3 जुलाई 2025 का ज्ञानप्रसाद-अखंड ज्योति मई 1972
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उपासना से पाप नष्ट होने का वास्तविक अर्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति जीवन साधना के प्रथम चरण (साधना) का परिपालन करते हुए दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझ चुका है और उनसे सतर्कता पूर्वक विरत हो गया है। पाप नष्ट होने का अर्थ है पाप-कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश।
अक्सर इस तथ्य का उल्टा अर्थ निकाला जाता है।
आइए इस तथ्य को थोड़ा ध्यानपूर्वक गंभीरता से समझने का प्रयास करें।
मनुष्य पाप-कर्मों के “प्रतिफल” के नाश करने की चेष्टा करता है। उसे मालूम है कि पाप-कर्म का फल ठीक होने वाला तो है नहीं, उसे चाहिए कि पाप-फल का निवारण करने के बजाए,पाप-कर्म ही न किया जाए। मनुष्य तो मनुष्य ठहरा,उसकी तो प्रवृति ही बहानेबाजी की है। पाप करके भी वोह भगवान को ही जिम्मेदार ठहराएगा।अक्सर सुनते हैं कि पाप करने के बाद जब भगवान पाप का दंड देते हैं तो मंदिर में पत्थर की मूर्ति के समक्ष नाक रगड़ते हुए यही कहता है,“ भगवान,यह पाप-कर्म मैने थोड़े ही किया है,आपने ही मेरी बुद्धि बिगाड़ दी थी जो मैने ऐसा किया।
पाप-कर्म और पाप-फल के अंतर को समझने कबीर जी के उलटबांसी वाले उदाहरण का सहारा लेना उचित रहेगा।
उलटबांसी का अर्थ है किसी बात को सीधे-सीधे न कहकर, घुमा-फिराकर या उल्टी तरह से कहना। इसे प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग करके भी व्यक्त किया जाता है, जहाँ सामान्य अर्थ से अलग अर्थ निकलता है . यह एक साहित्यिक विधा है, जो अक्सर संतों और विशेष रूप से कबीर की रचनाओं में पाई जाती है । “बरसे कंबल भीगे पानी” कबीर जी की बहुप्रचलित उलटबांसी है। बरसता तो पानी है लेकिन यहां कंबल के बरसने को कहा जा रहा है।कबीरदास अपनी उलटबांसी रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं, जिनमें उन्होंने आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त किया है। इन उलटबांसियों का अर्थ समझने के लिए, पाठक को पारंपरिक ज्ञान से परे जाकर, प्रतीकात्मक और गूढ़ अर्थों को समझना होता है।कई बार विद्यार्थी का IQ चेक करने के लिए शिक्षक भी इस तरह की उलटबांसियां प्रयोग करते हैं।
खैर आइए लेख के संदर्भ की बात करें। पाप-फल, पाप-कर्म की ही उत्पति है, लेकिन मूर्ख मनुष्य पाप के फल के पीछे, उस फल की शांति के लिए सारे प्रपंच करता है, जबकि आवश्यकता तो पाप कर्म न करने की है।
यदि कर्मफल की थ्योरी की कोई Validity न होती तो पाप को ही पुण्य और कर्तव्य माना जाने लगता। फिर कोई भी पाप से न डरता। राजदण्ड से बचने की हज़ार तरकीबें हैं। उन्हें अपनाकर अनाचारी लोग सहज ही निर्द्वन्द्व निश्चिन्त रह सकते हैं। देवदण्ड ही एकमात्र बंधन था,जिसे इन धर्मध्वजियों ने उड़ा दिया। अब असुरता को स्वच्छंद रूप से फलने-फूलने और फैलने का पूरा-पूरा अवसर मिल गया। जिन्होंने भी पाप कर्मों के दण्ड से मुक्ति दिलाने का आश्वासन पूजा-पाठ की कीमत पर दिया है उन्होंने मानवीय आदर्शों और अध्यात्म के मूलभूत आधारों के साथ अश्लील कर्म किया है।
मानव-समाज के भौतिक मेरुदंड को सीधा रखने के लिए पाप का दंड और पुण्य का पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए। इसके उचित/अनुचित का मूल्यांकन भी अति आवश्यक है।
यदि पाप और पुण्य के मापदंड का ही पालन न किया जाय तो फिर व्यक्ति और समाज की आचार संहिता का रक्षक ईश्वर ही हैं ।
क्या है पूजा उपासना का प्रयोजन ?
