग उनसे मिलने आया करते थे। वे सभी को देश की सेवा में जीवन उत्सर्ग करने की प्रेरणा देते। उन्होंने कहा था: “इस बार का केन्द्र भारतवर्ष है ।”
बंगला देश की जनता के विशेष आग्रह पर स्वामीजी ने अपनी माताजी के साथ चन्द्रनाथ, लांगलबन्ध और कामाख्या आदि तीर्थों की यात्रा की। ढाका में उनका महान् स्वागत हुआ और वहाँ उन्होंने दो व्याख्यान दिये। आसाम के गोआलपाड़ा और गौहाटी होकर माँ कामाख्या के दर्शन को गये, गौहाटी में उन्होंने तीन व्याख्यान दिये। बाद में शिलांग में कुछ दिन रहकर और कुछ व्याख्यान देने के बाद मई में वे बेलुड़ मठ वापस आये। स्वामीजी का शरीर जीर्ण हो चुका था लेकिन जीवन की इस संध्या में उनका जीवन दिव्य माधुर्य से परिपूर्ण था।
ऐसा लग रहा था, विश्वविजयी, कर्मवीर, प्रसिद्ध वक्ता, देशभक्त विवेकानन्द मानो संसार से विदा ले रहे हों और मानवता के सभी कार्यों को पूर्ण करने की जल्दी में हों। स्वामीजी के मन में 20 वर्ष पुराने नरेन्द्रनाथ की छवि उजागर हो रही थी जो दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण के चरणों में बैठकर उनके उपदेश सुना करते, भजन गाया करते और उनके दिव्य प्रेम का रस्वादन किया करते थे। वे समझ गये थे कि मेरी लीला अब समाप्त हो चुकी है। इसीलिए वे धैर्य के साथ अन्तिम दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे। उस वर्ष स्वामीजी ने शास्त्रविधान के अनुसार प्रतिमा में दुर्गापूजा, लक्ष्मीपूजा और कालीपूजा करायी। माँ काली के दर्शन करने वे कालीघाट गये। स्वयं अद्वैतवादी होते हुए भी स्वामीजी ने शास्त्रविहित देवी-देवताओं की पूजा-उपासना को उचित महत्त्व प्रदान किया। मठ की जमीन में गरीब लोग कार्य कर रहे थे। एक दिन उन्हें पूड़ी-तरकारी, मिठाई, दही आदि के साथ तृप्तिपूर्वक भोजन कराने के बाद उन्होंने कहा:
“ये लोग नारायण हैं। आज मैंने साक्षात् नारायण को भोग दिया है।”
बाद में मठ के संन्यासी-ब्रह्मचारियों की ओर इशारा करते हुए कहा:
“आह! देश के दीन-दुःखियों की कोई नहीं सोचता है। जो राष्ट्र की रीढ़ हैं, जिनकी मेहनत से अनाज पैदा होता है,उनके प्रति सहानुभूति रखनेवाला, उनके दुःख में हिस्सा बँटानेवाला कोई नहीं है। देखो न, मद्रास में हिन्दुओं की सहानुभूति न पाकर हजारों अछूत इसाई बन रहे हैं। ऐसा मत सोचना कि वे पेट के लिए ईसाई बन रहे हैं। हम जो रात दिन उन्हें कह रहे हैं:मुझे मत छुओ,मत छुओ! अरे बाबा, देश में दयाधर्म जैसा कुछ बचा भी है यां सिर्फ छुआछूत-पन्थियों का दल । ऐसे आचार व्यवहार के मुँह पर झाडू मारो, लात मारो। इनके उठे बिना माँ नहीं जागेंगी।”
स्वामीजी के इस आह्वान का आज देश ने उत्तर दिया है। इनकी ही सूक्ष्म शिक्षा से आज, 2026 में स्थिति कितनी सुधर गयी है ,
मार्च का महीना ऐसे ही बीत गया। इहलोक में स्वामीजी के जीवन के सिर्फ 3 ही महीने बाकी थे। शय्याग्रस्त होने पर भी उनके मन में सदा भारत के पुनर्जागरण की चिन्ता लगी रहती थी। 11 जनवरी 1895 वाले दिन शिकागो से उन्होंने अपने एक मद्रासी शिष्य को लिखा था:
