19 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
16 जनवरी वाले लेख में स्वामी विवेकानंद जी की शिष्या सिस्टर क्रिस्टीन की श्रद्धा का संक्षिप्त वर्णन दिया गया था,बताया गया था कि कैसे दोनों सहेलियां आंधी-तूफ़ान का सामना करते हुए न्यूयॉर्क स्थित 1000 Islands पार्क में पंहुचीं थीं जहाँ स्वामीजी ने सात सप्ताह व्यतीत किये थे।
इस समर्पित शिष्या का सम्मान करते हुए प्रवाजिका व्रजपाना ने 134 पन्नों की पुस्तक प्रकाशित की है जो Exotic India पर उपलब्ध है। इस पुस्तक के 2018 वाले एडिशन का लिंक एवं स्क्रीनशॉट इस लेख के साथ अटैच किये हैं।
विवेकानन्द शिष्या भगिनी क्रिस्टीन – Student of Vivekananda – Sister Christine | Exotic India Art
64 वर्षीय सिस्टर क्रिस्टीन जैसी समर्पित साधिका के जीवन का वर्णन एक सक्षिप्त से लेख में समा पाना कठिन तो बहुत है लेकिन असंभव नहीं है,आज के लेख में हमने यही प्रयास किया है। साथिओं के कमैंट्स से हमें आभास हो जायेगा कि हम इस प्रयास में कहाँ पँहुच पाए।
आज के ही लेख में वैरागी द्वीप में हो रहे शताब्दी समारोह का टाइम टेबल दिया गया जिसमें अलग-अलग गतिविधिओं के समय,तिथियां और यूट्यूब लिंक्स दिए गए हैं। लाइव होने के कारण यह लिंक्स Clickable नहीं हैं,केवल कुछ एक ही कॉपी/पेस्ट करके देखे जा सकते हैं। हमें विश्वास है कि यह सारी जानकारी शांतिकुंज की वेबसाइट पर उपलब्ध है लेकिन फिर भी हम यहाँ शेयर करके गिलहरी जैसा योगदान करना अपना कर्तव्य समझते हैं।
तो आइये शांतिपाठ का अर्थ समझें,शांति की कामना करें और आज के लेख का अमृतपान करें:
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
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सिस्टर क्रिस्टीन का जन्म 17 अगस्त 1866 को नूर्नबर्ग, जर्मनी में हुआ था। उनकी पाँच छोटी बहनें थीं। जब क्रिस्टीन तीन साल की थीं, तब उनका परिवार USA चला गया और Detroit, Michigan में बस गया। जब उनके पिता की मृत्यु हुई तब वह 17 वर्ष की थीं, वह परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य बन गईं और 1883 में डेट्रॉइट में ही सरकारी शिक्षक के रूप में नौकरी प्राप्त की।
1894 में, क्रिस्टीन अपनी दोस्त मैरी फुनके के साथ डेट्रॉइट में स्वामी विवेकानंद की एक लेक्चर में सीरीज़ में शामिल हुईं । स्वामी विवेकानंद छह हफ़्ते के लिए डेट्रॉइट में थे; उन्होंने वहाँ कई लेक्चर दिए। 24 फरवरी 1894 को, क्रिस्टीन ने विवेकानंद का एक लेक्चर सुना। वह विवेकानंद से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने उनके कई और लेक्चर सुने और उनकी प्रशंसक और शिष्या बन गईं।
स्वामीजी के पहले लेक्चर का अनुभव क्रिस्टीन ने निम्नलिखित शब्दों में बताया:
मैंने कभी ऐसी आवाज़ नहीं सुनी, इतनी लचीली, इतनी सुरीली। यह मेरे लिए भगवान की आवाज़ थी! भावनाओं की वह रेंज, ऐसा चांदी जैसा संगीत, मैंने कभी किसी और से नहीं सुना। यह शुद्ध संगीत था…यह मन था जिसने पहली बड़ी अपील की, वह अद्भुत मन! कोई ऐसा क्या कह सकता है जिससे उसकी शान, उसकी शान का हल्का सा भी अंदाज़ा हो सके? यह एक ऐसा दिमाग था जो दूसरे दिमागों से कहीं दूर आगे था, यहाँ तक कि उन लोगों के दिमाग से भी जो जीनियस माने जाते थे।इसके विचार इतने साफ़, इतने ताकतवर, इतने पारलौकिक थे कि यह यकीन नहीं होता था कि वे किसी सीमित बुद्धि वाले इंसान की बुद्धि से निकल सकते थे।”
क्रिस्टीन ने यह भी कहा कि विवेकानंद के लेक्चर सुनने के बाद उन्हें भारत से प्यार होने लगा:
“मुझे लगता है, भारत के लिए हमारा प्यार तब पैदा हुआ, जब मैंने पहली बार स्वामी विवेकानंद को उनकी उस शानदार आवाज़ में “भारत” शब्द कहते सुना। यह यकीन नहीं होता कि पाँच अक्षरों के एक छोटे से शब्द में इतना कुछ कहा जा सकता था। इस वाणी में जुनून, गर्व, चाहत, पूजा, दुःख, बहादुरी एवं वह प्यार था जो पूरी किताबें भी दूसरों में ऐसी भावना पैदा नहीं कर सकती थीं। इसमें सुनने वालों में प्यार पैदा करने की जादुई शक्ति थी। मेरे लिए “भारत” दिल की इच्छाओं की ज़मीन बन गया।
जब क्रिस्टीन और उनकी सहेली फुनके, पहले शनिवार के व्याख्यान में शामिल तो विवेकानंद अपने कुछ शिष्यों को दीक्षा दे रहे थे। अगले दिन विवेकानंद ने क्रिस्टीन से कहा कि वह क्रिस्टीन को इतनी अच्छी तरह से नहीं जानते कि यह सुनिश्चित कर सकें कि वह दीक्षा के लिए तैयार है या नहीं। फिर उन्होंने कहा:
उनके पास “किसी के मन को पढ़ने की शक्ति”, एक ऐसी शक्ति है जिसका वह बहुत कम उपयोग करते है। उन्होंने क्रिस्टीन से उसके मन को पढ़ने की अनुमति मांगी ताकि यह पता चल सके कि वह दीक्षा के लिए मानसिक रूप से तैयार है या नहीं। क्रिस्टीन ने सहमति दे दी और जब उन्होंने मन पढ़ना शुरू किया तो विवेकानंद ने फिर पूछा: “क्या मैं सब पढ़ सकता हूँ?”
क्रिस्टीन ने फिर सहमति दी और तब जाकर स्वामीजी ने अगले दिन दीक्षा दी।
विवेकानंद ने क्रिस्टीन को एक मंत्र दिया और उसे अपना शिष्य बना लिया। क्रिस्टीन ने बाद में कहा कि विवेकानंद उनके मन की बात पढ़कर खुश हुए थे। लेक्चर के दौरान, क्रिस्टीन विवेकानंद की चुनी हुई और पसंदीदा शिष्यों में से एक बन गईं। उन्होंने पाँच शिष्यों को आजीवन ब्रह्मचर्य की शपथ दिलाई, और क्रिस्टीन उनमें से एक थीं। विवेकानंद ने उन्हें दिव्य माँ को समर्पित कर दिया और उन्हें अपने भारतीय कामों के लिए बचाकर रखा।
7 अगस्त 1895 को स्वामीजी के न्यूयॉर्क जाने तक दोनों सहेलियां उनके उद्बोधनों में शामिल होती रहीं।
स्वामीजी के जीवन के कुछ जानकार, जिनमें सिस्टर गार्गी(Mary Louise Burke) और प्रव्राजिका व्रजप्राणा शामिल हैं, मानते हैं कि विवेकानंद क्रिस्टीन को अपनी बेटी मानते थे। जब स्वामीजी ने लंदन जाने की अपनी योजना की घोषणा की, तब उन्होंने क्रिस्टीन को लिखे एक पत्र में कहा था, “आपसे मिलकर मुझे बहुत खुशी होगी, दिव्य माँ सब जानती हैं। मैं आपको हमेशा के लिए उन्हें समर्पित करता हूँ, और मैं कर भी क्या सकता हूँ?”
