वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

प्राणाग्नि के जखीरे पर आधरित लेख श्रृंखला का प्रथम लेख- नन्हा सा बीज प्राणतत्व लिए हुए है।

परम पूज्य गुरुदेव की दिव्य रचना “काया में समाया प्राणाग्नि का जखीरा” मात्र 43 पन्नों की कोई साधारण सी पुस्तक नहीं है। किसी भी युग में मनुष्य  को उत्कृष्ट मार्गदर्शन प्रदान करने वाली इस पुस्तक को “सुखद जीवन का रामबाण” कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

2010 में प्रकाशित हुए  रिवाइज्ड एडिशन के अध्ययन से जो ज्ञानप्राप्ति होती है, उसे शब्दों में वर्णन कर पाना लेखक की सामर्थ्य से परे है। कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख में इस पुस्तक पर आधारित आने वाली लेख श्रृंखला की विस्तृत भूमिका प्रस्तुत की गयी थी, उचित रहेगा कि  आज सीधा प्रथम लेख के लिए  आध्यत्मिक गुरुकक्षा का रुख किया जाये। अपने गुरु के गुरुकुल के ज्ञानमंदिर में गुरुचरणों में समर्पित होने का सौभाग्य किन्हीं विरलों को ही मिलता है, जिसे मिलता है उसका तो कल्याण निश्चित ही है 

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वर्तमान लेख श्रृंखला का शुभारम्भ परम पूज्य गुरुदेव की अद्भुत रचना “काया में समाया प्राणाग्नि का जखीरा” के शीर्षक को समझने से किया जा रहा है। 

हमारा विश्वास है कि अधिकतर साथी शीर्षक के अर्थ से परिचित ही होंगें लेकिन सरल एवं संक्षिप्त सी चर्चा करने में कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिए। 

“काया में समाया प्राणाग्नि का जखीरा” अर्थात मानव शरीर प्राणाग्नि का Storehouse है। यदि हम मानव को प्राणी कहें (जो कहते भी हैं) तो प्राण और प्राणाग्नि में वही अंतर् है जो “अंगारों” और “धधकती आग की लपटों” में है। वर्तमान लेख श्रृंखला में इन्हीं धधकती आग की लपटों के  Existence और प्रयोग समझने का प्रयास रहेगा। अनेकों Tools की सहायता से समझने का प्रयास रहेगा कि प्राणाग्नि को कैसे जागृत किया जाता है, उसका सदुपयोग कैसे किया जाता है। विषय थोड़ा जटिल (Complex) अवश्य है लेकिन ज्ञान और रोचकता की पराकाष्ठा  लिए हुए है। इतनी शिद्दत और विश्वास के साथ ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि हमारे शरीर की बात  हो रही है, हमारी काया की बात हो रही है, उस काया की बात हो रही है जो अनंत शक्तियां लिए हुए है, ऐसा शक्तियां जिनसे हम अनभिज्ञ हैं, अनजान हैं।     

पुस्तक का प्रथम चैप्टर “अन्तराल में निहित सिद्धि वैभव” भी कुछ जटिल सा ही प्रतीत हो रहा है। आइये इसे भी समझ लें। मानव शरीर में अनंत सिद्धियों और वैभव का वास है, आवश्यकता है इस Hidden Potential को जानने की, explore करने की। यह कोई अविश्वसनीय बात नहीं है कि यदि मनुष्य उस परम शक्तिमान ईश्वर की संतान है, उसी का अंश हैं तो ईश्वर जैसा ही है । नन्हें से बीज की शक्ति का अनुमान तो वृक्ष की विशालता से ही लगाया जा सकता है। मानव की शक्ति का अनुमान,परम पिता की शक्ति से लगाया जा सकता है।

बीज में प्राणतत्व (Life element)  होता है। जब बीज को नमी, आरंभिक पोषण, अनुकूल वातावरण प्राप्त होता है तो वह अंकुरित होने लगता है। इसके उपरान्त वह बढ़ता है, पौधा बनता और फिर एक दिन विशाल वृक्ष की आकृति पकड़ता है । 

यहां एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है:

क्या यह निश्चित है कि प्रत्येक बीज से एक पौधा/ वृक्ष बनना  ही है? उत्तर मिलेगा-नहीं, ऐसा क्यों है? 

