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स्वामीजी का “प्लेग मैनिफेस्टो” भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से शक्ति प्रदान करता है-लेख श्रृंखला का 15वां लेख 

आज के लेख में मुख्य तौर से स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए “प्लेग मैनिफेस्टो (घोषणा पत्र)” का वर्णन है। यह घोषणा पत्र राजनैतिक न होकर,पूर्णतया स्वामीजी की शिक्षा पर ही आधारित है एवं आत्मबल प्रदान कर रहा है। लेख के दूसरे भाग में “नारी का कल्याण नारी से ही संभव है” विषय पर संक्षिप्त चर्चा है। 

तो आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ,अपने सहपाठिओं के साथ, गुरुचरणों में समर्पित होकर, यहीं से होता है। 

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मार्च 1898 का समय था, स्वामी विवेकानंद कोलकाता  प्रवास पर थे और वह बेलूर में  एक मठ में रुके हुए थे। उन्हें स्वास्थ्य संबंधी अनेकों प्रकार की समस्याएँ हो रही थीं  और सुधार के कोई संकेत नहीं दिख रहे थे। ऐसी स्थिति को देखते हुए उनके गुरुभाइयों ने उन्हें दार्जिलिंग में प्रवास करने के लिए कहा क्योंकि पिछली यात्रा में हुए जलवायु परिवर्तन से  स्वामीजी को शारारिक लाभ हुआ था।

स्वामीजी 30 मार्च 1898 को दार्जिलिंग के लिए रवाना हुए और लगभग एक महीना वहाँ बिताया। हालांकि वहाँ  तक पहुंचने के लिए उन्हें पहाड़ पर अत्यधिक चढ़ाई करनी पड़ी, उस वर्ष जल्दी वर्षाऋतु होने के कारण उन्हें बुखार हो गया और बाद में खांसी और जुकाम भी रहा। अप्रैल के अंत में स्वामीजी ने कोलकाता वापिस  लौटने की योजना बनाई लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए  क्योंकि उन्हें फिर से बुखार और फिर फ्लू  का संक्रमण हो गया था। 

29 अप्रैल को उनके गुरुभाई स्वामी ब्रह्मानंद ने उन्हें सूचित किया कि कोलकाता में प्लेग महामारी फैल गई है, बहुत से लोग पलायन कर रहे हैं और यदि आप का स्वास्थ्य अभी ठीक नहीं हैं तो डॉक्टर से सलाह लें और कुछ दिनों के बाद ही वापसी करें। जैसे ही स्वामीजी को प्लेग की सूचना  मिली वे बीच में किसी भी स्थान पर रुके बिना कोलकाता  जाने के लिए तैयार हो गए। कोलकाता पहुंचते ही वह राहत उपायों को आयोजित करके प्लेग और भगदड़ दोनों से निपटने के किये मिशन में खुद को झोंक दिए थे। स्वामीजी ने सबसे पहले कोलकाता  के लोगों को एक पत्र लिखा जिसे “प्लेग मैनिफेस्टो” के नाम से जाना जाता है। 

मूल रूप से अंग्रेजी में फॉर्मेट किया गया और हिंदी और बंगाली में अनुवादित, स्वामी विवेकानंद ने अपने पत्र “प्लेग मैनिफेस्टो” में बंगाल के लोगों को “डर से मुक्त रहने के लिए कहा क्योंकि भय सबसे बड़ा पाप है।” 

स्वामीजी को पता था कि महामारी के वातावरण ने मानव को कमजोर कर दिया है। इसीलिए उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि 

उन्होंने इस डर को दूर करने का निम्नलिखित शब्दों में आग्रह किया:

अपने प्रेरणादायक शब्दों के बाद वह इन परिस्थितिओ में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इन बिंदुओं पर प्रकाश डालते हैं। वह स्वच्छ रहने के लिए,घर और उसके परिसर, कमरे, कपड़े, बिस्तर, नाली आदि को हमेशा साफ रखने के लिए कहते हैं। वह आगे कहते हैं की बासी, खराब भोजन न करें; ताजा और पौष्टिक भोजन लें। Low immunity के कारण कमजोर शरीर में बीमारी की आशंका अधिक होती है।

