16 सितम्बर 2025 का ज्ञानप्रसाद-“गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां”
वर्तमान लेख शृंखला में प्रस्तुत किये जा रहे लेखों को समझना एवं अंतःकरण में उतारने के लिए, लेखों का उद्देश्य समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है। हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि हमें इस शिक्षा से क्या प्राप्त होने वाला है? क्या हम रातोंरात गुरुदेव जैसी शक्तियां एवं सिद्धियां प्राप्त कर लेंगें? ऐसा सोच कर हम प्राथमिक स्तर की साधना में ही बड़ी ऊँची उड़ान की आशा लेकर बैठे हैं, ऐसा हमें अपने मन में क्लियर कर लेना चाहिए।
प्राथमिक साधना की कक्षा में,1.सद्ज्ञान,2.स्वास्थ्य सुधार,3.उत्साह एवं स्फूर्ति,4.सहयोग एवं मित्रता की अभिवृद्धि,5.अभावों की पूर्ति जैसे पाँच लाभ उच्चकोटि के हो जाएँ तो बहुत बड़ी उपलब्धि है।
इन पांचों उपलब्धियों में से मात्र तीन (सहयोग,सद्ज्ञान,उत्साह) का ही समावेश हो जाए तो ज्ञानरथ परिवार से सम्बंधित हमारा व्यक्तिगत स्वार्थ पूरा हो जायेगा, समय की बहानेबाज़ी दूर भाग दौड़ेगी। निश्चित ही सच्ची निस्वार्थ गुरुभक्ति की दिशा में ऐसा योगदान एक अद्भुत सहायता प्रदान करेगा।
तो आइए अपने योगदान के प्रति संकल्पित होकर, विश्वशांति की कामना के साथ आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करें:
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:
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ज्वलन्त अंगार जब ठण्डा होने लगता है तो उसकी ऊपरी पर्त भस्म (राख) बनकर अंगारे पर एक आवरण बना लेती है। जब इस आवरण को स्पर्श करते हैं तो अंगार न तो गर्म मालूम पड़ता है और न ही प्रकाशवान। ऐसी स्थिति में यह पहचानना भी कठिन होता है कि इसके भीतर अभी अग्नि का अंश है भी या नहीं लेकिन जब उस राख के आवरण को हटा दिया जाता है तो भीतर छिपी हुई अग्नि पुनः प्रकट हो जाती है और उसकी गर्मी तथा रोशनी फिर से पहले जैसी दिखाई पड़ने लगती है।
यही बात हमारी आत्मिक स्थिति पर भी लागू होती है। परमात्मा का अंश होने के कारण मनुष्य में परमात्मा की सब शक्तियाँ और विशेषताएं भरी होती हैं लेकिन जब उस पर बुरी आदतें, संस्कार चढ़ जाते हैं तो उसकी स्थिति भी भस्म से ढँके हुए अंगार जैसी बन जाती है। माया के वशीभूत जीव की स्थिति बड़ी दीन-हीन और दयनीय दिखाई पड़ती है। दुःख- दारिद्र के रोग-शोक से ग्रसित,अज्ञान के अभाव में पल रहा, व्यथा-वेदना के कष्ट-क्लेशों में ग्रसित मानव प्राणी भला सत-चित आनन्द स्वरूप परमात्मा का कैसे हो सकता है? ठण्डी राख के आवरण को छू कर यह मानना कठिन होता है कि इसके भीतर ज्वलन्त अग्नि-पुंज भी छिपा होगा। इस स्थिति में पड़ा मानव पूजास्थली में अपने कष्टों की गठरी लेकर भिक्षा मांगने के सिवाय और कुछ नहीं करेगा।
यदि उसकी आत्मा पर से राख के आवरण हट जायें तो उसकी स्थिति इतनी उत्कृष्ट होती है कि उसे हर क्षण अनन्त-आनन्द का रसास्वादन करने का सौभाग्य उपलब्ध रहता है।
परम आनंद की स्थिति को प्राप्त करना ही अध्यात्मिक साधना का लक्ष्य है, वर्तमान लेख श्रृंखला इसी दिशा में एक छोटा सा प्रयास है।
अनेकों योनिओं की यात्रा करने के बाद प्राप्त हुआ “मानव शरीर ही इन आवरणों की सफाई कर लेने का एकमात्र अवसर है।” यदि इस दुर्लभ जीवन को यूं ही बर्बाद कर दिया जाए,आवरणों का पुलिंदा और भी बढ़ा लिया गया तो एक बार फिर चौरासी लाख योनियों की लम्बी अवधि में पड़ा रहना पड़ता है।
इन आवरणों की सफाई में दुहरा लाभ है:
जहाँ मलीनता हटने से आत्मा पर चढ़ा हुआ भार हल्का होने से अन्तःकरण में शान्ति और प्रफुल्लता बढ़ती है वहीँ इन आवरण द्वारों के खुलने पर विभूतियों का एक स्पेशल भाण्डागार उपलब्ध होता चलता है। पाँच आवरणों को ही पाँच कोश कहते हैं एवं इन द्वारों के खोलने की वैज्ञानिक विधि का नाम पंचकोशी साधना है।
