18 सितम्बर, 2025 का ज्ञानप्रसाद- गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में पंचमुखी साधना के द्वारा “पंचकोशों के विकास अर्थात खुलने की जानकारी समझने का प्रयास है। साधना एक ऐसा विज्ञान है जो भौतिक विज्ञान (Chemistry,Physics आदि) की अपेक्षा अधिक Real है। साधना के विज्ञान को अक्सर अन्धविश्वास मानकर नकार दिया जाता है क्योंकि प्रतक्ष्यवाद की अंधी धारणा यही समझती आयी है कि इसे देखा तो जा नहीं सकता तो हम क्यों विश्वास करें, लेकिन ऐसा नहीं है। इस लेख के अंत में पांच कोषों यानि ख़ज़ानों के खुलने से होने वाले साक्षात्, प्रतक्ष्य रिजल्ट्स का विवरण है। हमारा विश्वास है कि हमारे अनेकों साथिओं ने इन परिणामों का अनुभव किया होगा। हम इससे कतई इंकार नहीं करते कि उच्चस्तरीय साधना Highest level की है लेकिन सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ने वाले साधक को विशेष अनुभव होना कोई अचम्भे वाली बात नहीं है। यदि संलग्न चित्र के साथ-साथ आज के लेख का अमृतपान किया जाए तो बहुत से भ्र्म दूर हो सकते हैं।
कल वाले लेख में बुद्धि और सद्बुद्धि की व्यापक चर्चा की गयी थी लेकिन एक ऐसा उदाहरण प्राप्त हुआ था जिसके लिए शनिवार तक के लिए प्रतीक्षा करने पड़ेगी।
इन्हीं शब्दों के साथ, विश्वशांति की कामना करते हुए, आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करते हैं।
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:
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वैज्ञानिकता की दृष्टि से गायत्री उपासना के अगणित भौतिक लाभ भी हैं। कष्टों और आपत्तियों में पड़े हुए, विपत्तियों में फँसे हुए, अभाव और दारिद्रय से पीड़ित, असफलता की ठोकरों से दुःखी व्यक्ति यदि इस महामन्त्र का आश्रय लेते हैं तो उन्हें आशा की किरणें दृष्टिगोचर होती हैं। जिन्हें अपना भविष्य अन्धकारमय दिख रहा था और आपत्तियों के कुचक्र में पिस जाने का भय सता रहा था, उन्हें गायत्री उपासना से नया प्रकाश मिलता है। अभावग्रस्त व्यक्ति दारिद्र्य से और रुग्ण मनुष्य पीड़ाओं से छुटकारा प्राप्त करते देखे गये, कामनाओं की जलती हुई आग तृप्ति और शान्ति में परिणित होते देखी गई है। इस अवलम्बन का सहारा लेकर गिरे हुए लोग ऊपर उठते देखे गए हैं।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात गाँठ बांधने योग्य है कि इस प्रकार के प्रतिफल किसी जादू से नहीं, किसी चमत्कार से नहीं बल्कि एक “वैज्ञानिक पद्धति” से उपलब्ध होते हैं। देव संस्कृति यूनिवर्सिटी समेत अनेकों शोध संस्थानों ने गायत्री उपासना के वैज्ञानिक पक्ष पर न जाने कितने ही शोध पत्र प्रकाशित कर दिए हैं। हमारे यूट्यूब चैनल की प्रोफाइल वीडियो भी गायत्री मन्त्र की शक्ति का ही वर्णन कर रही है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रकाशित होने वाला प्रत्येक कंटेंट Research oriented ही है।
गायत्री उपासना मनुष्य के विचारों और कार्यों में एक नया मोड़, एक नया परिवर्तन प्रस्तुत करती है। ऐसा माना गया है कि जब मनुष्य का अन्तर्जगत् बदलता है तो उसके बाहरी/प्रतक्ष्य जीवन में परिवर्तन दिखना ही चाहिए। इस परिवर्तन को ही गायत्री साधक माँ का अनुग्रह एवं वरदान मानते हैं।
सबसे बड़ा वरदान तो “सद्बुद्धि” ही है, जिसे इस वरदान की प्राप्ति हो गई, समझो बहुत कुछ मिल गया। कल वाले लेख में इसका विस्तार से वर्णन किया गया था।
