13 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
आज एक बार फिर से परम पूज्य गुरुदेव ने ऊँगली पकड़ कर वोह कंटेंट लिखवा दिया जिसे हमने कभी सोचा तक नहीं था।
हमने तो तैयारी की थी मायावती अद्वैत आश्रम से 50 मील दूर श्यामला आश्रम के बारे में लिखने की,यह जानने की तैयारी की थी कि जाना जाये कि चार्लोट एलिजाबेथ सेवियर, Charlotte Sevier (1847-1930) ने स्वामी विरजानन्द की श्यामला ताल आश्रम स्थापित करने की क्या सहायता की,कैसी कैसी कठिनाइओं का सामना किया। गुरुसत्ता के निर्देश के आगे हमारी तैयारी का क्या मूल्य रह जाता है क्योंकि ज्यों-ज्यों लिखते गए माँ सेविएर से सम्बंधित इतना कुछ प्रकट होता गया कि हमें Compile करना ही अस्मभव प्रतीत होने लगा। जो भी हो,हमसे जितना कुछ संभव हो पाया साथिओं के समक्ष परोस दिया,अवश्य ही आज की दिव्य रेसिपी भी साथिओं की तृष्णा मिटा पायेगी,ऐसा हमारा विश्वास है,बाकी आपके कमैंट्स बताएंगें।



आज के लेख में दो दिव्य महिलाओं का संक्षिप्त वर्णन है। एक हैं “माँ सेविएर” और दूसरी हैं Dr Amrita Salm जिन्होंने अपनी रिसर्च और लेखनी से Mother of Mayavati शीर्षक से दिव्य पुस्तक प्रकाशित की। स्वामी विवेकानंद से सम्बंधित, दोनों ही विदेशी नारी शक्तिओं को ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का सादर नमन वंदन प्रदान किया जाता है।
आइये चलते हैं आज के ज्ञानप्रसाद लेख की ओर
*****************
जेम्स हेनरी सेवियर ब्रिटिश सेना में एक नॉन कमीशंड अधिकारी थे, उन्होंने भारत में भी कार्य किया था। वह और उनकी पत्नी चार्लोट एलिजाबेथ सेवियर, दोनों ही आध्यात्मिक ज्ञान के साधक थे। पहली बार जब वे निजी तौर से स्वामी विवेकानंद से मिले, तो स्वामीजी ने मिसेज़ सेवियर को “माँ” कहकर संबोधित किया और उनसे भारत आने का आग्रह किया। वर्ष 1847 में इंग्लैंड में जन्मीं यह महिला,स्वामीजी से 16 वर्ष बड़ी थीं। स्वामीजी ने कहा कि वह उन्हें अपनी सर्वश्रेष्ठ अनुभूतियाँ देंगे और उन्हें वेदांत से सम्बंधित अनेकों प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगें। दोनों ने स्वामी विवेकानंद के शिष्य बनने और उनके साथ भारत आने का फैसला किया।
1896 में, सेवियर दंपति यूरोप महाद्वीप में, विशेष रूप से Alps mountains में, स्विट्जरलैंड, इटली और जर्मनी देशों में स्वामी विवेकानंद के साथ इन यात्राओं पर गए। सेवियर्स दम्पति ने ही इस ट्रिप का पूरा आर्थिक एवं अन्य इंतज़ाम इसलिए किया था ताकि स्वामीजी को कुछ आराम मिल सके। कार्य की अधिकता के कारण स्वामी जी को आराम की ज़रुरत थी।
स्विट्ज़रलैंड की यात्रा के दौरान, स्वामी विवेकानंद ने Alps के मनमोहक एवं दिव्य पर्वतीय वातावरण को देखकर इच्छा जाहिर की थी कि ऐसे ही हिमालय वातावरण में एक मठ बन सके। स्वामीजी की यह इच्छा सेवियर्स दम्पति के लिए एक मिशन सा बन गया।
स्वामीजी जब भारत लौटे, तो सेवियर्स लंदन में अपनी सारी प्रॉपर्टी बेचकर उनके साथ आ गए। दोनों हिमालय में अल्मोड़ा में रुके।
1901 में कैप्टन सेवियर का निधन हो गया। निधन की खबर सुनकर स्वामी विवेकानंद मायावती गए और 3 से 18 जनवरी 1901 तक वहां रहे ।
ऑनलाइन सोर्सेज में रिसर्च करने पर ज्ञात होता है कि स्वामीजी एवं उनके शिष्यों से सम्बंधित प्रकाशित मैटेरियल इतनी अधिक मात्रा में उपलब्ध है कि किस को छोड़ा जाये और किसे शामिल किया जाए, एक बहुत ही चुनौती भरा कार्य है। हमें तो स्मरण ही नहीं आ रहा कि हमने इस लेख को लिखने के लिए कहाँ-कहाँ से रिसर्च की है। Amrita M Salm (PhD) द्वारा लिखित पुस्तक “Mother of Mayawati: The Story of Charlotte Sevier and Advaita Ashrama” इस जानकारी के लिए एक मास्टरपीस प्रकाशन है।
