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स्वामी विवेकानंद जी की शिष्या,भगिनी निवेदिता का अति संक्षिप्त विवरण-लेख श्रृंखला का 21वां लेख 

स्वामी विवेकानंद ने विदेश जाने से पहले पूरे भारत की यात्रा की थी। जनसाधारण की स्थिति देखकर, भारत की आध्यात्मिकता और पश्चिम के विकास के समन्वय के उद्देश्य को साकार होते हम साक्षात् देख रहे हैं।उद्योगपति रॉकफेलर का भारत के लिए आर्थिक योगदान, टाटा का भारत के विकास में योगदान,जोसफिन मैक्लेऑड की आर्थिक सहायता, सेविएर दम्पति का मायावती एवं श्यामलाताल के आश्रम में योगदान,भगिनी निवेदिता के योगदान एक लम्बी लिस्ट में से कुछ एक नाम ही हैं। 

21 लेख पढ़ने के बाद अब तो हमारे साथिओं को विश्वास हो गया होगा कि कुछ प्राप्त करने के लिए पहले त्याग करना अति आवश्यक है। “धन”,जिसको अर्जित करने के  लिए हर कोई दिन रात भागदौड़ कर रहा है, स्वयं नदिओं की भांति बहता है जब समर्पण,त्याग और “देने” की प्रवृति सर्वप्रथम  होती है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से भी सदैव “देने की भावना” को प्रसारित किया जाता रहा है। हमारे गुरुदेव का तो मूलमंत्र ही “बोओ और काटो” है अर्थात पहले बोओ और फिर काटो, न कि बोये बिना ही,खाद पानी डाले बिना ही,फल की इच्छा करना शुरू कर दें। 

आज के लेख में सिस्टर निवेदिता का संक्षिप्त सा वर्णन है, वोह सिस्टर निवेदिता जिनके नाम से निवेदिता स्कूल हैं,निवेदिता सेतु है,जिनका कोलकाता का निवास एक राष्ट्रिय हेरिटेज है,दार्जलिंग में जहाँ उनकी मृत्यु हुई “रॉय विला” एक पर्यटन स्थल बन चुका है, उनका अस्थि कलश भी यहाँ स्थापित है। आयरलैंड में जन्मीं इस दिव्य आत्मा को इतना सम्मान मिलने का कारण केवल स्वामी विवेकानंद की शिष्या होना ही नहीं है बल्कि उनका योगदान है। 

तो साथिओ यह है त्याग की शक्ति जिसका हम आज अमृतपान कर रहे हैं। 

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भगिनी (बहिन) निवेदिता (1867-1911) एक आइरिश (Ireland) एवं  भारतीय  सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, शिक्षक एवं स्वामी विवेकानन्द की शिष्या थीं। उनका मूल नाम  Margaret Elizabeth Noble था। भगिनी का अंग्रेजी अनुवाद सिस्टर होता है

2026 में, इन पंक्तियों को लिखते समय,भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है उनमें भगिनी निवेदिता का नाम पहली पंक्ति में आता है, जिन्होंने न केवल भारत की स्वतंत्रता  की लड़ाई लड़ने वाले देशभक्तों की दिल खोल कर सहायता की बल्कि नारी शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। भगिनी निवेदिता का भारत से परिचय स्वामी विवेकानन्द के जरिए हुआ। स्वामी विवेकानन्द के आकर्षक व्यक्तित्व और भाषण शैली से वह इतना प्रभावित हुईं कि उन्होंने न केवल रामकृष्ण परमहंस के इस महान शिष्य को अपना आध्यात्मिक गुरु बना लिया बल्कि भारत को अपनी कर्मभूमि भी बनाया।

ऐसे व्यक्तित्वों से सम्बंधित गूगल में इतना विस्तृत एवं महत्वपूर्ण कंटेंट उपलब्ध है कि इन पंक्तियों को लिख रहे इस तुच्छ से लेखक के लिए चयन करना कि किसको शामिल किया जाये और किसे छोड़ा जाये, एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता है। ऐसी स्थिति में अपने अल्प  विवेक एवं बुद्धि से यथासंभव प्रयास करके इस लेख में एक संक्षिप्त का विवरण प्रस्तुत किया गया है। 

मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल का जन्म 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड में हुआ था। प्रारंभिक जीवन में उन्होंने कला और संगीत का अच्छा ज्ञान हासिल किया। नोबेल ने पेशे के रूप में शिक्षा क्षेत्र को अपनाया। 1895 में, 28 वर्ष की आयु में उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ उस समय आया जब लंदन में उनकी स्वामी विवेकानंद से मुलाकात हुई। स्वामी विवेकानंद के विशाल दृष्टिकोण, वीरतापूर्ण व्यवहार और स्नेहाकर्षण ने निवेदिता के मन में यह बात पूरी तरह बिठा दी कि भारत ही उनकी वास्तविक भावी  कर्मभूमि है। इसके तीन साल बाद वह भारत आ गईं और भगिनी निवेदिता के नाम से पहचानी गईं।