यह सुनिश्चित किया गया था कि कोलकाता  के हर घर में “प्लेग मैनिफेस्टो” की प्रतियाँ पहुंचे। प्रभावितों के लिए स्वामीजी राहत अभियान शुरू करने के लिए तैयार थे। जब उनके गुरुभाई ने उनसे पैसे के स्रोत के बारे में पूछा तो स्वामी जी ने कहा, 

ऐसी नौबत आई नहीं और उन्हें काम के लिए पर्याप्त धन मिल गया था। भूमि का एक व्यापक भूखंड सरकारी अधिकारियों के साथ समन्वय करके किराए पर लिया गया था जहां आइसोलेशन सेंटर स्थापित किए गए थे। राहत कार्य युद्धस्तर पर किया गया और स्वामी जी द्वारा अपनाए गए उपायों ने लोगों को विश्वास दिलाया कि वह महामारी से लड़ सकते हैं। 

अगले वर्ष मार्च 1899  में कोलकाता में प्लेग ने दूसरी बार फिर दस्तक दी। स्वामीजी ने बिना समय गँवाते हुए राहत कार्य के लिए एक समिति का गठन किया जिसमें सिस्टर  निवेदिता को सचिव, गुरुभाई स्वामी सदानंद को सुपरवाइजर और स्वामी शिवानंद, नित्यानंद और आत्मानंद को सदस्य बनाया गया। सभी ने कोलकाता निवासिओं को सेवा देने के लिए दिन-रात कार्य किया। स्वामी जी ने आग्रह किया कि  अगर मदद करने वाला कोई नहीं है तो बेलूर मठ में श्री भगवान रामकृष्ण के सेवकों को तुरंत सूचना भेजें। हर संभव मदद पहुंचाई जाएगी। माता की कृपा से आर्थिक सहायता भी संभव हो जाएगी। 

शामबाजार, बागबाजार और अन्य पड़ोसी इलाकों में मलिन बस्तियों की सफाई के साथ मार्च 1899 को राहत कार्य शुरू हुआ, वित्तीय सहायता के लिए समाचार पत्रों के माध्यम से भी गुहार लगाई गई। सिस्टर  निवेदिता ने स्वामीजी के साथ प्लेग पर अनेकों व्याख्यान दिए। 21 अप्रैल को, उन्होंने “द प्लेग एंड द ड्यूटी ऑफ स्टूडेंट्स” पर क्लासिक थिएटर में छात्रों से बात की। सिस्टर निवेदिता ने पूछा, “आपमें से कितने लोग स्वेच्छा से आगे आएंगे और झोपड़ियों की सफाई में मदद करेंगे ?” सिस्टर निवेदिता  और स्वामीजी  के शक्तिशाली शब्दों को सुनने के बाद, लगभग 15 छात्रों का एक समूह प्लेग सेवा के कार्य के लिए सामने आया। एक दिन, जब सिस्टर निवेदिता ने देखा कि स्वयंसेवकों की कमी है, तो उन्होंने स्वयं गलियों और नालिओं की सफाई शुरू कर दी। गोरी चमड़ी की महिला सिस्टर निवेदिता जिसका असली नाम मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबल था और जो आयरिश अध्यापिका थीं, को अपनी गलियों में सफाई करते देखकर, इलाके के युवकों को शर्म महसूस हुई और उन्होंने झाड़ू उठाकर उसका समर्थन किया। सिस्टर ने खुद को अस्थायी रूप से एक ऐसी बस्ती में स्थानांतरित कर लिया था जो प्लेग महामारी से सबसे अधिक प्रभावित थी, जहां वह दिन-रात दीवारों को सफ़ेद रंग करने में लगी रहती थी और उन बच्चों की देखभाल करती थीं जिनकी माताओं का महामारी से देहांत हो चुका था।संभावित खतरे को नजरअंदाज करते हुए भी वह अपने कार्य में संलग्न रहीं। उन्होंने अपनी एक अंग्रेजी मित्र, मिसेज कूलस्टन को लिखा, 

अंततः रामकृष्ण मिशन की टोली ने इस बीमारी को नियंत्रित करने में कामयाबी हासिल की।

यहाँ दी गयी जानकारी के लिए अप्रैल 2021 में प्रकाशित हुई फेसबुक पोस्ट की भी सहायता ली गयी है। इस पोस्ट  के लेखक निखिल यादव विवेकानंद केंद्र,नार्थ ज़ोन  के युवा प्रमुख हैं और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता हैं। 

