12 दिसंबर 2025 का ज्ञानप्रसाद
स्वामी विवेकानंद जी से सम्बंधित मात्र दो लेखों की श्रृंखला का आज समापन हो रहा है, इस दिव्य व्यक्तित्व पर अनेकों जन्म भी समर्पित कर दिए तो भी तृष्णा शांत न हो, ऐसी हमारी पर्सनल धारणा है।
सभी साथिओं से, इस समापन लेख की निम्नलिखित मुख्य हाइलाइट्स को अंतर्मन में उतारने के लिए विशेष निवेदन करते हैं :
1.मनोज मुन्तशिर शुक्ला जी की दिव्य वाणी में संलग्न 17 मिंट की वीडियो आपके ह्रदय में स्वामी जी के प्रति आदर सम्मान के साथ-साथ,भारतीय होने का गर्व भी अनुभव करा रही है। चार वर्ष पूर्व अपलोड हुई इस वीडियो को मिले 5.3 मिलियन व्यूज इसकी उत्कृष्टता का सर्टिफिकेट हैं। वीडियो में कुछ ऐसे तथ्य बताए गए हैं जिनसे (स्वामी जी के प्रति प्रेम होने के बावजूद) हम आज तक अनभिज्ञ थे, प्रस्तुति तो Par excellence है ही। हम तो कहेंगें कि भारत के बारे में जितना विदेश में रह कर पता चला है इतना तो वर्षों भारत में रहकर भी नहीं चला था। शत शत नमन करते हैं अपनी मातृभूमि को।
2.न्यूयॉर्क के ट्विन टावर्स और आतंकवाद का स्मरण आते ही 9 /11 आँखों के समक्ष आन खड़ा होता है लेकिन 9 सितम्बर 1893 की शिकागो में हुई World Parliament of Religions उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी। उस आयोजन में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण ने सारी दुनिया को ज्ञान का जोअमृतपान कराया था,हर भारतीय के लिए एक गर्व का विषय है। उस भाषण का हिंदी अनुवाद लेख के साथ संलग्न करते हुए सभी साथिओं से करबद्ध निवेदन कर रहे हैं कि इसके एक-एक शब्द का ध्यानपूर्वक अमृतपान किया जाए और स्वयं मूल्यांकन किया जाए कि शताब्दी वर्ष का सन्देश भी कुछ ऐसा ही है,मानव धर्म का सन्देश !!! शब्द संख्या ने इस दिव्य सन्देश के फॉन्ट को छोटा अवश्य किया है लेकिन इसकी दिव्यता के आगे यह असुविधा कुछ भी नहीं है।
3.दक्षिण भारत से 15 जनवरी 1897 को प्रवेश करते हुए स्वामी जी ने अनेकों स्थानों पर प्रवचन दिए, उनमें से कुछ एक ही शमिल किये गए हैं।
आइए आज के ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान शांतिपाठ से करें :
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
*****************
स्वामी विवेकानंद ने 25 साल की आयु में गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया था। इसके बाद उन्होंने पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की। विवेकानंद ने 31 मई 1893 को मुंबई से अपनी विदेश यात्रा शुरू की। मुंबई से वह जापान पहुंचे। जापान में उन्होंने नागासाकी, कोबे, योकोहामा, ओसाका, क्योटो और टोक्यो का दौरा किया। इसके बाद वह चीन और कनाडा होते हुए अमेरिका के शिकागो शहर में पहुंचे थे।
खेतड़ी के राजा अजीत सिंह और स्वामी विवेकानंद की गहरी दोस्ती थी, इन्होने ही स्वामी जी को “विवेकानंद” नाम दिया,उनकी शिकागो यात्रा के लिए आर्थिक मदद की और उन्हें Astronomy विज्ञान सिखाया, जिससे विवेकानंद को विश्व स्तर पर पहचान मिली। इन्होने ही स्वामी जी को भगवा वस्त्र और पगड़ी भेंट की थी जो उनकी विश्व्यापी पहचान बन गयी। स्वामी जी ने स्वयं इस मित्रता को भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बताया जो “मानवता की भलाई के लिए दो आत्माओं का पूरक” था। “विवेकानंद” नाम के सम्बन्ध में रामकृष्ण परमहंस जी का वर्णन भी आता है।
राजा अजीत सिंह ने स्वामी विवेकानंद के जीवन और कार्यों में एक निर्णायक भूमिका निभाई, उन्हें न केवल एक नाम दिया बल्कि उनके वैश्विक मिशन को साकार करने में भी मदद की।
स्वामी जी की यात्रा के कुछ विवरण निम्नलिखित हैं :