बायोलॉजी में तो इस तथ्य को अनेकों बहुचर्चित theories के द्वारा समझाया गया है जिनमें से ( हमारे जैसे नौसिखियों के लिए ) कुछ एक सरल सी निम्नलिखित हैं : 

1.Theory of natural selection जिसके अनुसार प्रकृति स्वयं ही चयन करती है,Select करती है। 

2. Survival of the fittest जिसके अनुसार वही जीवित रह सकता है जो वातावरण के अनुसार सबसे Fit है।

3. Struggle for existence जिसके अनुसार हर कोई अपने अस्तित्व के लिए,अपने उत्कर्ष के लिए, अपनी उन्नति के लिए Struggle तो करता ही है लेकिन सफल  वही होता  है जो सबसे योग्य है,कर्मठ है,जिसकी पात्रता विकसित हो चुकी है। 

यहाँ  इस तथ्य को समझकर, गांठ बांध लेने की आवश्यकता है कि जिस प्रकार मानव के सामाजिक/व्यावहारिक  जीवन में दूसरे को गिराकर आगे निकलने की दौड़ लगी हुई है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति में भी दौड़ लगी रहती है। बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है, सिंह जंगल का राजा है, बड़े वृक्ष अपने नीचे कब कोई खेती होने देते हैं। 

पाठकों से निवेदन है कि यदि बीज के उदाहरण को अपने रोज़मर्रा के जीवन के साथ जोड़कर अध्ययन किया जाये तो विषय को समझने एवं रोचक बनाने में सहयता मिल सकती है। 

उचित वातावरण, उपजाऊ भूमि,उचित देखरेख,भूमि की समय-समय पर गुड़ाई आदि कुछ ऐसे पैरामीटर्स हैं जो नन्हें से बीज से एक विशाल वृक्ष की रचना करने की क्षमता रखते हैं। इनमें से किसी एक भी पैरामीटर को नकार दिया,उसकी ओर ध्यान न दिया तो जो परिणाम मिलेंगें उनसे हम सब भलीभांति परिचित हैं। हम नौसिखिए तो हैं लेकिन इतना तो समझ ही सकते हैं कि शिशु के पालन पोषण में यदि माँ थोड़ी सी भी कोताही,लापरवाही बरतना शुरू कर दे तो क्या होगा। अभी कुछ दिन की ही बात है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर हमारी सर्जरी के कारण कुछ अनुपस्थिति की सम्भावना बनती दिखी, तो बिखराव होने की आशंका होने लगी। इस परिवार का बीजारोपण तो वर्षों पहले हो चुका था, जड़ें भी कुछ-कुछ जमी हुई दिखती थीं, लेकिन लालन-पालन, लाड-पुचकार ठीक उसी तरह अभी भी उतना ही आवश्यक है जितना Parenting is an ongoing, never ending process.    

नन्हें से बीज का अंकुरित होना इस बात पर निर्भर होता  है कि उसे जड़ें जमाने के लिए आवश्यक खाद,पानी,पोषण आदि प्राप्त हुआ कि नहीं। यदि उसकी Growth की आवश्यकताएं पूरी होती चली जाएं तो उसमें से कोंपले निकलती ही जाती हैं।

वही बीज जो एक तरफ तो भूमि में जाकर, उचित वातावरण उपलब्ध होने के कारण एक “विशाल वृक्ष की उपाधि” से सम्मानित हो जाता है, वही दूसरी तरफ बोरे में बंद रहने के कारण कीड़ों के कारण समाप्त हो जाता है। विशाल वृक्ष अपनी छाया से,अपने फल से मानव के लिए कितना लाभदायक हो जाता है जबकि बोरे में पड़े बीज को बचाने  के लिए अनेकों प्रकार की कीटनाशक दवाओं की आवश्यकता पड़ती है। यदि उसकी ठीक से रक्षा की जाये, सुखाया जाये और कीड़ों से बचाया जाये  तो वह मुद्दतों तक यथास्थिति अपनाये रहेगा। हाँ, बहुत पुराना हो जाने पर काल के प्रभाव से वह Infected हो जायगा, घुन जैसे कीड़े लगकर उसे नष्ट कर देंगे। आखिर काल के  चक्र ने तो आज तक किसी तो नहीं बख्शा तो इस नन्हें से बीज की क्या औकात है।  

हमें पूर्ण विश्वास है कि गुरुज्ञान कक्षा के सूझवान, बुद्धिमान एवं विवेकशील विद्यार्थियों के मस्तिष्क में इस उदाहरण से अनेकों विचारों का प्रवाह उमड़ रहा होगा। यही है गुरुदेव का विचारों की शक्ति का उपदेश। बीज को भूमि में बोते,अंकुरित होते,पौधा बनते,वातावरण उपलब्ध होते सभी ने अनेकों बार देखा होगा लेकिन प्राकृतिक और सामाजिक theories पर आधारित सरल विश्लेषण शायद ही कभी किया हो। 

गुरुदेव के समर्पित शिष्यों के यही विचार जब उत्कृष्ट कॉमेंट्स की शक्ल में फूट पड़ते हैं, अंकुरित हो उठते हैं  तो सोने पर सुहागा ही होता है।ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार नामक बीज को अंकुरित होते देखना, उसकी गुड़ाई करना, पौधे को विकसित होते देखना, उत्तम खाद,निर्मल जल से सींचना, नन्हें से, कोमल से पौधे का रंग-बिरंगें पुष्पों से शोभायमान होना, स्वादिष्ट एवं पोषक फल का प्राप्त होना, अपनेआप में एक बहुत ही सुखदायक अनुभव है, जिसका स्वाद इन पंक्तियों को पढ़ रहा प्रत्येक समर्पित सहकर्मी चख रहा है। यह सिलसिला केवल स्वाद चख कर आनंद उठाने तक ही सीमित नहीं है, उसके अंतर्मन में उठ रही उत्तेजना एवं उत्साह की ज्ञानअग्नि उसे अपने गुरु के लिए कुछ भी (जी हाँ कुछ भी!) करने को प्रेरित करती है।     

