वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

हमारे अनुसार ध्यान साधना की कठिनतम प्रक्रिया (ब्रह्मवर्चस साधना)  

आज के लेख का शीर्षक स्वयं ही बता रहा है कि इस लेख में बताई गयी “ध्यान प्रक्रिया” कठिनतम प्रक्रिया है। यह विचार पूर्णतया हमारे व्यक्तिगत हैं क्योंकि हम ध्यान की कक्षा में मात्र नर्सरी के ही विद्यार्थी है। हो सकता है,ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में उच्चस्तर के साधक भी हों जिन्हें इस साधना (ब्रह्मवर्चस साधना) में महारत हो।

“ध्यान प्रक्रिया” को समझ पाने के लिए प्रस्तुत किये गए 13 सरल लेख एवं उसके बाद सरलतम और कठिनतम प्रक्रियाओं के साथ इस लेख श्रृंखला का आज समापन होता है। साथिओं से निवेदन है कि अगर कोई प्रक्रिया कठिन प्रतीत होती है तो उसे पूरी तरह छोड़ देना समझदारी नहीं है, जितना भी समझ आ पाए, प्रयास तो करना ही चाहिए। बिना प्रयास किये छोड़ देने का अर्थ है “युद्ध  से पहले ही हथियार डाल देना।” ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की यह प्रवृति तो नहीं हैं न ?

कल प्रस्तुत  की गयी 30 मिंट की सरलतम प्रक्रिया के अभ्यास के लिए यदि प्रक्रिया के तीनों स्टैप्स में वर्णन की गयी बातें प्रिंट करके (यां फ़ोन पर ही) सामने रख ली जाएँ तो सुविधा हो सकती है।अगर हमारे सहपाठी चाहें तो हम पोस्टर फॉर्म में तीनों  स्टैप्स प्रस्तुत कर सकते हैं। हम आदरणीय सुमनलता बहिन जी के साथ पूरी तरह से सहमत हैं कि 10 मिंट तो क्या हम तो 10 सेकंड भी मन को पकड़ कर बैठ नहीं सकते। शायद ऐसे अनेकों साथी होंगें। मन चंचल (Flickering) जो ठहरा, लेकिन हमारा विश्वास है कि Slow and steady wins the race, आम का वृक्ष भी तो पांच वर्ष के बाद ही फल देता है। आरम्भिक प्रयास का लेवल ही भविष्य का निर्माण करता है। जितना गुड़ डालेंगें,हलवा उतना ही मीठा होगा।  

ध्यान की प्रक्रिया इतनी विस्तृत है कि इसका समापन करना अनुचित ही होगा। कल से हम इसी विषय से गुंथे हुए एक और विषय (उपासना-साधना-आराधना) का शुभारम्भ कर रहे हैं। परम पूज्य गुरुदेव की मात्र 32 पृष्ठों की दिव्य रचना इन लेखों का आधार बनेगीं। अगर हमारे साथिओं ने पिछले शनिवार के विशेषांक में आद. रेणु श्रीवास्तव जी द्वारा वितरित की गयीं 51 पुस्तकों वाले चित्र को ध्यान से देखा होगा तो यह पुस्तक सामने दिखाई दे रही है। बहिन जी द्वारा इस चित्र को प्रस्तुत करने से कईं दिन पहले ही हम गुरुदेव के इस 1980 के उद्बोधन को सेव करके बैठे थे। बहुत ही सरल एवं रोचक उद्बोधन है,बहुतों ने पहले ही इस बहुचर्चित उद्बोधन का  अमृतपान किया होगा लेकिन परिवार में उदाहरणों एवं विचारों सहित चर्चा करके Revise करने में क्या हर्ज़ है। 

तो आइए गुरुदेव के चरणों में प्रणाम करें और ध्यानपूर्वक समर्पित होकर आज की गुरुशिक्षा को अपने अंतर्मन में उतारने का प्रयास करें। कठिन तो अवश्य है लेकिन कुछ तो समझ आएगा ही। 

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गायत्री महामन्त्र के अक्षरों में ब्रह्मविद्या का समस्त तत्वज्ञान बीज रूप में विद्यमान है। साधना विज्ञान की दृष्टि से विविध अनुष्ठानों, पुरश्चरणों एवं तप साधनाओं का विशाल परिकर उसी के साथ समन्वित है। गायत्री का ज्ञानपक्ष  “ब्रह्मविद्या” और विज्ञानपक्ष “वर्चस्” कहलाता है। दोनों को मिलाकर “ब्रह्मवर्चस्” शब्द बनता है। “ब्रह्मवर्चस साधना”  आध्यात्मिक प्रौढ़ता और प्रखरता को पृष्ठभूमि बनाने वाली साधना है।