अनेक व्यक्तियों को गायत्री उपासना के फलस्वरूप अनेक प्रकार के कष्टों से छुटकारा पाते और अनेक सुविधायें, उपलब्ध करते हुए देखकर अनुमान लगाना चाहिए कि इस साधना पद्धति में ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश है जिनके कारण साधक की अन्तःभूमि में आवश्यक बदलाव होते हैं। इन बदलाव के कारण ही वह असफलताओं एवं शोक संतापों पर विजय प्राप्त करते हुए तेज़ी से समुन्नत, समर्थ एवं सफल जीवन की ओर अग्रसर होता है। ज़ाहिर सी बात है कि जब मनुष्य बुद्धि से सद्बुद्धि की ओर अग्रसर होता है, उसका विवेक,चिंतन, Analytical power, Problem-solving capability जैसी विशेषताएं उच्चकोटि की होने के कारण उससे ऐसा कुछ करवा लेती हैं जिन्हें वह अज्ञानता की राख में चमत्कार समझ लेता है। लेकिन ऐसा है नहीं, यह केवल वर्षों पुराने स्लोगन “God helps those who help themselves” को ही मोहर लगा रहा है।
गायत्री उपासना का महात्म भावनात्मक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टि से है। यही कारण है कि ऋषियों ने प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति के लिए गायत्री की निष्ठापूर्वक उपासना को समझ कर, वैज्ञानिक विश्लेषण के साथ करने पर बल दिया है। जो साधक केवल आँख बंद करके, बिना सोचे समझे केवल गणना के पीछे भागे फिर रहे हैं, ऋषिओं ने इसे निन्दनीय ठहराया है।
अनेकों बार कहा गया है कि “आत्मा” अनन्त शक्तियों और सिद्धियों का भण्डार है। मानव ईश्वर का राजकुमार है और सत-चित-आनन्द स्वरूप है। उसे अपने पिता के इस उद्यानरुपी संसार में क्रीडा- कल्लोल का आनन्द लेने के लिए भेजा जाता है लेकिन माया/भ्र्म/Illusion के बन्धनों में फँसकर वह अपने मूल स्वरूप को, अपने लक्ष्य को, अपने कार्यक्रम को भूल जाता है और विपन्न स्थिति में पड़ जाता है।
इसी “भूल का नाम माया बन्धन” है। जैसे-जैसे मोहमाया के बन्धन ढीले पड़ते जाते हैं वैसे-वैसे मानव अपने परम मंगलमय मूल रूप में अवस्थित होता चलता है। आत्मा तो स्वच्छ दर्पण के समान है लेकिन मोहमाया की मैल जम जाने के कारण उस पर धुँधलापन छा जाता है। आत्मा जलते हुए अंगारे के समान है। उस पर जब राख की पर्त चढ़ जाती है तो वह बुझी सी दिखाई पड़ती है। यदि अंगार पर से राख की पर्त को हटा दिया जाय तो वह फिर प्रकाशवान एवं उष्णतायुक्त दिखने लगता है। यह उदाहरण अभी दो दिन पहले दिया गया था। दर्पण को साफ कर दिया जाय तो वह पुनः उज्ज्वल हो जाता है। अज्ञान के अन्धकार में यदि ज्ञान का प्रकाश जल उठे तो अन्धेरे में जो छिपा पड़ा था, वह सब कुछ क्लियर दिखने लगता है।
माँ गायत्री,यह सब काम, मनुष्य से उपासना के माध्यम से कराती है। वह आत्मा पर चढ़े हुए सम्पूर्ण मलों, विक्षेपों, कषायों, कल्मषों एवं जन्म-जन्मान्तरों के चढ़े हुए कुसंस्कारों को धोकर उसे स्वच्छ एवं प्रकाशवान बनाती है। वह माया के बन्धनों को काटने वाली तेज छुरी सिद्ध होती है। इन बाधाओं से छूटकर आत्मा जब अपनी मूलभूत, निर्मल स्थिति को पहुँच जाती है तो उसके सब त्रास दूर हो जाते हैं। “आत्मा का परम निर्मल हो जाना ही परमात्मा की प्राप्ति है।” इसे ही जीवन मुक्ति, ब्रह्मनिर्वाण, परमपद, आत्म साक्षात्कार एवं प्रभु प्राप्ति कहते हैं।
ऐसी प्राप्ति होना कठिन माना जाता है लेकिन श्रद्धापूर्वक, धीरे-धीरे,एक एक सीढ़ी चढ़ते हुए, उच्चस्तरीय साधना से सब कार्य सरल होते जाते हैं।
गायत्री साधक दिन-दिन आत्मिक उन्नति अनुभव करता है। जैसे-जैसे मनुष्य का साधना-स्तर ऊँचा उठता है वैसे-वैसे उसे अपने पिण्ड (देह) में छिपी हुई ईश्वररुपी ब्रह्माण्डीय महान शक्तियों का आभास होने लगता है। उसे विश्वास होना शुरू हो जाता है कि आँख,नाक,शीश वाला प्रतक्ष्य स्थूल शरीर ही शरीर नहीं है, यह तो केवल खाने-पीने,पालन पोषण “अन्नमय कोष” है, इसके भीतर चार और अदृश्य कोष हैं। मृत्यु होने पर स्थूल शरीर वाला अन्नमय कोष मर जाता है लेकिन चार सूक्ष्म कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष,आनन्दमय कोष जीवित रहते हैं। इन कोषों में वासनायें, इच्छायें, भावनायें,आदतें भरी रहती हैं जिनमें जन्म-जन्मान्तरों से चले आ रहे संस्कार जमा रहते हैं।