पूजा उपासना का प्रयोजन मनुष्य को ईश्वर-विश्वासी अर्थात् धर्म मर्यादाओं का पालन करने के लिए व्रत-बन्ध धारण किए रखना है। यदि पूजा-पाठ के माध्यम से मनुष्य पाप-दंड से मुक्त हो सकता होता तो फिर यही कहना पड़ेगा कि वह जीवन के बेसिक मूल्य(नैतिक,मानवीय, धार्मिक और आत्मिक) नष्ट कर रहा है। इस स्थिति में तो यही प्रचलन हो जाना चाहिए: पाप करो,बाबाओं से कोई ताबीज ले लो,16 सोमवार के व्रत रख लो, 24 लाख गायत्री मंत्र कर लो/करवा लो, पाप-दंड दूर भाग जाएगा। ऐसे लोग सौदेबाजी के इलावा और कुछ नहीं करते, पाप-दंड का निवारण तो होता नहीं है लेकिन वोह समझते हैं कि हो गया। फिर से उसी पाप-कर्म की राह पर चल पड़ते हैं। ऐसी दशा में यह पूजा नास्तिकता से भी महंगी पड़ेगी।
पिछले दिनों यही हुआ है। यही बताया सिखाया गया है। कथावार्ताओं में हम यही सुनते/ पढ़ते आए हैं, गुरु लोगों के पास सबसे बड़ा आकर्षण अपने मंत्र के पक्ष में ही है। भोले लोग सस्ते मोल में पापदंड की बहुत बड़ी विपत्ति से बचने के लिए फंसते हैं और दोहरी हानि भुगतते हैं।
ईश्वरीय अकाट्य नियम इतने सरल नहीं है कि तनिक सी पूजा से छुई-मुई होकर सूख जायें। वे अत्यन्त कठोर हैं। विश्व का कण-कण इन नियमों की पकड़ में जकड़ा हुआ है। ईश्वर को कोई पूजे या गाली दे, विश्व-व्यवस्था कर्मफल की अपरिहार्य प्रक्रिया में तनिक भी ढील करने वाली नहीं है। ऐसी दशा में यदि पूजा किसी प्रलोभन/लालच से की गई हो, ईश्वर की प्रसन्नता किसी आशा से बाँधी गई हो, तो साधक द्वारा आशा किया गया महल रेत की तरह ढहने में ज़रा भी देर नहीं लगाता।
उपासना की असफलता का एकमात्र कारण आत्मिक प्रगति की पहली मंजिल “साधना” को नकारना ही है। गुण,कर्म,स्वभाव का परिष्कार साधना का मूलभूत उद्देश्य है। आत्म-बोध, आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास इस परिष्कार के पंचस्वरूप हैं। यही आत्मदेव का सच्चा पंचोपचार पूजन है। जो उसे कर सकता है, उसी की पूजा/उपासना सफल होती है। परमेश्वर तो निराकार, निर्विकार हैं,उनकी उपासना को व्यावहारिक रूप देने के लिए साकार प्रतिमा बनाई जाती है। इसी प्रकार जल, दीप, नैवेद्य, पुष्प,चन्दन जिन्हें पंचविधि पूजा के उपकरण कहा गया है,साकार पूजा में प्रयुक्त किये जाते हैं। इस देव-अर्पण के पीछे “जीवन-साधना” की ओर मार्गदर्शन प्रदान करने वाली गहन फिलॉसफी सन्निहित है। यदि उस फिलॉसफी को न समझा जाए और मात्र “उपासनात्मक कर्मकाण्डों” को ही सब कुछ मान लिया जाए तो यही कहना पड़ेगा कि यथार्थता को भुला कर विडम्बना की उलझन में पैर फंसा दिया गया।
