21अगस्त 2025 का ज्ञानप्रसाद
अखंड ज्योति मार्च,अप्रैल, मई 1992 अंकों में “लीला प्रसंग” शीर्षक के अंतर्गत एक लेख श्रृंखला प्रकाशित हुई। हमने इस लेख श्रृंखला को आधार बना कर गुरुआज्ञा से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर लेख लिखने का बीड़ा उठाया। आज प्रस्तुत किया गया लेख मार्च वाले कंटेंट का समापन लेख है। सोमवार को अप्रैल 1992 वाले लेख की और बढ़ेंगें। कल वीडियो कक्षा में इसी विषय को आगे बढ़ाने की योजना है।
गुरुदेव की दिव्य शक्ति चरितार्थ करते तीन प्रतक्ष्य उदाहरण आज के लेख का मुख्य आकर्षण हैं, तो उचित रहेगा कि शांतिपाठ के साथ आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ किया जाए।
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:
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परम पूज्य गुरुदेव की साधना के बारे में शायद ही कोई ऐसा मनुष्य होगा जो उनकी अर्जित शक्तियों पर विश्वास न कर सके। इस लेख श्रृंखला में हम पाठकों को बार-बार लेखों के उद्देश्य के प्रति सजग करते आ रहे हैं एवं साथ ही साथ उद्देश्य को समझने के लिए Brain waves, तीन शरीर, पांच कोष आदि विषयों को भी जोड़े जा रहे हैं। हालाँकि यह सभी विषय अपनेआप में पूर्णतया Independent हैं, इन्हें समझने के लिए अलग से विस्तृत विवरण देना ही उचित होगा लेकिन गुरुदेव की शक्ति को समझने के लिए,संक्षेप में यहां बता देना भी बिल्कुल अनुचित नहीं है।
गुरुदेव के स्थूल के साथ जुड़ा बहुत कुछ “ऑकल्ट” अर्थात गुप्त भी है जो “लीलाप्रसंग“ की इस लेख श्रृंखला के अंतर्गत जानना भी अति लाभदायक रहेगा।
तो आइये सबसे पहले “ऑकल्ट” शब्द के बारे में यथासंभव जानने का प्रयास करें एवं प्रश्न का निवारण करें कि “क्या गुरुदेव सच में तांत्रिक हैं ?क्या उनकी सिद्धियां गुप्त हैं ?”
“ऑकल्ट” (Occult) शब्द का अर्थ होता है “गुप्त, रहस्यमय या अदृश्य ज्ञान”, जो सामान्य लोगों की समझ या प्रत्यक्ष अनुभव से परे माना जाता है। यह शब्द मुख्यतः उन विद्याओं, प्रथाओं और विश्वासों के लिए प्रयोग होता है, जो अलौकिक शक्तियों, रहस्यवाद और छिपी हुई शक्तियों से जुड़े होते हैं। “ऑकल्ट” लैटिन शब्द occultus से निकला है, जिसका मतलब होता है छिपा हुआ या गुप्त। इसका संबंध अक्सर ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, भविष्यवाणी, आत्माओं, रहस्यमयी शक्तियों और गूढ़ ज्ञान से जोड़ा जाता है। यह विज्ञान से अलग है, क्योंकि इसका आधार वैज्ञानिक प्रमाण (scientific evidence) के बजाय रहस्य और विश्वास होते हैं। इसके लिए निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं,इनमें से बहुत सारों को आजकल वैज्ञानिक माना गया है:
ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति देखकर भविष्य बताना, विशेष मन्त्र, यंत्र और साधना द्वारा अदृश्य शक्तियों को साधना, Alchemy के पुरातन सिद्धांत के अंतर्गत धातुओं को सोने में बदलना,ध्यान साधना द्वारा मृत आत्माओं से संपर्क कराना, हाथ की रेखाएँ पढकर भविष्य बताना,78 पत्तों वाली ताश के पत्तों (Tarot cards) से एवं सड़क पर बैठे तोते से भविष्य बतलाना, सभी “ऑकल्ट” के अंतर्गत ही आते हैं।
जो भी हो,इस विषय पर हमारा कुछ भी कहना उचित नहीं होगा क्योंकि हर किसी की अपनी दृढ आस्था होती है उसे ठेस पंहुचना इस मंच का कभी अनजाने में उद्देश्य नहीं रहा है।
तो साथिओं आइए चलें गुरुवर की ओर:
पूज्य गुरुदेव ने चौबीस वर्ष तक चौबीस महापुरश्चरण, गौ दुग्ध से बनी छाछ व जौ की रोटी ग्रहण कर एक कड़ी तप-तितिक्षा के रूप में खण्ड-खण्ड में संपन्न किए। यह निर्देश उन्हें 1926 में मिला था एवं जब उन्होंने अंतिम अनुष्ठान पूरा किया तो पूर्णाहुति 1953 में सम्पन्न हो पाई । बीच-बीच में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण व्यवधान पड़ने से इस अनुष्ठान को 27 वर्ष तो लग गए लेकिन नियम कड़ाई से ही निभता रहा।