गत शनिवार का विशेषांक इसी तथ्य का प्राकट्य था, यही कारण है कि ज्ञानप्रसाद लेख से संबंधित विस्तृत कॉमेंट के लिए बार-बार निवेदन किया जाता है, बीज को अंकुरित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।  ऐसा करने से सभी साथियों की सामूहिक भागीदारी होती है, ज्ञान की मशाल में सभी का हाथ लग जाता है, दिव्य ज्ञानरथ को सभी साथियों का  सामूहिक धक्का लग जाता है और वोह  गुरु के विशेष अनुदान के हकदार बन जाते हैं । ऐसा हमारा अटूट विश्वास है, यह विश्वास अनेकों बार प्रत्यक्ष देखने पर ही बना है। 

आज भी आद सुमनलता बहिन जी ने आद नीरा जी को काउंटर कमेंट करके हमारे जैसे साधारण से, तुच्छ से इंसान के सम्मान में जो लिखा उसके लिए धन्यवाद् बहुत ही छोटा शब्द है। हम सोच में पड़ जाते हैं कि हमारे गुरु ने फर्श से उठाकर अर्श पर बिठा दिया, वह रे मेरे गुरु, बारम्बार नमन है।   

बीज में अंकुरित होने की शक्ति तभी होती है जब वह पका हुआ हो। यदि उसे कच्ची स्थिति में ही तोड़ लिया गया है तो वह खाने के काम भले ही आ सके, बोने और उगने की क्षमता विकसित न होगी। वह देखने में तो अन्य बीजों के समान ही होगा लेकिन ध्यानपूर्वक Analyse करने पर विदित  होगा कि उसमें वह गुण नहीं हैं  जो परिपक्व स्थिति वाले बीजों में पाए जाते हैं। 

नन्हां शिशु इस संसार में आँख खोलते ही प्राणशक्ति( Vital power)  का जखीरा लेकर आता है। उसका बस चले तो वोह एक दिन में ही सब कुछ सीख ले, सब कुछ कर ले।कैसे इधर उधर भागता फिरता है ,कभी सीढ़ियों के ऊपर तो कभी नीचे, कभी सोफे के ऊपर तो कभी नीचे। बेचारी माँ उस लड्डू गोपाल के पीछे भाग-भाग कर हांफ जाती है। लेकिन जीवन की यात्रा में धीरे-धीरे समय के साथ,योग्यता एवं पात्रता विकसित होती जाती है। हर मनुष्य में प्राणशक्ति की मात्रा कम-अधिक बनी रहती है, इसी प्राणशक्ति के आधार पर अक्सर कहा जाता है कि यह मनुष्य तो बहुत ही प्राणवान है,चुस्त,फुर्तीला, परिश्रमी आदि है। दूसरी तरफ ऐसे मनुष्य भी होते हैं जिन्हें निष्प्राण,सुस्त,आलसी,नीरस, निर्जीव आदि की केटेगरी में Classify किया जा सकता है। 

ऐसा क्यों होता है कि एक मनुष्य प्राणवान है और दूसरा निष्प्राण, प्राणशक्ति तो दोनों के लिए उपलब्ध है। 

यहाँ हम साथिओं से क्षमाप्रार्थी हैं कि “प्राणशक्ति की उपलब्धता (कैसे उपलब्ध होती है)” के विषय को अभी के लिए स्थगित करना उचित समझते हैं,अगर ऐसा न करें तो वर्तमान विषय हाईजैक हो सकता है।   

महत्व इस तथ्य का है कि प्राणशक्ति तो उपलब्ध है, क्या उसे बीज को पकाने के लिए प्रयोग  किया गया कि नहीं। सूर्य की गर्मी तो उपलब्ध थी, क्या बीज को उसमें सुखाया गया यां गीला ही भूमि में डाल  दिया। प्राणायाम (प्राण का आयाम)  की बेसिक ट्रेनिंग के बिना ही अनुलोम विलोम, कपालभाति आदि करना शुरू कर दिया तो क्या परिणाम मिलेंगें, सब जानते हैं।

आज के इस रोचक विषय का  यहीं पर Abruptly मध्यांतर करने के लिए क्षमाप्रार्थी हैं ,गुरु आशीर्वाद से कल इसके आगे की चर्चा और भी रोचक बनाने का प्रयास रहेगा। 

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कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख   को 525   कमेंट मिले, 15   संकल्पधारिओं ने 24 से अधिक आहुतियां प्रदान की हैं। सभी साथिओं का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।


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