18 नवंबर 2024 का ज्ञानप्रसाद
आज सप्ताह का प्रथम दिन सोमवार है, भगवान शिव को समर्पित “जय शिव ओंकारा” से गुरुकुल की आज की आध्यात्मिक गुरुकक्षा का शुभारम्भ होना एक पावन सौभाग्य है।
आज के लेख का शुभारम्भ करने से पहले साथिओं के साथ शेयर करना चाहेंगें कि यूट्यूब की टेक्निकल टीम से “शुक्रवार को गायब होने वाले कमैंट्स” से सम्बंधित हमारी चैट वार्ता हुई है जिसमें उन्हें कोई भी Fault न दिखी, सब कुछ Up-to-date है, कोई Restriction नहीं है। आने वाले दिनों में वोह चैनल का विस्तृत विश्लेषण जारी रखेंगें जिसके लिए हम साथिओं से योगदान का निवेदन कर रहे हैं। हम सभी को केवल कमेंट करके यह Indicate करना है कि मेरा कमेंट दिखाई नहीं दे रहा। आप पूछेंगें कि कमेंट की ही तो समस्या है तो कमेंट कैसे करना है ? इसका केवल एक ही विकल्प है और वह है व्हाट्सप्प। आप हमें व्हाट्सप्प पर बता सकते हैं कि कमेंट तो किया है लेकिन दिख नहीं रहा, विश्लेषण के लिए यूट्यूब देखना चाहता है कि किसका कमेंट दिखाई नहीं दे रहा।
तो आइये चलते हैं आज के ज्ञानप्रसाद लेख की ओर।
हमारे कमैंट् से साथिओं को पता चल गया होगा कि हम अपनत्व एवं प्रेम से परिपूर्ण एक ऐसे मार्मिक लेख की बात कर रहे हैं जिसे तीन बार साहस एवं प्रयत्न के बावजूद हमारे लिए पढ़ना असंभव रहा, अश्रुधारा थमने का नाम ही नहीं ले रही थी।
“हमारा धन्यवाद् स्वीकार कीजिये” शीर्षक से दिसंबर 1940 की अखंड ज्योति में प्रकाशित लेख में गुरुदेव ने जो-जो अपनत्व एवं प्रेम भरे शब्दों से इस लेख की रचना की है,उन शब्दों का ऋण तभी चुका हुआ समझा जायेगा जब एक-एक शब्द की भावना समझकर पाठकों के ह्रदय में उतर जायेगा। जो कोई भी गुरुदेव की अंतरात्मा से स्वयं को जुड़ा हुआ समझता है, स्वयं को उनका निष्ठावान शिष्य समझता है, यह लेख शृंखला उसे गुरुदेव के और अधिक करीब लाने का एक उत्कृष्ट साधन साबित होगा, ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।
गुरुदेव इस लेख के माध्यम से हम बच्चों के एक बार फिर से बताना चाहते हैं कि अगर हम सम्राट सच्चिदानन्द की संतान हैं तो फिर हम स्वयं को उसके राजकुमार की भांति क्यों नहीं समझते? शेर का बच्चा शेर ही होता है न, हम भेड़ों के झुंड में क्यों जा बैठे हैं, क्यों अपने आप को शेर होते हुए भी भेड़ समझ रहे हैं ?
गुरुदेव बता रहे हैं कि पिछले एक वर्ष में हम एक-एक पाठक के घर नहीं भी जा पाए तो क्या बात है, इसके बावजूद 25000 पाठकों में जहाँ-जहाँ भी अखंड ज्योति पंहुच पायी, सबने हमें अपनी छाती से लगाया है।
वैसे तो हम कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख में गुरुदेव के ही शब्दों का सरलीकरण करके, उनकी भावनाओं को ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के एक-एक साथी के ह्रदय में उतारने का प्रयास करेंगें लेकिन निम्नलिखित उदाहरण बहुत कुछ कह रहा है :
गुरुदेव बता रहे हैं कि एक वर्ष में 18000 व्यक्तियों के 38040 पर्सनल पत्र आये, अपनी योग्यता अनुसार अनेकों का विस्तारपूर्वक समाधान भी किया लेकिन जिन लोगों ने जवाबी पत्र नहीं लिखे थे, उनके लिए हमें आर्थिक समस्या के बावजूद 194 रुपए अपनी जेब से लगाने पड़े क्योंकि हमारे यह पत्र केवल पत्र ही नहीं थे, पाठकों के प्राण थे।
ऐसी होती है अपनत्व की भावना, प्रेम की भावना।
इस उदाहरण से हम सब एक बहुत बड़ी शिक्षा गांठ बाँध सकते हैं कि अगर कोई हमें व्हाट्सप्प पर, फ़ोन पर कोई मैसेज करता है तो शिष्टाचार का पालन करते हुए हमें कितनी देर में रिप्लाई करना है, रिप्लाई करना भी है कि नहीं। कई बार लिख चुके हैं कि भीड़ इक्क्ठी करना बहुत आसान है, 5000 फेसबुक फ्रेंड बनाने बहुत ही आसान है,अलग- अलग सोशल मीडिया ग्रुप्स बनाकर, फैन फोल्लोविंग बनाना, वाहवाही लूटना, डींगें मारना बहुत आसान है लेकिन कैसी विडंबना है कि ऐसे ग्रुप्स में मेंबर्स की शक्ल तो क्या नाम तक भी याद नहीं है।