“मैं मृत्युपर्यन्त निरन्तर कार्य करता रहूँगा और मृत्यु के बाद भी संसार की भलाई के लिए कार्य करता रहूँगा।”
इस स्टेटमेंट का साक्षात् प्राकट्य ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के प्रत्येक उस पाठक ने अनुभव किया जिसने वर्तमान लेख श्रृंखला के लेखों को एक नन्हें शिशु की भांति पढ़ा जो आरम्भिक विद्या ग्रहण करने में उत्सुक होता है।
स्वामीजी, जगत् की भलाई के लिए जो विचार छोड़ गये हैं। वे निश्चय ही कार्य रूप में परिणत होंगे। भावी पीढ़ियाँ, स्वामीजी द्वारा आरम्भ किये हुए कार्यों को पूरा करने का भार ग्रहण करेंगी। शरीर छोड़ने के बाद भी स्वामीजी की लाखों/करोड़ों अदृश्य भुजाएँ अनगनित प्राणों में प्रेरणा के दीप जला रही हैं ,ठीक इसी तरह हमारे गुरुदेव का विचार क्रांति अभियान कार्यरत है। इस क्रांति का साक्षात् रूप वैरागी द्वीप में एकत्रित जन समूह से देखा जा सकता है।
यद्यपि स्वामीजी महाप्रस्थान की तैयारी कर रहे थे, फिर भी अपने गुरु की भांति किसी भी याचक को निराश नहीं करते थे। वे कहते थे:
“यदि अपने देशवासियों की आत्मा को जगाने में मुझे सैकड़ों बार मृत्यु की यातना सहन करनी पड़े, तो भी मैं पीछे नहीं हटूंगा।”
धीरे-धीरे स्वामीजी सांसारिक बंधनों के प्रति उदासीन होने लगे। कभी-कभी तो वे अति गम्भीर ध्यान में मग्न हो जाते। काम धाम के सम्बन्ध में उनकी सलाह माँगने पर वे कहते:
“इन सब बातों में मैं अब और सिर नहीं खपाऊँगा।”
उनका अन्तर्मुखी भाव देखकर गुरुभाइयों को शंका हुई। उन्हें श्रीरामकृष्ण जी की वह उक्ति स्मरण हो आयी जब उन्होंने कहा था: “नरेन्द्र जब अपना वास्तविक स्वरूप जान लेगा तो फिर इस देह को नहीं रखेगा ”
एक दिन एक गुरुभाई पूछ ही बैठे,“स्वामीजी ! क्या आप जान गए हैं कि आप कौन हैं?” स्वामीजी ने तुरन्त ही गम्भीर स्वर में उत्तर दिया, “हाँ, जान गया हूँ ,जिस अनुभूति के द्वार पर श्रीरामकृष्णदेव ने ताला लगा दिया था, उसे खोलने का अब समय आ गया है, देख उन्होंने खोल दिया है।”
देह त्यागने के एक सप्ताह पूर्व उन्होंने अपने एक सेवक को पंचांग लाने का आदेश दिया और स्वयं ही उसे देखकर अपने महाप्रस्थान का दिन निश्चित किया। जिस पुस्तक को आधार बनाकर यह लेख श्रृंखला का संकलन हुआ है, इसमें दो स्थानों पर वर्णन है कि सदाशिव अमरनाथ ने स्वामीजी को इच्छामृत्यु का वरदान दिया था।
देहत्याग के तीन दिन पहले सायंकाल मठ-प्रांगण में टहलते एक स्थान की ओर (जहाँ बाद में उनका समाधि-मन्दिर बना) दिखाते हुए, उन्होंने अपने एक शिष्य से कहा था:
“मेरा देहान्त होने पर वहाँ अन्तिम संस्कार करना।”
4 जुलाई 1902,शुक्रवार को वे खूब तड़के उठे। लगभग 8:00 बजे श्रीठाकुर के मन्दिर में गये और अन्दर से दरवाजे-खिड़कियाँ सब बन्द करके ध्यान में बैठे। 11:00 बजे तक वे गम्भीर ध्यान में मग्न रहे। उन्हें इतनी देरी तक ध्यान करते देख उनके गुरुभाइयों को बड़ी चिन्ता हुई। मन्दिर से लौटकर वे माँ-काली का एक भजन गाते हुए बरामदे में टहलने लगे। स्वामी प्रेमानन्द पास में ही थे। उन्होंने सुना स्वामीजी कह रहे हैं:
“यदि एक और विवेकानन्द होता, तो समझ पाता कि विवेकानन्द क्या कर गया है!”
