30 अक्टूबर 2024 का ज्ञानप्रसाद –सर्वांगपूर्ण सुगम उपासना विधि
आज के ज्ञानप्रसाद लेख से “उपासना आधरित लेख श्रृंखला” का समापन हो रहा है। कल प्रस्तुत किये गए लेख में “सर्वांगपूर्ण सुगम उपासना विधि” में किये जाने वाले पांच स्टैप्स (1.ब्रह्मसंध्या 2. देवपूजन 3. जप एवं ध्यान 4. प्रार्थना 5. सूर्यार्घ्यदान) में से प्रथम दो प्रारंभिक स्टैप्स का वर्णन दिया गया था। आज प्रस्तुत किये गए लेख में अगले तीन स्टेप्स का वर्णन है।
कमैंट्स भी बता रहे हैं और हमारा भी विश्वास है कि हमारे अनेकों साथी पहले ही ऐसी यां अन्य अनेकों उपासनाएँ का रहे हैं, उनमें महारत भी प्राप्त कर चुके हैं लेकिन अनेकों अन्यों के लिए यह लेख बिल्कुल नए हो सकते हैं यां सहायक हो सकते हैं।
आज के लेख की महत्वपूर्ण विशेषता है कि ध्यान के समय तीन शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) को तीन ऊर्जा केंद्रों (Energy centres) से कनेक्ट करने का प्रयास किया गया है। एनर्जी सेंटर्स से सम्बंधित एक सावधानी का भी ज़िकर किया गया है, जिसे ध्यान में रखना आवश्यक है। लेख लिखते समय हमारी रिसर्च से ज्ञात हुआ कि गूगल में एनर्जी सेंटर्स की लोकेशन कुछ अलग सी बताई गयी है लेकिन हम गुरुदेव द्वारा बताए गए ज्ञान को ही फॉलो करेंगें। कल वाले दिव्य सन्देश में भी चक्रों को फिर से स्मरण कराया गया था।
हमारे साथिओं को 8 अक्टूबर 2024 वाला लेख स्मरण होगा जिसमें हमने ध्यान पर आधारित लेख श्रृंखला के 27 दिन के ज्ञान का सारांश प्रस्तुत किया था,यह एक नवीन प्रयोग था लेकिन कमैंट्स के माध्यम से इस प्रयोग को भी भरपूर समर्थन मिला था। इस प्रयोग से प्रोत्साहित होकर कल वाला ज्ञानप्रसाद लेख “उपासना-साधना-आराधना” लेख श्रृंखला का सारांश एवं आगे की रणनीति लेकर आ रहा है, इसे भी उसी तरह उत्कृष्ट बनाने का यथासंभव प्रयास किया जायेगा।
इसी भूमिका के साथ गुरुकुल की दिव्य गुरुकक्षा में गुरुचरणों में समर्पित होकर गुरुज्ञान का अमृतपान करने के लिए चलते हैं।
हर्षोउल्लास से ओतप्रोत Festive season की सभी परिवारजनों को हमारी व्यक्तिगत शुभकामना एवं बधाई।
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“जप एवं ध्यान” के लिए आधा घण्टा गायत्री जप के लिए रखा गया है। माला या घड़ी से गणना की जा सकती है। नियत स्थान, नियत समय और नियत संख्या के तीनों तथ्यों का समन्वय रहने से हर साधना अधिक सफल होती है। जप में कण्ठ, होठ, जीभ आदि सभी स्वर यन्त्र चलते रहें लेकिन उच्चारण इतना धीमा हो कि समीप बैठे व्यक्ति भी ठीक तरह से समझ न सकें। माला का उपयोग हो रहा हो तो तर्जनी काम में नहीं लानी चाहिये।अंगूठा, मध्यमा और अनामिका उंगलियों के सहारे ही दाने खिसकाने चाहिए। बड़े मध्य दाने का उल्लंघन नहीं करना चाहिए । जब 108 दाने पूरे हो जाते हैं तो माला को उलट देते हैं।
ध्यान के समय आंखें लगभग बन्द ही रखी जायं। अधखुले नेत्र में पुतली ऊपर ही रखनी पड़ती है ताकि बाहर के दृश्य ध्यान में बाधा उत्पन्न न करें। जप के साथ-साथ प्रभातकालीन सूर्य का, प्रभा पुंज “सविता देवता का ध्यान” करना चाहिए। पूर्व दिशा से पीतवर्ण सूर्य निकल रहा है, उसकी दिव्य किरणें हमारी समूची सत्ता में X-Rays की तरह प्रवेश कर रही हैं।
ध्यान करते समय कैसा अनुभव किया जाए?