अगर हम उस गुरु की संतान हैं जिसने 84 वर्ष पूर्व, 38040 पत्रों को उस समय पढ़ा जब आजकल जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं थी, गुरुदेव हमसे न जाने कितने ही अधिक व्यस्त थे, एक-एक को समझते थे, जानते थे, तो कृपया यह कहना बंद कर दें “समय किसके पास है” तभी हम उनकी सन्तान कहलाने के हकदार हैं। 24 घंटे,यहाँ तक कि रात को सोते समय भी फ़ोन हमारे साथ होता है, गाड़ी चलते वक्त भी और यहाँ तक कि इंडिया में हमने नया रिस्की रिवाज़ भी देखा है, स्कूटर पर ड्राइव करते समय टेढ़ी गर्दन से सपोर्ट करके फ़ोन करना।
आइए हम सब संकल्प लें कि गुरु द्वारा रचित दिव्य साहित्य को केवल इस भावना से न पढ़ें कि पढ़ना है और कमेंट करना है बल्कि उसे अंतरात्मा में उतार कर आत्मपरिष्कार करना है, स्वयं शिक्षित होना है, अनेकों को शिक्षित करना है। सही मायनों में यही है युग निर्माण, धरती पर स्वर्ग का अवतरण और मनुष्य में देवत्व का उदय।
उपरोक्त पंक्तियाँ उसी लेख में व्यक्त गुरुदेव की भावना को चरितार्थ कर रही हैं जिसे कल हमने ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के परिवारजनों की अंतरात्मा में उतारने का संकल्प लिया है, अगर हम इस प्रयास में सफल हो पाते हैं तो समझा जायेगा कि बहुत बड़ा किला फतह कर लिया गया है।
भावुकता में बहकर, गुरुदेव के प्रति प्रेम में हमने न जाने क्या कुछ लिख डाला। करबद्ध प्रार्थना है कि यदि एक भी शब्द अनुचित लिखा गया हो तो हमारी अल्प बुद्धि और अयोग्यता समझ कर, क्षमा करके कृतार्थ करें।
निवेदन है कि अखंड ज्योति दिव्य पत्रिका के बारे में समय-समय पर प्रकाशित हुए सम्मानीय सन्देश अवश्य अपने ह्रदय में उतारें।
****************
1.अखण्ड ज्योति का प्रकाशन ठीक वसंतपर्व के दिन से ही हुआ था। यों दिखने में वह भी एक साहित्यिक प्रयास जैसा लगता है लेकिन जिन्होंने उसे निकट से देखा है, वे जानते हैं कि यह “एक ऐसा प्रकाशपुंज” है, जिसने एक दीपक से असंख्य दीपक जगमगाने वाले काव्यालंकार को प्रत्यक्ष कर दिखाया है। अखण्ड ज्योति के दिव्यदर्शन से , प्रत्याहार, ध्यान-धारणा, समाधि के क्षेत्र में आगे बढ़ाकर व्यवहार के कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है। अखंड ज्योति ने इस अनोखेपन का अभिनव प्रयोग करने का दुस्साहस किया है और वह सफल होकर रहा है । संक्षेप में कहने योग्य, यही है “अखण्ड ज्योति का इतिहास।” इसे युगाँतरीय चेतना की गंगोत्री माना जा सकता है, आज उसका सेवा-साधना क्षेत्र, युगनिर्माण योजना के रूप में अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति दिसंबर 75, पृष्ठ 62
2.अखण्ड ज्योति देखने को तो एक पत्रिका भर लगती है, लेकिन सही मायनों में यह एक मिशन है, जो किसी वर्ग, क्षेत्र, धर्म की समिति परिधि में नहीं बँधता और न छुटपुट सामयिक हलचलों तक सीमितहै। फुंसियों पर मरहम-पट्टी करने की औपचारिकता स्वीकार करते हुए भी उसका लक्ष्य एक रक्तशोधन प्रक्रिया है। इसके लिए टिटहरी द्वारा समुद्र पाटे जाने वाले दुस्साहस की पुनरावृत्ति करने वाली विनम्र हलचल को अखण्ड ज्योति कहा जा सकता है। आज उसका बाजारू मूल्य थोड़ा ही आँका जा सकता है लेकिन है वह अत्यंत गरिमायुक्त एवं बहुमूल्य।
अखण्ड ज्योति दिसंबर 75, पृष्ठ 62
पंचतंत्र की अति शिक्षाप्रद टिटहरी जोड़े की अंडे देने वाली कथा से हम सब परिचित हैं, अनेकों बार इस मंच पर शेयर हो चुकी है,पाठक चाहें तो गूगल सर्च करके फिर से revise कर सकते हैं।