उपासना की पूर्व भूमिका “जीवन-साधना” से आरम्भ होती है। तपश्चर्या का प्रयोजन मनोभूमि पर छाये हुए कुसंस्कारों का निराकरण है। एक बार समझ लेना चाहिए कि “साधना सर्फ पाउडर” है जिससे धुलाई होगी और “उपासना टिनोपाल” है जिससे कपड़े को चमचमाती सफेदी मिलती है। कपड़े को ‘सर्फ’ में धोकर मल रहित करना चाहिए और तदनन्तर ‘टिनापोल’ की नीली झलक देनी चाहिए। यह भूल नहीं करनी चाहिए कि धोने में बहुत झंझट समझ कर उसे टाल दिया जाय और मात्र टिनोपाल के छींटे लगाकर चमचमाते वस्त्र पहनने की आशा रखी जाय।
आत्मिक प्रगति के लिए उपासना का अपना महत्व है। जप आवश्यक है। आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान, समाधि की बहुमंजिली इमारत बनानी तो चाहिए लेकिन उससे पहले यम-नियम की ईंट, चूना नींव में गहराई तक भर के नींव पक्की कर लेनी चाहिए।
मंत्र-विद्या का महात्म्य बहुत है। योग साधना की गरिमा गगनचुम्बी है। विविध-विधि उपासनायें चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों की चर्चा काल्पनिक नहीं है लेकिन वह सारा आकर्षक विवरण, कथासार आकाश कुसुम ही बना रहेगा जब तक साधना की पृष्ठभूमि को अनिवार्य मान कर न चला जाएगा।
ओछी मनोभूमि के व्यक्ति यदि किसी प्रकार,किसी तन्त्र-विधि द्वारा कुछ लाभ वरदान प्राप्त भी कर लें तो भी वह अन्ततः उनके लिए विपत्ति ही सिद्ध होगी। Food pipe में कैंसर और Intestine में अल्सर से ग्रस्त रोगी यदि मिष्ठान/ पकवान खा भी ले,तो भी वह पकवान बहुमूल्य और पौष्टिक होते हुए भी कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे। जब पेट स्वस्थ होता है तो ज्वार, बाजरा जैसा सख्त भोजन भी पुष्टिकर सिद्ध होता है।
इन पंक्तियों में रहस्यमय अनुष्ठान साधनों की मंत्र प्रक्रिया एवं साधना विधि की गरिमा कम नहीं की जा रही है और न ही उनका महात्म्य मिथ्या बताया जा रहा है। कहा केवल यह जा रहा है कि “आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में जीवन साधना को आधारभूत मानना चाहिए और उपासना को उसकी सुसज्जा।” बाल्यकाल पूरा करने के बाद ही यौवन आता है और साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है। साधना को नर्सरी की कक्षा मानकर चलना चाहिए,उसके बाद ही अगली कक्षाओं में एडमिशन मिलेगी।अच्छी उपज लेने के लिए केवल अच्छा बीज ही पर्याप्त नहीं, अच्छी भूमि भी होनी चाहिए। पूजा विधान बीज है और साधक की मनोभूमि खेत। किसान भूमि जोतने, सींचने और संभालने में छह महीने लगाता है और बीज बोने में एक दिन। यदि अन्तःकरण निर्मल बना लिया जाय तो थोड़ा सा मंत्र साधन अनजान साधकों को भी सफलता के चरम लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। इसके विपरीत कर्मकाण्ड में पारंगत कठोर प्रयत्नरत होने पर भी मिली हुई सफलता उल्टी विनाशकारी होती है। दूषित मनोवृत्ति बनाये रहने के कारण रावण,कुम्भ-करण, मेघनाद, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर आदि को दुर्गति के गर्त में गिरना पड़ा। इन्होंने तप/वरदान अपने अहंकार और अनाचार को बढ़ाने में प्रयोग किए।
