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प्राणाग्नि के जखीरे पर आधारित लेख श्रृंखला का 11वां लेख-प्राणवान व्यक्ति एक ही शरीर से कई स्थानों पर कार्य कर सकते हैं

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की गुरुकुल स्थित पावन यज्ञशाला में ज्ञानयज्ञ की आहुतियां देने के लिए परम पूज्य गुरुदेव के  हम सब समर्पित बच्चे आज गुरुवार को गुरुचरणों में समर्पित हो रहे  हैं। गुरुवर से  निवेदन करते हैं कि हमें विवेक का दान दें। वीणा वादिनी, ज्ञान की देवी माँ  सरस्वती से निवेदन करते हैं कि अपने बच्चे को इतना योग्य बना दो एवं उसके सिर पर हाथ धरो माँ  ताकि उसकी लेखनी  सदैव चलती रहे।

प्राणाग्नि पर चल रही वर्तमान लेख श्रृंखला में आज प्रस्तुत किया गया आध्यात्मिक ज्ञानप्रसाद की  आरंभिक पंक्तियों में प्राणाग्नि के प्रकटीकरण की बात हो रही है। भोलेनाथ की अर्धांगिनी सती ने अपने पिता के घर में अपने ही शरीर से प्रकट हुई योगाग्नि से अपने शरीर का दाह किया था। मानव शरीर प्राणाग्नि के Sparks के कारण अपरिमित शक्तियों का स्थान है, इसीलिए इसे  देव मंदिर कह कर सम्मानित किया जाता रहा है। 

लेख के अगले भाग में परम पूज्य गुरुदेव के उदाहरण देकर यह  प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि  प्राणवान व्यक्ति, अद्भुत प्राणशक्ति के कारण एक ही समय में, एक ही शरीर से, कई स्थानों पर कार्य कर सकते हैं। इस सन्दर्भ में दो पूर्व प्रकाशित लिंक दिए गए हैं जिनका अमृतपान करके हमारे सहकर्मी अपनी स्मरणशक्ति को रिफ्रेश कर सकते हैं। इसी तथ्य को दो विदेशी उदाहरणों से भी समर्थन मिलता है। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख के साथ परम पूज्य गुरुदेव की अमूल्य रचना “काया में समाया प्राणाग्नि का ज़खीरा” पर आधारित वर्तमान  लेख श्रृंखला के चौथे चैप्टर का समापन होता है। अभी दो चैप्टर और बाकी हैं,सोमवार से इन्हें भी समझने का प्रयास रहेगा। 

तो साथिओं, आइये चलें आध्यात्मिक गुरुकक्षा को ओर  एवं हो जाएँ गुरुचरणों में समर्पित। 

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प्राणाग्नि कई बार प्रयत्नपूर्वक प्रकट की जा सकती है और कई बार अनायास ही अप्रत्याशित रूप से उभरती है। पौराणिक गाथा के अनुसार शिव पत्नी सती ने पितृगृह में अपने शरीर से ही योगाग्नि प्रकट करके शरीर दाह किया था। अन्य योगियों के बारे में भी ऐसी ही गाथाएं मिलती हैं जिन्होंने शरीरान्त के समय अन्य किसी के द्वारा अन्त्येष्टि किये जाने की प्रतीक्षा न करके अपने भीतर से ही अग्नि प्रकट की थी और काया को भस्मसात कर लिया था। शाप देकर दूसरों को भस्म कर देने के तो कितने ही कथानक हैं। भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था और दमयन्ती के शाप से व्याध जल कर भस्म हो गया था। भस्मासुर ने तो इस विशिष्टता को अपनी तपस्या के सहारे एक सिद्धि के रूप में ही प्राप्त कर लिया था वह किसी पर भी हाथ रखकर उसे भस्म कर सकता था।

यह प्राणाग्नि के प्रयत्नपूर्वक किये गये प्रयोग हुए। इसके पीछे कुछ उद्देश्य और प्रयोग भी हैं लेकिन आश्चर्य तब होता है जब यह कायिक ऊर्जा अनायास ही किसी-किसी के शरीर से फूट पड़ती है और अपनी काया को ही नहीं समीपवर्ती सामान को भी जलाने लगती है।