सुनकर प्रेमानन्दजी चिन्तित हो गये लेकिन स्वामीजी का गम्भीर भाव देखकर उन्हें कुछ पूछने का साहस ही नहीं हुआ।
दोपहर में भोजन और थोड़ा-सा विश्राम करने के बाद 1:00 बजे से उन्होंने ब्रह्मचारियों को लगातार तीन घण्टे तक संस्कृत-व्याकरण पढ़ाया। शाम को स्वामी प्रेमानन्द के साथ बेलुड़ बाज़ार तक घूम आये। रास्ते में वेद-विद्यालय की स्थापना के बारे में बहुत-सी बातें हुईं। अँधेरा होने से पहले ही वे मठ लौट आये। मन्दिर में आरती का घण्टा बजने पर स्वामीजी दूसरी मंजिल पर अपने कमरे में जाकर गंगा की ओर निहारते खड़े हो गये। सामने गंगा के उस पार काशीपुर का वही श्मशान घाट दिख रहा था जहाँ पर श्रीरामकृष्णदेव का अंतिम संस्कार किया गया था। सेवक ब्रह्मचारी को बाहर बैठकर जप करने का आदेश देकर वे स्वयं पूर्व की ओर मुख करके ध्यान में बैठ गए । उनकी दृष्टि स्थिर थी, दोनों भौंहों के बीच और मुखमण्डल पर स्वर्णिम ज्योति विराज रही थी। रात 9:10 पर उनका मन महासमाधि के द्वारा आत्मस्वरूप में लीन हो गया।
दूसरे दिन शोभायात्रा के साथ उनकी पार्थिव देह को बेलुड़ मठ के ही दक्षिण-पूर्वी किनारे पर अवस्थित बिल्व वृक्ष के पास लाया गया और गंगातट पर उन्हीं के द्वारा निर्दिष्ट स्थान पर चन्दन आदि काष्ठ से चिता सजायी गयी। वेदपाठ और स्तवन-वन्दना आदि के बीच उनकी अन्त्येष्टि-क्रिया समाप्त हुई।
स्वामी विवेकानन्द की आत्मा, देह-पिंजर से मुक्त होकर असीम में विलीन हो गयी लेकिन वोह जगत् के लिए वेदांत का अमोघ-सन्देश और विश्व-भ्रातृत्व का सन्देश छोड़ गए हैं।
स्वामीजी न केवल बंगाल के थे, न केवल भारतवर्ष के, वे समग्र जगत् के थे। सर्वस्वत्यागी संन्यासी होने पर भी उनके हृदय में जिस स्वदेश- प्रेम एवं विश्वमैत्री का विकास हुआ था वह अभूतपूर्व था। वे विराट् के पुजारी थे। उनके ईश्वर किसी मन्दिर, विशेष में प्रतिष्ठित नहीं थे, वे प्रत्येक मानव के हृदय-मन्दिर में निवास करते। देशभक्ति, मानवसेवा और ईश्वर-आराधना, तीनों उनकी दृष्टि में समान थे। भारतवर्ष की सामूहिक भलाई के लिए उन्होंने कहा था:
“अगले पचास वर्षों के लिए देश की सेवा ही तुम्हारी साधना हो, राष्ट्रदेवता ही तुम्हारे एकमात्र आराध्य हो।”
स्वामीजी की इस वाणी के भीतर निहित था देशप्रेम और राष्ट्रीयता का बीज; इसीलिए तो इस आह्वान का महान् फल हुआ। देशसेवा का यह महामन्त्र, हजारों प्राणों में संचरित होकर राष्ट्रीय जागरण के विविध क्षेत्रों में स्फुरित हुआ है। उसी के फलस्वरूप 50 वर्ष के भीतर ही भारतवर्ष ने अपनी राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त कर ली।
भारत के लिए उनका सन्देश है:
“हे भारत ! मत भूलना कि तुम्हारी नारी-जाति का आदर्श है सीता, सावित्री, दमयन्ती; मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य सर्वत्यागी उमानाथ शंकर है; मत भूलना कि तुम्हारा विवाह, तुम्हारा धन, तुम्हारा जीवन इन्द्रियसुख के लिए, अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है; मत भूलना कि तुम आजन्म ‘माता’ के लिए बलिस्वरूप रखे हुए हो; मत भूलना कि नीच, अज्ञानी, दरिद्र, चमार और मेहतर तुम्हारे रक्त, तुम्हारे भाई हैं। हे वीर! साहस का अवलम्बन करो, गर्व के साथ कहो: मैं भारतवासी हूँ, भारतवासी मेरे भाई हैं, ब्राह्मण-भारतवासी, चाण्डाल-भारतवासी सभी मेरे भाई हैं; भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देवी-देवता मेरे भगवान हैं, भारत का समाज मेरे बचपन का बिछौना, मेरे यौवन का उपवन और मेरे बुढ़ापे की वाराणसी है, बोलो भाई, भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है, भारत का कल्याण मेरा कल्याण है; और रात-दिन कहते रहो: हे गौरीनाथ! हे जगदम्बे! मुझे मनुष्यत्व दो माँ! मुझे मनुष्य बना दो।”
इसी दिव्य सन्देश के साथ आज के लेख का समापन तो हो गया है लेकिन हम इसे Work in progress ही कहेंगें, एक ऐसा कार्य जिसका कोई अंत नहीं है।
जय गुरुदेव



