12 जनवरी,2026 का ज्ञानप्रसाद-
साथिओ,आज 12 जनवरी 2026,सोमवार का दिन,सप्ताह का प्रथम दिन, अपने साथ एक अद्भुत ऊर्जा लेकर आया है। इस वर्ष का 12 जनवरी का दिन एडिशनल विशेषता लिए हुए है क्योंकि स्वामी विवेकानंद जयंती एवं राष्ट्रिय युवा दिवस को समर्पित यह दिन उस लेख शृंखला के समय आया है जिसका अमृतपान हम पिछले कई दिनों से कर रहे हैं।
आज स्वामीजी के बताए मार्ग पर चल कर Universal brotherhood और वसुधैव कुटुंबकम की बात करें तो उचित रहेगा ।परम पूज्य गुरुदेव एवं इस छोटे से परिवार का यही एक उद्घोष है “प्यार,प्यार और केवल प्यार।”
स्वामीजी पर आधारित लेख शृंखला में बताए गए ज्ञान का,चिंतन करते हुए,अपने ह्रदय में उतार लें तो बड़ी बात होगी।
आज के लेख में JRD Tata और स्वामीजी के बीच हुई अविस्मरणीय वार्ता के साथ ही राम मंदिर के लिए उनके भविष्यवक्ता होने का प्रमाण मिल रहा है।
तो शुरू होती है आज की गुरुकक्षा :
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अध्यात्म के विश्वगुरु और उद्योग के बादशाह के बीच संक्षिप्त मुलाकात का विवरण। यह मुलाकात इतनी महत्वपूर्ण है कि इन दोनों के बीच का पत्र भी गूगल पर देखा जा सकता है।
31 मई 1893 का दिन था, एक समुद्री जहाज़ में दो महान भारतीय जापान के योकोहामा नगर से कनाडा के वैंकूवर जाते हुए पहली बार मिले। एक थे उद्योगपति, जो आगे चलकर भारत के सबसे महान दूरदर्शी, जमशेदजी टाटा बने और दूसरे थे एक भिक्षु ,स्वामी विवेकानंद जो भारत की आध्यात्मिक परंपरा को पहले से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से पश्चिम में ले जाने के लिए प्रयासरत रहे।
यह अति आकर्षक कहानी भारत के इतिहास में तो बहुत ही कम जानी जाती है लेकिन महत्वपूर्ण क्षण को चिह्नित करती है।
जमशेदजी शिकागो में एक “औद्योगिक प्रदर्शनी (Industrial Exhibition)” के लिए जा रहे थे। मई माह की दोपहर में इस शानदार जोड़ी ने योकोहामा बंदरगाह से SS Empress of India स्टीमशिप में वैंकूवर के लिए यात्रा शुरू की।
जमशेदजी और विवेकानंद पहले भी मिले थे लेकिन दोनों के पास कोई लंबी बातचीत करने का समय नहीं था।अब जब वे जहाज के Promenade पर मिले तो कुछ बातचीत आरम्भ हुई । विवेकानंद जी ने जमशेदजी को अपने अनुभवों के बारे में बताया जो उन्होंने सत्य की खोज में एक भटकते हुए साधु के रूप में भारत के एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा के दौरान प्राप्त किए थे । उन्होंने अपने साथी भारतीयों के अथक उत्पीड़न और दमन के बारे में बातें कीं जो उन्होंने औपनिवेशिक अधिकारियों ( Colonial authorities) के हाथों देखे थे। इसके अलावा स्वामी जी ने बताया कि चीन की यात्रा के दौरान उन्हें बौद्ध मठों में कई संस्कृत और बंगाली पांडुलिपियां (Manuscripts) मिलीं। स्वामी जी ने यह भी बताया कि विश्व धर्म संसद की उनकी यात्रा का मिशन “भारतीय आस्था को पश्चिम में ले जाना और विश्व के प्रमुख धर्मों के बीच एकता का आह्वान करना है ।”
विश्व धर्म संसद एक ऐसी सभा थी जिसमें 7,000 से अधिक धर्मगुरुओं, विद्वानों और प्रमुख विश्वधर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले इतिहासकारों ने अपना योगदान दिया। यह सभा आधुनिक इतिहास में पहली वैश्विक अंतर-धार्मिक घटना मानी जाती है। इस विशाल संसद का शिकागो में World Columbian Exhibition के एक हिस्से के रूप में 11 से 27 सितंबर, 1893 के बीच आयोजन किया गया था।
दोनों हस्तियों ने जापान की प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति और भारत में स्टील उद्योग की नींव रखने की जमशेदजी की योजना पर भी चर्चा की। भारत के सबसे बड़े उद्योगिक समूहों में से एक के संस्थापक, जमशेदजी ने यह भी बताया कि वह ऐसे उपकरणों और प्रौद्योगिकी की तलाश में हैं जो भारत को एक मजबूत औद्योगिक राष्ट्र (Strong industrial nation) बनाने में मदद करें। विवेकानंद जी ने अत्यंत उत्साह के साथ इस दृष्टि का समर्थन किया, और कहा:
“हमारे देश की असली आशा लाखों करोड़ों सामान्य भारतीयों की समृद्धि और प्रगति में है। उन्होंने यह भी कहा कि जापान से माचिस आयात करने के बजाय, जमशेदजी को उनका निर्माण भारत में ही करना चाहिए और ग्रामीण गरीबों को आजीविका प्रदान करने में मदद करनी चाहिए।”
आज के विकसित भारत की प्रगति देखकर विश्वास करना कठिन प्रतीत होता है कि Colonial rule में 20वीं शताब्दी के शुरू में भारत में जापान और स्वीडन से माचिस आयत की जाती थी।
विवेकानंद के विज्ञान और गहरी देशभक्ति के विचारों से प्रभावित होकर, जमशेदजी ने स्वामी जी से भारत में “एक शोध संस्थान की स्थापना” के अभियान में मार्गदर्शन का अनुरोध किया। स्वामी जी की आयु उस समय केवल 30 वर्ष की थी और जमशेदजी लगभग दुगनी आयु (54) वर्ष के थे। दूरदर्शी साधु स्वामी जी मुस्कुराए, अपना आशीर्वाद दिया और कहा:
“कितना अच्छा हो यदि हम पश्चिम की वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों को भारत के तप और मानवतावाद के साथ जोड़ सकें!”
