7 जनवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
साथिओं द्वारा पोस्ट किये जा रहे कमैंट्स/काउंटर कमैंट्स,उनकी सक्रियता इस बात के साक्षी हैं कि वर्तमान लेख श्रृंखला में सभी इस कदर डूब चुके हैं क्या कहा जाये। हमारे बारे में अगर पूछा जाये तो केवल इतना ही कहा जा सकता है वर्षों के विद्यार्थी जीवन में किसी भी सब्जेक्ट में इतना आनंद नहीं आया जितना कि ज्ञानप्रसाद लेखों के संपादन में आ रहा है। गुरुदेव एवं स्वामीजी की दिव्य शक्ति स्वयं ही सब कुछ निकाल कर आगे रखे जा रही है, हमें तो लेख शृंखला के समापन की तिथि का भी कुछ अनुमान करना कठिन लग रहा है। हाँ इतना अवश्य कह सकते हैं कि 12 जनवरी को स्वामीजी के जन्म दिवस पर एक अति उत्तम वीडियो सेव करके रखी है उसे ज़रूर ही प्रकाशित करेंगें।
आज के लेख में स्वामीजी की अति समर्पित अमेरिकन शिष्या Josephine MacLeod का बहुत ही संक्षिप्त सा विवरण है। इस शिष्या के बारे में ऑनलाइन इतना कुछ प्रकाशित है कि बीच-बीच में से चुनकर निकालना हमारे लिए एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य था। इस शिष्या के बारे में लिखने के पीछे उद्देश्य था कि हम सब स्वामीजी के विदेशी शिष्यों के बारे में एक झलक सी पा सकें।
तो आइए आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करें।
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हिमालय के आश्रम (मायावती आश्रम) को सुप्रतिष्ठित करने के बाद, स्वामीजी अपने पाश्चात्य शिष्यों को भारतीय धर्म व संस्कृति से परिचित कराने के उद्देश्य से उन्हें साथ लेकर काश्मीर-यात्रा को चल पड़े। काश्मीर के विभिन्न स्थानों में उन्होंने तीन महीने से भी अधिक समय बिताया। अन्य तीर्थयात्रियों के साथ वे भी अमरनाथ दर्शन को गये। वहाँ वे केवल कौपीन (लंगोट) धारण किये तुषारमय गुफा में जाकर ध्यानमग्न हो गये एवं सदाशिव अमरनाथ के दर्शन किये।लौटते समय उन्होंने क्षीरभवानी में सात-दिन तक तपस्या की। काश्मीर की तीर्थयात्रा समाप्त कर स्वामीजी 18 अक्तूबर को बेलूड़ मठ लौट आये। काश्मीर में कठोर तप के फलस्वरूप उनका शरीर बहुत ही अस्वस्थ और दुर्बल हो गया था लेकिन उन्होंने उस पर ध्यान नहीं दिया।
मठ की नयी भूमि का निर्माणकार्य पूरा होते ही 9 दिसम्बर को स्वामीजी ने स्वयं ही विविध उपचारों के साथ पूजा और होम आदि किये एवं उसके बाद वहाँ भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की चिरकाल के लिए प्रतिष्ठा की। बेलूड़ मठ महान् तीर्थक्षेत्र में परिणत हुआ।
स्वामीजी ने प्रार्थना की थी:
“महायुगावतार श्रीरामकृष्ण बहुजन-हिताय बहुजनसुखाय” इस पुण्यक्षेत्र में दीर्घकाल तक विराजित रहते हुए इस स्थान को सभी धर्मों का अपूर्व समन्वय केन्द्र बनाये रखें।”
सारे जगत् का हित एवं श्रीरामकृष्ण-प्रवर्तित भावधारा का प्रचार करने के लिए वे बँगला में एक मासिक पत्रिका निकालने की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे। 14 जनवरी 1899 को, स्वामी त्रिगुणातीतानन्द के सम्पादन व संचालन में “उद्बोधन पत्रिका ” का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ। यह पत्रिका रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की एकमात्र बंगाली प्रकाशन के रूप में भी विकसित हुई और रामकृष्ण और विवेकानंद की साहित्यिक कृतियों की प्रमुख प्रकाशन बनी रही । “उद्धोधन पत्रिका” के कार्यालय में पुस्तकालय सुविधाएं, पढ़ने और पुस्तकों को उधार लेने की सुविधाएं उपलब्ध हैं। संग्रह में इतिहास, संस्कृति, वेद, उपनिषदों से लेकर साहसिक कहानियाँ शामिल हैं।
यहाँ पर यह बताना बहुत ही प्रासंगिक लगता है कि वोह स्वामीजी जो कभी पाई-पाई के मोहताज हो रहे थे उनके श्रीचरणों में समस्त विश्व ने कैसे अथाह धन उढ़ेल दिया।
