वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

“अपने सहकर्मियों की कलम से” का 14 जून 2025 का स्पेशल अंक -सरविन्द जी एवं अरुण जी की समस्या

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सभी साथी भलीभांति परिचित हैं कि प्रत्येक माह के तीन शनिवार साथिओं की प्रतिभा एवं प्रोत्साहन के लिए रिज़र्व किये हुए हैं। हमारा प्रयास रहता है कि किसी भी साथी में,किसी भी प्रकार की, कोई भी प्रतिभा हो उसे परिवार के मंच पर,साथिओ के समक्ष लाया जाए, उसका मूल्यांकन किया जाए,योगदान दे रहे साथिओं को अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाए, उनका मनोबल बढ़ाया जाए ताकि वोह गुरुदेव के सच्चे सैनिक बन कर उभरें। इसी प्रथा का सम्मान करते हुए हमारी पिंकी पाल बेटी ने कुछ दिन पहले ऑडियो/वीडियो बनाने के लिए सहयोग माँगा था, आज अभी-अभी प्रेरणा बेटी ने भी इसी दिशा में सहयोग के लिए फ़ोन किया था।   

इस कढ़ी में हर सप्ताह हमारे पास अनेकों वीडियोस, ऑडिओस, फोटो आदि का इतना संग्रह इक्क्ठा हो जाता है कि  उचित चयन करना कठिन हो जाता है। हमारे विवेक के अनुसार जो-जो योगदान उचित प्रतीत होते हैं उन्हें, एक डाकिये की भांति, परिवार के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। इतना ही नहीं, डाकिये की ही भांति घर-घर में (हर किसी के व्हाट्सप्प अकाउंट) पर पोस्ट भी  करते हैं। जिस प्रकार पुराने समय में डाकिये की  चिठ्ठी का बेसब्री से इंतज़ार किया जाता था, आज आधुनिक युग में, AI के युग में भी हमारे शनिवार के सेगमेंट की प्रतीक्षा की जाती है। पुराने समय में, अच्छी सूचना के लिए, डाकिये को बख्शीश दी जाती थी, हमें  भी आशा अनुसार खूबसूरत, प्रभावशाली कमैंट्स  की बख्शीश मिलती है। व्यक्तिगत सराहना की तो कभी भी चाहत नहीं रही, लेकिन जब निष्ठावान साथी अपने मन की बात करते हैं तो इस बात की ख़ुशी अवश्य होती है कि मेरे गुरु का गुणगान हो रहा है। गूगल ड्राइव लिंक में कैद किये गए योगदान की सराहना भी हमें अत्यंत सुखद अनुभव प्रदान करती है। 

आज प्रस्तुत किया गया स्पेशल सेगमेंट दो ऐसी घटनाओं पर केंद्रित है जिसने न केवल हमारे स्थूल स्वास्थ्य को प्रभावित किया है बल्कि हमारे अंतःकरण में भी खलबली सी मचाये रखी है। आद अरुण वर्मा जी की समस्या तो इतनी बड़ी नहीं है,आद सरविन्द जी की आर्थिक समस्या ने हमारी  मानसिक स्थिति एवं अंतःकरण को एक “धर्मसंकट” में धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। एक तरफ से इच्छा उठती है कि आद सरविन्द जी की सहायता होनी चाहिए वहीँ दूसरी तरफ से विरोध का निर्देश मिल रहा है।    

1.ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार को बार-बार एक समर्पित, सहयोगी परिवार के विशेषण  से सम्मानित किया गया है। इस विशेषण के आधार पर हमारा कर्तव्य एवं अधिकार बनता है कि जिस व्यथा से हमारा अंतःकरण दुःखित हो रहा है उसकी  परिवार में चर्चा क्यों न की जाए।  हमारी समर्पित जीवनसाथी, आदरणीय नीरा जी  भी ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की एक कार्यकर्ता है, उनके साथ कई दिन लगातार चर्चा करने के उपरांत एवं हमारे स्वास्थ्य के सभी Indicators (ब्लड प्रेशर, शुगर, स्ट्रेस आदि ) rise होने से यही संकेत मिल रहे हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से कुछ गलत होने की सम्भावना है। 

आगे चलने से पूर्व,हम लिखना चाहते हैं कि जो कुछ भी लिखा जा रहा है अपने  अंतःकरण से प्रकट हो  रहे शब्द हैं, जैसे जैसे आ रहे हैं, हम लिखे जा रहे हैं, बिना किसी vocabulary की परवाह किये क्योंकि हम कोई  लेखक नहीं  हैं। 

आद सरविन्द जी की आर्थिक सहायता में प्रतक्ष्य विरोध उनके द्वारा दो बहिनों से लिए गए कर्ज़े को वापिस न करना है। जिन दो बहिनों ने भाई साहिब की सहायता की, वोह भी हम सबकी भांति ही होंगीं, उनकी भी आशा होगी कि हमें हमारे पैसे वापिस मिल जाएँ। 

आदरणीय बड़ी बहिन रेणु जी के कमेंट से कुछ संकेत मिलता था कि सहायता करने की उनकी इच्छा है, क्योंकि सरविन्द जी ने जिस भावना एवं शब्दावली से main कमेंट एवं सात काउंटर कमेंट लिखे थे, किसी के भी ह्रदय में भवंडर मचा सकते थे। 

“लेकिन कई बार दिल से ज़्यादा दिमाग से काम लेना उचित होता है।” गुरुदेव की शिक्षा एवं गायत्री उपासना (केवल गायत्री मंत्र ही) सद्बुद्धि की ओर प्रेरित करने को कहते हैं। विवेकशील होकर यदि भाई साहिब की समस्या का विश्लेषण किया जाए तो इससे ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार जैसे समर्पित मंच पर नेगेटिव प्रभाव पड़ता दिखता है। वोह कैसे ?