पुराणों में इस तथ्य का वर्णन निम्नलिखित दिया गया है:

यह प्राण ही शरीर में अग्नि रूप धारण करके तपता है, यह सूर्य, मेघ, इन्द्र, वायु, पृथ्वी तथा भूत समुदाय है। सत असत तथा अमृत स्वरूप ब्रह्म भी यही है। शरीर में यह कई तरह की अग्नियों के रूप में जलता है। यह अग्नि जठराग्नि हो सकती है, यज्ञ में वर्णित तीन दिव्य अग्नियां आयुर्वेद वर्षित प्राकृत अग्नि विज्ञान की तेरह अग्नियां अथवा योगाग्नि के रूप में प्राण शक्ति का समुच्चय कुण्डलिनी हो सकती है। अपने-अपने भिन्न-भिन्न रूप में यह बहिरंग में प्रकट होती रहती है एवं कभी आंखों से, कभी भाव-भंगिमा द्वारा, कभी वाक् शक्ति के माध्यम से एवं कभी-कभी बल पराक्रम-साहसिकता के रूप में इसकी स्थूल अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।

मन को लुभाने वाले,आकर्षित करने वाले सौन्दर्य में जो तेजस्विता एवं सौम्यता बिखरी होती है, वह और कुछ नहीं, प्राणों का उभार है। वृक्ष-वनस्पति पुष्पों से लेकर, पहाड़, नदी-सरोवर, शिशु-शावक, किशोर-किशोरियों में जो कुछ भी आह्लादकारी सौंदर्य दिखाई पड़ता है, वह सब प्राण का ही प्रताप है। अभिव्यक्ति के रूप भिन्न-भिन्न घटकों में भिन्न हो सकते हैं लेकिन मूल प्राण तत्व एक ही होता है, एक ही स्रोत इस समष्टिगत प्राण का है।

मानवी काया का स्थूल बहिरंग जो हमें दिखाई देता है, उसका सूक्ष्म रूप प्राण के अनेकों Sparks के मिश्रण से बना है। यह Sparks का मिश्रण  अपने आप में अनन्त अपरिमित शक्तियों का पुंज है। यही कारण है कि इस शरीर को देव मन्दिर कहा गया है, जिसमें पांच प्राण रूपी पंच देव प्रतिष्ठापित हैं। 

जब मात्र एक देवता के वरदान से मनुष्य अजर-अमर हो जाता  है तो पंच देवों की सिद्धि कर लेने वाला कितना समर्थ, सशक्त हो सकता है, उसकी कल्पना भर से रोमांच हो उठता है।

निम्नलिखित पंक्तियों में इस अद्भुत विशेषता के कुछ उदहारण दिए गए हैं :  

एक ही शरीर से कई स्थानों पर एक ही समय उपस्थित होने का सबसे विश्वसनीय एवं उत्तम उदाहरण हमारे अपने पूजनीय गुरुदेव के इलावा और कौन हो सकता है। हमारे साथिओं को स्मरण हो आया होगा कि गुरुवर ने अपनी ईस्ट अफ्रीका यात्रा के दौरान किलिमंजारो नगर स्थित विक्रम देसाई के घर में उसके बच्चे का नामकरण सम्पन्न किया था। उसके बाद वहीं पर यज्ञ कराया जिसमें नार्मल दिनों की तुलना में बहुत अधिक परिजन उपस्थित हुए। जब गुरुदेव विक्रम देसाई जी के घर में थे उसी समय मारसबित कस्बे के सेमिनार हाल में गुरुदेव सूर्य विज्ञान पर लेक्चर दे रहे थे। इससे भी बड़ी बात यह थी कि गुरुदेव स्थूल रूप से इन दोनों स्थानों पर नहीं थे, वोह तो उस समय 700 किलोमीटर दूर मोशी में थे। इसी तरह का एक और उदाहरण आदरणीय महेंद्र शर्मा जी के उद्बोधन से मिलता है जब 1985 में गुरुवर पर  जानलेवा हमला हुआ था और उन्हें तालाबंद कमरे में बंद कर दिया था। महेंद्र जी एवं एक सिक्योरिटी गार्ड 24 घंटे ड्यूटी पर तैनात थे लेकिन फिर भी गुरुदेव हिमालय यात्रा कर आये थे। 