ऑनलाइन रिसर्च करने पर ज्ञात होता है कि “उद्बोधन पत्रिका” के लिए जिस महिला ने आर्थिक एवं अन्य सहायता प्रदान की, वह शिकागो में जन्मीं Josephine MacLeod थीं। उन्होंने उद्बोधन प्रेस की स्थापना के लिए $800 की प्रारंभिक धनराशि प्रदान की थी।
स्वामी विवेकानंद के 15 लेखों का अमृतपान करने के बाद अब इतनी जानकारी तो अवश्य हो गयी है कि स्वामीजी के जीवन के साथ अनेकों विदेशिओं का सहयोग रहा है। लिस्ट इतनी लम्बी है कि हमारी विस्तृत रिसर्च के बावजूद सभी के नाम तक देने में हम स्वयं को अयोग्य मानते हैं, फिर भी कैप्टन सेविएर, मिसेज़ सेविएर, नोबल पुरस्कार विजेता रोमां रोलैंड,बिजनेसमैन रॉकफेलर, वैज्ञानिक निकोला टेस्ला, मैक्स मूलर,सिस्टर निवेदिता,सिस्टर,सिस्टर क्रिस्टीन, Josephine MacLeod जैसे नाम तो हमारी Finger tips पर रह ही सकते हैं।
स्वामीजी को हर कदम पर सहयोग देते विवरणों के देखकर, Josephine के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई और समझा गया कि यदि इस अमरीकन महिला के संक्षिप्त एवं प्रेरणादायक विवरण को साथिओं के समक्ष न लाया जाए तो सरासर अन्याय होगा। इन लेखों का अमृतपान करते अनेकों पाठकों में से न जाने कौन इन पंक्तियों को पढ़ ले और किस का ह्रदय प्रभावित और प्रोत्साहित हो जाये।
यह महिला सारी उम्र क्रिस्चियन ही रहीं लेकिन स्वामीजी द्वारा दिए गए वेदांत के भाषणों से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने कहा है कि स्वामीजी के उद्बोधनों से ही मैं एक बेहतर क्रिस्चियन बना पायी। 1902 में स्वामीजी के महाप्रयाण के बाद दो वर्ष गंभीर डिप्रेशन में चली गईं। डिप्रेशन से नजात पाते ही, 90 वर्ष की आयु में शरीर त्याग करने तक 40 वर्ष अनवरत वेदांत का प्रचार करती रहीं। 15 अक्टूबर 1949 को हॉलीवुड कैलिफ़ोर्निया में स्थित “वेदांत सोसाइटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया” में उनका देहांत हो गया।
26 दिसंबर 1858 को जन्मीं Josephine 37 वर्ष की आयु में, 29 जनवरी 1895 वाले दिन जब अपनी बहिन Betty के साथ न्यूयार्क में स्वामीजी के उद्बोधन सुनने आयी तो पहले ही दिन इतनी प्रभावित हुईं कि उस दिन को उन्होंने अपना आध्यात्मिक जन्मदिन मान लिया।
हमारे पूज्यवर,हमारे गुरुदेव भी उसी दिन को अपना आध्यात्मिक जन्मदिन मानते हैं जिस दिन वर्ष 1926 की वसंत पंचमी को उनके आध्यात्मिक गुरु सर्वेश्वरानन्द जी आंवलखेड़ा गांव में स्थित गुरुदेव की पूजास्थली में प्रकट हुए थे।
आगे चलने से पहले यह बताना उचित समझते हैं कि सिस्टर निवेदिता या सिस्टर क्रिस्टीन की भांति जोसेफिन मैक्लियोड कोई सन्यासिन नहीं थीं। वह स्वामी विवेकानंद की केवल एक अमेरिकी मित्र और भक्त थीं एवं उन्हें भारत से गहरा लगाव था। रामकृष्ण विवेकानंद आंदोलन की सक्रिय सहभागी थीं। विवेकानंद ने उन्हें “Tantine” and “Jo Jo उपनाम दिए थे जिनका अर्थ आंटी बताया गया है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद को अपना मित्र माना और उनकी वित्तीय मदद की। उन्होंने पश्चिम में विवेकानंद का वेदांत संदेश फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई एवं रामकृष्ण और विवेकानंद के संगठन के प्रारंभिक और बाद के विकास चरणों में कई योगदान दिए।
अंग्रेज़ों को भारत से बाहिर निकालने वाले “भारतीय राष्ट्रिय आंदोलन” में (विशेष तौर से बंगाल) में उनका विशेष वित्तीय योगदान माना गया है।
मैकलियोड को यह पसंद नहीं था कि कोई उसे विवेकानंद की शिष्या के रूप में संबोधित करे। उनकी भतीजी, लेडी सैंडविच ने टिप्पणी की कि वह स्वामी की दोस्त नहीं बल्कि “उसकी” अर्थात परमपिता परमात्मा की मित्र थीं। स्वामीजी भी उनका बहुत सम्मान करते थे, एक पत्र में स्वामीजी लिखते हैं कि “मैं आपका ऋणी हूँ और इस अपार ऋण को मैं कल्पना में हीं चुका सकता हूँ।” भारत में ब्रिटिश हकूमत और कोलकाता में बेलूर मठ के बीच संघर्ष के मुद्दों को हल करने के लिए मैकलियोड ने इंग्लैंड में ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों के साथ हस्तक्षेप किया।
