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स्वामी विवेकानंद  की रॉकफेलर और टेस्ला से मीटिंग: रिवाइज्ड एडिशन- लेख श्रृंखला का 18वां लेख 

हमारे साथी जानते हैं कि हम दोनों के बीच ज्ञानप्रसाद लेखों पर चर्चा होती ही रहती है, कल ही निर्णय ले लिया था कि आने वाले सोमवार,12 जनवरी को वर्तमान  लेख श्रृंखला का समापन कर दिया जाए लेकिन स्वामीजी को यह मंज़ूर नहीं था। 

जब आज की वीडियो बना रहे थे तो एकदम 2022 (और वह भी जनवरी में ही) में प्रकाशित एक लेख का स्मरण हो आया जिसे हमने बड़े ही परिश्रम से,अनेकों प्रकार की रिसर्च करके प्रकाशित किया था। यह लेख Attached वीडियो के साथ मेल खाता है लेकिन इसमें टाटा की मुलाकात का वर्णन नहीं है, उस मुलाकात का वर्णन अगले लेख में करेंगें। 

चार वर्ष पुराने लेख का पुनः प्रकाशित होना और वोह भी जनवरी में जो  स्वामीजी की जयंती से सम्बंधित है,मात्र संयोग तो हो नहीं सकता, साक्षात् निर्देश ही कहा जा सकता है।

प्रस्तुत है 25 जनवरी 2022 को प्रकाशित लेख का संशोधन के साथ रिवाइज्ड एडिशन। 

दिव्य सत्ताओं से करबद्ध प्रार्थना है कि इसी तरह के निर्देश मिलते रहें ताकि हम अपने रक्त की अंतिम बूँद उनके चरणों में अर्पित कर सकें।

हो सकता है कि वीडियो और लेख दोनों एक साथ प्रकाशित होने के कारण कमैंट्स इधर-उधर हो जाएँ,लेकिन ध्यान से किये गए कमेंट शायद ही गायब हों।   

     

30 जुलाई 1893 को स्वामी विवेकानंद अमेरिका पहुंचे।  वहां शिकागो में धर्म संसद का आयोजन होना  था।  अमेरिका प्रवास के दौरान एक फ़्रेंच सिंगर एमा काल्वे उनकी शिष्या बनी।  एमा काल्वे ने अपनी एक दोस्त को विवेकानंद और रॉकफ़ेलर की मुलाक़ात का किस्सा सुनाया था।  

रॉकफ़ेलर कौन? पहले ये जान लेते हैं। 

पूरा नाम जॉन डी रॉकफ़ेलर, एक अमरीकी बिजनेसमैन हुआ करते थे, क़तई रईस, शायद आधुनिक इतिहास के सबसे ज़्यादा रईस व्यक्ति।  रेफेरेंस के लिए समझिए कि अमेरिका में तेल का धंधा शुरू करने वाले पहले व्यक्ति थे, आज 2026 में भी अमेरिका में तेल के लिए ही भागदौड़ मची पड़ी है। उन्होंने स्टैंडर्ड ऑयल नाम की एक कम्पनी बनाई  जो अमेरिका का 90% ऑयल ट्रेड चलाती थी। बाद में स्टैंडर्ड ऑयल ही टूटकर एक्सॉन-मोबिल और शेवरन जैसी बड़ी तेल कम्पनियां बनीं। 

अमीरी  के हिसाब से देखा जाये तो 1937 में,97 वर्ष की आयु में जब रॉकफ़ेलर की मृत्यु हुई तब उनकी दौलत थी 1400 मिलियन  अमेरिकी डॉलर थी। 

रॉकफ़ेलर और स्वामी विवेकानंद की मुलाक़ात अप्रैल 1894 में हुई।  धर्म संसद में अपने भाषण  के उपरांत स्वामी जी बहुत ही प्रसिद्ध हो चुके थे। 55  वर्षीय जॉन रॉकफ़ेलर तब मानसिक अवसाद से गुजर रहे थे। इस अवसाद ने उनके स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाला।  सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव था उनके शरीर  से बालों  का गायब होना और पाचन क्रिया पर प्रभाव होना। धीरे-धीरे उनके सिर के बाल और बाद में मूंछ के बाल भी गायब हो गए।  कई बार अवसाद का प्रभाव ऐसा भी होता है। ऐसे में उनके दोस्तों ने उन्हें भारत से आए इस “स्वामी ,भिक्षु”  से मिलने की सलाह थी।  उस समय स्वामी  विवेकानंद अपने एक सहयोगी के यहां ठहरे हुए थे  जो रॉकफ़ेलर का दोस्त हुआ करता था। 

