8 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
स्वामी विवेकानंद एवं परम पूज्य गुरुदेव की विदेश यात्रायें जिन परिस्थितिओं में सम्पन्न हुई थीं उनसे हम सब परिचित हैं। आजकल की यात्राओं की तुलना में वोह यात्राएं बिलकुल ही अलग थीं, पानी के जहाज़, कई-कई दिन पानी में ही रहना,अनेकों तरह की समस्याएं थीं। आजकल तो मात्र 5 घंटे की हवाई यात्रा में ही फैशनेबुल Jetlag हो जाता है। जो भी हो, दोनों सन्यासिओं के परिश्रम एवं उद्देश्य को हम सब ने, हम शिष्यों ने ही आगे बढ़ाना है,तभी सच्ची गुरुभक्ति समझी जाएगी।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में स्वामीजी की दूसरी विदेश यात्रा के संक्षिप्त से वर्णन के इलावा और भी बहुत शिक्षा की बातें हैं। गिरते स्वास्थ्य के कारण डॉक्टरों की सलाह पर विदेश यात्रा एवं उनके ह्रदय में उठती असीम की पुकार ने भारत बुला लिया।
तो साथिओ,आइए आज के जादू के पिटारे में एक और पारसमणि का अनुभव करें, यही है वोह पत्थर जिसे छू कर बहुमूल्य व्यक्तित्व का निर्माण होता है, ज्ञान की पारसमणि
आज के लेख के साथ संलग्न की गयी शार्ट वीडियो भी आद चंद्रेश जी का योगदान है जिसके लिए हम आभारी हैं।
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भारतवर्ष में स्वामीजी ने बहुत ही कम भाषण दिये थे । यहाँ पर उनका प्रमुख कार्य व्यक्ति निर्माण के लिए भूमि तैयार करना था। स्वामीजी ने विश्वभर में दिए गए साइक्लोनिक भाषणों में छिपे शब्द-तरंग रूपी बीज भारत में बिखेरे तो उन बीजों का ही फल हमें भारत की वर्तमान उन्नति में दिख रहा है। स्वामीजी ने जो जन-जागरण का शंखनाद किया था, उसी के परिणामस्वरूप बीसवीं शताब्दी के भारत में परिवर्तन देखने को मिले। यह कोई संयोग नहीं बल्कि नियति है कि उसी पीरियड में लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस,नेहरू आदि अनेकों नेताओं ने भारत के स्वाधीनता-आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उस भूमिका के पीछे “स्वाधीनता के ऋत्विक् स्वामी विवेकानन्द का सशक्त सन्देश और उनके आह्वान” की ही प्रेरणा थी।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रत्येक साथी इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि किसी मनुष्य के व्यक्तित्व बनाने में प्रेरणा और प्रोत्साहन का कितना बड़ा योगदान है। परम पूज्य गुरुदेव ने स्वयं शांतिकुंज को महामानवों और युगपुरुषों के गढ़ने की टकसाल कहा है। वातावरण,शिक्षा,प्रेरणा और प्रोत्साहन सभी अपने-अपने स्थान पर योगदान देते हुए इस ज्ञानरथ परिवार में भी ऐसे महामानवों को जन्म दे रहे हैं जिन्हें देखकर विश्वास करना बहुत ही कठिन है।
स्वामीजी की शिक्षा से ही प्रेरित होकर 1921 में महात्मा गाँधी ने बेलूड़ मठ में उनकी जन्मतिथि पर एक भाषण में कहा था:
“मैं यहाँ असहयोग आन्दोलन या चरखे का प्रचार करने नहीं आया हूँ। मैं स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिवस पर उनकी पुण्यस्मृति में श्रद्धांजलि अर्पित करने आया हूँ। मैंने स्वामीजी के ग्रन्थ बड़े ही ध्यानपूर्वक पढ़े हैं और इसके फलस्वरूप देश के प्रति मेरा प्रेम और भी बढ़ गया हैं। युवकों से मेरा अनुरोध है कि स्वामी विवेकानन्द जहाँ निवास करते थे, जहाँ उन्होंने देहत्याग किया, वहाँ से कुछ प्रेरणा लिये बिना, खाली हाथ मत लौटें ।”