एक बार मैकलियोड ने स्वामी विवेकानंद से पूछा था कि क्या वह उनके साथ भारत आ सकती हैं । स्वामीजी का उत्तर था,
“अगर तुम्हें गंदगी, पतन, गरीबी और कई धोती पहनकर धर्म की बातें करने वाले अधनंगे लोग देखने हैं तो अवश्य आओ । अगर तुम्हें कुछ और चाहिए तो मत आओ। भारतीय लोगों की विश्वभर में पहले से ही बहुत आलोचना होती है, हम एक और आलोचना नहीं सह सकते।”
जब वह भारत आईं तो उनसे पूछा गया कि वह स्वामी विवेकानंद के लिए क्या कर सकती हैं, तो उन्होंने गंभीरतापूर्वक उत्तर दिया, “भारत से प्रेम करना ही स्वामीजी की शिक्षा है।”
1895 में जब उन्होंने भगवदगीता, जो हिन्दू शास्त्रों में सबसे महत्वपूर्ण है, पर स्वामीजी के व्याख्यान को याद किया, तब उन्होंने कहा:
मैंने अपनी इन आंखों (उन्होंने अपनी आंखों की ओर इशारा किया) से स्वयं भगवान् कृष्ण को वहां खड़े देखा और गीता का उपदेश देते देखा। यह मेरी पहली अद्भुत दृष्टि थी। मैं घूरती रही और घूरती रही… मैंने केवल रूप देखा और सब कुछ गायब हो गया।
1898 में उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साथ उत्तर भारत की यात्रा की, जिसमें अल्मोड़ा, कश्मीर और पंजाब के कुछ हिस्से शामिल थे। भारत में रहते समय वह बेलूर मठ की पुरानी इमारत में रहती थीं। 1899 में जब स्वामीजी न्यूयॉर्क में दूसरी बार आए, तो उन्होंने उनकी हर संभव देखभाल की । कप्तान सेवियर, जो अपनी पत्नी शार्लोट सेवियर के साथ लंदन में स्वामी विवेकानंद के व्याख्यान में भाग लेने के बाद उनके शिष्य बने और जिन्होंने मयावती में अद्वैत आश्रम स्थापित किया, ने पहले से स्वामी विवेकानंद के बारे में अपने प्रभाव के बारे में मैकलियोड से ही परामर्श किया था।
मैकलियोड ने राजनीतिक संकटों से निपटने में रामकृष्ण मिशन की भी मदद की। दिसंबर 1916 में, बंगाल के तब के उप-राज्यपाल Lord Carmichael, ने रामकृष्ण मिशन पर आपत्तिजनक टिप्पणी की जिसे वापिस करवाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। रामकृष्ण मठ और मिशन हमेशा ही सरकार की नज़र में रहते थे। इसका मुख्य कारण संन्यासियों की राष्ट्रीय गतिविधियां एवं स्वामी विवेकानंद के प्रखर भाषण एवं आदर्श ही थे। रामकृष्ण मिशन को सरकार के दायरे में अनुकूल राय बनाने में मैकलियोड के उच्च स्तर की संपर्कों से मदद मिली।
आज के लेख का समापन इस जानकारी के साथ करना उचित समझते हैं कि स्वामीजी दूसरी बार अमेरिका कब गए थे :
स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम की दूसरी यात्रा 1899 में की जब वह लॉस एंजेल्स, कैलिफ़ोर्निया आए थे । उनकी वाक्शैली और हिंदू धार्मिक सिद्धांतों की प्रस्तुति और अन्य धार्मिक विश्वासों के साथ तुलना ने उन्हें अमेरिकी दर्शकों के बीच एक प्रसिद्ध व्यक्तित्व बना दिया। 1893—1897 और 1899–1902 के बीच, उन्होंने अमेरिका में अनेकों यात्राएँ की और विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए और वेदांत केंद्र भी स्थापित किए। अमेरिका के कई शहरों में ऐसे केंद्र हैं, जिनमें कैलिफ़ोर्निया के कई केंद्र शामिल हैं। 1899 में, न्यूयॉर्क में व्याख्यान देने के बाद, वह संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी भाग की ओर बढ़े और शिकागो के रास्ते लॉस एंजेल्स पहुँचे। इसके बाद उन्होंने कैलिफ़ोर्निया के ऑकलैंड, सान फ्रांसिस्को और अलामेडा में व्याख्यान दिए। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य वेदांत का प्रचार तो था ही लेकिन उनके गिरते स्वास्थ्य में डॉक्टरों की सलाह भी थी।
कल का लेख इससे भी अधिक रोचक और ज्ञानवर्धक होने वाला है
जय गुरुदेव,धन्यवाद्