प्लेग महामारी और संक्रमणों ने सम्पूर्ण इतिहास में अनेक बार मानव जाति को बरबाद किया है। 14वीं शताब्दी में आयी “बुबोनिक प्लेग” को  ब्लैक डेथ के रूप में जाना जाता है जिसमें लाखों मनुष्यों की मृत्यु हुई थी और इसे मानव इतिहास के सबसे घातक महामारियों में से एक माना जाता है। कोरोना महामारी के कहर को भला कौन भूल पाया है। इस महामारी ने दुनिया भर में 30 लाख से अधिक लोगों को अपनी चपेट में ले लिया था। 

स्वामीजी द्वारा दिया गया 128 वर्ष पुराना “प्लेग मैनिफेस्टो” आज 2026 में भी हमें  मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक रूप से मजबूत रहने की शिक्षा दे रहा है। अभी कल प्रकाशित हुए लेख में ही हम 3Hs, Heart,Hand और  Head की बात कर रहे थे, उसी को चरितार्थ करता है यह मैनिफेस्टो। 

तो साथिओ उपरोक्त पंक्तियों ने हमने देख लिया है कि आत्मबल और मनोबल का हमारे जीवन में कितना बड़ा योगदान है। सत्य कहा है: ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है,मुर्दादिल क्या खाक जीते हैं। कोरोना काल में भी ऐसे विचारों का खूब प्रचलन हुआ था। 

आइये आगे चलते हैं।   

हिमालय में एक आश्रम स्थापित करने की इच्छा से स्वामीजी ने 22 मई को अल्मोड़ा की यात्रा की। उनके साथ पाश्चात्य शिष्य और शिष्याएँ भी गए थे। ब्रिटिश आर्मी के कैप्टन जेम्स हेनरी सेविएर और उनकी पत्नी एलिज़ाबेथ सेविएर  को प्रोत्साहित कर स्वामीजी ने  उन्हें मायावती आश्रम के निर्माण में लगा दिया। भारत में व्यापक रूप से नारी शिक्षा का श्रीगणेश करने के उद्देश्य से 12 नवम्बर को स्वामीजी ने कोलकाता  में एक बालिका विद्यालय प्रारम्भ कर उसकी बागडोर सिस्टर निवेदिता के हाथ में सौंप दी। नारी शिक्षा और नारी उन्नयन के बिना भारत की भलाई होने की कोई सम्भावना नहीं है। वे कहा करते थे:

“पक्षी का एक पंख के सहारे उड़ना असम्भव है। नारियों की उन्नति होने पर ही भारत का ठीक से  जागरण होगा।” 

भारतीय नारी के आदर्श के बारे में उन्होंने कहा था:

आज के लेख का समापन इसी तथ्य के विश्लेषण से हो रहा है कि  नारिओं का वास्तविक कल्याण नारिओं द्वारा ही होगा।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था:नारी को उठने दो,रास्ता वह स्वयं ही बना लेगी। 

आज विकसित युग में हम देख रहे हैं कि सती प्रथा कहीं देखने को ही नहीं मिलती,इसका अंत तभी हुआ जब नारिओं ने इसे अस्वीकार करना शुरू किया,बाल विवाह का विरोध महिला समाज जैसे संगठनों ने किया। क़ानून तो बाद में आये,पहले चेतना आयी। अध्यात्म में भी बाहिर से नहीं बल्कि भीतरी शक्ति की बात  होती है। दुर्गा,काली सरस्वती नारी शक्ति के ही प्रतीक हैं। गायत्री उपासना में भी “गायत्री मंत्र” जाप करती नारी ही दर्शाई गयी है। यही महिलाओं को  शक्ति प्रदान करती हैं और उसी से शक्ति प्राप्त करके नारी शक्ति जैसे संगठनों का जन्म होता है। पुरुषों के योगदान को पूरा सम्मान देते हुए, देखा जा रहा है कि हमारे ज्ञानरथ परिवार में भी हमारी बहिनें कैसे एक दूसरे का सहयोग कर रही हैं। 

कल तक के लिए मध्यांतर यहीं पर होता है 

जय गुरुदेव,धन्यवाद्   


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