उस यात्रा के बाद जमशेदजी और स्वामीजी कभी नहीं मिले। लेकिन इन शब्दों ने उद्योगपति के दिल में एक स्थान बना लिया और पांच साल बाद उन्होंने स्वामी जी को निम्नलिखित पत्र लिखा जिसका ओरिजिनल स्वरूप साथ दी गयी स्लाइड में है :
एस्प्लेनेड हाउस, बॉम्बे।
23 नवंबर 1898
प्रिय स्वामी विवेकानंद,
मुझे विश्वास है, आपको याद होगा कि जापान से शिकागो की यात्रा पर मैं आपके साथ एक सहयात्री था। मुझे उस समय भारत में तपस्वी भावना के विकास और कर्तव्य को उपयोगी साधनों में बदलने के बारे में आपके विचार याद हैं।
भारत के लिए “अनुसंधान संस्थान की मेरी योजना” के बारे में आपने निस्संदेह सुना या पढ़ा होगा और उसके संबंध में आपके विचार मुझे आज भी याद हैं। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस “आत्मा के प्रभुत्व वाले पुरुषों के लिए मठों की स्थापना से बेहतर तपस्वी भावना का कोई बेहतर उपयोग नहीं किया जा सकता है, जहां उन्हें सामान्य शालीनता के साथ रहना चाहिए और विज्ञान, प्राकृतिक और मानवतावादी खेती के लिए अपना जीवन समर्पित करना चाहिए
मेरा मानना है कि अगर आप जैसे तपस्वी और सक्षम नेता द्वारा मार्गदर्शन किया जाता है, तो यह तपस्या, विज्ञान और हमारे सामान्य से देश को विशेष बनाने में बहुत मदद करेगी । मैं जानता हूँ कि इस तरह के अभियान के लिए विवेकानंद से अधिक उपयुक्त सेनापति कोई नहीं हो सकता।
क्या आपको लगता है कि आप इस संबंध में हमारी प्राचीन परंपराओं को जीवंत करने के मिशन में अपनेआप को लागू करेंगे? शायद,आपने इस मामले में भारत के लोगों को जागृत करने वाले एक ज्वलंत पैम्फलेट के साथ बहुत ही अद्भुत शुरुआत की है। मैं खुशी-खुशी प्रकाशन का सारा खर्च उठाऊँगा।”
आदर के साथ,
मैं हूँ, प्रिय स्वामी,
आपका विश्वासी,
जमशेदजी टाटा
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रामकृष्ण मिशन की स्थापना में व्यस्त, स्वामीजी प्रस्ताव को स्वीकार करने में असमर्थ थे, उन्होंने तुरंत अपनी शिष्या, सिस्टर निवेदिता को जमशेदजी से मिलने के लिए भेजा। दोनों ने इक्क्ठे कार्य करके “अनुसंधान संस्थान” के लिए एक विस्तृत योजना तैयार की लेकिन तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने इसे तुरंत रिजेक्ट कर दिया। हालाँकि जमशेदजी ने इन योजनाओं पर काम करना जारी रखा और आश्वस्त किया कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत की प्रगति रिसर्च पर महत्वपूर्ण रूप से निर्भर है। टाटा ने एक ऐसे संस्थान की परिकल्पना की जिससे इस ध्येय को प्रोत्साहन मिल सके।
1898 में टाटा ऐसी संस्था के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश में मैसूर के दीवान शेषाद्री अय्यर से मिले और अपने विचार पर चर्चा की। उन दोनों ने मैसूर के तत्कालीन शासक कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ को बंगलौर नगर के मध्य में लगभग 372 एकड़ निशुल्क भूमि दान करने और अन्य आवश्यक सुविधाएं प्रदान करने के लिए राजी किया।
जुलाई 1902 में स्वामी विवेकानंद ने देह त्याग दी और दो वर्ष बाद 1904 में जमशेदजी ने भी इस संसार से विदा ले ली।