इसी अवधि में गुरुदेव दो वर्षों के लिए “नैमिषारण्य तीर्थ” जाकर रहे। उनके साथ हरिद्वार के ही कनखल स्थित एक आश्रम के महन्त भी वहाँ थे जो साक्षी देते हैं कि चूँकि वहाँ गाय के गोबर से निकली जौ उपलब्ध नहीं थी तो उन्होंने “चक्रतीर्थ सरोवर” में भक्तों द्वारा चढ़ाए गए चावलों को बीन कर पूरे चौबीस घण्टों में मात्र एक बार, मात्र डेढ़ छटाँक चावल पर गुज़ारा किया एवं सतत् गायत्री जप में संलग्न रहते थे। तीन-तीन घण्टे तक सरोवर में कमर तक पानी में खड़े रह कर, सतत् सूर्य की ओर मुख करके ध्यान करते थे। “यह प्रसंग संभवतः हममें से बहुतों की जानकारी में नहीं है।”
पूज्यवर ने अपनी तपश्चर्या द्वारा जो सिद्धियाँ अर्जित कीं उन्हें वितरित करने का क्रम जारी रखा।
1.अहमदाबाद की तारा बहन के साथ रहने वाले परिजनों को अभी भी याद है कि किस प्रकार पूज्य गुरुदेव ने वरदान देकर उन्हें एक ऐसी व्याधि से मुक्त कराया जिसका निदान कोई नहीं कर पाया था। वे जो भी खातीं, तुरंत उलटी हो जाती। आमाशय(Stomach) के आगे मार्ग तंग होने के कारण,चिकित्सकों ने बहुत कम मात्रा में बार-बार Liquid diet लेने को कहा था। जब कभी भी ठोस या अर्धतरल द्रव्य लेंगें तो उलटी होने या फिर सर्जीकल इमरजेन्सी पैदा होने की संभावना रहेगी। गुरुदेव के गुजरात प्रवास में वे भी उनके दर्शन को गयीं। चर्चा के दौरान ही आयोजकों ने कहा कि “पूज्यवर! आप भोजन करलें। समय हो गया है” गुरुदेव ने अपने साथ उस बहन को भी लिया एवं उसके लिए भी एक थाली लगवायी। वह कहती रही मैं भोजन नहीं कर पाऊँगी। सारा भोजन उलटी में बाहर निकल जाएगा। गुरुदेव ने ज़ोर दे कर कहा कि “तू खा तो सही बेटा, हम यहाँ बैठे हैं। कोई दिक्कत होगी तो हम देख लेंगे।” देखते-देखते वह बहन पूरा भोजन ग्रहण कर गयीं, ज़रा सा भी भोजन बाहर नहीं आया और न ही उलटी जैसा कोई आभास हुआ।
वह दिन तारा बहिन के कष्टों के समापन का दिन था। उस दिन के बाद से अब तक वे सहज रूप में भोजन करती रहीं हैं। एक “मेकेनिकल” तकलीफ कैसे दूर हो गयी इसका किसी चिकित्सक के पास कोई समाधान नहीं है। “क्या कोई बता सकता है कि इस प्रक्रिया का विश्लेषण विज्ञान की किस पद्धति से किया जाय?”
यह मात्र इसी आशय से कहा जा रहा है कि परमार्थ हितार्थाय ही स्व-उपार्जित सिद्धियों का सुनियोजन महामानव करते आए हैं।परमपूज्य गुरुदेव ने उसी परम्परा का निर्वाह किया।
2.पनवाड़ी हमीरपुर के श्री कुँजबिहारी लाल गुप्ता के पुत्र रामबिहारी गुप्ता 1982-83 में रुड़की यूनिवर्सिटी के केमिकल इंजीनियरिंग में M.Tech. कर रहे थे। एक दिन एक Thunderstorm में एक्सीडेंट हुआ जिससे कमर की हड्डी में दर्द व सूजन आ गयी, डॉक्टर को दिखाया तो 4-5 दिन Bed rest के लिए कहा। Xray, blood आदि की जाँच से चिकित्सकों ने निष्कर्ष निकाला कि यह तो जोड़ों/हड्डीओं की TB है एवं डेढ़ वर्ष तक बहुत स्ट्रांग औषधियाँ नहीं लेनी होंगी, चलना फिरना भी प्रभावित होगा। रामबिहारी जी ने अपने माता-पिता को सूचना दी। तकलीफ पता चलने के 10 दिन के अंदर ही रामबिहारी अपने माता-पिता सहित पूज्य गुरुदेव की शरण में आ गए व प्रार्थना की कि अब आप ही इस कष्ट से मुक्ति दिलाएँ। पूज्यवर ने रामबिहारी को स्पर्श करके कहा कि “अरे बेटा,किसी ने गलत डायग्नोसिस कर दिया है। तुझे TB जैसी कोई बीमारी नहीं है। जा,एक माह तक हमारी जड़ी बूटी की दवा ले ले, अच्छे नम्बरों से पास होकर विदेश में नाम कमा के आ।” आशीर्वचनों का ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे बिना किसी तकलीफ के तुरंत ही चलने लगे, एलोपैथिक औषधियाँ बंद कर दीं तथा एक माह तक शाँतिकुँज के चिकित्सकों की बताई दवा ली। दवा तो निमित्त मात्र थी। रोग तो उसी दिन,गुरुदेव के छूते ही दूर हो गया था। राम बिहारी जी ने प्रथम स्थान में अपनी पढ़ाई पूरी की तथा अपनी पत्नी दीप्तिशिखा के साथ अमेरिका में रहकर Ph.D की,असोशिएटेड प्रोफेसर की पोस्ट पर छात्रों के प्रिय अध्यापक बने । दोनों पति-पत्नी गायत्री का खूब प्रचार करते हैं व स्वयं को गुरुदेव की कृपा का जीता जागता मॉडल बताते हैं।