साधना का स्तर जैसे-जैसे ऊपर उठता है वैसे-वैसे साधक में अधिक तन्मयता और तत्परता का समावेश होता चलाता है। सामान्य उपासना में “जप और ध्यान” पर्याप्त समझा जाता है। ध्यान की भावना अंतर्मन में न बैठ पाए  तो प्रतिमा के सहारे “प्रत्यक्ष दर्शन” से भी वह काम चलाया जा सकता है, इसमें कोई हर्ज़ नहीं है। धीरे-धीरे जब स्तर बढ़ता है तो अनुष्ठानों और पुरश्चरणों के माध्यम से साधक को अधिक कठोर अनुशासनों में कसना आरम्भ कर दिया जाता है। 

सभी जानते हैं कि पुरश्चरणों में जप की संख्या का नियत होना ही पर्याप्त नहीं बल्कि उसके साथ-साथ उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमि शयन, अपनी सेवा आप करना जैसे प्रतिबन्ध लगते हैं। और नियत समय, नियत संख्या, अन्त में अग्निहोत्र, ब्रह्मभोज आदि के कितने ही उपक्रम जुड़ जाते हैं।अगर इन प्रतिबन्धों का पालन न हो, केवल अस्त-व्यस्त रीति से जब  मन किया, समय मिला, संख्या पूरी कर ली जाय तो पुरश्चरण से प्राप्त होने वाली उपलब्धियां न मिल सकेगीं। सच पूछा जाय तो साधना के उच्चस्तरीय क्षेत्र में पहुँचने पर “तपश्चर्या” ही प्रमुख हो जाती है। वही बन्दूक का काम करती है, मन्त्र तो उसके साथ कारतूसों की तरह समन्वित रहते हैं।

परम पूज्य गुरुदेव ने परिवार के समस्त साधकों को व्यक्तिगत जीवन में तपश्चर्या का समावेश करने के लिए गुरुवार को अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य एवं दो घन्टे के मौन की तप साधना का समावेश अनिवार्य कर दिया गया है। ज्ञानयज्ञ के लिए “सम्पर्क की तीर्थयात्रा” को “सामाजिक क्षेत्र की तपश्चर्या” कहा गया है और जो परिजन केवल जप आदि  करके अपनी साधना की पूर्णता मान लेते थे उन्हें कहा गया है कि तपश्चर्या की दिशा में बढ़ना चाहिए। इस दिशा में वे जितनी प्रौढ़ता और प्रखरता का परिचय देंगे, उसी अनुपात में  वोह  अपने साधन प्रयत्नों को सफल होते देखेंगे। भगवान को अनुनय-विनय से फुसलाया नहीं जा सकता, उनके लिए कुछ कर दिखाना पड़ता है। क्या दिखाना पड़ता है ? भगवान के इस विशाल खेत में बहुत कुछ करने के लिए है, जिसमें भी साधक की रूचि और सामर्थ्य हो,समय देना चाहिए।  

तप द्वारा भगवान का अनुग्रह खरीदा जा सकता  है। यह तथ्य क्रमशः परिजनों के सामने उजागर होता चला जा रहा है। अब उन्हें दबाव देकर अपनी परिष्कृत मनःस्थिति और आन्तरिक प्रौढ़ता के अनुरूप साधन क्षेत्र में अधिक कठोरता अपनाने के लिए अनुरोध आग्रह किया जा रहा है।  गायत्री परिवार के सूत्र संचालकों ,परम पूज्य गुरुदेव/परम वंदनीय माता जी ने  भी अपनी विशेष स्थिति तपश्चर्या का अवलंबन करके ही प्राप्त की है। अनुकरण कर्ताओं को भी इसी पुण्य परम्परा को अपनाने और कुछ कहने लायक उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए विशेष रूप से इंगित किया जा रहा है।

समय साध्य और क्रमशः अधिक कठोर होती जा रही  साधना पद्धति का एक महत्वपूर्ण सुनियोजित साधनाक्रम “चन्द्रायण व्रत की तपश्चर्या और पंचकोशी योग साधना पद्धति के साथ जुड़ा हुआ है।” 

इसका परिचय प्रशिक्षण और अभ्यास करने के लिए इन दिनों गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की साधना स्थली और समर्थ संरक्षण में “ब्रह्मवर्चस् साधना क्रम” चल पड़ा है।

ब्रह्मवर्चस साधना की प्रक्रिया   के रूप में यह साधना सत्र एक-एक महीने के रखे गये हैं और महीना अंग्रेजी महीने न रखकर भारतीय कलैण्डर के अनुरूप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का कर दिया गया है। चान्द्रायण व्रत की उसी से संगति भी है। यह एक महीने चलेगा। साथ ही इसी एक महीने में सवालक्ष गायत्री का पुरश्चरण भी करना होगा। पुरश्चरण के अतिरिक्त पाँच कोशों के अनावरण के लिए निम्नलिखित पांच साधनाएँ अतिरिक्त रूप से भी करनी होंगी:

(1) त्राटक (2) सूर्य भेदन प्राणायाम (3) शक्तिचालिनी मुद्रा (4) खेचरी मुद्रा (5) हंसयोग सोऽहम् साधना। 