गाँधीजी की इस उक्ति से पता चलता है कि उस समय के एवं उसके बाद के भारत के प्रमुख नेताओं पर स्वामीजी के जीवन और वाणी का कितना अधिक प्रभाव पड़ा है।
किसी भी देश का भाग्य उसके आम नागरिकों की शिक्षा और जीवन स्तर पर निर्भर करता है। स्वामीजी ने कहा था:
“याद रखो, प्रत्येक देश में यह आम जनता ही राष्ट्र की मेरुदण्ड, रीढ़ की हड्डी (Spinal cord) हैं। असली भारत का निवास निर्धनों की कुटिया में ही हैं लेकिन अफ़सोस है कि उनके लिए कभी, किसी ने, कुछ भी नहीं किया।”
इसीलिए हम देखते हैं कि उन्होंने अपने शिष्यों को अधिक से अधिक अनाथालय, चिकित्सालय और जनशिक्षा केन्द्र खोलकर दीन-दुखियों की सेवा करने की प्रेरणा दी और उत्साहित किया। वे और भी कहा करते थे:
“जो धर्म गरीबों का दुःख दूर नहीं करता, वह धर्म क्या धर्म कहलाने योग्य है?”
श्रीरामकृष्णदेव का कहना था कि खाली पेट धर्म नहीं होता। सर्वप्रथम “कूर्मदेवता” की पूजा आवश्यक है। अतः अन्न की व्यवस्था करने के लिए ही मैं लोगों को रजोगुणी होने का उपदेश देता हूँ। वर्तमान युग की आवश्यकता के अनुसार विवेकानन्द ने दरिद्रनारायण की सेवा, नरनारायण की पूजा के लिए सभी का आवाहन किया है।
उपरोक्त पंक्तियों में रामकृष्ण परमहंस ने “कूर्मदेवता की पूजा और रजोगुणी” होने के पीछे के सिद्धांत को कछुए का उदाहरण देकर समझाया है। वह कहते हैं कि कछुए (कूर्म) की भांति स्थिर और एकाग्र होकर ईश्वर की साधना की जाये, एक ऐसी साधना जिसमें साधक अपने अंगों (आंखों, कानों, आदि) को धीरे-धीरे समेटकर केवल ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करता है और बाहरी दुनिया से विरक्त होता है यह साधना सांसारिक आकर्षणों (विषय विकार आदि ) से ध्यान हटाकर, विरक्त होकर, ईश्वर में प्रेम (ईश्वरानुराग) स्थापित करने का एक तरीका है, जहाँ बाहरी दुनिया की चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं और केवल भगवान केंद्र में रहते हैं।
यह शिक्षा एकाग्रता (Concentration) का पाठ पढ़ाती है। जैसे कछुआ अपने अंगों को खोलता और बंद करता है, वैसे ही साधक को अपनी इंद्रियों (आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) को बाहरी विषयों से हटाकर केवल ईश्वर पर केंद्रित करना चाहिए।
यह शिक्षा वैराग्य (Detachment) का पाठ पढ़ाती है। एक तरफ सांसारिक सुख और इच्छाएं (भोग) और दूसरी तरफ आध्यात्मिकता। दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते।
आध्यात्मिक जीवन का एकमात्र लक्ष्य ईश्वर ही होता है ऐसा होते ही सांसारिक इच्छाएँ अपनेआप कम होने लगती हैं।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि रामकृष्ण परमहंस का यह उपदेश “कछुए की तरह” साधना करने का है, जिसका अर्थ है बाहरी दुनिया की बातों और इच्छाओं से धीरे-धीरे अपनी इंद्रियों को समेटकर, पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाना और उनकी प्राप्ति के लिए एकाग्रता व वैराग्य साधना का पालन करना।
लेकिन यहीं पर कहा जा रहा है कि पेट पालने के लिए रजोगुणी होना भी आवश्यक है। एक तरफ संसारिक बंधनों से विरक्त होने को कहा जा रहा है और दूसरी तरफ कर्म, चंचलता, भोग-विलास, महत्वाकांक्षा, और भौतिक इच्छाओं की प्रबलता का महत्व बताया जा रहा है। तो है न बिल्कुल एक दूसरे के विपरीत,Controversial !!! बिलकुल नहीं !!