एक दिन जब रॉकफेलर अपने दोस्त से मिलने पहुंचे तो पता चला कि स्वामीजी यहीं ठहरे हुए हैं। रॉकफ़ेलर सीधे उनके कमरे में जा घुसे। उन दिनों  रॉकफ़ेलर की हैसियत ऐसी थी कि अमेरिका के राष्ट्रपति भी उन्हें  नज़रअन्दाज़ नहीं कर  सकते थे। विवेकानंद एक पुस्तक पढ़ने में मग्न थे।  उन्होंने रॉकफ़ेलर की तरफ़ देखा तक नहीं। अंत में जब ध्यान दिया तो दोनों में बात शुरू हुई। स्वामी  विवेकानंद को अहसास हुआ कि रॉकफ़ेलर अथाह  धन सम्पत्ति के मालिक हैं लेकिन फिर भी अत्यंत  दुःखी  और निराश हैं।  स्वामी जी ने उनसे कहा : 

“हां, बिलकुल”,  रॉकफ़ेलर ने उत्तर  दिया। 

स्वामी विवेकानंद ने  कहा: 

रॉकफ़ेलर को लगा यह  सन्यासी क्या बोले जा रहा है, औरों को अपना धन दान करने  से मेरी क्या सहायता  होगी।  रॉकफ़ेलर उठे और चलते बने।  एक सप्ताह ही गुज़रा  होगा कि  रॉकफ़ेलर ने  विवेकानंद से फिर से  मिलने का निश्चय किया।  कमरे में प्रवेश करते  ही उन्होंने स्वामीजी की  टेबल पर  एक काग़ज़ का टुकड़ा रखा।  उसमें वह राशि  थी जो रॉकफ़ेलर ने चैरिटी के लिए दान की थी। रॉकफेलर बोले, “ये रहा चेक, अब तो तुम संतुष्ट हो गए होगे। अब  तुम इस चैरिटी के लिए   मुझे धन्यवाद कह सकते हो।” 

स्वामी विवेकानंद ने टुकड़ा उठाया और बोले:

बाद में रॉकफ़ेलर ने “रॉकफ़ेलर फ़ाउंडेशन” नाम की एक चैरिटी संस्था की स्थापना की  और अमेरिका के सबसे बड़े जनहितैषी और दानी  के तौर पर जाने गए।

1950 में रॉकफ़ेलर फ़ाउंडेशन की मदद से पुणे में “वाइरस रिसर्च लैब” की स्थापना हुई और इसी फ़ाउंडेशन ने भारत में एग्रीकल्चर रिसर्च के लिए मदद देने का काम भी किया।  

ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि रॉकफ़ेलर की चैरिटी का समस्त श्रेय स्वामी विवेकानंद को मिलता है लेकिन इतना अवश्य  है कि स्वामी विवेकानंद से मुलाक़ात का उनकी सोच पर गहरा असर पड़ा था।  

यही है  सोच में परिवर्तन, यही है हमारे परमपूज्य गुरुदेव का “विचार क्रांति अभियान  Thought Revolution Campaign.” 

जहाँ तक दान की बात की जाये तो रॉकफेलर  बचपन से ही अपनी माँ के साथ चर्च जाया करते थे, माँ अक्सर कहा करती थी कि कुछ सिक्के दान भी किया करो। एक बार तो चर्च के फादर ने आशीर्वाद देते हुए  कहा था “तुम अपनी समर्था से जितना हो सके कमाओ लेकिन जितना हो सके उतना दान भी करो” रॉकफेलर इस आशीर्वाद को याद करते कहते थे शायद इसी क्षण मेरे जीवन का Financial Plan बन चुका  था  और   पैसा कमाना  “ईश्वर प्रदत्त उपहार” माना जाता सकता है। माँ द्वारा बचपन की शिक्षा ही थी जिसने रॉकफेलर के अंदर दान प्रवृति पैदा की। इतिहास में विवरण मिलते हैं कि जब 16 वर्ष की आयु में उन्होंने क्लर्क की नौकरी आरम्भ  की तो अपनी आय का  6 प्रतिशत दान में देते थे। 20 वर्ष की आयु पहुँचते-पहुँचते उनकी चैरिटी आय का 20 प्रतिशत हो गयी।

यह पंक्तियाँ हमने इस कारण लिखी हैं हम इस तथ्य को Certify कर सकें कि भगवान  जब हमें इस संसार में भेजते हैं तो कोई  विशेष उदेश्य ही देकर भेजते हैं और उसी प्रकार के संस्कार बनाने में सहायता और मार्गदर्शन भी मिल ही जाता है।  रॉकफेलर तो बचपन से ही धार्मिक और दानी प्रवृति के थे लेकिन जिस समय स्वामी विवेकानंद को मिले वह  अवसाद के कारण बहुत ही दुःखित स्थिति में थे।  जब इंसान दुःखी होता है तो  हर किसी प्रकार का प्रयास करता है और साधन भी बन ही जाते हैं, स्वामी जी के साथ उनका संपर्क करवाने के लिए विधाता ने उनके जानकारों को ही तो माध्यम बना दिया, जिनके घर स्वामी जी प्रवास कर रहे थे। 