द्वारों को खोलने का कार्य केवल उच्चस्तरीय साधना से ही संभव हैं लेकिन इसका शुभारम्भ प्राथमिक साधना से ही करना पड़ता है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में इस लेखों के माध्यम से स्वयं के साधना स्तर को जानने का प्रयास किया जा रहा है,कमैंट्स से पता चल रहा है कि हम सभी प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी ही हैं।
हमारी सारी साधना स्थूल वस्तुओं, स्थूल विधि-विधानों पर निर्भर है। माला, आसन, पंचपात्र, धूप, दीप, नैवेद्य,अक्षत,पुष्प, चित्र, मूर्ति, हवन सामग्री, मन्त्रोच्चारण, व्रत- उपवास, पाठ-कीर्तन, अनुष्ठान, ब्रह्मभोज, तर्पण आदि सब स्थूल ही हैं और हम उन्हीं तक सीमित हैं। ऐसी उपासना को साकार उपासना कहते हैं।
प्रथम कक्षा के लिए यह सब कुछ आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। इस आधार के बिना ऊपर की कक्षा में प्रवेश कर सकना उसी प्रकार सम्भव नहीं है जिस प्रकार सीढ़ियों की सहायता के बिना छलांग मार कर छत पर चढ़ जाना असंभव होता है। प्रथम स्तरीय स्थूल विधि व्यवस्था के आधार पर बनी हुई “साकार उपासना” के बिना उच्चस्तरीय “निराकार साधना” में सफलता प्राप्त कर सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता ।
उच्चस्तरीय गायत्री उपासना एकान्त निर्जन वनों में रहकर घोर तपस्या करके की जाती है, ऐसे साधकों के लिए अन्न और वस्त्र आदि का कोई महत्व नहीं रहता।
हमारे गुरुदेव इस तथ्य के साक्षात् उदाहरण हैं।
सच बात यह है कि ऐसे साधकों को किसी भी उपकरण की आवश्यकता नहीं रह जाती, वे आत्मा की अग्नि में प्राण की आहुति से निरन्तर अखण्ड यज्ञ करते रहते हैं। श्वास (Breathe in), प्रश्वास (Breathe out) क्रिया के साथ ‘सोऽहम्’ की ध्वनि होती है उसे ही हंसयोग कहते हैं। यह हंस अर्थात सोऽहम् तत्व ही गायत्री का वाहन बन जाता है। माला का स्थान यह श्वास प्रक्रिया ले लेती है। शरीर की नाड़ियां माला फेरने का काम करती हैं, 54 ग्रन्थियाँ (Glands), एक बार ऊपर और एक बार नीचे के क्रम में माला के 108 मनकों का कार्य करती हैं और “सूक्ष्म चक्र टाईमटेबल” स्वयं ही घूमता जाता है।
जिस प्रकार प्रथम स्तर के साधक हंस पर बैठी गायत्री माता का नारी देह में दर्शन करते हैं, उच्च भूमिका के साधक को प्रकाश की छोटी- छोटी चिंगारिओं के रूप में, किरणों के रूप में और तेजस्वी ज्योतिपिण्ड के दर्शन एवं साक्षात्कार होता है।
ज्यों ज्यों स्तर बदलते जाते हैं, साधन एवं उपकरण भी बदलते जाते हैं:
नर्सरी की कक्षा में माँ बच्चे को हाथ पकड़ कर पेंसिल से लिखना सिखाती है, पहली/दूसरी कक्षाओं में लकड़ी की तख्ती पर मोटी कलम से बड़े- बड़े अक्षर लिखने का अभ्यास करना पड़ता रहा है, हमारे कई साथिओं ने इस पुरातन सिस्टम (जो आज लुप्त हुआ दिखता है) का अभ्यास किया होगा, उसके बाद की कक्षा में कापी और फाउन्टेन पेन की क्रिया सम्पन्न होती है।
साधना के क्षेत्र में भी ऐसी Gradual advancement का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं बल्कि एक स्वाभाविक विकास प्रक्रिया है। भारतीय धर्म में साकार और निराकार का न तो कोई विरोध है और न विभ्रम। दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। अपने-अपने स्थान पर दोनों ही उपयुक्त हैं और आवश्यक भी। पंचकोशी गायत्री उपासना का विधान क्रम निराकार उपासना जैसा ही है। इसीलिए इस साधना में पंचमुखी गायत्री को अलंकारिक रूप से चित्रित करते हैं लेकिन साधारण पूजा पाठ के लिए एक मुखी गायत्री की तस्वीरें तथा मूर्तियाँ ही प्रयुक्त होती हैं। इस उद्देश्य के लिए पंचमुखी गायत्री का प्रयोग नहीं होता।
पंचमुखी और दश भुजी गायत्री की विवेचना करते हुए बताया गया है कि अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश ही गायत्री के पाँच मुख हैं। पंचकोशी आराधना का प्रधान उद्देश्य,इन कोशों में छिपी हुई महत्त्वपूर्ण शक्तियों को विकसित करना और आत्मिक शान्ति का रसास्वादन करना है।