शांतिकुंज से एवं अप्रतक्ष्य साथिओं से प्राप्त हुए संदेशों में  आग्रह किया गया है,निवेदन किया गया है कि बिना मूल्यांकन किये आर्थिक सहायता करने के दूरगामी नेगेटिव प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है। हम इन संदेशों को सार्वजानिक करने में असमर्थ हैं लेकिन नेगेटिव प्रभाव दिखने आरम्भ हो भी गए हैं। 

अभी कुछ वर्ष पूर्व सक्रीय हुए यूट्यूब चैनल, जिसके 41000 सब्सक्राइबर्स देखकर हम प्रसन्नता अनुभव करते हैं, एक माह में 2200 सब्सक्राइबर्स की संख्या गिर कर 455 आ गयी है। दैनिक ज्ञानप्रसाद लेख/वीडियो आदि  पर प्रतक्ष्य दिख रहे, कमेंट कर रहे साथिओं की संख्या 60 से गिर कर 25 रह गयी है, उनमें  भी कमेंट करने वाले सक्रीय साथी  केवल कुछ एक ही रह गए हैं (उनको हम नमन किये बिना नहीं रह सकते) हमें डर है कि यदि इस तरह ही चलता रहा तो हमारे  अथक प्रयास के बावजूद, यूट्यूब चैनल बंद होने में कोई देर नहीं है।

नेगेटिविटी कैसे ?

जिन साथिओं के सन्देश हम सार्वजनिक करने  में संकोच कर रहे हैं, वोह हमारे साथ पिछले पांच वर्षों से अप्रतक्ष्य रूप से जुड़े  हुए हैं, हमारी एक-एक गतिविधि से अवगत हैं। हमारी ही एक शॉर्ट वीडियो पर उन्होंने हमें सन्देश भेजा था कि नपुंसकता की पराकाष्ठा है कि इस वीडियो पर एक भी सार्थक/प्रेंरणाप्रद कमेंट नहीं पोस्ट हुआ है। 

कमेंट की बात हो ही रही है तो बिना नाम लिए उन साथिओं की चर्चा करना भी अनुचित नहीं रहेगा कि पिछले कितने ही वर्षों से हम सार्थक,ज्ञानप्रसाद-सम्बंधित कमेंट करने का आग्रह कर रहे हैं, काउंटर कमेंट करने एवं पढ़ने का आग्रह/निवेदन कर रहे हैं लेकिन उनके कान पर कोई जूं तक नहीं रेंगी। हम बार-बार मानवीय मूल्यों का राग अलापते रहते हैं, क्या यही  शिष्टाचार है कि बच्चों ने परिवार की वरिष्ठ बहिन सुमनलता जी की बात को भी नकार दिया, अनसुना कर दिया, उन्हें विवश होकर कहना पड़ा कि कोई नहीं सुनता। 

इन बच्चों ने तो गुरुदेव के “बोओ और काटो” के सन्देश को भी नकार दिया, पात्रता विकसित की होती तो गुरुदेव स्वयं ही हाथ पकड़ कर मंझधार में से निकाल लेते, उन्होंने ने तो मरे हुए को जीवित कर दिया, गाड़ी दिलाना तो उनके लिए बड़ी तुच्छ सी बात है। कल की ही शार्ट वीडियो में  गुरुदेव भगवान् के बारे में बता रहे हैं, अगर देखी  होती तो स्वयं ही मार्गदर्शन मिल जाता।

अनदेखा करना, न सुनना हमारे साथ ही नहीं है, गुरुदेव भी इससे व्यथित रहे हैं। जून 1972 की अखंड ज्योति में माता जी लिखती  हैं : 

उनकी एक ही लालसा उभरी पड़ रही है कि उनके प्रियजन महानता का वरण करें। उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलें और उस लक्ष्य तक पहुँचें, जहाँ मानव जीवन सार्थक एवं कृतकृत्य होता है। वार्ता के बीच-बीच में निराशा, क्षोभ, दुःख के भाव भी उनके चेहरे पर झलकते दिखाई पड़े। इसके पीछे एक ही व्यथा थी कि हर आधार पर समझाने के साथ अपना निज का उदाहरण प्रस्तुत करने पर भी उनके प्रियजन उस मार्ग पर चलने के लिए क्यों तैयार नहीं होते? अपनी पात्रता में वृद्धि क्यों नहीं करते? उनकी सहायता के लिए लालाइत देवशक्तियाँ जो उनका दरवाजा कब से खटखटा रही हैं, उनके लिए रास्ता क्यों नहीं खोलते?