उपासना कारतूस है और जीवन साधना बन्दूक। अच्छी बन्दूक होने पर ही कारतूस का चमत्कार देखा जा सकता है। बन्दूक के बिना अकेला कारतूस थोड़ी आवाज करके ही फट सकता है, उससे सिंह व्याघ्र का शिकार नहीं किया जा सकता। अनैतिक गतिविधियाँ और अवाँछनीय विचारणायें यदि भरी रहें तो कोई साधक आत्मिक प्रगति का वास्तविक और चिरस्थायी लाभ न ले सकेगा। किसी प्रकार कुछ मिल जाय तो उससे जादूगरी जैसा चमत्कार दिखा कर थोड़े ही दिन यश लिप्सा पूरी की जा सकती है। ऐसी स्थिति में न अपना वास्तविक लाभ हो सकता है और न दूसरों का।
इसलिए आवश्यक है कि आत्मबल से संबंधित सिद्धियाँ और आत्म-कल्याण के साथ जुड़ी हुई विभूतियाँ प्राप्त करने के लिए जो कोई भी निष्ठावान हो उसे अपने गुण,कर्म,स्वभाव पर गहरी दृष्टि डालनी चाहिए और जहाँ कहीं छिद्र हों उन्हें बन्द करना चाहिए। फूटे हुए बर्तन में जल नहीं भरा रह सकता,छेद वाली नाव तैर नहीं सकती, दुर्बुद्धि और दुश्चरित्र से ग्रस्त व्यक्ति इन छिद्रों में अपना सारा उपासनात्मक उपार्जन गँवा बैठता है और उसके हाथ कुछ नहीं लगता है।
हर दिन नया जन्म हर रात नई मृत्यु वाली साधना:
उपरोक्त साधना विधि के अनुसार गुरुदेव बताते हैं: प्रातःकाल उठते ही यह अनुभव करना चाहिए कि अब से लेकर सोते समय तक के लिए ही आज का नया जन्म मिला है। इसके एक-एक क्षण का सदुपयोग करना है। इस आधार पर दिन भर की पूरी दिनचर्या निर्धारित कर ली जाय। इस दिनचर्या में समय जैसी बहुमूल्य सम्पदा का एक कण भी बर्बाद होने की उसमें गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। एक भी अनाचार बन पड़ने की ढील न रखी जाय। निकृष्ट स्तर पर सोचने और हेय कर्म करने पर पूरा प्रतिबन्ध लगाया जाय। इस प्रकार नित्य कर्म से लेकर आजीविका उपार्जन तक, संभाषण से लेकर कर्तृत्व तक, जीवन के हर क्षेत्र में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। रात को सोते समय लेखा-जोखा लिया जाय कि आज उत्कृष्टता और निकृष्टता में से किस का उपार्जन अधिक हुआ। पाप अधिक बना या पुण्य। भूलें प्रबल रहीं या सतर्कता जीती। इस प्रकार आत्म निरीक्षण करने के उपरान्त दूसरे दिन और भी अधिक सतर्क रहने,और भी उत्तम दिनचर्या बनाने की तैयारी करते हुए निद्रा-माता को मृत्यु समझ कर उसकी गोद में शान्तिपूर्वक जाना चाहिए। यह क्रम निरन्तर जारी रखा जाय तो जीवन में क्रमशः अधिकाधिक पवित्रता का समावेश होता चला जाता है और तदनुरूप आत्मिक प्रगति तीव्र होती चली जाती है।
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साधना और उपासना लेख का समापन।