1.कोलंबो में: “प्रत्येक उपलब्ध वाहन का उपयोग किया गया था और सैकड़ों पदयात्री विजय पंडाल की ओर बढ़ रहे थे, जिसे ताड़ के वृक्षों, सदाबहार फूलों आदि से सजाया गया था। स्वामी जी एक रथ से उतरकर जुलूस के साथ पैदल आगे बढ़े, जिसे सम्मान के हिन्दू प्रतीकों जैसे ध्वज, पवित्र छत्र, श्वेत वस्त्र आदि द्वारा सजाया गया था। एक भारतीय बैंड विशिष्ट धुनें बजा रहा था। सड़क के दोनों ओर एक पंडाल से दूसरे पंडाल तक, जिनके बीच की दूरी चौथाई मील थी, ताड़ के पत्तों से बने गेट सजाए गए थे। जैसे ही स्वामीजी दूसरे पंडाल में पहुँचे, एक सुन्दर कृत्रिम कमल की पंखुड़ियाँ खुलीं और भीतर से एक पक्षी निकलकर मुक्त गगन में उड़ गया। क्या यह इस बात का संकेत था कि मुक्त होना ही भारत का भविष्य है? इस भव्य सजावट की ओर किसी का विशेष ध्यान नहीं गया था क्योंकि सबकी आँखें स्वामी जी के तेजस्वी मुखमंडल और चमकते नेत्रों पर लगी हुई थीं। उन नेत्रों में लोगों को महान भारत की स्वतंत्रता स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
2.श्रीलंका के उत्तर और भारत के दक्षिण में स्थित जाफना प्रायद्वीप (Peninsula) के सभी भागों से सहस्त्रों लोग इस प्रसिद्ध सन्यासी की एक झलक पाने के लिए नगर में उमड़ पड़े थे और उनके स्वागत के लिए मार्ग के दोनों ओर एकत्रित थे। शाम 6:00 बजे से रात्रि 12:00 बजे तक, जाफना के कांगेसंतुरा मार्ग से हिन्दू कॉलेज तक इतनी भीड़ जमा थी कि घोड़ागाड़ियों या अन्य वाहनों का निकलना असंभव था। रात्रि 8:30 बजे भारतीय संगीत के साथ प्रारंभ हुआ मशाल जुलूस अभूतपूर्व था। ऐसा अनुमान है कि लगभग 15000 लोग इसमें पैदल सम्मिलित हुए। दो मील की संपूर्ण दूरी तक इतनी भीड़ थी कि मानो लोगों का समुद्र ही उमड़ गया हो, किन्तु फिर भी प्रारंभ से अंत तक सब-कुछ सुव्यवस्थित ढंग से हुआ। संपूर्ण दूरी तक मार्ग के दोनों ओर लगभग प्रत्येक घर के द्वार पर निराईकुडम और दीप रखे हुए थे जो वहाँ के निवासियों के लिए, हिन्दू विचार के अनुसार, इस महान सन्यासी के प्रति अपना उच्चतम सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका था।
3.रामनाड,तमिलनाडु में स्वामी जी की प्रतीक्षा कर रहे सहस्त्रों लोगों को तोप की आवाज़ से उनके आगमन की सूचना मिली। स्वामी जी के आगमन पर एवं जुलूस के दौरान, हवा में रॉकेट छोड़े गए। चारों ओर उत्साह व प्रसन्नता का वातावरण था। स्वामी जी को राजसी-बग्घी में ले जाया गया, जिसके साथ राजा के भाई के नेतृत्व में अंगरक्षक चल रहे थे,स्वयं राजा, पैदल चलते हुए जुलूस का मार्गदर्शन कर रहे थे। मार्ग के दोनों ओर मशालें जल रही थीं। उत्साहपूर्ण जुलूस में भारतीय और यूरोपीय संगीत ने और भी जोश भर दिया। स्वामी जी के आगमन पर और राजधानी में उनके प्रवेश के समय “विजयी वीर का आगमन हुआ” (See the Conquering Hero Comes) की धुन बजाई गई। जब आधी दूरी तय हो गई, तो राजा के अनुरोध पर स्वामी जी नीचे उतरे और राज्य की पालकी पर सवार हुए। पूरी धूमधाम के साथ वे शंकर विला पहुंचे।
4.अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में स्वामी जी की सवारी के लिए एक सुंदर घोड़ा सजाया गया था जिस पर सवार होकर उन्होंने जुलूस का नेतृत्व किया। इस जुलूस के बारे में गुडविन ने लिखा है कि ऐसा लगता था मानो अल्मोड़ा का प्रत्येक नागरिक उसमें सम्मिलित होने आया हो। यह आयोजन 10 मई वाले दिन था। हर घर में दीप और मशालें प्रज्वलित की गईं थीं और पूरा नगर प्रकाशमान हो गया था। स्थानीय संगीत और भीड़ के लगातार नारों से संपूर्ण वातावरण इतना अधिक विलक्षण हो उठा था कि वे लोग भी आश्चर्यचकित रह गए, जो कोलंबो से ही स्वामी जी के साथ थे। प्रत्येक घर से पुष्पों और अक्षत की वर्षा की गई।
विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध भाषण के बाद से ही, भारतीय समाचार-पत्र अकसर उनकी प्रशंसा से भरे रहते थे और जब वे कोलंबो पहुँचे, तो आमंत्रणों, निवेदनों, अनुरोधों और अभिनंदनों के अनेक तार उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वे भारत के “राष्ट्रीय नायक” बन चुके थे, ऐसा लगता था मानो उनमें और उनके संदेश में भारत ने अपनी आत्मा की खोज कर ली हो, मानो भारत अपने उद्देश्य को समझकर जागृत हो गया हो, मानो उसने विश्व-कल्याण का अपना स्वर पुनः प्राप्त कर लिया हो।
चूंकि अनेक आमंत्रण और अनुरोध आते जा रहे थे, इसलिए स्वामी जी को बार-बार अपने कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा। कुछ आमंत्रणों को उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया, जैसे रामनाड के राजा से प्राप्त आमंत्रण। ऐसा प्रतीत होता है कि 27 जनवरी को स्वामी जी का आगमन होगा, यह समाचार सुनकर राजा इतने अधिक प्रसन्न हुए कि उन्होंने तुरंत ही एक सहस्र दरिद्रजनों को भोजन करवाया’, स्वामीजी के रामनाड आगमन पर, राजा ने पुनः एक सहस्र दरिद्रजनों को भोजन एवं वस्त्र प्रदान किए।
जब स्वामी विवेकानंद खेतड़ी की ओर जा रहे थे, तो 1 दिसंबर को खेतड़ी और साथ ही अलवर के लोग अपने घोड़ों और पालकियों के साथ रेवाड़ी जंक्शन पर उपस्थित थे। अलवर के लोगों ने स्वामी जी से इतना अधिक आग्रह किया कि उन्हें पहले अलवर ही जाना पड़ा। कुछ निवेदनों को वे स्वीकार नहीं कर सके, जैसे पुणे, तिरुचिरापल्ली आदि; किन्तु तिरुचिरापल्ली स्टेशन पर प्रातः 4:00 बजे सहस्त्रों लोग स्वामी जी के स्वागत के लिए उपस्थित थे। थोड़े समय बाद तंजौर में भी पुनः सहस्र लोग एकत्रित हो गए।
मद्रास के एक छोटे स्टेशन पर, जहां रेलगाड़ी नहीं रूकती थी, वहाँ लोग रेलगाड़ी को रोकने के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना रेल-लाइनों पर लेट गए क्योंकि थोड़ी देर के लिए रेलगाड़ी को वहाँ रोकने का उनका अनुरोध स्टेशन-मास्टर ने अस्वीकार कर दिया था। गार्ड की समय-सूचकता के कारण एक भीषण दुर्घटना टल गई। रेल की पटरियों पर इस तरह लेटे हुए लोगों को देखकर स्वामी जी द्रवित हो उठे और उन्होंने उन लोगों से बात की। वे लोग क्या चाहते थे? वे केवल उस व्यक्ति के दर्शन करना चाहते थे, जिसने उन्हें उनका आत्म-सम्मान लौटाया था, जिसने उनके व्यक्तिगत और राष्ट्रीय जीवन को उसका उद्देश्य प्रदान किया था, जिसने उनके विश्वास को दृढ़ किया था।
एक वर्ष पूर्ण हो जाने के बाद भी विभिन्न नगरों में स्वामी विवेकानंद को आमंत्रित किया जा रहा था और उनका स्वागत जारी था। जब उन्होंने इनमें से कुछ निवेदनों को स्वीकार कर लिया, तो इस अतिरिक्त यात्रा का प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ा, जिसके कारण उन्हें पुनः अपने कार्यक्रमों में परिवर्तन करना पड़ा। लोगों के अभूतपूर्व उत्साह के कारण कुछ नए स्थान उनकी यात्रा में जुड़ गए, लेकिन इसके कारण जब उनका स्वास्थ्य गिरने लगा, तो कुछ स्थान यात्रा से हटाने भी पड़े।
प्रत्येक नगर, प्रत्येक ग्राम उनकी एक झलक पाना चाहता था, उनका जीवनदायी संदेश सुनना चाहता था, उद्देश्य को समझना चाहता था, अपना यह विश्वास दृढ़ बनाना चाहता था कि उनकी वेदांत परंपरा ही मानव-जाति की सर्वाधिक वैश्विक आध्यात्मिक परंपरा थी। शारीरिक रूप से, स्वामी विवेकानंद प्रत्येक ग्राम और नगर में नहीं जा सकते थे किन्तु, उनका प्रभाव इतना महान था कि उसके बाद से ही भारत के लोगों ने उनकी जन्म-शताब्दी, और उनकी यात्रा की, शिकागो के भाषण की, उनकी समाधि की जन्म-शताब्दी मनाई, ताकि वे बार-बार उनके दिव्य व्यक्तित्व का अनुभव कर सकें और उनका प्रेरणादायी संदेश सुन सकें। स्वामी विवेकानंद जैसी दिव्य आत्मा का अभूतपूर्व स्वागत हर दिन होना चाहिए।
जय गुरुदेव, धन्यवाद्
समापन