पुस्तक की भूमिका में अमृता लिखती हैं कि स्वामी विवेकानंद की पश्चिमी शिष्याओं में से एक, श्रीमती शार्लेट ई सेवियर काफी गुमनाम रही हैं, लेकिन अब इस प्यार भरे प्रकाशन की वजह से,उनकी जीवनी भी सिस्टर निवेदिता (मार्गरेट नोबल), टैंटाइन (जोसेफिन मैकलियोड) और श्रीमती सारा बुल की जीवनी जैसी प्रसिद्ध हो गयी है। मुझे इस पुस्तक को लिखने के लिए, First hand information प्राप्त करने के लिए, अनेकों बार इंडिया और इंग्लैंड की यात्रा करनी पड़ी। इन सभी विदेशी महिलाओं ने मिलकर, अपने गुरु के मिशन और संदेश को दुनिया के मंच पर,उनके मात्र 39 वर्ष की उम्र में किये गए कार्य को आगे बढ़ाने का अद्भुत कार्य किया है।
डॉ अमृता Vedant society of California में बहुत वर्षों तक सेक्रेटरी का कार्य करती रहीं,उसके पहले Berkeley में स्वामी स्वाहानन्द जी के साथ 35 वर्ष तक सेक्रेटरी रहीं। विश्व के महान व्यक्तित्वों को जानने में उनकी बड़ी रूचि रही है।
सेविएर दम्पति की श्रद्धा के बारे में क्या कहा जाए, सराहना वर्णन करने में शब्द कम पड़ जाते हैं।
अल्मोड़ा में दोनों ने एक पहाड़ी खरीदी, इसी पहाड़ी पर “मायावती अद्वैत आश्रम” की स्थापना हुई। दुर्भाग्यवश आश्रम बनने के कुछ ही समय बाद उनके पति की मृत्यु हो गई। सम्पूर्ण आत्मबल के साथ मिसेज़ चार्लोट,अकेली गोरी महिला 53 साल की उम्र में, भारतीय साधुओं, मज़दूरों और गांव वालों से घिरी अगले 14 वर्ष तक काम करती रहीं
उस दौरान, मंथली मैगज़ीन “प्रबुद्ध भारत” के अलावा, उन्होंने साधुओं के साथ मिलकर “Complete works of Swamiji” और “The Life of Swami Vivekananda by His Eastern and Western Disciples” पर काम किया।
हिमालय में अकेले सुनसान जगह पर निवास करना,यातायात भी इतना मुश्किल कि जिस किसी चीज़ की भी ज़रूरत पड़ती,जहाँ तक कि प्रिंटिंग प्रेस और कागज़ भी घोड़े पर लाने पड़ते थे। ऐसी स्थिति होने के बावजूद वह कई बार बेलूर मठ गईं और दो बार इंग्लैंड भी आयीं। ऐसी कठिन स्थिति होने के बावजूद उन्होंने मायावती से 50 मील दूर श्यामला ताल में दूसरे आश्रम के लिए भूमि खरीदी। श्यामला ताल आश्रम की कथा बहुत ही रोचक और प्रेरणादायक है लेकिन उसके लिए पाठकों को अगले ज्ञानप्रसाद लेख तक इंतज़ार करना होगा।
अपने बड़े दिल, दरियादिली और शांत स्वभाव के कारण मायावती आश्रम में सभी लोग उन्हें माँ के नाम से पुकारने लगे। स्वामीजी को लिखे अपने पत्रों पर वह माँ के नाम से साइन करती थीं, उन्हें “मेरा प्यारा बेटा” एड्रेस करती थीं।
मैनेजमेंट के तौर पर वह हर चीज़ का ध्यान रखती थीं। उदाहरण के लिए, उन्होंने आस-पास के लोगों के लिए एक होम्योपैथिक डिस्पेंसरी शुरू की, यह सुनिश्चित किया कि भिक्षुओं को उनके खाने-पीने के लिए ज़रूरी चीज़ें मिलें और कभी-कभी अपने खर्चे पर भिक्षुओं और काम करने वालों के लिए पार्टियों का आयोजन भी करती थीं। अपने अंतिम समय तक भी, आश्रम में उन्होंने सब कुछ इस तरह से अरेंज करती रहीं कि उनके जाने के बाद भी भिक्षुओं को (विशेषकर महिला भिक्षुओं को) कोई परेशानी न हो।
माँ सेविएर अद्वैत आश्रम की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं और बेलूर मठ में अद्वैत आश्रम की ट्रस्टी मीटिंग में भी शामिल होती रहीं। रामकृष्ण ऑर्डर के इतिहास में ऐसा करने वाली वह अकेली महिला थीं। 20 अक्टूबर 1930 को, 83 वर्ष की आयु में इंग्लैंड में उनका निधन हो गया। मठ के हेडक्वार्टर में उनके लिए एक मेमोरियल सर्विस रखी गई थी। ऑनलाइन रिसर्च से उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, श्रीरामकृष्ण परमहंस की पत्नी,शारदा देवी के बाद इतना सम्मान केवल माँ सेविएर को ही दिया गया है।
उनके अधिकांश प्रकाशन में स्वामी विवेकानंद के साथ उनकी इंटरनेशनल यात्राओं के वर्णन के इलावा वेदांत फिलॉसफी और भारत, जिसे वह “हमारा देश” कहती हैं,बहुत ही लोकप्रिय एवं रोचक हैं।
तो साथिओ, माँ सेविएर के बारे में यह एक बहुत ही संक्षिप्त सा विवरण है। कल के लेख में इस दिव्य व्यक्तित्व का श्यामला ताल आश्रम स्थापित करने के योगदान के बारे में जानेगें।
धन्यवाद् जय गुरुदेव