ध्यान के समय यह समझ लेना चाहिए कि मानव के तीन शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) के तीन विशिष्ट केन्द्र हैं,जिन में से होकर सविता देवता का प्रकाश उन शरीरों में प्रवेश करता है।
आगे चलने से पहले यहाँ एक सावधानी बरतने की आवश्यकता है कि “ग्रन्थि” अर्थात गाँठ से सम्बंधित निम्नलिखित जानकारी परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित पुस्तक “गायत्री साधना की सर्वसुलभ विधि” में दिए गए चैप्टर “सर्वांगपूर्ण सुगम उपासना विधि” पर आधारित है। इस लेख को लिखते समय कुछ ऑनलाइन सोर्सेज के अध्ययन से पता चलता है कि यहाँ बताई गयी ग्रंथिओं की लोकेशन ऑनलाइन सोर्सेज से अलग है।
1.स्थूल शरीर का केन्द्र “नाभि” है, यहां रुद्रग्रन्थि का वास माना गया है । सविता देवता की किरणें इस रुद्रग्रन्थि में होकर रक्त-मांस से बने शरीर के प्रत्येक जीवाणु में प्रवेश करती हैं और शक्ति, सक्रियता एवं सच्चरित्रता की प्रचुर मात्रा भर देती हैं यानि सारा स्थूल शरीर एनर्जी से भर जाता है।
2. सूक्ष्म शरीर का केन्द्र “मस्तिष्क” है, उसकी विष्णुग्रन्थि को आज्ञाचक्र कहते हैं। इसमें से होकर सविता देवता का तेज समूचे “विचार विभाग (Department of thoughts)” को आच्छादित कर लेता है। विवेकशीलता, बुद्धिमत्ता एवं सृजनात्मक सद्विचारों की बहुलता, सूक्ष्म शरीर को मस्तिष्क से ही प्राप्त होती है ।
3.कारण शरीर का केन्द्र दोनों पसलियों के बीच स्थित “हृदय” में है। यह “आध्यात्मिक हृदय”, शरीर में धड़कने वाले रक्त के थैले (Organ heart) से भिन्न है। इसे सूर्यचक्र कहते हैं। यहां होकर सविता देवता कारण शरीर में प्रवेश करते हैं और उच्चस्तरीय आदर्शवादी, आस्था; आत्मज्ञान से प्रभावित देवउमंगें (आत्मीयता, करुणा, उदारता) जैसी सद्भावनाएं,अनुदान रूप में प्रदान करते हैं।
गुरुदेव बताते हैं कि अगर सुगम उपासना में इस स्तर के ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है तो समझा जा सकता है कि बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है।
इस स्थिति को प्राप्त होते ही ऐसा अनुभव किया जाना चाहिए कि मेरी सारी सत्ता सूर्य की तरह ज्योतिर्मय हो रही है। अज्ञान का अन्धकार मिट रहा है और उसके साथ जुड़ी अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ (कुत्सायें, कुंठायें) कूच कर रही हैं। आत्मा में सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की हिलोरें उठ रही हैं। “ज्योतिर्मय आत्मसत्ता” अपने प्रकाश से सारे वातावरण को प्रकाशवान बना रही है। जप के साथ-साथ ऐसा ध्यान करने से मन उसी चिंतन-धारा में बहने लगता है और उसे एकाग्रता की प्रैक्टिस हो जाती है, इसे धारा प्रवाह अर्थात Flow of current कहते हैं।
मन का एक केन्द्र बिंदु पर केन्द्रीभूत रहना बहुत आगे की अवस्था है। इस अवस्था को “तुरीयावस्था” कहा गया है जो लगभग “समाधि स्थिति” पर पहुंची हुई अवस्था है।
आरम्भिक साधकों को ऐसी साध्य सफलता के लिए न तो उत्सुक होना चाहिए और न ही प्रयास करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने में सफलता मिले न मिले, भटकन अवश्य हाथ लग जाएगी।
उपासना का अर्थ स्थिर होकर पास बैठना है, भटकन और स्थिरता एक दुसरे के कट्टर शत्रु हैं, दोनों एक दुसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते हैं।
प्रारम्भिक प्रयास में इतनी ही एकाग्रता पर्याप्त है कि मनःसंस्थान की विचारशक्ति एक निर्धारित धारा प्रवाह में बहने लगे। गायत्री माता की गोदी में छोटे बच्चे की तरह खेलना, पयपान करना, सूर्यरूपी अग्निकुण्ड में आत्मसत्ता को हवन के रूप में अर्पित कर देना, दीपक पर पतंगे का आत्मसमर्पण जैसे ध्यान चित्र भी इसी भावप्रवाह के अंग है।
जप एवं ध्यान की समाप्ति पर प्रार्थना करें। गायत्री का कोई स्तोत्र, गायत्री चालीसा अथवा सामान्य भाषा में ही भावपूर्वक मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।