जब स्वामीजी एस.एस. गोलकोंडा नामक जहाज पर सवार होकर बंदरगाह पर पहुँचे तो वह उन्हें रिसीव करने लिए वहाँ मौजूद थीं।वहीँ वह पहली बार सिस्टर निवेदिता से मिली थीं। लंदन में दो सप्ताह के बाद, वह और क्रिस्टीन डेट्रॉइट गए। इस यात्रा को क्रिस्टीन ने “उनकी उपस्थिति में दस प्रेरणादायक दिन” के आशीर्वाद के रूप में वर्णित किया।
2012 में प्रकाशित “A monumental meeting” पीडीऍफ़ में यह सब वर्णित है। स्वामीजी जी पाँच दिन क्रिस्टीन के परिवार के साथ रहे। 1890 के अंत तक क्रिस्टीन डेट्रॉइट में वेदांत सोसाइटी के प्रशासनिक कार्यों में मदद करती रहीं । भारत लौटने के बाद भी स्वामीजी ने उनके साथ पत्राचार जारी रखा। माँ की मृत्यु के बाद क्रिस्टीन ने भारत आने का फैसला किया।
7 अप्रैल 1902 को, क्रिस्टीन कोलकाता पहुंचीं। अगली ही सुबह वह विवेकानंद से मिलने बेलूर मठ गईं, जहाँ उन्होंने पूरा दिन उनके साथ बिताया। स्वामी ब्रह्मानंद जी की नोटबुक के नोट्स के अनुसार,क्रिस्टीन अक्सर बेलूर जाने लगीं और 18, 23, 25, 26 अप्रैल,1 और 4 मई को मठ आईं और हर बार पूरा दिन रुकीं।
गर्मियों में, जब कोलकाता का मौसम बहुत गर्म और Dry हो गया, तो विवेकानंद ने अपनी पश्चिमी महिला शिष्यों को मायावती भेजने का फैसला किया। विवेकानंद ने शुरू में अपने शिष्यों के साथ यात्रा करने और हिमालय जाने की योजना बनाई थी लेकिन बाद में योजना बदल दी गई। ।
5 मई 1902 को, सिस्टर क्रिस्टीन और सिस्टर निवेदिता ने मायावती के लिए अपनी यात्रा शुरू की। विवेकानंद ने उनके यात्रा खर्च के लिए 150 रुपए का भुगतान किया और दोनों 10 मई को मायावती पहुँचीं, जहाँ श्रीमती सेवियर ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। वे मायावती के विवेकानंद के शिष्यों के साथ रहने लगीं।
स्वामी विवेकानंद की मृत्यु:
सिस्टर निवेदिता जून के बीच में कोलकाता लौट आईं क्योंकि उनके स्कूल में काम पहले ही शुरू हो चुका था। स्वामीजी ने 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में शरीर त्याग किया। 21 जून 1902 को उन्होंने क्रिस्टीन को अंतिम पत्र लिखा था। जुलाई के दूसरे हफ्ते में, क्रिस्टीन को निवेदिता का पत्र मिला।
कल तुम्हें यह खबर मिलेगी जो तुम्हारी ज़िंदगी को उदास कर देगी। मैं बस इतना कह सकती हूँ डियर कि अगर मेरी मौजूदगी तुम्हें वहाँ रख सकती, तो तुम शनिवार को कभी उनके पास से दूर नहीं होतीं। शुक्रवार की रात को मृत्यु बड़ी ही खूबसूरती से उनके पास आई! मेडिटेशन के बाद आधे घंटे की नींद, और वे चले गए!
एक अन्य लेख में इसी मंच से एक लेख प्रकाशित किया गया था जिसमें सिस्टर निवेदिता को स्वामीजी की ठंडी हुई चिता में से भगवा रंग का कपडे का टुकड़ा प्राप्त हुआ था। उस लेख का लिंक नीचे दे रहे हैं :
4 जुलाई 1902 को विवेकानंद के महाप्रयाण के बाद, वह कोलकाता वापस आ गईं। वह बोसपारा लेन के एक घर में रहती थीं, और सिस्टर निवेदिता के चलाए जा रहे स्कूल में टीचर बन गईं। साथ-साथ में वह वरिष्ठ-बूढ़ी महिलाओं की सहायता भी करती रहीं। सिस्टर क्रिस्टीन 1914 में वापिस USA चली गयीं। 10 वर्ष बाद 1924 में, वह फिर भारत लौटीं लेकिन उन्होंने पाया कि उनकी गैरमौजूदगी में बोसपारा लेन की ज़िंदगी बदल गई थी और जिस घर में वह दस वर्ष पहले रहती थीं, वह गिर गया था। क्रिस्टीन “निवेदिता स्कूल” गईं, उन्हें उम्मीद थी कि वह टीचर के तौर पर इस स्कूल से फिर से जुड़ पाएंगीं लेकिन स्कूल अधिकारियों ने उनके निवेदन को ठुकरा दिया । वह मशहूर साइंटिस्ट Basiswar “Boshi” Sen (1887 – 31 August 1971) के साथ, पहले उनके घर “8,बोसपारा लेन” में और फिर अल्मोड़ा में कुंदन हाउस में रहीं। वह जोसेफिन मैकलियोड से मिले 500 डॉलर के सालाना अलाउंस पर गुज़ारा करती थीं। उन्होंने अपना एकमात्र खज़ाना, एक माला और स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखे खत बोशी को दे दिए थे। स्वामीजी ने उन्हें राजयोग को गहराई से जानने के लिए कहा था जिसे उन्होंने अल्मोड़ा रहकर जानने का प्रयास किया।
सिस्टर क्रिस्टीन मार्च 1928 तक भारत में रहीं, जब उन्होंने बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण अमेरिका वापस जाने का निर्णय किया। न्यूयॉर्क में, वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं, उन्हें उनके दोस्त के नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया, जहाँ 27 मार्च 1930 को उनकी मृत्यु हो गई।
कल 25वें के शक्तिशाली एवं एंजेल नंबर के साथ इस लेख श्रृंखला का समापन हो रहा है।
अनवरत एवं अटूट सहयोग के लिए सभी साथिओं का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।
जय गुरुदेव