दोनों महान व्यक्ति इस बात से अनजान थे कि उनकी साझा दृष्टि पांच वर्ष बाद साकार होगी। 1909 में “टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस” का जन्म हुआ और 1911 में इसका नाम बदलकर “इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISC)” कर दिया गया। आज यह इंस्टिट्यूट भारत का गौरव है और विश्व के प्रमुख शोध संस्थानों में से एक है। टाटा समूह के बाद के उपक्रमों में “टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, TISS”,1930 में और “टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, TIFR 1940 की स्थापना भी शामिल थी।
इन संस्थानों का हमारे ह्रदय में विशेष स्थान है क्योंकि कुछ एक में हमें भी कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन दिनों हमें स्वामीजी के बारे में तो कुछ भी ज्ञान नहीं था लेकिन IISC और TIFR में जाकर एक अद्भुत दिव्य सी अनुभूति अवश्य हुई थी।
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My life with my Guruji ,स्वामी अनंत दास:
ऐतिहासिक तथ्य है कि स्वामी विवेकानंद की कही बातें सत्य साबित होने के कारण उन्हें भविष्यवक्ता भी कहा जाता है। स्वामी विवेकानंद के मन में मंदिरों और मूर्तिपूजा को लेकर काफी गहरी श्रद्धा थी। उनके गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस कोलकाता के प्रसिद्ध काली मंदिर के पुजारी थे। स्वामी जी के अनुसार श्रद्धा और भक्ति के लिए मंदिरों में जाना बेहद जरूरी है। वह कहते थे कि मंदिरों में की गयी साधना अधिक फलित होती है क्योंकि अत्यधिक श्रद्धा के कारण वहां दिव्य शक्तियों या सकारात्मक ऊर्जा का Volume बढ़ा हुआ होता है। इसके प्रमाण के लिए विज्ञान का निम्नलिखित उदाहरण दिया जा सकता है :
वातावरण में नमी के रूप में पानी तो हर जगह मौजूद होता है लेकिन वर्षा तो वहीँ पर होती है जहाँ नमी का Volume अधिक होता है। इसी तरह अगर भक्ति की वर्षा में भीगना या डूबना हो तो मंदिर जाना जरूरी हो जाता है।
इन पक्तियों को पढ़ रहे हमारे साथी स्वयं अनुभव करते होंगें कि घर की पूजास्थली और ड्राइंग रूम के वातावरण और श्रद्धा में क्या अंतर् है।
भविष्यवक्ता के बारे में स्वामी विवेकानंद के एक शिष्य स्वामी अनंत दास ने अपनी आत्मकथा “My life with my Guruji” में अयोध्या के राम मंदिर के बारे में लिखा है। पुस्तक में वर्णित प्रसंग के मुताबिक कोलकाता के राम मंदिर का उद्घाटन कर स्वामी विवेकानंद जब मठ को लौटने लगे तो मंदिर बनवाने वाले व्यापारी ने उनके चरण पकड़ लिए और धन्यवाद कहने लगा। इस पर स्वामी विवेकानंद ने कहा कि
“अरे इसमें धन्यवाद क्या, यह तो मेरा सौभाग्य है कि “अयोध्या के राम” के कलकत्ता में आगमन का मैं प्रत्यक्षदर्शी बना। जिस दिन हमारी श्रद्धा प्रबल हो जाएगी, अयोध्या में फिर से भव्य राम मंदिर बन जाएगा”
अनंत दास ने लिखा है कि तभी वहां मौजूद श्रद्धालुओं की भीड़ में से किसी ने कहा कि अयोध्या के राम अब अयोध्या में कहां हैं स्वामीजी? वहां उनका मंदिर तो कब का तोड़ दिया गया है। इस पर स्वामी विवेकानंद ने कहा कि मंदिर नहीं तो क्या हुआ, हम भारतीयों की श्रद्धा तो अभी भी जीवित है। जब तक हमारी श्रद्धा है कि राम अयोध्या के हैं तब तक राम अयोध्या के ही रहेंगे और जिस दिन हमारी श्रद्धा अत्यधिक प्रबल हो जाएगी उस दिन अयोध्या में उनका भव्य मंदिर फिर से बनकर खड़ा हो जाएगा। आज अयोध्या का राम मंदिर स्वामीजी की भविष्यवाणी का साक्षात् प्रमाण है।
तो साथिओ,स्वामीजी की जयंती को समर्पित इस दिव्य लेख का यहीं पर समापन होता है,कल कैप्टन सेविएर जी की पत्नी मैडम सेविएर द्वारा प्रदान की गयी आर्थिक एवं भावनात्मक सहायता का वर्णन करने की योजना है।