25 मार्च 1898 को स्वामी विवेकानंद ने नोबेल को दीक्षा देकर मानव मात्र के प्रति भगवान बुद्ध के करुणा के पथ पर चलने की प्रेरणा दी। दीक्षा देते हुए स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रेरणाप्रद शब्दों में उनसे कहा:

दीक्षा के समय स्वामी विवेकानंद ने उन्हें नया नाम “निवेदिता” दिया और बाद में वह पूरे देश में इसी नाम से विख्यात हुईं। भगिनी निवेदिता कुछ समय अपने गुरु स्वामी विवेकानंद के साथ भारत भ्रमण करने के बाद आखिरकार कोलकाता  में ही बस गईं। अपने गुरु की प्रेरणा से उन्होंने 13 नवंबर, 1898 को काली पूजा के दिन बागबाजार इलाके में गर्ल्स स्कूल खोला था, जिसका उद्देश्य भारतीय महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण को बढ़ावा देना था। यह स्कूल, जिसे “रामकृष्ण  मिशन सिस्टर निवेदिता गर्ल्स स्कूल” के नाम से जाना जाता है, शुरुआती दिनों से ही लड़कियों को शिक्षित करने के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। इस  स्कूल का उद्घाटन श्रीरामकृष्ण  परमहंस जी की जीवनसंगिनी माँ  शारदा ने किया था। माँ  शारदा ने सदैव भगिनी निवेदिता को अपनी पुत्री की तरह स्नेह दिया। 

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी  में बांग्ला विभाग के पूर्व अध्यक्ष अमरनाथ गांगुली ने कहा कि मार्गरेट नोबेल को स्वामी विवेकानंद ने निवेदिता नाम दिया था। इसके दो अर्थ हो सकते हैं एक तो ऐसी महिला जिसने अपने गुरु के चरणों में अपना जीवन अर्पित कर दिया और दूसरा अर्थ जो निवेदिता पर ज्यादा सही बैठता है कि एक ऐसी महिला जिन्होंने नारी शिक्षा और सशक्तिकरण (Women education and empowerment) के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। गांगुली ने कहा कि सिस्टर निवेदिता में एक “अग्नि” थी और स्वामी विवेकानंद ने उस “अग्नि”  को पहचाना। निवेदिता अपने गुरु की प्रेरणा से नारी  शिक्षा के क्षेत्र में उस समय उतरीं जब समाज के पढ़े लिखे Elite  लोग भी अपनी बेटियों को स्कूल भेजना पसंद नहीं करते थे। उस समय के समाज की एवं उसमें पल रही नारिओं की दुर्दशा के अनेकों किस्से स्मरण करके इतिहास के पन्नें आज भी लहूलुहान हो उठते  हैं। इसमें कोई शंका नहीं कि भारतीय नारिओं ने बहुत प्रगति की है लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।     

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं के लिए नारी शिक्षा और नारी सशक्तिकरण का विषय कोई नया नहीं है क्योंकि हमारे गुरुदेव ने वर्षों पहले इस सूत्र को हम सबके भीतर उतारने का अथक प्रयास किया था जिसके परिणाम साक्षात् दिखाई दे रहे हैं। “जाग गयी भाई जाग गयी नारी शक्ति जाग गयी” गायत्री परिवार का बहुप्रचलित स्लोगन है।    

उस समय के रूढ़िवादी एवं पुरुष प्रधान समाज में नारी  शिक्षा को बढ़ावा देना निवेदिता जैसी साहसिक महिला के प्रयासों से ही संभव हो पाया। कोलकाता  प्रवास के दौरान भगिनी निवेदिता के संपर्क में उस दौर के सभी प्रमुख लोग आये जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस, सुप्रसिद्ध चित्रकार अवनीन्द्रनाथ ठाकुर शामिल हैं। 

प्रोफेसर गांगुली ने सिस्टर निवेदिता के देशप्रेम की चर्चा करते हुए कहा: 

आयरिश होने के कारण स्वतंत्रता के प्रति प्रेम उनके रक्त में दौडता था। ऐसे में यह बेहद स्वाभाविक था कि उन्होंने भारत में स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का समर्थन किया और उन्हें सहयोग दिया। स्वतंत्रता आंदोलन में एवं नारी सशक्तिकरण के कार्यों में दिन रात कार्य करने के कारण उनका स्वास्थ्य ख़राब होने लगा। ऐसे में अथक कार्य से ब्रेक लेने के लिए सिस्टर निवेदिता 1911 में दुर्गापूजा की छुट्टियों में भ्रमण के लिए दार्जीलिंग गई थीं। वहाँ मलेरिआ और Dysentery से उनका स्वास्थ्य ऐसा बिगड़ा कि 13 अक्टूबर 1911 को मात्र 44 वर्ष की आयु  में ही उनका निधन हो गया। दार्जीलिंग में ही हिन्दू रीति से उनका अन्तिम संस्कार किया गया। 