रजोगुण का उदाहरण देकर कर्मफल से बांधने की प्रेरणा देना है, यह गुण व्यक्ति को कर्म करने की प्रेरणा देता है।
स्वामीजी ने दरिद्रनारायण की सेवा, नरनारायण की पूजा पर बल तो अवश्य दिया है लेकिन कछुए की भांति अपनी ही स्पीड में कर्म करने के सिद्धांत को कभी भी नकारा नहीं है। उन्होंने इस बात का सख्त विरोध किया है कि हाथ पर हाथ रखे बैठा रहा जाये और लोगों की ओर सहायता के लिए ताकते रहा जाए। उन्होंने तो 3Hs (Heart,Head और Hand), दिल,दिमाग और हाथ की तीनों संयुक्त शक्तियों के लिए कहा है। आत्मबल,आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता आदि इसी शिक्षा की Branches हैं।
ऐसी शिक्षा एवं प्रेरणा के कारण ही स्वामीजी की योजनाएँ आज भी एक-एक करके साकार हो रही हैं।
स्वामीजी विदेश में भारत के कल्याण के लिए ही गए थे, उन्होंने भारत आने पर भी पाश्चात्य देशों में आरम्भ किये कार्यों को कभी भूलाया नहीं क्योंकि भारत की उन्नति उन्हीं योजनाओं की सफलता पर ही निर्भर थी।
अत्यधिक कार्यभार एवं भारतवासिओं की लगातार चिंता से उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही जा रहा था। अतः डाक्टरों की सलाह पर वे एक बार फिर से विदेश यात्रा के लिये तैयार हुए। इस बार उन्होंने स्वामी तुरीयानन्द को साथ में लिया। सिस्टर निवेदिता ने भी अपनी नारी शिक्षाकार्य योजना के लिए धन की व्यवस्था करने को उनके साथ ही इंग्लैंड जाने का निश्चय किया।
20 जून 1899 को कोलकाता से जहाज में बैठकर, मद्रास, कोलम्बो, अदन, नेपल्स होते हुए 31 जुलाई को स्वामीजी लन्दन पहुँचे। वहाँ मित्रों और शुभचिन्तकों की अपार भीड़ एकत्र हो गयी थी लेकिन स्वास्थ्य के कारण इस बार उन्होंने लन्दन की किसी सभा आदि में कोई भी व्याख्यान नहीं दिये। लन्दन में मात्र दो सप्ताह ही रहने के बाद 16 अगस्त को न्यूयार्क आ गए । इस बार उन्होंने अमेरिका में एक वर्ष बिताया। अधिकांश समय सैन फ्रांसिस्को, लास ऐंजेल्स और औकलैण्ड आदि अमेरिका के पश्चिमी भाग में रहते हुए, 50 से भी अधिक व्याख्यान दिये।अमेरिका के इस भाग में अपने कार्य का प्रसार देखकर वे अतीव आनन्दित एवं सन्तुष्ट हुए।
पश्चिम की इस बार की यात्रा में स्वामीजी अमेरिका और यूरोप की संगठन-शक्ति के पीछे छिपे पदार्थवाद, भौतिकवाद की भूख, स्वार्थ, महत्त्वाकांक्षा और साम्राज्यवाद की लालसा को अच्छी तरह समझ गये। इस सन्दर्भ में उन्होंने निवेदिता से कहा था:
“पश्चिम की जीवनयात्रा एक खोखली,ऊँची हँसी के समान है, जिसके भीतर छिपा है रुदन और उसकी परिसमाप्ति भी रुदन में ही होती है।”
यहाँ पर हर कोई वर्तमान के लिए ही जी रहा है, एक Never-ending अंधी रेस में लगा हुआ है। भूतकाल की कोई बात ही नहीं करता क्योंकि वह रूढ़िवाद है,आदिमानव-वाद है और भविष्य की किसी को चिंता ही नहीं है क्योंकि कल किसने देखा है ?