3.1988 में UP सरकार में सचिव पद पर कार्यरत एक गायत्री परिजन पूज्यवर की आज्ञा ले कर शासकीय कार्य से दो माह के लिए अमेरिका गए। जाते समय उन्हें याद आया कि पूज्यवर तथा वंदनीय माता जी ने निर्देश दिया था कि विदेश यात्रा कभी अकेले न करें।अतः पत्नी, जो चिकित्सक थीं, उनका भी पासपोर्ट,वीज़ा टिकट आदि बनवाया। Pittsburgh में उन्हें दो माह तक स्पेशल ट्रेनिंग में भाग लेना था जो दिन भर चलती थी। एक दिन अचानक ही उन्हें महसूस हुआ कि एयरपोर्ट पर उतरने पर जो थोड़ी साँस फूलने की शिकायत हुई थी,अब फिर से हो रही है व अब तो साँस लेना भी कठिन हो रहा है। इस तकलीफ को नार्मल सी मानकर,वह खिड़की के पास जाकर खुली हवा में साँस लेकर, फिर मीटिंग में बैठे लेकिन कुछ ही देर में बेहोशी सी आने लगी। उन्हें हस्पताल पंहुचाया गया जहाँ चिकित्सकों ने बताया कि बहुत ही बड़े स्तर का दिल का दौरा पड़ा था। पत्नी को सूचित कर, उन्हें समीप ही एक अस्पताल की “इन्टेन्सिव केयर यूनिट” में भर्ती किया गया। परीक्षण पर ज्ञात हुआ कि हृदय की धमनियों में 99% ब्लाकेड था। Ballooning से रक्तप्रवाह को ठीक कर दिया गया और एक ही सप्ताह में छुट्टी मिल गयी। चूँकि उनकी चिकित्सक श्रीमती जी साथ थीं व वे तकनीकी दृष्टि से अतिविकसित अमेरिका में थे, उन्हें चिकित्सा सेवा तुरंत सुलभ हो गयी व देख−रेख भी उनकी पत्नी करती रहीं। उन्हें आश्चर्य था कि भारत में कभी भी ऐसी तकलीफ नहीं हुई, अब जब पहली बार हुई तो ऐसे स्थान पर जहाँ कुछ ही दूरी पर कुशल चिकित्सा ही नहीं परिपूर्ण सघन देख−रेख संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध थीं। वे सोच रहे थे कि यदि परम पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद न होता, वे अकेले होते तो अपने देश से 10 हजार किलोमीटर दूर इस स्थान पर कैसे यह सब हो पाता। वे आज पूर्ण स्वस्थ हैं व अपनी दीर्घायुष्य के लिए परमपूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी का आशीर्वाद ही मूल में पाते हैं। उन्हीं की प्रेरणा से,उन्हीं के निर्देशों के अनुरूप जीवन जीने को संकल्पित यह अधिकारी महोदय पूर्णतया स्वस्थ हैं एवं क्रमशः उच्चतम सोपानों पर बढ़ते ही चले जा रहे हैं।
यह कुछ प्रसंग मात्र जिज्ञासा/रूचि/विज्ञापन के लिए नहीं बल्कि एक परोक्ष सत्ता का अस्तित्व प्रमाणित करने के लिए प्रस्तुत किए गये हैं। गुरुदेव एक दिव्य सत्ता के रूप में, समाज को समर्पित, श्रेष्ठ,सुपात्र,संस्कारवान आत्मा के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान किये हुए हैं। कठिन तप से अर्जित यह पूँजी परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद भी उतनी ही नहीं बल्कि और भी सशक्त एवं सक्रियता से उपलब्ध है।
हमारे साथी “अद्भुत,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य” सीरीज में ऐसे अनेकों किस्से पढ़ चुके हैं लेकिन यहाँ पर जिस सन्दर्भ में प्रस्तुत किये गया हैं उनसे साथी भलीभांति परिचित हैं।
इस सप्ताह के अंतिम ज्ञानप्रसाद लेख का यहीं पर समापन होता है, संयोगवश यह अखंड ज्योति के मार्च 1992 वाले का भी समापन है। सोमवार को एक और दिव्य एवं रोचक अगले लेख की और बढ़ेंगें।
जय गुरुदेव