वे चाहते थे कि उनके प्रियजन महानता का मार्ग अपनाएँ। उसके लिए पात्रता का चयन करें और ऐसा चिंतन अपनाएँ, जिसे धारणा, ध्यान, प्रत्याहार और समाधि की संज्ञा दी जा सके। यह चिंतन वही हो सकता है , जो व्यक्ति निर्माण-प्रक्रिया के अंतर्गत गुरुदेव आए दिन समझाते रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनके हर साथी को इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का पग-पग पर भरपूर आनंद मिले। इसके लिए कोई मंत्रानुष्ठान पर्याप्त नहीं हो सकता। इसके लिए लोक-मंगल की वह साधना अपने कर्तृत्व में सम्मिलित करनी पड़ती

केवल व्यक्ति-निर्माण के नारे लगाने से कुछ नहीं होने वाला। सरविन्द जी को संतान-मोह को छोड़कर, दोनों बेटिओं को आत्मनिर्भर,स्वावलम्बी  बनाने की ओर प्रेरित करना चाहिए। उन्होंने अपने कमेंट में तीनों बच्चों को ज्ञानरथ परिवार के बच्चे कह कर सम्बोधित किया था, ठीक है वोह हैं हमारे बच्चे, फिर  हमारी  व्यक्तिगत धारणा  है कि बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के दूरगामी सार्थक परिणाम हैं। फिर हमें इन बच्चों को ठीक उसी प्रकार पालना चाहिए जैसे हमारे  माता पिता ने हमें पाला, जैसे हमने अपने दोनों बेटों को पाला, जैसे हमारी दोनों पोतियां पल रही हैं। हमारे माता पिता ने हमें इतना सक्षम बना दिया कि पांचवीं कक्षा से लेकर-पीएचडी और विदेशी शिक्षा तक स्कालरशिप और फ़ेलोशिप से काम चल गया। दोनों बेटों ने स्वयं को इतना आत्मनिर्भर बनाया कि आज तक उन पर हमने एक पैसा भी खर्च नहीं किया। चर्चा का विषय ही कुछ ऐसा है कि हमें व्यक्तिगत लिखना पड़ा जिससे हम दूर भागते हैं। 

अपनी बेटी ही समझ कर  पिंकी पाल की दिनचर्या को देखकर कुछ पैसा कमाने का सुझाव दिया था, वोह हमसे कितना सहमत हुई तभी पता चलेगा जब वह अपने पापा का आर्थिक सहयोग करेगी। बड़ी बहिन को देखकर छोटी एवं भाई भी प्रेरित होंगें। सपने देखना, प्रयास करना जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं लेकिन जब प्रयास सही दिशा में होते हैं तो ईश्वर वरदान देने को लालयित, उतावले होते हैं। 

तीन Grown up children होने के बावजूद यदि सरविन्द जी की सहायता की गयी तो उनके भविष्य में नेगेटिव इफ़ेक्ट की सम्भावना बढ़ने का अंदेशा है। 

2.आदरणीय अरुण वर्मा जी की व्यक्तिगत समस्या अपनी जीवनसाथी के साथ है।  जीवनसाथी शब्द का अर्थ ही ऐसा साथी होता है जो जीवन भर  साथ दे यां फिर जिसके कारण जीवन सार्थक हो। हमे पूर्ण विश्वास है कि बहिन जी अरुण जी का अवश्य साथ देंगी लेकिन देंगीं तभी जब गुरुदेव का हाथ उनके सिर  पर होगा, इसके बिना और कोई विकल्प नहीं है। इस विषय पर केवल बहिन जी को ही ज़िम्मेवार ठहराना उचित नहीं होगा क्योंकि परिवार की ज़िम्मेवारिओं से विमुख होकर गुरुदेव का कार्य करना भी सहन नहीं होगा। अरुण जी के ऊपर बहिन जी का अधिकार है, इस अधिकार  के वशीभूत ही यह सब कुछ हो रहा है। ऐसा अधिकार पति-पत्नी के परस्पर सम्बन्ध एवं स्नेह के कारण ही जन्म लेता है। इस सम्बन्ध का सम्मान करना दोनों का परम कर्तव्य है क्योंकि दोनों ही इस जीवनरुपी गाड़ी के पहिये हैं। अरुण जी तो वर्षों से मारुति की गाड़ियां बेचते आ रहे हैं, अपने घर-परिवार की गाड़ी के मूल्य को समझ नहीं पाए। वर्मा परिवार की गाड़ी के चालक परम पूज्य गुरुदेव हैं, उसका स्टीयरिंग इधर उधर नहीं जा सकता, उबड़-खूबड़ गड्ढों में भी इस गाड़ी को कोई हानि पहुँचने वाली नहीं है, ऐसा हमारा अटल विश्वास है। अरुण जी को गुरुदेव पर अटल विश्वास है तो गुरुदेव बहिन जी से अवश्य ही वोह सब कुछ करवा लेंगें जिसमें उनकी पात्रता है। 

जय गुरुदेव        


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