अफ्रीका और हिमालय वाली उपरोक्त दोनों घटनाएं कोई साधारण घटनाएं नहीं हैं, ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर दोनों ही प्रकाशित हो चुकी हैं, साथिओं को स्मरण भी हो आयी होंगी लेकिन फिर भी हम दोनों के लिंक नीचे दे रहे हैं,दोहराने में  कोई हर्ज़ नहीं है : 

ऐसी ही अन्य दो  घटनाओं का वर्णन डा. थेल्मामॉस ने उल्लेख किया है जिससे प्रमाणित होता है कि मानवी चेतना शरीर के नियम बन्धनों से मुक्त  है।  

उनमें से एक घटना सन् 1908 की है। ब्रिटेन के हाउस ऑफ लार्डस का अधिवेशन चल रहा था। इस अधिवेशन में विरोधी दल ने सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखा था और उस दिन No confidence प्रस्तुत किया जाना था। विरोधी पक्ष तगड़ा था। अतः सरकार को बचाने के लिए सत्तारूढ़ दल के सभी सदस्यों का सदन में उपस्थित होना आवश्यक था। इधर सत्तारूढ़ दल के एक प्रतिष्ठित सदस्य सर कॉर्नरोश गम्भीर रूप से बीमार पड़े हुए थे। उनकी स्थिति इस लायक भी नहीं थी कि वे बिस्तर से उठकर चल फिर भी सकें लेकिन उनकी हार्दिक आकांक्षा यह थी कि वे मतदान में भाग लें। उन्होंने डाक्टरों से बहुत कहा कि उन्हें किसी प्रकार मतदान के लिए सदन में ले जाया जाय परन्तु डॉक्टर अपने कर्त्तव्य से विवश थे। आखिर उनका जाना सम्भव न हो सका। परन्तु मतदान के समय सदन में कई सदस्यों ने देखा कि सर कॉर्नरोश अपने स्थान पर बैठे मतदान में भाग ले रहे हैं जबकि डाक्टरों का कहना था कि वे अपने बिस्तर से हिले तक नहीं। प्रबल प्रचण्ड शक्ति ही चेतन-सत्ता को वहां खींच लायी थी।

दूसरी घटना का उल्लेख करते हुए डा.थेल्मामॉस ने लिखा है:

कनाडा के ब्रिटिश कोलम्बिया प्रांत में विधान सभा का अधिवेशन राजधानी विक्टोरिया सेनेट में चल रहा था। उस समय एक विधायक चार्ल्सवुड बहुत बीमार थे, डाक्टरों को उनके बचने की उम्मीद नहीं थी लेकिन उनकी उत्कट इच्छा थी कि वे अधिवेशन में भाग लें। डॉक्टरों ने उन्हें बिस्तर से उठने के लिए भी मना कर दिया था और वे अपनी स्थिति से विवश बिस्तर पर लेटे थे। परन्तु सदन में सदस्यों ने देखा कि चार्ल्सवुड विधान सभा में उपस्थित हैं। अधिवेशन की समाप्ति पर सदस्यों का जो फोटो लिया गया, उसमें चार्ल्सवुड भी विधान सभी की कार्यवाही में भाग लेने वाले सदस्यों के साथ उपस्थित थे। यह चित्र आज भी वहां के म्यूजियम में सुरक्षित है।

चैप्टर 4 का समापन 

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कल वाले लेख  को 486   कमेंटस  मिले, 9 संकल्पधारी  साथिओं ने 24 से अधिक आहुतियां प्रदान की हैं। सभी का धन्यवाद् करते हैं ।


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