तो साथिओ आज के प्रतक्ष्यवादी और भौतिकवादी संसार में क्या हम और आप ऐसा ही नहीं देख रहे ? क्या टीवी चैनल्स पर,हमारे फ़ोन पर कुछ ऐसा ही नहीं परोसा जा रहा? क्या ऐसे ही प्रोडक्ट को प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा ?
गायत्री परिवार,विवेकानंद मिशन जैसी कुछ मुट्ठीभर संस्थाएं निस्वार्थ सेवा करते हुए यूनिवर्सल Brotherhood, वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत को अनवरत,निस्वार्थ आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं,यही सिद्धांत हमारे छोटे से परिवार को भी प्रेरित किये जा रहे हैं। हमें विश्वास करना चाहिए कि इन मुट्ठीभर संस्थाओं के द्वारा ही मानव धर्म की स्थापना होना निश्चित है। पांडव भी तो केवल पांच ही थे कितने बड़े योद्धाओं को हराने में सफल हुए थे क्योंकि उनके साथ भगवान् थे।
24 अक्तूबर को चार मित्रों के साथ पेरिस से चलकर स्वामी जी विएना, हंगरी,सर्बिआ , रुमानिया, बल्गेरिया होते हुए मिस्र पहुँचे। इस बार उन्हें यूरोप का कोई भी नगर अच्छा नहीं लग रहा था। वे अपने हृदय में असीम की पुकार सुन रहे थे। इसीलिए वे भारत लौटने को व्यग्र हुए और सबसे पहले जो जहाज मिला उसी में भारत के लिए रवाना हो गये।
9 दिसंबर 1900 को स्वामीजी वापिस बेलूड़ मठ आ गए। ठीक डेढ़ वर्ष बाद वे टूटी फूटी देह और बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य लेकर भारत लौटे थे।
मायावती आश्रम के संस्थापक कैप्टेन सेवियर के निधन का समाचार पाते ही श्रीमती सेवियर को इस असहनीय शोक में सान्त्वना देने हेतु वे मायावती जाने को तैयार हुए। गुरुभाई स्वामी सारदानन्द तथा शिष्य स्वामी सदानन्द को साथ लेकर भीषण ठंड और हिमपात के बीच 3 जनवरी 1901 को वे मायावती पहुँचे। उन्हें देखकर श्रीमती सेवियर को थोड़ा ढाढ़स बँधा।
सेवियर दम्पति ने ब्रिटिश होने के बावजूद अपने हृदय का रक्त देकर भारत की सेवा की है। वहाँ हिमालय के ध्यानमय वातावरण में स्वामीजी पन्द्रह दिन रहे।
बेलुड़ मठ लौटकर वे फिर अपने आदर्शों को मूर्त रूप देने में लग गये। भारत के सभी प्रान्तों से लोग उनसे मिलने आया करते थे। वे सभी को देश की सेवा में जीवन उत्सर्ग करने की प्रेरणा देते। उन्होंने कहा था: “इस बार केन्द्र है भारतवर्ष।”
कल तक के लिए मध्यांतर
धन्यवाद् जय गुरुदेव