1896 में अमेरिका में एक नाटक मशहूर हुआ। नाटक का नाम था “इजिएल (Iziel)।” सैरा बर्नहार्ट नाम की एक एक्ट्रेस मुख्य भूमिका में थी और फ़्रेंच भाषा के इस नाटक की विषय वस्तु थी “बुद्ध का जीवन” नाटक में बुद्ध जब ध्यान में मग्न थे  तब “इजिएल” नाम की एक लड़की बुद्ध को रिझाने की कोशिश करती है। 

फरवरी 1896 में स्वामी विवेकानंद इस नाटक को देखने पहुंचे। एक्ट्रेस सैरा बर्नहार्ट ने दर्शक गैलरी  में स्वामी विवेकानंद को बैठे देखा।  नाटक  समाप्त  होने के उपरांत उन्हें मुलाक़ात के लिए बुलाया।  इत्तेफ़ाक ये कि इस दौरान यूगोस्लाविया के  मशहूर वैज्ञानिक और इनोवेटर निकोला टेस्ला भी यहां मौजूद थे। टेस्ला और स्वामी विवेकानंद की यह  पहली मुलाक़ात थी ।  39 वर्षीय  टेस्ला तब तक AC मोटर का आविष्कार कर चुके थे  और निकोला टेस्ला कम्पनी भी खोल चुके थे। इत्तेफ़ाक था कि इससे कुछ दिन पहले ही स्वामी विवेकानंद ने एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने टेस्ला का ज़िक्र किया था।  विवेकानंद रचनावली, वॉल्यूम फ़ाइव में इस पत्र का ज़िक्र है। विवेकानंद लिखते हैं,

Mr. Tesla thinks he can prove the transformation of force and matter into energy with Math Equations. I look forward to meeting him next week to see his new mathematical experiment.”

इसी पत्र में वह  आगे कहते हैं कि टेस्ला का यह प्रयोग वेदांत की साइंटिफिक जड़ों  को साबित कर देगा जिसके मुताबिक़ यह पूरा विश्व अनंत ऊर्जा का ही रूपांतरण (Transformation of energy) है।  दोनों के बीच ठीक-ठीक क्या बात हुई यह तो किसी जगह पर दर्ज़ नहीं है  लेकिन बाद में टेस्ला के लेखन और रिसर्च पर इस मुलाक़ात का प्रभाव दिखता है।  

1907 में टेस्ला ने “Man’s Greatest Achievement” शीर्षक के साथ एक लेख लिखा।  इसमें उन्होंने ‘आकाश’ और ‘प्राण’ जैसे संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया है।  टेस्ला लिखते हैं :

“सभी पदार्थ मूल रूप से एक ही तत्व से निकले हैं और इस तत्व की कोई शुरुआत नहीं है। सम्पूर्ण आकाश में यही फैला हुआ है और ये तत्व जीवन देने वाले प्राण या रचनात्मक ऊर्जा से प्रभावित होता है।” 

All matter is originally derived from the same element. And this element has no beginning. It is spread all over the sky. And this element is influenced by the life-giving prana or creative energy.

इसके अलावा अतर्राष्ट्रीय टेस्ला सोसायटी के अध्यक्ष रहे टॉबी ग्रोट्ज का एक आलेख है जिसमें टेस्ला और विवेकानंद की मुलाक़ात का ज़िक्र करते है। हालांकि टेस्ला पदार्थ और ऊर्जा के संबंध को स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पाए थे लेकिन वेदांत दर्शन के प्रभाव के चलते इस पर उनका पक्का भरोसा था।  बाद में वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने पदार्थ-ऊर्जा संबंध समीकरण को साबित किया था।

1897 में भारत लौटकर स्वामी विवेकानंद के लेक्चर्स में भी टेस्ला का ज़िक्र मिलता है। एक जगह वो कहते हैं,

“वर्तमान के कुछ सबसे बुद्धिमान वैज्ञानिकों ने वेदांत के विज्ञान सम्मत होने को स्वीकार किया है। इनमें से एक को मैं निजी तौर पर जानता हूं।  यह व्यक्ति दिन रात अपनी लैब में ही लगा रहता है  इसके पास खाने का वक्त भी नहीं है लेकिन मेरे द्वारा दिए गए वेदांत के लेक्चर को अटेंड करने के लिए वो घंटों खड़ा रह सकता है।  उसके अनुसार ये लेक्चर  इतने विज्ञान सम्मत हैं कि विज्ञान आज जिन निष्कर्षों पर पहुंच रहा है ये उनसे पूरी तरह मेल खाते हैं। ”

Mr. Tesla, is one of the real scientists and inventors of his age. More than thirty years ago, sitting in Delmonico’s old restaurant in New York, at 26th Street and Fifth Avenue, he raised in his hand a small wine glass, and said: “The power that holds together the molecules and atoms in that glass, if it could be released, would run the machinery of the biggest factory in the United States.” That seemed wild imagining then. It is taught to children in school now. Everybody knows that the force holding together the electrons within the atom, as they revolve around the nucleus, trillions of times in a second, is great beyond our imagining.

धन्यवाद्  


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