प्रथम स्तरीय उपासना में लौकिक लाभों का मार्ग प्रशस्त होता है जिनमें 1.सद्ज्ञान,2. स्वास्थ्य सुधार,3. उत्साह एवं स्फूर्ति,4. सहयोग एवं मित्रता की अभिवृद्धि,5. अभावों की पूर्ति जैसे पाँच लाभ और भी उच्चकोटि के हो जाते हैं।
जिस प्रकार बिना जड़ का पौधा देर तक खड़ा नहीं रह सकता, उसी प्रकार योग्यता और प्रतिभा न होने पर अनायास कोई सम्पदा मिल भी जाय तो देर तक ठहर नहीं पाती। जड़ मजबूत होने पर ऊपर की टहनी कट जाने पर भी उसकी शाखायें फूट आती हैं, उसी प्रकार यदि सद्गुणों की जड़, मनोभूमि में मजबूती से जमी हुई हो तो किन्हीं आकस्मिक कारणों से दरिद्रता एवं विपत्ति सामने आ जाने पर भी वे ठहर नहीं पातीं और कोई नई सुविधा उत्पन्न होकर उस अभाव की पूर्ति कर देती है।
गायत्री उपासना से प्रत्यक्षतः तो किसी को छप्पर फाड़कर सम्पदा नहीं मिलती लेकिन साधक के अन्दर वे तत्व विकसित हो जाते हैं जिनके साथ अनेक प्रकार की सुख संपदायें जुड़ी रहती हैं। जिस प्रकार वर्षा होते ही हरियाली उग आती है और कीट पतंगों की अजस्र उत्पत्ति होने लगती है उसी प्रकार गायत्री की प्राथमिक साधना से भी ऐसी मंगलमयी सुख सुविधायें, समृद्धियाँ और विभूतियां प्रकट हो जाती हैं जिनके लिए आमतौर से लोग तरसते रहते हैं और जिनकी उपलब्धि को कोई दैवी वरदान चमत्कार माना जाता है। इस छोटे से ज्ञानरथ परिवार में अनेकों साथिओं को ऐसे वरदान मिलते देखा गया है।
आम तौर से मानव शरीर की सीमा और सामर्थ्य से बाहर वाली बातों को चमत्कार माना जाता है । हवा में उड़ना, पानी पर चलना, अदृश्य हो जाना, रूप बदल देना आदि क्रियाओं को किसी समय सिद्धियाँ कहा जाता था लेकिन आधुनिक समय में विज्ञान की उन्नति के कारण ऐसी बातें तरह-तरह की मशीनों की सहायता से सस्ती और सुलभ हो गई हैं। इसलिए इन क्षमताओं के प्राप्त कर लेने पर भी कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। जादूगर लोग कई तरह के अचम्भे में डालने वाले करतब दिखाते हैं। मैस्मेरिज्म और हिप्नोटिज्म से भी बहुत मनोरंजक तमाशे होते देखे हैं। कौतूहल उत्पन्न करके अचम्भे में डालने वाली बातें, इस विज्ञान की उन्नति के युग में जब सौर मण्डल की यात्रा करने के लिए मानव संचालित यान उड़ रहे हैं, कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती। आजकल तो Driver-less गाड़िओं जैसे चमत्कार आम जैसे दिखते हैं। मात्र एक ही परमाणु बम से करोड़ों मनुष्यों को,घर बैठे ही पलक मारते नष्ट कर डालना सम्भव हो गया है तो साधना के चमत्कार क्या महत्त्व रखते हैं। यह प्रयोजन तो नशीली चीजों से या मामूली हथियारों से भी पूरे हो सकते हैं।
गायत्री उपासना के द्वारा इस प्रकार के चमत्कारों की आशा से श्रम करना, बालबुद्धि वाले ओछे स्तर के लोगों के लिए ही सम्भव है। बेशक तपस्वी साधकों के लिए, अचम्भे में डालने वाले अनेकों काम कर सकना सम्भव है,लेकि उनकी तुच्छता को समझते हुए उनकी निंदा ही की जाती है।
गायत्री उपासना की उच्च भूमिका में प्रवेश करने का सबसे बड़ा लाभ “आत्मबल की वृद्धि” है। आत्मबल की महत्ता संसार के समस्त भौतिक बल सम्पन्न लोगों से कहीं अधिक होती है। आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों को ही महापुरुष कहते हैं, इन्हीं की गणना नर रत्नों में होती है। युगपरिवर्तन की,आत्मकल्याण की,दूसरों का सच्चा हित साधन कर सकने की अपार क्षमता ऐसे उच्चकोटि के साधकों में ही होती है। इसी को “सच्ची सिद्धि” कहते हैं। उच्चस्तरीय गायत्री उपासना का उपासक दिनोंदिन तीव्रगति से महानता की ओर अग्रसर होने लगता है। वह सिद्धियाँ और सामर्थ्य उपलब्ध होती हैं जो न केवल आत्मकल्याण बल्कि भौतिक प्रगति में अत्याधिक सहायक होती हैं।
समापन, जय गुरुदेव