यही कारण है कि चित्रों और प्रतिमाओं में माँ गायत्री को पाँच मुख वाली भी दिखाया जाता है। वह दशोंदिशाओं में व्याप्त है, दशों इन्द्रियों कि स्वामिनी है, दश महाशक्तियों की अधीश्वरी है, इसलिए इसे दशभुजी भी कहते हैं, इसी महाशक्ति की सहायता से हम अपने पाँचों बन्धनों से छूट सकते है, दशों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, दशदिशाओं में अपना विस्तार कर सकते हैं और दश महाशक्तियों के स्वामी बन सकते हैं।
गायत्री माता की कृपा से हम क्या नहीं कर सकते हैं? जो कुछ इस लोक में तथा परलोक में है वह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं।
पंचमुखी साधना के द्वारा “पंचकोशों के विकास अर्थात खुलने की साधना एक विज्ञान है जो भौतिक विज्ञान की अपेक्षा अधिक समर्थ और यथार्थ है।” ऐसी साधना करने से मनुष्य शरीर और वंश से सामान्य दिखाई देने पर भी राजाओं, महाराजाओं जैसा जीवनयापन करता है, समस्त सिद्धियाँ उस विज्ञान में सन्निहित हैं। विश्व में जो कुछ भी है उसका दर्शन गायत्री की पंचकोशी साधनाओं से प्राप्त किया जा सकता है।
गायत्री के उच्चस्तरीय पंचकोशीय साधना विधान के अनुसार साधना करने से एक-एक कोष खुलता जाता है। कोष का अर्थ देह भी है और खजाना भी । जहाँ पाँचों देहों एवं बन्धनों का परिमार्जन होता है, वहाँ इन कोषों में जो अलौकिक दिव्य शक्तियों के खजाने भरे पड़े हैं वे भी सामने आते हैं। यह कोष ही ऋद्धि-सिद्धियों के भण्डार हैं एवं जिनके हाथ में यह खजाने होते हैं उन्हें इस संसार में और कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता।
आज के लेख का समापन यदि “कोषों के खुलने” के बारे में जाने बिना कर दिया जाए तो अनुचित ही होगा।
“पंचकोषों का खुलना”, साधना या आध्यात्मिक उन्नति के दौरान इन परतों का शुद्ध और सक्रिय होना कहा गया है। इसका अर्थ है कि साधक केवल स्थूल शरीर तक सीमित न रहकर अपनी आंतरिक परतों के बारे में अनुभव करने लगता है/जानने लगता है।
जब अन्नमय कोष खुलता है तो शरीर संतुलित और स्वस्थ होता है, भोजन और जीवनशैली पर सजगता बढ़ती है, साधक अपने शरीर को “उपकरण” की तरह अनुभव करने लगता है। उसे अनुभव होना शुरू हो जाता है कि मैं केवल शरीर नहीं उससे ऊपर कुछ और ही हूँ।
जब प्राणमय कोष खुलता है तो श्वास-प्रश्वास (Breathe in/breathe out) पर गहरी पकड़ होनी शुरू होती है, ऊर्जा प्रवाह (Flow of energy) का अनुभव होता है, प्राणायाम या ध्यान के समय शरीर में स्पंदन (Vibrations), ऊष्मा(Heat) हल्कापन महसूस होता है। साधक को अपने भीतर ऊर्जा के स्रोत का बोध होने लगता है।
जब मनोमय कोष खुलता है तो अस्थिर मन धीरे-धीरे शांत होता है, विचारों पर नियंत्रण होता है और नकारात्मकता का नाश होता है।मनुष्य भावनाशील होता जाता है लेकिन साधक उनसे बंधता नहीं है।
जब विज्ञानमय कोष खुलता है तो विवेक और अंतर्ज्ञान का जागरण होता है, साधारण जीवन से परे अद्भुत “सत्य के दर्शन” होते हैं । मनुष्य विवेकशील होकर सही और गलत में सहजता से ऐसे भेद करता है जैसे भीतर से कोई मार्गदर्शक बोल रहा हो, इसी को अंतर्मन की आवाज़, Sixth sense कहते हैं।
जब आनंदमय कोष खुलता है तो बिना किसी कारण के आनंद और शांति का अनुभव। ध्यान में “मैं” और “मेरा” एक हो जाते हैं, मनुष्य को आत्मा के निकट होने का अनुभव होता है।
सोमवार तक के लिए मध्यांतर,
धन्यवाद्, जय गुरुदेव