3.अपना आध्यात्मिक परिवार ही अखण्ड ज्योति के सदस्यों के रूप में बिखरा पड़ा है। कुछ समय पूर्व तक हम लोग परस्पर बिखरे हुए एक-दूसरे से अपरिचित थे। जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनतापूर्वक गुँथ गए उसे अखण्ड ज्योति पत्रिका कहा जा सकता है। अखण्ड ज्योति क्या है ? वसंत पर्व की एक कसक । प्रकाराँतर में हम लोगों के निताँत दूरवर्ती और अपरिचित होते हुए भी एक-दूसरे के अधिकतम निकट शब्दों में सघन आत्मीय बना देने का श्रेय इस कसक को ही जाता है, जो वसंतपर्व के उपहार के स्वरूप उभरी और जिसके बंधनों में बँधकर हम एक विशाल कारवाँ के रूप में किसी महान् लक्ष्य की ओर कंधे-से-कंधा मिलाकर चल पड़े।
अखण्ड ज्योति दिसंबर 77, पृष्ठ 54
4.अखण्ड ज्योति मनोरंजन के लिए चित्र-विचित्र लेखों का गुलदस्ता बनाकर पाठकों का मन बहलाने वाली पत्रिका नहीं है। इसके पीछे एक उच्चस्तरीय लक्ष्य है। वह लक्ष्य है: “लोकचिंतन में उत्कृष्टता का समावेश एवं चिंतन चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश।”
यह कार्य अत्यंत कठिन है। अंतराल का कायाकल्प करना सर्जरी के समान है। इसमें भावनाओं, मान्यताओं, संवेदनाओं, आकाँक्षाओं के अनेकानेक पक्षों स्तरों में जनचेतना का संचार एवं इसी हेतु इसमें कितने ही तर्कों तथ्यों, प्रमाणों और उदाहरणों का समावेश करना होता है। इस संग्रह के लिए मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतरे हंसों की तरह मोती चुन कर निकालने पड़ते हैं। हंस तो अपना-अपना ही पेट भरते हैं लेकिन यहाँ उससे भी बढ़-चढ़कर काम करना होता है। यह मणिमुक्तों के वितरण करने की प्रक्रिया है, जिससे अनेकों को सुसज्जित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। यही वह प्रयत्न है, जिसमें राजहंस की तरह अखण्ड ज्योति के प्रयास पिछले 50 वर्षों से अनवरत तत्परता के साथ चले आ रहे हैं। इसका परिणाम भी आशातीत हुआ है।
अखण्ड ज्योति नवंबर 87, पृष्ठ 63
5.अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर काले अक्षर ही नहीं छपते बल्कि उसके साथ प्रचंड प्राण प्रवाह भी बहता है। ऐसा प्रवाह जो सोतों को जगाता है, जागों को खड़ा करता है, खड़ों को चलाता है और चलतों को उछाल देता है। उसकी दिव्य क्षमता में कहीं कोई संदेह की गुंजाइश है नहीं।
अखण्ड ज्योति दिसंबर 87, पृष्ठ 62
6.अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान् ऊर्जा और उसके द्वारा बन पड़ने वाली क्रिया-प्रक्रिया प्रत्यक्ष दिखाई दे रही है। इसकी उपयोगिता एवं क्षमा को हर पारखी ने भूरि-भूरि सराहा है। उसे पारस की उपमा देने वाले कहते हैं, जो भी इसे छूते हैं, वे अपने कल्मष-कषाय (दोष दुर्गण) धो डालते हैं और ऐसा व्यक्तित्व विकसित करते हैं, जिसे कायाकल्प की उपमा दी जा सके। यदि ऐसा न होता तो सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के दुहरे मोरचे पर जो लाखों शूरवीर लड़ रहे हैं, उनका कहीं अता पता भी न होता । उज्ज्वल भविष्य का जो विश्वास जन-जन के मन में जाग रहा है, उसका बीजाँकुर भी कहीं दृष्टिगोचर न होता। इस दिव्य ऊर्जा की गरिमा और क्षमता को हर कसौटी पर कसा और खरा पाया जा सकता है। उसमें जन-जन को देवमानव में विकसित करने की भागीदारी ललक को युगचेतना के रूप में प्रज्वलित देखा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति दिसंबर 87, पृष्ठ 63
7.अखण्ड ज्योति का प्रधान लक्ष्य है, ऋषि परंपराओं का पुनर्जीवन । इसी को आधुनिक परिवेश में अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय भी कह सकते हैं।”
अखण्ड ज्योति जनवरी 88, पृष्ठ 55
इसके आगे कल का लेख ही होगा।
*********************
शनिवार वाले लेख को 506 कमैंट्स मिले एवं 12 युगसैनिकों ने 24 से अधिक कमेंट करके ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की इस अनूठी एवं दिव्य यज्ञशाला की शोभा को कायम रखा गया है। सभी को हमारी बधाई एवं धन्यवाद।