सूर्यार्घ्यदान के लिए पूर्व दिशा में मुँह करके पूजास्थल पर रखे हुए देव शक्तियों के सम्मिलित स्वरूप जल कलश को सूर्य भगवान के निमित्त धार बांध कर चढ़ाना चाहिए। सूर्यदर्शन सम्भव हो तो ठीक है नहीं तो उनका ध्यान करते हुए यह जल चढ़ाया जाय। ध्यान रखा जाए कि जल गन्दी जगह पर न बहने पाये, पैरों के नीचे न कुचलने पाये और तुलसी अथवा अन्य किसी पौधे के गमले में ही उसे गिराया जाय। गमला न हो तो पानी को थाली में गिरा लिया जाय और उसे किसी वृक्ष की जड़ में लगाने के लिए भेज दिया जाय। जल अर्पित समय भावना की जाए कि हम अपने जीवन को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर रहे हैं । सूर्य देवता जल को भाप बना कर सुविस्तृत वायुमंडल में बिखेर रहे हैं। भावना की जाए कि हमारे जीवनरस को,आन्तरिक और भौतिक वैभव को, विश्व सम्पदा बना दिया जायगा। भाप, ओस-बिंदु बन कर पौधों का पोषण करती है। अपनी जीवन संपत्ति भी विश्व सम्पदा बन कर अनेकों का सिंचन कर सके। इसी भावना का प्रतीक यह “सूर्य अर्घ्यदान” है।
इतना सब कृत्य पूरा कर लेने के बाद पूजास्थल पर आकर विदाई करते हुए नमस्कार किया जाय और सब वस्तुओं को समेट कर यथास्थान रख दिया जाय। पूजा में प्रयुक्त अक्षतों को चिड़ियों को डाल दिया जाय। नैवेद्य को प्रसाद रूप स्वयं ले लिया जाय। जल पौधों के गमले में डाला जाय, अगरबत्ती में आग हो तो उसके कारण कोई दुर्घटना न होने पाये ऐसी व्यवस्था कर ली जाय।
साधना के लिए कुछ नियम :
शरीर को शुद्ध करके साधना पर बैठना चाहिये। साधारणतः स्नान द्वारा शुद्धि होती है लेकिन किसी विवशता, ऋतु प्रतिकूलता या अस्वस्थता की दशा में हाथ-मुंह धोकर गीले कपड़े से शरीर पोंछकर भी काम चलाया जा सकता है। साधना के समय जिन सूती वस्त्रों को शरीर पर धारण किया जाये, वह धुले हुए होने चाहिये। पालथी मारकर सीधे ढंग से बैठना चाहिये। कष्टसाध्य आसनों से चित्त में अस्थिरता आती है। बिना आसन बिछाये जमीन पर नहीं बैठना चाहिए। कुश का आसन, चटाई आदि के आसन सर्वोत्तम हैं। पशुचर्म गायत्री साधना के उपयुक्त नहीं। तुलसी या चन्दन की माला लेनी चाहिए। प्रातः काल से 2 घण्टे पूर्व गायत्री साधना प्रारम्भ की जा सकती है। दिन में किसी भी समय जप हो सकता है। सूर्यास्त होने के एक घण्टे बाद तक जप समाप्त कर लेना चाहिए। दो घण्टा प्रातःकाल के और एक घण्टा सायंकाल का यह तीन घण्टे छोड़कर रात्रि के अन्य भागों में नियमित गायत्री साधना नहीं होती है । मौन-मानसिक जप किसी भी समय हो सकता है। प्रातःकाल पूर्व की ओर, शाम को पश्चिम की ओर मुख करके बैठने का विधान है, परन्तु यदि मूर्ति या चित्र किसी स्थान पर स्थापित हो तो दिशा का विचार न करके उसके सम्मुख ही बैठना उचित है।
माला जपते समय सुमेरु (माला के आरम्भ का सबसे बड़ा दाना) उल्लंघन नहीं करना चाहिये। एक माला पूरी होने पर उसे मस्तक से लगाकर पीछे को ही उलट देना चाहिए, इस प्रकार सुमेरु का उल्लंघन नहीं होता। तर्जनी उंगली का जप के समय उपयोग नहीं किया जाता।
मल-मूत्र त्याग या किसी अनिवार्य काम के लिए बीच में उठना पड़े तो हाथ-पांव, मुंह धोकर तब दुबारा बैठना चाहिये। यदि कभी बाहर जाने या अन्य कारणों से जप छूट जाय तो थोड़ा-थोड़ा करके उस छूटे हुए जप को पूरा कर लेना चाहिये, और एक माला प्रायश्चित स्वरूप अधिक करनी चाहिये। जब स्नान की या विधिवत् पूजा की सुविधा न हो या घर में जन्म-मृत्यु का सूतक हो गया हो, तो मन ही मन मौन मानसिक जप इस तरह करना चाहिये कि कण्ठ में ध्वनि होती रहे, होठ हिलते रहें, परन्तु पास में बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से उसे सुन-समझ न सके।
साधक का आहार-विहार सात्विक ही होना चाहिए, जिनका आहार-विहार सात्विक नहीं है, वे भी उपासना कर सकते हैं, क्योंकि उपासना के प्रभाव से उनकी बुराइयां बहुत जल्दी सुधरती हैं और वे कुछ ही दिनों में अनेक बुराइयों को छोड़कर शुद्ध सतोगुणी बनने लगते हैं।
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कल वाले ज्ञानप्रसाद को 461 कमैंट्स प्राप्त हुए,10 साधकों ने 24 से अधिक आहुतियां प्रदान करके ज्ञानयज्ञ का पुण्य प्राप्त किया है जिसके लिए सभी का धन्यवाद् करते हैं।
जय गुरुदेव