कोलकाता और हावड़ा को जोड़ने वाले हुगली नदी पर बने एक सेतु का नाम “निवेदिता सेतु” रखा गया है। हुगली नदी पर निर्मित यह  केबल-युक्त पुल मुख्यतः दिल्ली और कोलकाता को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर पुराने हो चुके विवेकानन्द सेतु के पुनर्स्थापन के रूप में बनाया गया है। 

सिस्टर निवेदिता की शिक्षा के प्रति रूचि इस तथ्य से प्रकट होती है कि मात्र 17 वर्ष की ही आयु में उन्होंने शिक्षिका के रूप में अध्यापन कार्य आरम्भ कर दिया था। इन्हीं दिनों निवेदिता आयरलैंड से इंग्लैंड आ गयीं और 25 वर्ष की आयु में 1892 में  विम्बल्डन लंदन में Ruskin school  नाम से अपने स्कूल की स्थापना कर डाली। यही वह स्कूल था जिससे  सिस्टर निवेदिता को भारत में नारी शिक्षा की प्रेरणा मिली थी  

1899 में कोलकाता में आये प्लेग रोग की महामारी में उन्होंने खुद की जान जोखिम में डालकर मरीजों की सेवा की। रामकृष्ण मिशन को मदद दिलाने के लिये उन्होंने इंग्लैंड, फ्रान्स, अमेरिका आदि देशों की यात्रा की। 1902 में पुणे जाकर देश के लिये शहीद  किये गए चापेकर  बंधु के माता के चरण स्पर्श कर उनके कदमों की धूल उन्होंने अपने मस्तक  पर लगाई।1905 को बनारस में हुए  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने हिस्सा लिया। गूगल सर्च से ऐसा भी विवरण मिलता है कि सिस्टर निवेदिता ने भारत का राष्ट्रिय ध्वज डिज़ाइन करने में भी योगदान दिया था। 

सिस्टर निवेदिता ने स्वामी विवेकानंद को अंतिम बार 2 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में देखा था। उस दिन विवेकानंद एकादशी का उपवास कर रहे थे। उनके शिष्यों ने भोजन किया जिसे स्वामीजी ने स्वयं उन्हें खुशी से परोसा। भोजन के बाद, विवेकानंद ने निवेदिता के हाथों पर पानी डाला, और उन्हें एक तौलिये से सुखाया। निवेदिता ने इसे “The master as I saw him” पुस्तक में निम्नलिखित शब्दों में दर्ज किया:

स्वामीजी के यह आखिरी शब्द थे, शायद उनका अंत आ चुका  था। स्वामीजी ने अपने  शरीर का त्याग  4 जुलाई 1902 को किया।  उस रात निवेदिता ने स्वप्न में देखा कि श्री रामकृष्ण परमहंस  दूसरी बार अपना शरीर छोड़ रहे हैं। अगली सुबह, बेलूर मठ से स्वामी शारदानंद ने एक भिक्षु को  सिस्टर निवेदिता के पास एक पत्र भेजा और विवेकानंद की मृत्यु का संदेश दिया। निवेदिता की आंखों के चारों ओर तुरंत सब कुछ शून्य हो गया। वह तुरंत मठ की ओर दौड़ी, लगभग 7:00  बजे उस स्थान पर पहुंची और विवेकानंद के कमरे में प्रवेश किया। वहां उसने देखा कि स्वामीजी का शरीर फर्श पर रखा था। वह विवेकानंद के सिर के पास बैठ गई और उनके शरीर को हाथ के पंखे से तब तक हवा करती रही जब तक कि दोपहर 2:00  बजे उनके शरीर को आंगन की ओर जाने वाले बरामदे में नहीं ले जाया गया। 5 जुलाई की दोपहर में, स्वामी विवेकानंद के शरीर को दाह संस्कार के लिए ले जाया गया। निवेदिता के मन की बात समझते हुए स्वामी शारदानंद  ने उनसे स्वामीजी  के कपड़े का एक छोटा सा टुकड़ा  काटने को कहा लेकिन निवेदिता को विश्वास नहीं था कि यह काम उससे  हो पायेगा, इसलिए उन्होंने इसे न काटने का फैसला किया। जब विवेकानंद के शरीर का अंतिम संस्कार हो रहा था, तो वह जलती हुई चिता को देखती रहीं। शाम के करीब छह बजे, जलती चिता ठंडी होने  वाली थी। अचानक निवेदिता को लगा कि किसी ने उनकी आस्तीन खींची है। जब उन्होंने मुड़कर देखा तो भगवा कपड़े का एक छोटा सा टुकड़ा मिला जो अंतिम संस्कार के दौरान किसी तरह चिता से निकल आया था। 

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