इन पाँचों का समन्वित साधनाक्रम ऐसा है जिसमें पंच कोशों के अनावरण के अतिरिक्त कुण्डलिनी जागरण का प्रारम्भिक चरण भी इसी अवधि में पूरा हो जाता है। ऐसा करने से  आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक ले पहुँचने वाला अवरुद्ध द्वार खुल जाता है, जिस पर चलते हुए पग-पग पर भौतिक सिद्धियों से लौकिक सफलता और आत्मिक विभूतियों की अतीन्द्रिय क्षमता उपलब्ध करते चलना सम्भव हो जाता है।

साधना की अवधि में मात्र गंगा जल पीना होता है। गंगा अति निकट है,वहीं से अपने पीने के लिए सभी साधक स्वयं गंगाजल लाते है और उसी से प्यास बुझाते है। युवाओं के लिए नित्य गंगा स्नान में भी कोई कठिनाई नहीं पड़ती। वृद्धों को शीत ऋतु में गंगा जल गर्म  करके स्नान करने की भी सुविधा रहती है। नित्य प्रातः काल पंचगव्य पान करना होता है। गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का पानी को सामूहिक रूप से पंचगव्य कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे औषधि की मान्यता है। इसके उपरान्त ही अन्य कोई पेय या भोजन मुख में जा सकता है। नित्य आहार में हविष्यान्न (तिल, जौ, चावल आदि ) से बनी एक रोटी और अमृत कल्प (ब्राह्मी, शतावरि, वच, शंखपुष्पी, गोरख मुण्डी, आंवला, अदरक और सेन्धा नमक) में आध्यात्मिक अष्टवर्ग सम्मिश्रित रहता है। च्यवनप्राश अवलेह में शरीर को युवा बनाने वाला अष्टवर्ग है। हविष्यान्न की रोटी और अमृत अष्टवर्ग की चटनी का आहार ऐसा है जिससे ‘‘जैसा खाए अन्न वैसा बने मन’’ की उक्ति प्रत्यक्ष चरितार्थ होती है। विचारों  में उत्कृष्टता का अभिनव परिचय आहार में इस चरु का समावेश होने से तत्काल दिखने  लगता है। यूँ तो शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से चान्द्रायण व्रत में हर दिन चौदहवाँ अंश घटाया जाता है, इसके बाद एक चौदहवां भाग बढ़ाते हुए पूर्णिमा को पूर्ण आहार तक पहुँचाना होता है। यह कई दुर्बल मनःस्थिति के व्यक्तियों के लिए कठिन पड़ता है। इसलिए इस अवधि में शाक और दूध/छाछ की मात्रा बढ़ाते रह कर सन्तुलन बनाए रहने की सुविधा रखी गई है। हविष्यान्न की एक रोटी को प्रसाद चरु माना जाता है। इससे भी कुछ आहार बना रहता है। हविष्यान्न में प्रयुक्त होने वाले जौ, गौ मूत्र में भिगोकर सुखाए और संस्कारित किए  जाते हैं। 

 प्रायः इसी स्तर के आहार का समावेश “ब्रह्मवर्चस् साधना सत्र” में गायत्री की उच्चस्तरीय साधना करने वाले साधकों को मिलता रहे इसका विशेष प्रबन्ध रखा गया है।

प्रातः 3:30 बजे उठना, उठते ही सामूहिक प्रार्थना, फिर शौच स्नान से निवृत्ति। प्रातःकाल का जप ध्यान, 6:00 बजे  पंचगव्य चाय। इसके अतिरिक्त 7:00  से 8:30 बजे तक यज्ञ। 9:30  बजे भोजन, मध्याह्न बाद से 1:30  बजे तक प्रवचन। तीसरे पहर चाय। और उसके उपरांत विचार गोष्ठी। 5:00  बजे सांय भोजन, गंगा दर्शन गंगा जल लाना। 7:00  से 7:30 तक  सामूहिक आरती। 7:30 से 8:00 बजे तक  सामूहिक ध्यान। 8:30 बजे सो जाना। गुरुवार को अस्वाद व्रत जैसे नियमों उपनियमों का पालन करते हुए परम सात्विक दिनचर्या का निर्वाह करते हुए एक महीने का योग, तप, विनियोग साधा जाता है। इसी अवधि में दिव्य संरक्षण और दिव्य अनुदान का अनवरत लाभ मिलता रहता है। साधना की सफलता ऐसे ही अनेक सुयोगों का संगम मिल जाने से किस प्रकार सम्भव होती है इसे साधक प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।

समापन 

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कल प्रस्तुत किये गए लेख को 513  कमैंट्स  मिले, 12  युगसैनिकों (साधकों) ने,  24 से अधिक आहुतियां (कमैंट्स)  प्रदान करके ज्ञान की इस दिव्य यज्ञशाला का सम्मान बढ़ाया है जिसके लिए सभी को बधाई एवं सामूहिक सहकारिता/सहयोग  के लिए धन्यवाद्। जय गुरुदेव


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